केन्द्र-राज्य संबंध (उत्तर प्रदेश)

उत्तर प्रदेश केन्द्र-राज्य संबंध

भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत उसके संघीय ढांचे की जड़ों में बसती है, जहाँ केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बारीक संतुलन एक मजबूत राष्ट्र की नींव रखता है। उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य के परिप्रेक्ष्य में 'केन्द्र-राज्य संबंध' का ताना-बाना और भी दिलचस्प हो जाता है। इस विस्तृत लेख में हम संविधान की सातवीं अनुसूची में दर्ज विधायी शक्तियों के बंटवारे, प्रशासनिक तालमेल, वित्तीय संसाधनों के वितरण से लेकर अंतर्राज्यीय परिषदों और वित्त आयोग की भूमिका को गहराई से समझेंगे। साथ ही, सरकारिया और पुंछी आयोग की ऐतिहासिक सिफारिशों का भी सटीक विश्लेषण करेंगे, जो हर प्रतियोगी परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
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भारतीय संविधान: केन्द्र-राज्य संबंध

संविधान (संघीय ढांचा)
विधायी संबंध
(कानून निर्माण)
प्रशासनिक संबंध
(कार्यपालिका शक्ति)
वित्तीय संबंध
(राजस्व वितरण)

सातवीं अनुसूची: शक्तियों का विभाजन

संघ सूची

100 विषय (मूल 97)

अधिकार: केवल केन्द्र सरकार (संसद)

  • रक्षा, विदेशी संबंध, परमाणु ऊर्जा
  • रेलवे, बैंकिंग, मुद्रा, बीमा
  • जनगणना, नागरिकता, निगम कर

राज्य सूची

61 विषय

अधिकार: राज्य विधानमंडल

  • स्थानीय शासन, पुलिस, जेल
  • कृषि, सिंचाई, लोक स्वास्थ्य
  • शराब उत्पादन एवं परिवहन

समवर्ती सूची

52 विषय

अधिकार: केन्द्र व राज्य दोनों

  • विवाद होने पर केन्द्रीय कानून को वरीयता।

अवशिष्ट शक्तियां

अनुच्छेद 248

अधिकार: केवल संसद

  • जो विषय तीनों सूचियों में नहीं हैं।
  • नए करों का अधिरोपण।

भारत की निधियां (अनुच्छेद वार तुलना)

निधि का नाम अनुच्छेद स्रोत (Source) व्यय की शर्त / अनुमति
संचित निधि
(Consolidated Fund)
266 (1) समस्त कर, राजस्व, सरकार द्वारा लिए गए ऋण संसद की पूर्व अनुमति अनिवार्य है।
आकस्मिक निधि
(Contingency Fund)
267 विधि द्वारा अवधारित राशियां राष्ट्रपति के अधीन। पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं, किंतु बाद में स्वीकृति अनिवार्य।
लोक निधि
(Public Account)
266 (2) भविष्य निधि, बचत खाता, न्यायिक जमा आदि सरकार केवल देख-रेख करती है (स्वामित्व नहीं)।

प्रमुख संस्थाएं एवं समितियां

अंतर्राज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263)

गठन: 1990 (राष्ट्रपति द्वारा)

अध्यक्ष: प्रधानमंत्री

  • विवादों की जांच व सुझाव देना।
  • समान हितों पर विचार-विमर्श।
  • निर्णय आम सहमति से होते हैं।

क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)

गठन: राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956

अध्यक्ष: केन्द्रीय गृहमंत्री

  • यह वैधानिक निकाय हैं (संवैधानिक नहीं)।
  • कुल 5 परिषदें (उत्तरी, मध्यवर्ती, पूर्वी, पश्चिमी, दक्षिणी)।
  • उत्तर प्रदेश मध्यवर्ती परिषद (प्रयागराज) में है।

केन्द्र-राज्य संबंधों पर प्रमुख आयोग

आयोग का नाम गठन / रिपोर्ट प्रमुख सिफारिशें (मुख्य बिंदु)
सरकारिया आयोग
(अध्यक्ष: आर. एस. सरकारिया)
1983 / 1987
  • राज्यपाल की नियुक्ति में CM की अनिवार्य सहमति।
  • बहुमत होने पर विधानसभा भंग न हो।
  • अनुच्छेद 356 का प्रयोग अंतिम विकल्प के तौर पर हो।
  • समवर्ती सूची पर कानून बनाने से पहले राज्यों से परामर्श।
पुंछी आयोग
(अध्यक्ष: मदन मोहन पुंछी)
2007 / 2010
  • आंतरिक सुरक्षा हेतु विशिष्ट संस्था का निर्माण।
  • अनुच्छेद 355 एवं 356 में आवश्यक सुधार।
  • राज्यपाल की नियुक्ति में CM से परामर्श।

भारतीय संविधान में संघवाद का विशिष्ट स्वरूप अपनाया गया है। यहां संघीय व्यवस्था के अनुरूप केन्द्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन तो किया गया, परंतु राज्यों की तुलना में केन्द्र को अधिक शक्तियां प्रदान की गई हैं।

शक्तियों का विभाजन

भारतीय संघात्मक व्यवस्था के अंतर्गत संघ एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन दिखायी देता है। यहां संविधान द्वारा शासन की तमाम शक्तियों का विभाजन तीन वर्गों में किया गया है-
  • संघ सूची
  • राज्य सूची
  • समवर्ती सूची
संघ सूची के विषयों पर केन्द्र सरकार को तथा राज्य सूची के विषयों पर राज्य सरकार को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है।
  • समवर्ती सूची पर राज्य तथा केन्द्र दोनों कानून बना सकते हैं, परंतु एक ही विषय पर निर्मित दोनों के कानून में केन्द्रीय कानून को वरीयता दी जाएगी।
  • अनुच्छेद 263 के तहत संविधान राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह केन्द्र और राज्यों के बीच अथवा राज्य और राज्यों के बीच उठते हुए विवाद के समाधान हेतु एक अन्तर्राज्यीय परिषद् स्थापित करे, जिससे उन्हें न्यायिक प्रक्रियाओं से न गुजरना पड़े।
  • जून, 1990 में राष्ट्रपति द्वारा अन्तर्राज्यीय परिषद् का औपचारिक गठन किया गया। इस परिषद् का नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं। इसमें केन्द्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री सम्मिलित होते हैं।
संविधान के परिप्रेक्ष्य में संघ तथा राज्यों के मध्य संबंधों को तीन रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है-
  1. संघ और राज्यों के मध्य विधायी संबंध
  2. संघ और राज्यों के मध्य प्रशासनिक संबंध
  3. संघ और राज्यों के मध्य वित्तीय संबंध

संघ और राज्यों के मध्य विधायी संबंध

  • संविधान में संघ तथा राज्य सरकारों के विधायी संबंधों एवं क्षेत्राधिकार का स्पष्ट विभाजन किया गया है।
  • केन्द्रीय संसद तथा राज्य विधायिका द्वारा अपनी अधिकारित शक्तियों का प्रयोग संविधान के भीतर किया जा सकता है, संविधान के बाहर नहीं।
  • संसद सर्वोच्च है, यद्यपि वह भी विधि के शासन के अनुपालन हेतु बाध्य है।
  • केन्द्र सरकार देश के किसी हिस्से के लिए विधि का निर्माण कर सकती है, जबकि राज्य सरकार अपने संपूर्ण राज्य अथवा उसके किसी भू-भाग के लिए विधि का निर्माण करने को स्वतंत्र है।

संघसूची, राज्यसूची एवं समवर्ती सूची
संविधान द्वारा सातवीं अनुसूची में संपूर्ण विषयों को तीन भागों में विभक्त गया है। इसका संक्षिप्त विवरण निम्नरूपेण दिया जा सकता है-
  • संघसूची : इसमें राष्ट्रीय महत्व के '97' विषयों (वर्तमान में 100 विषय) को समाहित किया गया है। इस सूची पर कानून बनाने का संसद को अनन्य शक्ति प्राप्त है।
  • संघ सूची के विषयों में शामिल हैं- रक्षा, वैदेशिक संबंध, परमाणु उर्जा, रेलवे, बैंक, डाक, तार, रिजर्व बैंक, टेलिफोन, विदेश व्यापार, नागरिकता, जनगणना, मुद्रा, विदेशी ऋण, बीमा, विनिमयपत्र, चेक, प्रतिज्ञा पत्र, बाट माप, कृषि आय से भिन्न आयकर, सीमा शुल्क, निगम कर, वायु मार्ग, ब्रॉडकास्टिंग, चलचित्रों की मंजूरी आदि।
  • राज्य सूची: इस सूची में ऐसे 61 विषयों को शामिल किया गया है, जिस पर राज्य का विधान मंडल कानून बना सकता है। इन विषयों में स्थानीय शासन, पुलिस, जेल, परिवहन, कृषि, सिंचाई, लोक स्वास्थ्य, शराब का उत्पादन तथा विपणन, स्वच्छता आदि शामिल हैं।
  • समवर्ती सूची: इस सूची के अंतर्गत 52 विषय हैं। इस विषय पर केन्द्र तथा राज्य विधान मंडल दोनों कानून बना सकते हैं परंतु केन्द्र तथा राज्यों द्वारा निर्मित कानून में यदि विवाद होता है तो केन्द्रीय कानून को वरीयता दी जाएगी।
  • अवशिष्ट शक्ति: संविधान के अनुच्छेद 248 में अवशिष्ट शक्तियों का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार (1) संसद को किसी ऐसे विषय के संबंध में जो समवर्ती अथवा राज्य सूची में शामिल नहीं है, विधि बनाने की अनन्य शक्ति है। (2) ऐसी शक्ति के अंतर्गत ऐसे कर के अधिरोपण के लिए जो उपर्युक्त तीनों सूचियों में से किसी में वर्णित नहीं है, विधि बनाने की शक्ति है।
संसद द्वारा बनाई गई विधि मात्र भारतीय राज्य क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि विश्व के किसी हिस्से में निवास करने वाले भारतीय नागरिक तथा उनकी परिसम्पत्तियों पर लागू होगी।
संविधान में केन्द्र को न केवल समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दिया गया है, बल्कि अवशिष्ट शक्तियों पर भी पूर्ण नियंत्रण प्रदान किया गया है।
अनुच्छेद 249 में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि यदि आवश्यक हो तो राज्य सभा दो-तिहाई बहुमत से पारित संकल्प द्वारा राज्य सूची के विषयों पर संकल्प पारित कर संसद को विधि बनाने के लिए अधिकृत कर सकती है। ऐसी विधि एक वर्ष के लिए प्रभावी होगी।
राज्य-सूची के कुछ विषयों पर विधि-निर्माण से पूर्व राज्य को राष्ट्रपति से अनुमति लेनी होती है, यथा-राज्य सूची में वर्णित व्यापार आदि।

विधायी संबंधों में तनाव एवं सुधार के उपाय

  • कई बार संघ और राज्य के बीच विधायी संबंध असंतुलित हो जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में संघ-राज्य संबंध को अधिक संतुलित और लोकतांत्रिक बनाये जाने की आवश्यकता है।
  • जबतक अनिवार्य न हो, संघ को समवर्ती सूची से संबंधित विषयों पर कानून बनाने से बचना चाहिए।
  • राज्य सूची के संदर्भ में संघीय हस्तक्षेप को न्यूनतम रखा जाना चाहिए।
  • यदि राज्यपाल अनुच्छेद 200 के तहत राज्य विधान-मंडल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करते हैं, तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को शीघ्र अपना निर्णय देना चाहिए।

केन्द्र तथा राज्यों के मध्य प्रशासनिक संबंध

  • संविधान के भाग-XI में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य के प्रशासनिक संबंधों का वर्णन है।
  • अनुच्छेद 256 में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा, जिससे संसद द्वारा बनाई गई शक्तियों तथा मौजूद ऐसी विधियों का, जो राज्य में लागू हैं, का अनुपालन सुनिश्चित हो सके।
  • अनुच्छेद 257 (1) में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका द्वारा शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा, जिससे संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में कोई रुकावट न आए।
  • संविधान के अनुच्छेद 285 (1) में कहा गया है कि संसद किसी राज्य सरकार की सहमति से संघीय कार्यपालिका शक्ति से संबद्ध किसी विषय को उस राज्य सरकार अथवा उसके पदाधिकारियों को सौंप सकती है।
  • संविधान में राज्य तथा केन्द्र हेतु पृथक-पृथक सेवाओं की व्यवस्था दी गई है, परंतु संविधान में दोनों के लिए एक संयुक्त सेवा के गठन का भी प्रावधान किया गया है।

केन्द्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों में तनाव के कारण एवं समाधान

केन्द्र तथा राज्यों के संबंध में प्रशासनिक क्षेत्राधिकार को लेकर कई बार मतभेद एवं विवाद सामने आते हैं।
ऐसे मुख्य मामलें जिनमें केंद्र तथा राज्यों के मध्य कई बार मतभेद पैदा हो जाते हैं, वे हैं-
  • अखिल भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण का मामला।
  • राज्यपालों के क्षेत्राधिकार का मामला।
  • राज्यों की कानून व्यवस्था में हस्तक्षेप का मामला।
अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी राज्य प्रशासन के शीर्ष पर विद्यमान रहते हैं तथा राज्यों को प्रशासनिक कार्यों में सहायता उपलब्ध कराते हैं। अखिल भारतीय सेवा के इन अधिकारियों को नियमतः राज्य सरकार के अधीन कार्य करना पड़ता है, किन्तु उनका नियंत्रण संघ द्वारा किया जाता है।
इन अधिकारियों पर संघ तथा राज्य की योजनाओं के क्रियान्वयन का दायित्व होता है। राज्य सरकारें प्रायः आरोप लगाती हैं कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारी केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं तथा इन अधिकारियों द्वारा केंद्रीय योजना के क्रियान्वयन को प्राथमिकता तथा राज्य सरकार की योजनाओं की अनदेखी की जाती है।
संघ-राज्य के मध्य प्रशासनिक संबंधों के विवाद का अन्य बड़ा कारण राज्यपाल की भूमिका को लेकर उठने वाले मुद्दे हैं।
राज्यपाल की भूमिका को लेकर प्रायः उन राज्यों में विवाद उठ खड़ा होता है, जहाँ केन्द्र की सत्तारूढ़ - पार्टी से भिन्न पार्टी की सरकार होती है। राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त कार्य करते हैं और राष्ट्रपति प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं। ऐसी स्थिति में राज्यपाल अपने पद पर बने रहने के लिए प्रायः संघ सरकार को प्रसन्न रखने का प्रयास करते हैं।
राज्यपाल की भूमिका को लेकर विवाद से बचने हेतु आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे व्यक्तियों को राज्यपाल नियुक्त किया जाए, जो न तो सक्रिय राजनीतिज्ञ हैं और न ही सक्रिय राजनीति में आने की इच्छा रखते हैं। इस संदर्भ में सरकारिया आयोग ने महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं।
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केन्द्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय संबंध

  • संविधान में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य संसाधनों के विभाजन तथा उसके समन्वय एवं संबंधों के निर्धारण हेतु स्पष्ट व्यवस्था दी गई है।
  • केन्द्र तथा राज्यों के मध्य वित्तीय संबंध लचीला बनाए रखने हेतु दोनों के मध्य एक वित्त आयोग के गठन की व्यवस्था दी गई है।
  • संविधान में वित्तीय व्यवस्था के संदर्भ में स्पष्ट उपबंध किए गए है। अनुच्छेद 265 कहता है कि विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर अधिरोपित या संग्रहित नहीं किया जाएगा। किसी कार्यपालिका द्वारा कोई नया कर नहीं अधिरोपित किया जा सकता है।

भारत की निधियां (Funds of India)

संचित निधि (Consolidated Fund)

संविधान के अनुच्छेद 266 (1) में संचित निधि का प्रावधान किया गया है। इस निधि का सृजन निम्नलिखित स्रोतों से होता है-
  • सरकार को प्राप्त समस्त कर, राजस्व एवं गैर कर राजस्व।
  • सरकार द्वारा अग्रिम उपायों के रूप में लिये गये समस्त ऋण, राजकोषीय बिल आदि।
  • इस निधि से कोई राशि संसद की पूर्व अनुमति के बिना व्यय नहीं की जा सकती।
  • राज्य सरकारों के लिए 'राज्य संचित निधि' (State consolidated fund) का प्रावधान है, जिसकी राशि व्यय करने के लिए संबंधित राज्य विधानसभा से अनुमति लेने की आवश्यकता होती है।

आकस्मिक निधि (Contigency Fund)

संविधान के अनुच्छेद 267 के अनुसार भारत में राष्ट्रपति के अधीन 'आकस्मिक निधि' का निर्माण किया जाता है, जिससे आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
इस निधि से सरकार के उन व्ययों की पूर्ति की जाती है, जिनमें विलंब नहीं किया जा सकता।
आकस्मिक निधि से धनराशि व्यय करने के लिए संसद अथवा विधानसभा से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती, किंतु व्यय के बाद उसकी स्वीकृति सदन से कराना अनिवार्य होता है।

लोक निधि (Public Account)

  • संविधान के अनुच्छेद 266 (2) में इस निधि का प्रावधान किया गया है। इसका निर्माण सरकार द्वारा कर राजस्व के अतिरिक्त अन्य लोक बचत आदि स्रोतों से प्राप्त धनराशि से किया जाता है।
  • उदाहाण- कर्मचारी भविष्य निधि, बचत खाता जमा, न्यायिक जमा, विभागीय जमा आदि।
  • सरकार के पास लोकनिधि का स्वामित्व नहीं होता, वह इसका मात्र देख-रेख करती है।

संचित निधियां एवं लोक लेखा (Consolidated Fund and Public Account)

  • अनुच्छेद 266 यह उपबंध करता है कि भारत सरकार की संचित निधि, उसको प्राप्त संपूर्ण राजस्व, उस सरकार द्वारा जारी हुंडियां निर्गमित करके उधार द्वारा प्राप्त सभी धनराशियों से निर्मित होंगी। इसी प्रकार राज्य की भी संचित निधि बनेगी।
  • भारत सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा या उसकी ओर से प्राप्त सभी अन्य लोक धनराशियां यथास्थिति भारत के लोक लेखा अथवा राज्य के लोक लेखा में जमा की जाएंगी।
  • संचित निधि से कोई भी धनराशि मात्र विधि के अनुसार तथा इस संविधान में उपबंधित प्रयोजनों के लिए और रीति से ही विनियोजित की जा सकती है।

आकस्मिक निधि (Contigency Fund)

संविधान के अनुच्छेद 267 में कहा गया है कि संसद विधि द्वारा एक आकस्मिकता निधि की स्थापना करेगी। इसमें विधि द्वारा अवधारित राशियां समय-समय पर जमा की जाएंगी। यह निधि कार्यपालिका के अधीन होगी।

संघ तथा राज्यों के मध्य राजस्व का वितरण

  • संविधान के अनुच्छेद 268 में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य राजस्व वितरण की व्यवस्था दी गई है।
  • समवर्ती सूची पर केन्द्र तथा राज्य दोनों सरकारें कर आरोपित कर सकती है, परंतु संघ सूची पर केन्द्र तथा राज्य सूची के विषयों पर राज्य सरकारें कर आरोपित करती हैं।
  • राज्य सूची में वर्णित विषयों पर लगाए गए करों पर राज्य सरकार का अधिकार होता है, परंतु संघ सूची में वर्णित विषयों पर लगाए गए करों में से कुछ कर पूर्णतः या अंशतः राज्यों में वितरित किए जाते हैं।

वित्त आयोग (Finance Commission)

  • संविधान का अनुच्छेद 280 यह व्यवस्था देता है कि राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर अथवा उससे पहले एक वित्त आयोग की स्थापना करेगा।
  • वित्त आयोग में एक अध्यक्ष तथा 4 सदस्य होंगे। संसद विधि द्वारा सदस्यों की सेवा शर्तें निर्धारित कर सकेगी।
  • आयोग को सिविल न्यायालय की तमाम शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

वित्त आयोग निम्नांकित तथ्यों पर अपनी अनुशंसा राष्ट्रपति को प्रस्तुत करेगा-
  • संघ तथा राज्यों के मध्य करों के शुद्ध आगमों के वितरण तथा ऐसे आगमों में राज्य के भाग के आवंटन के संबंध में।
  • भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्वों में समस्त अनुदान को शामिल करने वाले सिद्धान्तों के संबद्ध में।
  • राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सौंपे गए किसी अन्य विषय में।
  • अनुच्छेद 281 के अनुसार राष्ट्रपति वित्त आयोग द्वारा की गई प्रत्येक सिफारिश को तथा उस पर की गई कार्यवाही के स्पष्टीकरण को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएंगे।

16वां वित्त आयोग

  • सरकार ने राष्ट्रपति के अनुमोदन से संविधान के अनुच्छेद 280 (1) के अनुसरण में नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डा. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में 16वें वित्त आयोग का गठन किया है।
  • श्री ऋत्विक रंजनम पाण्डे को आयोग का सचिव नियुक्त किया गया है।
  • पूर्व सचिव व्यय अजय नारायण झा, एसबीआई समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष, पूर्व विशेष सचिव व्यय एनी जार्ज मैथ्यू एवं अर्थ ग्लोबल के कार्यकारी निदेशक निरंजन राजाध्यक्ष को 16वें वित्त आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया है।

16वें वित्त आयोग को निम्नलिखित विषयों के संबंध में सिफारिशें प्रस्तुत करनी हैं-
  • संघ और राज्यों के मध्य करों की निवल आय का वितरण, जो संविधान के अध्याय I भाग XII के अधीन उनके बीच विभाजित किया जाना है, अथवा किया जा सकता है, और ऐसी आय से संबंधित शेयरों के राज्यों के बीच आवंटन-
  • जो भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व के सहायता अनुदान को नियंत्रित करे और संविधान के अनुच्छेद 275 के अधीन राज्यों को उनके राजस्व के सहायता अनुदान के रूप में उस अनुच्छेद के खंड (1) के प्रावधानों में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के अतिरिक्त अन्य प्रयोजनों के लिए भुगतान की जाने वाली राशि, तथा
  • राज्य के वित्त आयोग द्वारा की गयी सिफारिशों के आधार पर राज्य में पंचायतों और नगर पालिकाओं के संसाधनों को संपूरित करने के लिए राज्य की संचित निधि में वृद्धि करने के लिए आवश्यक उपाय।
  • 16वें वित्त आयोग को 1 अप्रैल, 2026 से आरंभ होने वाले 5 वर्षों की अवधि को कवर करते हुए 31 अक्टूबर, 2025 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देनी है।

उत्तर प्रदेश में छठा वित्त आयोग

  • लंबी अवधि के पश्चात उत्तर प्रदेश में छठें वित्त आयोग का गठन हो गया है।
  • वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दीपक कुमार को छठें वित्त आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
  • राज्य के छठें वित्त आयोग के सचिव सिद्धार्थ श्रीवास्तव बनाये गये हैं।
  • राज्यपाल द्वारा राज्य वित्त आयोग के सदस्य के रूप में नील रतन कुमार तथा आलोक दीक्षित की नियुक्ति की गयी है।

अंतर्राज्यीय परिषद (Inter-State Council)

अनुच्छेद, 263 में कहा गया है कि किसी भी समय यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत हो कि लोकहित में अंतर्राज्यीय परिषद का गठन कर उसे दायित्व सौंपा जाना चाहिए, तो वह उसका गठन कर सकता है।
परिषद के निम्नलिखित दायित्व हैं-
  • राज्यों के मध्य उठने वाले विवादों की जाँच करना और उन पर सुझाव देना।
  • उन मामलों की जांच करना व विचार विमर्श करना, जिनमें केंद्र व एक या एकाधिक राज्यों का समान्य हित निहित है।
  • उन मामलों, विशेषतः ऐसे मामलों में अनुशंसाएं करना, जो समन्वय की नीति व उन मामलों पर उठाए जाने वाले कदमों के बेहतर क्रियान्वयन में सहायक हों।
अंतर्राज्यीय परिषद का दायित्व महत्त्वपूर्ण मुद्दों की जांच व सलाह देने का है, न कि उन पर निर्णय लेने का।

राष्ट्रपति ने 1990 में अंतर्राज्यीय परिषद का गठन किया, जिसका संगठन निम्नलिखित है-
  • प्रधानमंत्री (अध्यक्ष के रूप में)।
  • राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, जहाँ विधानसभाएँ हों।
  • केन्द्रीय कैबिनेट के 6 मंत्री (सदस्य के रूप में)।
परिषद की बैठकें कैमरे के समक्ष होती हैं और इसके निर्णय आम सहमति (Consensus) से लिए जाते हैं।

क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)

क्षेत्रीय परिषदें वैधानिक (संवैधानिक नहीं) निकाय हैं।
क्षेत्रीय परिषद केन्द्र-राज्य संबंधों को सुधारने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस संस्था को 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत स्थापित किया गया है।
अधिनियम अन्तर्गत कुल पाँच क्षेत्रीय परिषदें गठित की गयी हैं, जो गोवा, दमन-दीव, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह तथा लक्षद्वीप को छोड़कर शेष सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को अपने में समाविष्ट करती हैं।
वर्ष 1971 में अलग से उत्तर पूर्वी परिषद अधिनियम द्वारा 'उत्तर-पूर्वी परिषद' का गठन किया गया। इसमें मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, असम, नगालैण्ड, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम शामिल हैं।
  • उत्तरी क्षेत्रीय परिषद: इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसमें हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, लद्दाख तथा चंडीगढ़ शामिल हैं।
  • मध्यवर्ती क्षेत्रीय परिषद: इसका मुख्यालय प्रयागराज है। इसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड एवं छत्तीसगढ़ शामिल हैं।
  • पूर्वी क्षेत्रीय परिषद: मुख्यालय कोलकाता है। इसमें बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा व सिक्किम शामिल हैं।
  • पश्चिमी क्षेत्रीय परिषदः मुख्यालय मुम्बई है। इसमें महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा राज्य तथा दादर एवं नगर हवेली तथा दमन-दीव केन्द्र शासित प्रदेश शामिल हैं।
  • दक्षिणी क्षेत्रीय परिषदः इसका मुख्यालय चेन्नई है। इसमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु राज्य तथा संघशासित पुद्दुचेरी शामिल हैं।

संगठनात्मक ढांचा

प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद का अध्यक्ष केन्द्रीय गृहमंत्री होता है, जबकि इसमें सम्मिलित राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री तथा प्रत्येक राज्य से राज्यपाल द्वारा नामित दो मंत्री इसके सदस्य होते हैं। मुख्यमंत्री बारी-बारी से एक वर्ष के लिए परिषद के उपाध्यक्ष का पद संभालते हैं।

सरकारिया आयोग

उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आर. एस. सरकारिया की अध्यक्षता में 1983 में तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया गया, जिसे सरकारिया आयोग के नाम से जाना जाता है। इस समिति के अन्य सदस्य थे- वी शिवरामन तथा एम. आर. सेन।
सरकारिया आयोग की सिफारिशों को केन्द्र-राज्य संबंधों के निर्धारण हेतु महत्वपूर्ण माना जाता है। इस आयोग ने केन्द्र-राज्य संबंध पर अपनी रिपोर्ट 1987 में प्रस्तुत की, जिसमें निम्नांकित सिफारिशें की गयी थीं-
  • राज्यपाल की नियुक्ति में मुख्यमंत्री की अनिवार्य सहमति को संविधान में शामिल किया जाना चाहिए।
  • राज्यपाल विधान सभा को बहुमत होने की स्थिति में भंग नहीं कर सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।
  • समवर्ती सूची पर कानून बनाने से पहले केन्द्र को राज्य से परामर्श करना चाहिए।
  • राज्यपाल के पाँच वर्ष के कार्यकाल को बिना ठोस कारण कम नहीं करना चाहिए।
  • त्रिभाषा फार्मूले को समान रूप से लागू करने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए।
  • अनुच्छेद 356 का प्रयोग अंतिम विकल्प के तौर पर किया जाए।
  • केन्द्र द्वारा राज्यों को करों के आवंटन में वित्त आयोग की भूमिका को प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
  • केन्द्र द्वारा आयकर पर अधिभार नहीं लगाना चाहिए।

पुंछी आयोग

केंद्र सरकार ने अप्रैल, 2007 में केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिये उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया।
आयोग को केंद्र एवं राज्यों के बीच संबंधों की वर्तमान स्थिति का आकलन कर उनमें सुधार के लिये उचित सिफारिशें देनी थीं। पुंछी आयोग ने मार्च, 2010 में अपनी सिफारिशें सरकार के समक्ष सात खंडों में प्रस्तुत कीं।

आयोग की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार थीं-
  • आंतरिक सुरक्षा के संबंध में विशिष्ट संस्था/संरचना का निर्माण किया जाए।
  • संविधान के अनुच्छेद 355 एवं 356 में आवश्यक सुधार किया जाना चाहिए।
  • समवर्ती सूची से संबंधित विषय पर विधेयक पेश करने से पूर्व राज्यों से परामर्श किया जाना चाहिए।
  • राज्यपाल की नियुक्ति में संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श होना चाहिए।

दोस्तों, हमें उम्मीद है कि इस लेख में दी गई जानकारी आपके लिए मददगार साबित हुई होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सही और सटीक जानकारी होना बहुत जरूरी है। ऐसे ही महत्वपूर्ण टॉपिक्स को आसान भाषा में पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट WWW.UPGK.IN पर नियमित रूप से विजिट करते रहें। इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।