उत्तर प्रदेश केन्द्र-राज्य संबंध
भारतीय संविधान: केन्द्र-राज्य संबंध
(कानून निर्माण)
(कार्यपालिका शक्ति)
(राजस्व वितरण)
सातवीं अनुसूची: शक्तियों का विभाजन
संघ सूची
100 विषय (मूल 97)अधिकार: केवल केन्द्र सरकार (संसद)
- रक्षा, विदेशी संबंध, परमाणु ऊर्जा
- रेलवे, बैंकिंग, मुद्रा, बीमा
- जनगणना, नागरिकता, निगम कर
राज्य सूची
61 विषयअधिकार: राज्य विधानमंडल
- स्थानीय शासन, पुलिस, जेल
- कृषि, सिंचाई, लोक स्वास्थ्य
- शराब उत्पादन एवं परिवहन
समवर्ती सूची
52 विषयअधिकार: केन्द्र व राज्य दोनों
- विवाद होने पर केन्द्रीय कानून को वरीयता।
अवशिष्ट शक्तियां
अनुच्छेद 248अधिकार: केवल संसद
- जो विषय तीनों सूचियों में नहीं हैं।
- नए करों का अधिरोपण।
भारत की निधियां (अनुच्छेद वार तुलना)
| निधि का नाम | अनुच्छेद | स्रोत (Source) | व्यय की शर्त / अनुमति |
|---|---|---|---|
| संचित निधि (Consolidated Fund) |
266 (1) | समस्त कर, राजस्व, सरकार द्वारा लिए गए ऋण | संसद की पूर्व अनुमति अनिवार्य है। |
| आकस्मिक निधि (Contingency Fund) |
267 | विधि द्वारा अवधारित राशियां | राष्ट्रपति के अधीन। पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं, किंतु बाद में स्वीकृति अनिवार्य। |
| लोक निधि (Public Account) |
266 (2) | भविष्य निधि, बचत खाता, न्यायिक जमा आदि | सरकार केवल देख-रेख करती है (स्वामित्व नहीं)। |
प्रमुख संस्थाएं एवं समितियां
अंतर्राज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263)
गठन: 1990 (राष्ट्रपति द्वारा)
अध्यक्ष: प्रधानमंत्री
- विवादों की जांच व सुझाव देना।
- समान हितों पर विचार-विमर्श।
- निर्णय आम सहमति से होते हैं।
क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)
गठन: राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956
अध्यक्ष: केन्द्रीय गृहमंत्री
- यह वैधानिक निकाय हैं (संवैधानिक नहीं)।
- कुल 5 परिषदें (उत्तरी, मध्यवर्ती, पूर्वी, पश्चिमी, दक्षिणी)।
- उत्तर प्रदेश मध्यवर्ती परिषद (प्रयागराज) में है।
केन्द्र-राज्य संबंधों पर प्रमुख आयोग
| आयोग का नाम | गठन / रिपोर्ट | प्रमुख सिफारिशें (मुख्य बिंदु) |
|---|---|---|
| सरकारिया आयोग (अध्यक्ष: आर. एस. सरकारिया) |
1983 / 1987 |
|
| पुंछी आयोग (अध्यक्ष: मदन मोहन पुंछी) |
2007 / 2010 |
|
शक्तियों का विभाजन
- संघ सूची
- राज्य सूची
- समवर्ती सूची
- समवर्ती सूची पर राज्य तथा केन्द्र दोनों कानून बना सकते हैं, परंतु एक ही विषय पर निर्मित दोनों के कानून में केन्द्रीय कानून को वरीयता दी जाएगी।
- अनुच्छेद 263 के तहत संविधान राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह केन्द्र और राज्यों के बीच अथवा राज्य और राज्यों के बीच उठते हुए विवाद के समाधान हेतु एक अन्तर्राज्यीय परिषद् स्थापित करे, जिससे उन्हें न्यायिक प्रक्रियाओं से न गुजरना पड़े।
- जून, 1990 में राष्ट्रपति द्वारा अन्तर्राज्यीय परिषद् का औपचारिक गठन किया गया। इस परिषद् का नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं। इसमें केन्द्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री सम्मिलित होते हैं।
- संघ और राज्यों के मध्य विधायी संबंध
- संघ और राज्यों के मध्य प्रशासनिक संबंध
- संघ और राज्यों के मध्य वित्तीय संबंध
संघ और राज्यों के मध्य विधायी संबंध
- संविधान में संघ तथा राज्य सरकारों के विधायी संबंधों एवं क्षेत्राधिकार का स्पष्ट विभाजन किया गया है।
- केन्द्रीय संसद तथा राज्य विधायिका द्वारा अपनी अधिकारित शक्तियों का प्रयोग संविधान के भीतर किया जा सकता है, संविधान के बाहर नहीं।
- संसद सर्वोच्च है, यद्यपि वह भी विधि के शासन के अनुपालन हेतु बाध्य है।
- केन्द्र सरकार देश के किसी हिस्से के लिए विधि का निर्माण कर सकती है, जबकि राज्य सरकार अपने संपूर्ण राज्य अथवा उसके किसी भू-भाग के लिए विधि का निर्माण करने को स्वतंत्र है।
- संघसूची : इसमें राष्ट्रीय महत्व के '97' विषयों (वर्तमान में 100 विषय) को समाहित किया गया है। इस सूची पर कानून बनाने का संसद को अनन्य शक्ति प्राप्त है।
- संघ सूची के विषयों में शामिल हैं- रक्षा, वैदेशिक संबंध, परमाणु उर्जा, रेलवे, बैंक, डाक, तार, रिजर्व बैंक, टेलिफोन, विदेश व्यापार, नागरिकता, जनगणना, मुद्रा, विदेशी ऋण, बीमा, विनिमयपत्र, चेक, प्रतिज्ञा पत्र, बाट माप, कृषि आय से भिन्न आयकर, सीमा शुल्क, निगम कर, वायु मार्ग, ब्रॉडकास्टिंग, चलचित्रों की मंजूरी आदि।
- राज्य सूची: इस सूची में ऐसे 61 विषयों को शामिल किया गया है, जिस पर राज्य का विधान मंडल कानून बना सकता है। इन विषयों में स्थानीय शासन, पुलिस, जेल, परिवहन, कृषि, सिंचाई, लोक स्वास्थ्य, शराब का उत्पादन तथा विपणन, स्वच्छता आदि शामिल हैं।
- समवर्ती सूची: इस सूची के अंतर्गत 52 विषय हैं। इस विषय पर केन्द्र तथा राज्य विधान मंडल दोनों कानून बना सकते हैं परंतु केन्द्र तथा राज्यों द्वारा निर्मित कानून में यदि विवाद होता है तो केन्द्रीय कानून को वरीयता दी जाएगी।
- अवशिष्ट शक्ति: संविधान के अनुच्छेद 248 में अवशिष्ट शक्तियों का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार (1) संसद को किसी ऐसे विषय के संबंध में जो समवर्ती अथवा राज्य सूची में शामिल नहीं है, विधि बनाने की अनन्य शक्ति है। (2) ऐसी शक्ति के अंतर्गत ऐसे कर के अधिरोपण के लिए जो उपर्युक्त तीनों सूचियों में से किसी में वर्णित नहीं है, विधि बनाने की शक्ति है।
विधायी संबंधों में तनाव एवं सुधार के उपाय
- कई बार संघ और राज्य के बीच विधायी संबंध असंतुलित हो जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में संघ-राज्य संबंध को अधिक संतुलित और लोकतांत्रिक बनाये जाने की आवश्यकता है।
- जबतक अनिवार्य न हो, संघ को समवर्ती सूची से संबंधित विषयों पर कानून बनाने से बचना चाहिए।
- राज्य सूची के संदर्भ में संघीय हस्तक्षेप को न्यूनतम रखा जाना चाहिए।
- यदि राज्यपाल अनुच्छेद 200 के तहत राज्य विधान-मंडल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करते हैं, तो ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को शीघ्र अपना निर्णय देना चाहिए।
केन्द्र तथा राज्यों के मध्य प्रशासनिक संबंध
- संविधान के भाग-XI में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य के प्रशासनिक संबंधों का वर्णन है।
- अनुच्छेद 256 में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा, जिससे संसद द्वारा बनाई गई शक्तियों तथा मौजूद ऐसी विधियों का, जो राज्य में लागू हैं, का अनुपालन सुनिश्चित हो सके।
- अनुच्छेद 257 (1) में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका द्वारा शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा, जिससे संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में कोई रुकावट न आए।
- संविधान के अनुच्छेद 285 (1) में कहा गया है कि संसद किसी राज्य सरकार की सहमति से संघीय कार्यपालिका शक्ति से संबद्ध किसी विषय को उस राज्य सरकार अथवा उसके पदाधिकारियों को सौंप सकती है।
- संविधान में राज्य तथा केन्द्र हेतु पृथक-पृथक सेवाओं की व्यवस्था दी गई है, परंतु संविधान में दोनों के लिए एक संयुक्त सेवा के गठन का भी प्रावधान किया गया है।
केन्द्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों में तनाव के कारण एवं समाधान
- अखिल भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण का मामला।
- राज्यपालों के क्षेत्राधिकार का मामला।
- राज्यों की कानून व्यवस्था में हस्तक्षेप का मामला।
केन्द्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय संबंध
- संविधान में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य संसाधनों के विभाजन तथा उसके समन्वय एवं संबंधों के निर्धारण हेतु स्पष्ट व्यवस्था दी गई है।
- केन्द्र तथा राज्यों के मध्य वित्तीय संबंध लचीला बनाए रखने हेतु दोनों के मध्य एक वित्त आयोग के गठन की व्यवस्था दी गई है।
- संविधान में वित्तीय व्यवस्था के संदर्भ में स्पष्ट उपबंध किए गए है। अनुच्छेद 265 कहता है कि विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर अधिरोपित या संग्रहित नहीं किया जाएगा। किसी कार्यपालिका द्वारा कोई नया कर नहीं अधिरोपित किया जा सकता है।
भारत की निधियां (Funds of India)
संचित निधि (Consolidated Fund)
- सरकार को प्राप्त समस्त कर, राजस्व एवं गैर कर राजस्व।
- सरकार द्वारा अग्रिम उपायों के रूप में लिये गये समस्त ऋण, राजकोषीय बिल आदि।
- इस निधि से कोई राशि संसद की पूर्व अनुमति के बिना व्यय नहीं की जा सकती।
- राज्य सरकारों के लिए 'राज्य संचित निधि' (State consolidated fund) का प्रावधान है, जिसकी राशि व्यय करने के लिए संबंधित राज्य विधानसभा से अनुमति लेने की आवश्यकता होती है।
आकस्मिक निधि (Contigency Fund)
लोक निधि (Public Account)
- संविधान के अनुच्छेद 266 (2) में इस निधि का प्रावधान किया गया है। इसका निर्माण सरकार द्वारा कर राजस्व के अतिरिक्त अन्य लोक बचत आदि स्रोतों से प्राप्त धनराशि से किया जाता है।
- उदाहाण- कर्मचारी भविष्य निधि, बचत खाता जमा, न्यायिक जमा, विभागीय जमा आदि।
- सरकार के पास लोकनिधि का स्वामित्व नहीं होता, वह इसका मात्र देख-रेख करती है।
संचित निधियां एवं लोक लेखा (Consolidated Fund and Public Account)
- अनुच्छेद 266 यह उपबंध करता है कि भारत सरकार की संचित निधि, उसको प्राप्त संपूर्ण राजस्व, उस सरकार द्वारा जारी हुंडियां निर्गमित करके उधार द्वारा प्राप्त सभी धनराशियों से निर्मित होंगी। इसी प्रकार राज्य की भी संचित निधि बनेगी।
- भारत सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा या उसकी ओर से प्राप्त सभी अन्य लोक धनराशियां यथास्थिति भारत के लोक लेखा अथवा राज्य के लोक लेखा में जमा की जाएंगी।
- संचित निधि से कोई भी धनराशि मात्र विधि के अनुसार तथा इस संविधान में उपबंधित प्रयोजनों के लिए और रीति से ही विनियोजित की जा सकती है।
आकस्मिक निधि (Contigency Fund)
संघ तथा राज्यों के मध्य राजस्व का वितरण
- संविधान के अनुच्छेद 268 में केन्द्र तथा राज्यों के मध्य राजस्व वितरण की व्यवस्था दी गई है।
- समवर्ती सूची पर केन्द्र तथा राज्य दोनों सरकारें कर आरोपित कर सकती है, परंतु संघ सूची पर केन्द्र तथा राज्य सूची के विषयों पर राज्य सरकारें कर आरोपित करती हैं।
- राज्य सूची में वर्णित विषयों पर लगाए गए करों पर राज्य सरकार का अधिकार होता है, परंतु संघ सूची में वर्णित विषयों पर लगाए गए करों में से कुछ कर पूर्णतः या अंशतः राज्यों में वितरित किए जाते हैं।
वित्त आयोग (Finance Commission)
- संविधान का अनुच्छेद 280 यह व्यवस्था देता है कि राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर अथवा उससे पहले एक वित्त आयोग की स्थापना करेगा।
- वित्त आयोग में एक अध्यक्ष तथा 4 सदस्य होंगे। संसद विधि द्वारा सदस्यों की सेवा शर्तें निर्धारित कर सकेगी।
- आयोग को सिविल न्यायालय की तमाम शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
- संघ तथा राज्यों के मध्य करों के शुद्ध आगमों के वितरण तथा ऐसे आगमों में राज्य के भाग के आवंटन के संबंध में।
- भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्वों में समस्त अनुदान को शामिल करने वाले सिद्धान्तों के संबद्ध में।
- राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सौंपे गए किसी अन्य विषय में।
- अनुच्छेद 281 के अनुसार राष्ट्रपति वित्त आयोग द्वारा की गई प्रत्येक सिफारिश को तथा उस पर की गई कार्यवाही के स्पष्टीकरण को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएंगे।
16वां वित्त आयोग
- सरकार ने राष्ट्रपति के अनुमोदन से संविधान के अनुच्छेद 280 (1) के अनुसरण में नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डा. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में 16वें वित्त आयोग का गठन किया है।
- श्री ऋत्विक रंजनम पाण्डे को आयोग का सचिव नियुक्त किया गया है।
- पूर्व सचिव व्यय अजय नारायण झा, एसबीआई समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष, पूर्व विशेष सचिव व्यय एनी जार्ज मैथ्यू एवं अर्थ ग्लोबल के कार्यकारी निदेशक निरंजन राजाध्यक्ष को 16वें वित्त आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया है।
- संघ और राज्यों के मध्य करों की निवल आय का वितरण, जो संविधान के अध्याय I भाग XII के अधीन उनके बीच विभाजित किया जाना है, अथवा किया जा सकता है, और ऐसी आय से संबंधित शेयरों के राज्यों के बीच आवंटन-
- जो भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व के सहायता अनुदान को नियंत्रित करे और संविधान के अनुच्छेद 275 के अधीन राज्यों को उनके राजस्व के सहायता अनुदान के रूप में उस अनुच्छेद के खंड (1) के प्रावधानों में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के अतिरिक्त अन्य प्रयोजनों के लिए भुगतान की जाने वाली राशि, तथा
- राज्य के वित्त आयोग द्वारा की गयी सिफारिशों के आधार पर राज्य में पंचायतों और नगर पालिकाओं के संसाधनों को संपूरित करने के लिए राज्य की संचित निधि में वृद्धि करने के लिए आवश्यक उपाय।
- 16वें वित्त आयोग को 1 अप्रैल, 2026 से आरंभ होने वाले 5 वर्षों की अवधि को कवर करते हुए 31 अक्टूबर, 2025 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देनी है।
उत्तर प्रदेश में छठा वित्त आयोग
- लंबी अवधि के पश्चात उत्तर प्रदेश में छठें वित्त आयोग का गठन हो गया है।
- वरिष्ठ आईएएस अधिकारी दीपक कुमार को छठें वित्त आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
- राज्य के छठें वित्त आयोग के सचिव सिद्धार्थ श्रीवास्तव बनाये गये हैं।
- राज्यपाल द्वारा राज्य वित्त आयोग के सदस्य के रूप में नील रतन कुमार तथा आलोक दीक्षित की नियुक्ति की गयी है।
अंतर्राज्यीय परिषद (Inter-State Council)
- राज्यों के मध्य उठने वाले विवादों की जाँच करना और उन पर सुझाव देना।
- उन मामलों की जांच करना व विचार विमर्श करना, जिनमें केंद्र व एक या एकाधिक राज्यों का समान्य हित निहित है।
- उन मामलों, विशेषतः ऐसे मामलों में अनुशंसाएं करना, जो समन्वय की नीति व उन मामलों पर उठाए जाने वाले कदमों के बेहतर क्रियान्वयन में सहायक हों।
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष के रूप में)।
- राज्यों व केन्द्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, जहाँ विधानसभाएँ हों।
- केन्द्रीय कैबिनेट के 6 मंत्री (सदस्य के रूप में)।
क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)
- उत्तरी क्षेत्रीय परिषद: इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। इसमें हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, लद्दाख तथा चंडीगढ़ शामिल हैं।
- मध्यवर्ती क्षेत्रीय परिषद: इसका मुख्यालय प्रयागराज है। इसमें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड एवं छत्तीसगढ़ शामिल हैं।
- पूर्वी क्षेत्रीय परिषद: मुख्यालय कोलकाता है। इसमें बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा व सिक्किम शामिल हैं।
- पश्चिमी क्षेत्रीय परिषदः मुख्यालय मुम्बई है। इसमें महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा राज्य तथा दादर एवं नगर हवेली तथा दमन-दीव केन्द्र शासित प्रदेश शामिल हैं।
- दक्षिणी क्षेत्रीय परिषदः इसका मुख्यालय चेन्नई है। इसमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु राज्य तथा संघशासित पुद्दुचेरी शामिल हैं।
संगठनात्मक ढांचा
सरकारिया आयोग
- राज्यपाल की नियुक्ति में मुख्यमंत्री की अनिवार्य सहमति को संविधान में शामिल किया जाना चाहिए।
- राज्यपाल विधान सभा को बहुमत होने की स्थिति में भंग नहीं कर सके, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।
- समवर्ती सूची पर कानून बनाने से पहले केन्द्र को राज्य से परामर्श करना चाहिए।
- राज्यपाल के पाँच वर्ष के कार्यकाल को बिना ठोस कारण कम नहीं करना चाहिए।
- त्रिभाषा फार्मूले को समान रूप से लागू करने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए।
- अनुच्छेद 356 का प्रयोग अंतिम विकल्प के तौर पर किया जाए।
- केन्द्र द्वारा राज्यों को करों के आवंटन में वित्त आयोग की भूमिका को प्रभावी बनाया जाना चाहिए।
- केन्द्र द्वारा आयकर पर अधिभार नहीं लगाना चाहिए।
पुंछी आयोग
- आंतरिक सुरक्षा के संबंध में विशिष्ट संस्था/संरचना का निर्माण किया जाए।
- संविधान के अनुच्छेद 355 एवं 356 में आवश्यक सुधार किया जाना चाहिए।
- समवर्ती सूची से संबंधित विषय पर विधेयक पेश करने से पूर्व राज्यों से परामर्श किया जाना चाहिए।
- राज्यपाल की नियुक्ति में संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श होना चाहिए।
दोस्तों, हमें उम्मीद है कि इस लेख में दी गई जानकारी आपके लिए मददगार साबित हुई होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सही और सटीक जानकारी होना बहुत जरूरी है। ऐसे ही महत्वपूर्ण टॉपिक्स को आसान भाषा में पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट WWW.UPGK.IN पर नियमित रूप से विजिट करते रहें। इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!


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