स्वाधीनता संघर्ष में उत्तर प्रदेश का योगदान
उत्तर प्रदेश की धरती केवल धर्म और संस्कृति का केंद्र नहीं रही, बल्कि इसने भारत के स्वाधीनता संग्राम की एक ऐसी अमर गाथा लिखी है जिसकी गूंज आज भी पूरे देश में सुनाई देती है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की धधकती चिंगारी से लेकर चौरीचौरा के जन-आक्रोश और काकोरी के बलिदान तक, इस माटी ने अनगिनत वीरों के शौर्य को बेहद करीब से देखा है। प्रस्तुत लेख में हम जानेंगे कि कैसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के ऐतिहासिक अधिवेशनों, असहयोग आंदोलन और 'भारत छोड़ो आंदोलन' में उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं। आइए, आजादी के दीवानों के इस वैभवशाली और प्रेरणादायक सफरनामा के पन्ने पलटते हैं।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष में उत्तर प्रदेश की मुख्य भूमिका रही। विद्रोह का आरम्भ उत्तर प्रदेश से हुआ और अंग्रेजों को अपनी सर्वाधिक शक्ति आंदोलन को खत्म करने में लगानी पड़ी। परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजी हुकूमत का रवैया इस क्षेत्र के प्रति काफी हद तक द्वेषपूर्ण हो गया। यही कारण रहा कि जिस समय बंगाल, मद्रास, बम्बई आदि क्षेत्रों में सामाजिक एवं सांस्कृतिक जागरण के अनेक लोकप्रिय आंदोलन शुरू हुए, उस समय वर्तमान उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में इसकी खास पहचान एवं मौलिकता के विरुद्ध सन्नाटा फैला हुआ था। एकमात्र भारतेन्दु हरिश्चन्द्र अपने 'अंधेर नगरी' और 'भारत दुर्दशा' जैसे नाटकों एवं पत्रिका 'कविवचन सुधा' में प्रकाशित लेखों के माध्यम से अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध लोगों को जागृत करने का प्रयास कर रहे थे। इस सम्बन्ध में उनकी लिखी एक मुकरी उल्लेखनीय है-
भीतर भीतर सब रस चूसै, हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै।
जाहिर बातन में अतितेज, क्यों सखि साजन, नहीं अँगरेज।।
अपनी इस तरह की रचनाओं के कारण भारतेन्दु को कई बार अंग्रेजी हुकूमत का कोपभाजन बनना पड़ा।
स्वाधीनता संघर्ष में उत्तर प्रदेश का योगदान
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' तक उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) की ऐतिहासिक यात्रा।
1857 का प्रथम संग्राम
- विद्रोह का आरम्भ उत्तर प्रदेश से हुआ।
- अंग्रेजी हुकूमत का रवैया इस क्षेत्र के प्रति अत्यंत द्वेषपूर्ण रहा।
- अन्य राज्यों में जागरण हो रहा था, जबकि यहाँ अंग्रेजों का कड़ा पहरा था।
सांस्कृतिक जागरण: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
- नाटक: 'अंधेर नगरी' और 'भारत दुर्दशा'।
- पत्रिका: 'कविवचन सुधा'।
- योगदान: अपनी रचनाओं के माध्यम से अंग्रेजों के शोषण के विरुद्ध जनता को जागृत किया।
गांधी युग: असहयोग से चौरीचौरा तक
1916: लखनऊ अधिवेशन
चम्पारण के किसानों की समस्या से परिचय
चम्पारण के किसानों की समस्या से परिचय
1920: असहयोग का निर्णय
मुरादाबाद सम्मेलन में प्रस्ताव; उपाधियों और अदालतों का बहिष्कार
मुरादाबाद सम्मेलन में प्रस्ताव; उपाधियों और अदालतों का बहिष्कार
1921: विद्यापीठों की स्थापना
काशी विद्यापीठ व अलीगढ़ मुस्लिम विद्यापीठ की शुरुआत
काशी विद्यापीठ व अलीगढ़ मुस्लिम विद्यापीठ की शुरुआत
5 फरवरी 1922: चौरीचौरा काण्ड
गोरखपुर में 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु; असहयोग आंदोलन स्थगित
गोरखपुर में 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु; असहयोग आंदोलन स्थगित
क्रांतिकारी आंदोलन (उत्तर प्रदेश का केंद्र)
HRA की स्थापना (1924)
- स्थान: कानपुर
- संस्थापक: सचिन्द्र नाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल, योगेश चन्द्र चटर्जी।
- मुख्य घटना: काकोरी ट्रेन डकैती (9 अगस्त 1925)। 8 डाउन ट्रेन से सरकारी खजाना लूटा गया।
HSRA का पुनर्गठन (1928)
- स्थान: फिरोजशाह कोटला (कार्यालय: आगरा)
- प्रमुख: चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह।
- मुख्य घटनाएं: सॉण्डर्स वध (1928), असेंबली बम कांड (1929)।
- बलिदान: अल्फ्रेड पार्क, प्रयागराज में आजाद वीरगति को प्राप्त (27 फर. 1931)।
सविनय अवज्ञा से स्वतंत्रता तक (1930 - 1947)
1931: द्वितीय किसान आंदोलन
प्रयागराज में जवाहर लाल नेहरू द्वारा 'करबन्दी' आंदोलन
प्रयागराज में जवाहर लाल नेहरू द्वारा 'करबन्दी' आंदोलन
1937: प्रांतीय सरकार
संयुक्त प्रांत में गोविंद वल्लभ पंत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार
संयुक्त प्रांत में गोविंद वल्लभ पंत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार
अगस्त 1942: भारत छोड़ो आंदोलन
बलिया में चित्तू पाण्डे के नेतृत्व में 'अस्थायी राष्ट्रीय सरकार' की स्थापना
बलिया में चित्तू पाण्डे के नेतृत्व में 'अस्थायी राष्ट्रीय सरकार' की स्थापना
15 अगस्त 1947
भारत की आज़ादी (विभाजन के साथ)
भारत की आज़ादी (विभाजन के साथ)
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उत्तर प्रदेश
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में एक सेवानिवृत्त अंग्रेज सिविल सर्वेण्ट ए.ओ. ह्यूम द्वारा की गई। लाला लाजपत राय के अनुसार "कांग्रेस वॉयसराय लॉर्ड डफरिन के दिमाग की उपज थी"।
- पहले इसका नाम 'भारतीय राष्ट्रीय संघ' (Indian National Union) था। दादा भाई नौरोजी के सुझाव पर इसका नाम बदलकर 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' कर दिया गया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 28 दिसम्बर, 1885 को 'गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज, बम्बई', में सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व गंगा प्रसाद वर्मा, प्राणनाथ पंडित, मुंशी ज्वाला प्रसाद, जानकीनाथ घोषाल, रामकली चौधरी, बाबू जमुनादास, बाबू शिव प्रसाद चौधरी तथा लाला बैजनाथ आदि ने किया।
कलकत्ता में सम्पन्न कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधियों की संख्या 74 पहुंच गयी। दादा भाई नौरोजी की अध्यक्षता में प्रारम्भ इस अधिवेशन में कुल 431 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े प्रश्नों पर विचार के लिए सत्रह सदस्यीय समिति का गठन किया, जिसमें अकेले उत्तर प्रदेश से पाँच सदस्यों को चुना गया था। लखनऊ के गंगाप्रसाद वर्मा, प्राणनाथ, मौलाना हामिद अली तथा नवाब रज़ा अली खान और प्रयागराज के मुंशी काशी प्रसाद इस समिति में शामिल थे।
मद्रास के तीसरे अधिवेशन में बदरूद्दीन तैयब अली द्वारा घोषित सब्जेक्ट कमेटी में उत्तर प्रदेश से राजा रामपाल सिंह, मौलवी हामिद अली, रामकली चौधरी एवं पं. मदनमोहन मालवीय को भी सम्मिलित किया गया था। कांग्रेस के इसी सत्र में पार्टी के संविधान तथा कार्यपद्धति को निर्धारित करने के लिए एक विधि समिति का निर्माण भी किया गया, जिसमें लखनऊ के गंगा प्रसाद वर्मा, विशन नारायण व मौलाना हामिद अली को शामिल किया गया था।
कांग्रेस का चौथा अधिवेशन वर्ष 1888 में जार्ज यूल की अध्यक्षता में प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में सम्पन्न हुआ। इस समय प्रान्त के गवर्नर ऑकलैण्ड कॉल्विन थे। उन्होंने भरपूर प्रयास किया कि अधिवेशन को विफल कर दिया जाय। इस सम्बन्ध में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा तमाम रूकावटें पैदा करने की कोशिश की गयीं। ऑकलैण्ड ने प्रयत्न किया कि अधिवेशन के लिए कांग्रेस को प्रयागराज में कोई स्थान न प्राप्त हो सके। अधिवेशन के प्रचार-प्रसार में भी बाधा डालने की कोशिश की गयी। इस पर राजा दरभंगा ने प्रयागराज में 'लोथर काउंसिल' खरीद कर कांग्रेस को दे दिया, जहां अधिवेशन का आयोजन हुआ। तमाम रुकावटों और दुष्प्रचार के बावजूद इस अधिवेशन को पिछले अधिवेशनों से अधिक सफलता प्राप्त हुई। इसमें कुल 1248 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इन प्रतिनिधियों में से 11 नवाब, 1 शहजादा, 2 मुगल राजकुमार, 3 अन्य राजकुमार, 388 जमींदार, 448 वकील, 77 पत्रकार, 143 आयुक्त, 58 शिक्षक तथा 10 किसान शामिल थे।
संख्या की दृष्टि से यद्यपि प्रयागराज का अधिवेशन एक सफल अधिवेशन था परन्तु इसमें सामन्तों तथा अभिजात्यवर्गीय प्रतिनिधित्व का वर्चस्व इतना अधिक बढ़ गया कि अंग्रेजी राज के प्रति कांग्रेस का रुख पहले की तुलना में अधिक नरम होने लगा। इस नरम रुख का नेतृत्व रानाडे और गोखले आदि कर रहे थे। इस नरम रुख के परिणामस्वरूप 1892 का अधिवेशन लंदन में करने का निर्णय लिया गया था, हालांकि बाद में इसे प्रयागराज में करने का निर्णय लिया गया। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का यह दूसरा अधिवेशन था।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का तीसरा अधिवेशन 1899 में लखनऊ में हुआ, जिसमें कांग्रेस के संविधान को स्वीकार किया गया। इसी अधिवेशन में प्रादेशिक कमेटियों के गठन का निर्णय लिया गया। सर सैय्यद अहमद और बनारस के तत्कालीन राजा शिव प्रसाद सितारे हिन्द ने इस अधिवेशन का विरोध किया।
सर सैय्यद अहमद ने मुसलमानों को कांग्रेस से दूर रहने को कहा, परन्तु उनके विरोध के बाद भी भारतीय मुस्लिम समाज में कांग्रेस के प्रति आकर्षण निरन्तर बढ़ रहा था। इसके अधिवेशनों में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या 1885 में 2, 1886 में 33, और 1887 में 79 तक बढ़ चुकी थी। कांग्रेस में मुसलमानों के बढ़ते प्रभाव को देखकर सर सैय्यद ने 'मुहम्मडन एजूकेशनल कांग्रेस' और 'यूनाइटेड पैट्रियाटिक एसोसिएशन' नामक दो संस्थाओं की स्थापना कर कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार प्रारम्भ कर दिया।
प्रदेश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख अधिवेशन
| वर्ष | स्थान | अध्यक्ष |
|---|---|---|
| 1888 ई. | इलाहाबाद (प्रयागराज) | जॉर्ज यूल |
| 1892 ई. | इलाहाबाद (प्रयागराज) | डब्ल्यू. सी. बनर्जी |
| 1899 ई. | लखनऊ | रोमेश चन्द्र दत्त |
| 1905 ई. | बनारस (वाराणसी) | गोपाल कृष्ण गोखले |
| 1910 ई. | इलाहाबाद (प्रयागराज) | सर विलियम वेडरबर्न |
| 1916 ई. | लखनऊ | अम्बिका चरन मजूमदार |
| 1925 ई. | कानपुर | श्रीमती सरोजिनी नायडू |
| 1935 ई. | लखनऊ | पं. जवाहर लाल नेहरू |
| 1946 ई. | मेरठ | आचार्य जे.बी. कृपलानी |
स्वदेशी आंदोलन
कांग्रेस के इस नरम रुख के विरुद्ध कांग्रेस के अंदर एक उग्रवादी धारा प्रवाहित होने लगी, जिसका नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक तथा अरविंद घोष कर रहे थे। 1905 तक कांग्रेस पर यद्यपि नरम और गरम पंथियों का ही वर्चस्व स्थापित रहा परन्तु धीरे-धीरे तिलक की बढ़ती लोकप्रियता ने नरम और गरम पंथ के मध्य दूरी को बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। 1905 के बंगाल विभाजन ने कांग्रेस के इस आन्तरिक मतभेद को अत्यधिक बढ़ा दिया।
बंग-भंग आंदोलन में दिये गये बहिष्कार, स्वदेशी तथा राष्ट्रीय शिक्षा के नारे के प्रश्न पर कांग्रेस में तीखे मतभेद उत्पन्न हो चुके थे। ऐसे माहौल में कांग्रेस का 21वां अधिवेशन बनारस में हुआ। दोनों समूहों में पहला टकराव बनारस में ही हुआ। इस विवाद का प्रथम कारण 'प्रिंस ऑफ वेल्स' का स्वागत प्रस्ताव था। नरम पंथी इस प्रस्ताव को पारित कराना चाहते थे, जबकि तिलक आदि इसके विरुद्ध थे। 'स्वदेशी' आन्दोलन को लेकर भी दोनों दलों में विरोध प्रारम्भ हो गया था। इन सबका परिणाम 1907 के कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में उस समय सामने आया जब यह विरोध अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया तथा कांग्रेस दो हिस्सों में विभाजित हो गयी।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी
उत्तर प्रदेश (यूनाइटेड प्राविंसेज) में कांग्रेस कमेटी का पहला सम्मेलन पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में प्रारम्भ हुआ। 1907 के सूरत अधिवेशन में उत्तर प्रदेश के पं. मोतीलाल नेहरू तथा पं. मदनमोहन मालवीय ने नरम पंथियों का साथ दिया। 1909 में प्रदेश कांग्रेस का राजनीतिक सम्मेलन पुनः मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में आगरा में शुरू हुआ। 1910 तक कांग्रेस संगठन का विस्तार प्रदेश के अनेक जिलों तक हो चुका था।
मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, मौलाना मुहम्मद अली और शौकत अली जैसे नेताओं के प्रयास से मुस्लिम लीग ने अपने उद्देश्यों व नीतियों में थोड़ा परिवर्तन किया और ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी की जगह भारत में स्वशासन की स्थापना को मुस्लिम लीग का उद्देश्य घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही तिलक, एनी बेसेन्ट तथा जिन्ना के प्रयासों से वर्ष 1915 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का अधिवेशन एक साथ मुम्बई में हुआ। अगले वर्ष 1916 में एक बार फिर कांग्रेस और मुस्लिम लीग का अधिवेशन एक साथ लखनऊ में सम्पन्न हुआ। इस समय मुस्लिम लीग के नेता स्वयं जिन्ना थे, जो 1904 से ही कांग्रेस के नेता थे। लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष अम्बिका चरण मजूमदार थे। यहाँ पर कांग्रेस और लीग की एकता ने मूर्त रूप धारण किया। इन दोनों ने मिलकर जो योजना तैयार की वह 'कांग्रेस-लीग समझौता' के नाम से प्रसिद्ध हुई। कांग्रेस का यह अधिवेशन इसलिए भी महत्वपूर्ण था। क्योंकि 1907 के बाद पहली बार तिलक कांग्रेस अधिवेशन में सम्मिलित हो रहे थे। तिलक की लोकप्रियता इस सीमा तक पहुंच चुकी थी कि लखनऊ स्टेशन से अधिवेशन स्थल तक उन्हें जिस घोड़ागाड़ी में लाया गया उसे घोड़ों के बदले लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों ने खींचकर पण्डाल तक पहुँचाया था।
गांधी युग और उत्तर प्रदेश
महात्मा गांधी को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारत में आंदोलन शुरू करने का प्रथम सूत्र वर्तमान उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मिला था।
गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से 9 जनवरी, 1915 को भारत लौटे थे। स्थानीय परिस्थितियों को समझने के लिए उन्होंने एक वर्ष तक भारत के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करने का निर्णय लिया। इसी क्रम में वे दिसम्बर 1916 में लखनऊ पहुंचे थे, जहां उन्होंने कांग्रेस के 31वें अधिवेशन में भाग लिया। यह अधिवेशन लखनऊ में 26 से 30 दिसम्बर, 1916 तक अंबिका चरण मजूमदार की अध्यक्षता में हुआ था। यहीं पर उनसे चम्पारण के किसान राजकुमार शुक्ल ने उनसे मुलाकात की और चम्पारण में नील की खेती करने वाले किसानों का अंग्रेजों द्वारा तिनकठिया पद्धति से किये जा रहे शोषण की व्यथा बताकर उनसे चम्पारण आने का आग्रह किया। इसी के बाद गांधी जी ने भारत में सत्याग्रह का अपना पहला प्रयोग 1917 ई. में बिहार के चम्पारण जिले में किया। उनका यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा और अंग्रेजों को उनके सामने झुकना पड़ा। इस सफलता ने गांधी जी को समूचे देश का 'नायक' बना दिया और रविन्द्र नाथ टैगोर ने उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी।
जवाहर लाल नेहरू की महात्मा गांधी से प्रथम मुलाकात लखनऊ के रेलवे स्टेशन पर हुई थी। नेहरू उनसे मिलकर बहुत प्रभावित हुए। इसके बाद स्वाधीनता संघर्ष के लिए लोगों में जागृति पैदा करने के लिए गांधी जी का लखनऊ आना कई बार हुआ। अप्रैल, 1936 में नेहरू की अध्यक्षता में आयोजित 49वें कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए भी गांधी जी लखनऊ पहुँचे थे।
इस अधिवेशन में कांग्रेस का लक्ष्य 'समाजवाद' निर्धारित किया गया। इसी समय 'कांग्रेस संसदीय बोर्ड' (Congress Parliament Board) का गठन किया गया।
खिलाफत आंदोलन (1919-1922 ई.)
प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन द्वारा तुर्की के सुल्तान, जिसे दुनिया भर के मुसलमान अपना खलीफा मानते थे, के साथ अपमानजनक व्यवहार के विरोध में भारतीय मुसलमानों ने 'खिलाफत आंदोलन' आरम्भ किया। महात्मा गांधी ने इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता का अच्छा अवसर मानते हुए खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया। 20 जून, 1920 ई. को इलाहाबाद में हिन्दू-मुस्लिम नेताओं की संयुक्त बैठक हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने अंग्रेजी शासन के विरूद्ध असहयोग की नीति को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। खिलाफत आन्दोलन 1924 में तब समाप्त हुआ, जब तुर्की की कमाल पाशा सरकार ने खलीफा के पद को समाप्त कर दिया।
असहयोग आंदोलन (1919-1922 ई.)
स्वराज की मांग के साथ असहयोग आंदोलन की शुरूआत हुई। इसमें सरकारी पद एवं नौकरी, उपाधियों, सरकारी शिक्षा संस्थाओं तथा अदालतों के साथ ही विदेशी वस्तुओं के भी बहिष्कार का निर्णय लिया गया। अक्टूबर, 1920 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस का प्रान्तीय सम्मेलन मुरादाबाद में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ. भगवान दास ने की। सम्मेलन में गांधी, मालवीय, मोतीलाल, जवाहरलाल, श्रद्धानंद, हकीम अजमल खाँ, मौलाना शौकत अली, मौलाना मुहम्मद अली आदि ने भाग लिया। इस सम्मेलन ने गांधी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
दिसम्बर, 1920 के नागपुर अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया। कांग्रेस के अन्दर खादी, अस्पृश्यता निवारण, नशाबन्दी तथा राष्ट्रीय शिक्षा जैसे रचनात्मक सामाजिक कार्यों का प्रारम्भ यहीं से हुआ। छात्रों ने स्कूल छोड़े और सरकारी नौकरों ने अपनी नौकरियां छोड़ दीं। राष्ट्रीय शिक्षा के विकास के लिए बनारस में काशी विद्यापीठ, पटना में बिहार विद्यापीठ, अहमदाबाद में गुजरात विद्यापीठ एवं अलीगढ़ में मुस्लिम विद्यापीठ के साथ ही जामिया मिल्लिया इस्लामिया (विश्वविद्यालय) अलीगढ़ की स्थापना की गयी।
मोतीलाल नेहरू, देशबन्धु चितरंजन दास, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, आसफ अली तथा राजगोपालाचारी जैसे प्रमुख वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी। विदेशी कपड़ों की होली जलायी जाने लगी। गांधी ने ब्रिटिश सरकार से प्राप्त 'कैसर-ए-हिंद' की उपाधि वापस करते हुए 'जूलू युद्ध पदक' तथा 'बोअर युद्ध पदक' भी लौटा दिये। हजारों की संख्या में सत्याग्रही गिरफ्तार कर लिये गये। इसी समय ब्रिटेन के राजकुमार वेल्स ने भारत यात्रा प्रारम्भ की।
अक्टूबर, 1921 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस का राजनीतिक सम्मेलन मौलाना हसरत मोहानी की अध्यक्षता में आगरा में हुआ। इस सम्मेलन में ब्रिटिश युवराज के बहिष्कार को पूरी तरह सफल बनाने का निश्चय किया गया।
जनवरी, 1922 के सर्वदल सम्मेलन के अनुरोध पर गांधी जी ने बारदोली में सामूहिक आन्दोलन प्रारम्भ करने का निर्णय लिया, परन्तु इस आन्दोलन के आरम्भ होने से पूर्व ही उत्तर प्रदेश के चौरीचौरा नामक स्थान पर एक ऐसी घटना हो गयी जिसने स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को एक नया मोड़ दे दिया।
चौरीचौरा काण्ड
गोरखपुर के चौरीचौरा नामक स्थान पर 5 फरवरी, 1922 को असहयोग आंदोलन के क्रम में सत्याग्रहियों की एक सभा आयोजित थी। सुबह से ही लोग सभा स्थल पर पहुंचने लगे थे। सत्याग्रहियों में काफी उत्साह था। सभा से पूर्व दोपहर के समय उन्होंने जुलूस निकाला, जिसमें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ नारे लगाये जा रहे थे। इसी बीच कुछ पुलिसकर्मियों ने सत्याग्रहियों को मार्ग से हटाने की कोशिश की और उनसे मारपीट व दुर्व्यवहार किया। इससे सत्याग्रही उत्तेजित हो गये और उन्होंने पुलिसकर्मियों पर हमला बोल दिया। पुलिसकर्मी जान बचाकर भागे और निकट के चौरीचौरा थाने में घुस कर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। सत्याग्रहियों ने थाने को घेर कर उसमें आग लगा दी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मी (एक थानेदार एवं 21 सिपाही) जलकर मर गये। घटना की सूचना मिलने के बाद गांधी जी ने 12 फरवरी को बारदोली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर असहयोग आंदोलन को स्थगित करने की घोषणा कर दी। महात्मा गांधी के इस निर्णय से कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेता एवं कार्यकर्ता सन्न रह गये और उन्होंने इससे असहमति जताई।
पूर्ण स्वराज का लक्ष्य
1919 के भारत सरकार अधिनियम के कार्यों की समीक्षा के लिए अक्टूबर, 1927 में ब्रिटेन की सरकार ने एक आयोग की नियुक्ति की, जिसे 'साइमन कमीशन' कहा गया। इसके सभी सदस्य अंग्रेज थे। आयोग का अध्यक्ष सर साइमन को बनाया गया था। आयोग में किसी भारतीय को स्थान न दिये जाने के कारण कांग्रेस समेत तमाम दलों ने इसके विरोध का निर्णय लिया। भारत में साइमन कमीशन का 1928 में जबरदस्त विरोध किया गया। इसके सदस्यों के सामने बम्बई में 'साइमन वापस जाओ' के नारे भारतीयों द्वारा लगाए गए।
नेहरू रिपोर्ट
कांग्रेस ने मार्च, 1928 में एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन दिल्ली में किया और साइमन कमीशन के बहिष्कार के साथ ही मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस समिति के समक्ष 1 जुलाई, 1928 से पहले भारत के संविधान के सिद्धांतों का प्रारूप तैयार करने का लक्ष्य रखा गया।
'नेहरू रिपोर्ट' नाम से प्रसिद्ध इस प्रारूप में अधिराज्य अथवा औपनिवेशिक स्वराज को आधार बनाया गया था। इस सम्बन्ध में अगस्त, 1928 में एक बार पुनः सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन लखनऊ स्थित राजा महमूदाबाद के महल में किया गया। सम्मेलन में जवाहर लाल नेहरू तथा सुभाष चन्द्र बोस ने नेहरू रिपोर्ट से असहमति व्यक्त की।
क्रांतिकारी आंदोलन
भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में क्रांतिकारी आंदोलन का सूत्रपात लगभग 1879 ई. में महाराष्ट्र में हुआ, जब वासुदेव बलवन्त फड़के ने कोली, भील एवं धांगड जातियों को एकजुट कर रामोसी कृषकों का दल गठित किया और धनी अंग्रेज साहूकारों को लूटकर 'स्वराज' के लिए धन एकत्र करने का निर्णय लिया। फड़के ने 200 समर्पित क्रांतिकारियों की सेना बनायी थी। माना जाता है कि यह भारत की प्रथम क्रांतिकारी सेना थी। यह संघर्ष शीघ्र ही समाप्त हो गया। वासुदेव बलवन्त फड़के को गिरफ्तार कर उन्हें 'कालापानी' की सजा दे दी गई, जहां उनका स्वर्गवास हो गया।
क्रांतिकारी आंदोलन की असल शुरूआत 1905 ई. में स्वदेशी आंदोलन के साथ हुई, यद्यपि इसमें व्यापकता आई 'असहयोग आंदोलन' को स्थगित करने के पश्चात। चौरीचौरा काण्ड के बाद गांधी जी द्वारा चरम पर पहुंच चुके असहयोग आंदोलन को एकाएक स्थगित करने की घोषणा से देश के निम्न मध्यमवर्गीय नौजवानों को बेहद निराशा हुई। इस वर्ग में अंग्रेजी शासन के अत्याचारों और दमनकारी नीतियों को लेकर भारी आक्रोश था और वे अंग्रेजों को उन्हीं की शैली में जवाब देना चाहते थे। असहयोग आंदोलन के स्थगित होने से इन नौजवानों के मनोबल को गहरी ठेस पहुंची, जिसके परिणामस्वरूप 'क्रांतिकारी सैन्यवाद' ने उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करना आरम्भ कर दिया।
संयुक्त प्रांत में क्रांतिकारी आंदोलन के परिणाम के रूप में लखनऊ के निकट काकोरी ट्रेन डकैती की घटना सामने आयी। सचिन्द्र नाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल और योगेश चन्द्र चटर्जी ने अक्टूबर, 1924 में कानपुर में 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' (Hindustan Republican Association-HRA) नामक संस्था का गठन किया। संस्था द्वारा स्वतंत्रता संघर्ष के लिए धन की व्यवस्था करने के उद्देश्य से 9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी नामक स्थान पर 8 डाउन ट्रेन को रोककर सरकारी खजाने को लूट लिया गया।
काकोरी लूट काण्ड को एच.आर.ए. के दस सदस्यों ने मिलकर अंजाम दिया था। बाद में एसोसिएशन से जुड़े 40 क्रांतिकारियों को इस मामले में गिरफ्तार किया गया, जिनमें से पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी एवं ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा दी गई। चन्द्रशेखर आजाद फरार होने में सफल रहे।
स्थान जहां क्रांतिकारियों को दी गई फांसी
| क्रांतिकारी | स्थान | तिथि |
|---|---|---|
| राम प्रसाद बिस्मिल | गोरखपुर | 19 दिसंबर, 1927 |
| अशफाक उल्ला खां | फैजाबाद | 19 दिसंबर, 1927 |
| राजेन्द्र लाहिरी | गोण्डा | 17 दिसंबर, 1927 |
| रोशन सिंह | नैनी (प्रयागराज) | 19 दिसंबर, 1927 |
गिरफ्तार क्रांतिकारियों का मुकदमा चन्द्रभानु गुप्त नामक युवा वकील ने निःशुल्क लड़ा था, जो बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने।
काकोरी षड्यन्त्र केस के बाद गिरफ्तारी से बचे क्रांतिकारियों ने फिरोजशाह कोटला में एक गुप्त बैठक कर बिखर चुके क्रांतिकारियों को पुनः संगठित करने का निर्णय लिया। इस बैठक में संयुक्त प्रांत की तरफ से शिव शर्मा, सुरेन्द्र पाण्डेय, विजय कुमार सिन्हा तथा जयदेव कपूर ने भाग लिया। भगत सिंह और सुखदेव ने पंजाब का प्रतिनिधित्व किया। बैठक में क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक नेतृत्व वाले एक नये संगठन के गठन का निर्णय लिया। नये संगठन का नाम 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन' (HSRA) रखा गया। चन्द्रशेखर आजाद इसके प्रमुख बने। संगठन में एक केन्द्रीय समिति का निर्माण किया गया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव, शिवशर्मा, विजय कुमार सिन्हा, कुंदनलाल तथा फणीन्द्र घोष को सदस्य नियुक्त किया गया। संगठन का कार्यालय आगरा बनाया गया।
द्वितीय किसान आंदोलन (1931 ई.)
सितम्बर, 1931 में जवाहर लाल नेहरू ने अपने सहयोगियों के साथ प्रयागराज और निकटवर्ती क्षेत्रों में 'करबन्दी' आंदोलन शुरू कर दिया। इस आंदोलन में उनके मुख्य सहयोगी रहे लाल बहादुर शास्त्री एवं जयप्रकाश नारायण। इससे पूर्व 29 अगस्त, 1931 को महात्मा गांधी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए लंदन रवाना हुए तो पंडित नेहरू ने ब्रिटिश कानूनों से किसानों को हो रही परेशानी को लेकर अधिकारियों को ज्ञापन दिया। उनके इस कार्य में पुरूषोत्तम दास टण्डन उनके साथ थे। विश्वव्यापी मंदी के चलते कृषि उत्पाद के दाम काफी गिर गये थे, लेकिन अंग्रेज हुकूमत उनसे लगान तथा मालगुजारी बढ़ाकर वसूलने का प्रयास कर रही थी। कर न जमा कर
पाने पर किसानों का उत्पीड़न किया जा रहा था। अंग्रेज अधिकारियों ने उनकी बातों और जायज मांगों को अनसुना कर दिया तो नेहरू के समक्ष अहिंसात्मक आंदोलन शुरू करने के अतिरिक्त कोई अन्य रास्ता नहीं बचा। 26 दिसम्बर को नेहरू समेत तमाम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
साइमन कमीशन के विरोध के समय लाला लाजपत राय पर अंग्रेजों द्वारा लाठियां बरसाई गयीं जिससे उनका देहांत हो गया। एच.एस.आर.ए. के सदस्यों ने इसका बदला लेने का निर्णय लिया। सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद एवं उनके साथियों ने 19 दिसम्बर, 1928 को जे.पी. सॉण्डर्स नामक पुलिस अधिकारी की हत्या कर इस अपमान का बदला लिया।
सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को केन्द्रीय विधानमंडल में बम फेंककर अपनी गिरफ्तारी दी। इस योजना में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का सहयोग संयुक्त प्रांत के शिव शर्मा तथा जयदेव कपूर ने किया।
भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त दोनों पर बम फेंकने और भगत सिंह पर सॉण्डर्स की हत्या का मुकदमा चला। शिव शर्मा तथा जयदेव कपूर को सहारनपुर से गिरफ्तार किया गया। 23 मार्च, 1931 को भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी दे दी गयी। अन्य अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
चन्द्रशेखर आजाद अंत तक नहीं पकड़े गये। 27 फरवरी, 1931 को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में एक पुलिस मुठभेड़ में बहादुरी से लड़ते हुए उन्होंने स्वयं को गोली मारकर प्राण त्याग दिये।
सविनय अवज्ञा (1930-1934 ई.) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942-1945 ई.)
- द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (7 सितम्बर से 1 दिसम्बर 1931 ई.) से खाली हाथ लौटने के बाद महात्मा गांधी ने एक बार फिर सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) का बिगुल फूंक दिया। गांधी के इस कदम से बौखलायी अंग्रेजी हुकूमत ने दमन चक्र तेज कर दिया और गांधी व सरदार पटेल समेत लगभग एक लाख बीस हजार आंदोलनकारियों को जेल भेज दिया।
- वर्ष 1937 में कांग्रेस ने संयुक्त प्रांत समेत छह प्रांतों में सरकारें बनायीं। यह प्रांतीय सरकार 1935 के भारत सरकार अधिनियम में दिये गये विधानों के अनुरूप बनी थीं। संयुक्त प्रांत में सरकार का नेतृत्व गोविंद वल्लभ पंत ने किया। इस बीच क्रिप्स प्रस्ताव (मार्च, 1942 ई.) से भारतवासियों को कुछ उम्मीदें बंधी, लेकिन इससे भी भारी निराशा मिली। लम्बे संघर्ष और विचार-विमर्श के पश्चात 14 जुलाई, 1942 को कांग्रेस कार्य समिति की वर्धा बैठक में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' के प्रस्ताव को पारित कर दिया गया। आंदोलन की औपचारिक घोषणा से पूर्व 1 अगस्त, 1942 को प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) में 'तिलक दिवस' का आयोजन किया गया।
- भारत छोड़ो प्रस्ताव 8 अगस्त, 1942 को बम्बई (मुम्बई) के ग्वालिया टैंक में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में स्वीकृत हो गया। इसे 'अगस्त क्रांति' कहा गया। इस ऐतिहासिक मौके पर गांधी ने 'करो या मरो' का नारा दिया।
- अंग्रेजों ने अगली सुबह, अर्थात् 9 अगस्त, को 'ऑपरेशन जीरो ऑवर' के तहत तमाम नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। कांग्रेस को असंवैधानिक संस्था घोषित कर उसकी सम्पत्ति जब्त कर ली गई। इससे देश की आम जनता भड़क उठी और चारो तरफ उपद्रव शुरू हो गये। संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के अधिकांश भाग, विशेषकर बलिया, बनारस, मिर्जापुर, जौनपुर, आज़मगढ़, सुल्तानपुर, फैज़ाबाद, गोरखपुर, गाजीपुर, बस्ती आदि क्षेत्रों में आंदोलन का तीव्र प्रभाव देखने को मिला। बलिया में चित्तू पाण्डे के नेतृत्व में एक 'अस्थायी राष्ट्रीय सरकार' की स्थापना कर दी गई। यहां 13 से 16 अगस्त के बीच अनेक पुलिस थानों पर अधिकार कर जेल से कैदियों को छुड़ा लिया गया। कई रेलवे स्टेशन जला दिए गए।
- अंग्रेजों ने 22 अगस्त को बलिया पर पुनः अधिकार कर लिया। समूचे देश में आंदोलन के विरूद्ध कठोरतापूर्वक दमनचक्र चलाया गया। परिणाम यह हुआ कि 1943 के अंत तक भारत छोड़ो आंदोलन पूरी तरह बिखर गया।
- द्वितीय विश्वयुद्ध में 15 अगस्त, 1945 को जापान ने अमेरिका व ब्रिटेन के नेतृत्व वाले मित्र राष्ट्रों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। युद्ध के पश्चात ब्रिटेन में 'लेबर पार्टी' सत्ता में आई। प्रधानमंत्री एटली ने भारत को सत्ता हस्तांतरण के सम्बन्ध में ब्रिटिश नीतियों की घोषणा कर दी। 2 सितम्बर, 1946 को जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में अन्तरिम सरकार गठित हुई। 24 मार्च, 1947 को लॉर्ड माउन्टबेटन को भारत का वॉयसराय बनाकर भेजा गया। नये वॉयसराय ने अत्यन्त चतुराई से कांग्रेस और मुस्लिम लीग की कटुता का लाभ उठाकर भारत विभाजन की नींव रख दी। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हो गया, किंतु देश के विभाजन की कीमत पर।
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