उत्तर प्रदेश की भाषा, बोली एवं साहित्य
उत्तर प्रदेश केवल भौगोलिक रूप से विशाल नहीं है, बल्कि यह वह पुण्यभूमि है जहाँ साहित्य, संस्कृति और बोलियों की अविरल गंगा सदियों से निरंतर बह रही है। वेद-पुराणों की प्राचीन देवभाषा संस्कृत से लेकर, सूफी संतों की मिठास भरी अवधी, सूरदास की ब्रजभाषा और आधुनिक हिंदी गद्य तक उत्तर प्रदेश की मिट्टी ने हर युग के साहित्यिक सफरनामे को बहुत करीब से जिया है। इस विस्तृत लेख में हम उत्तर प्रदेश की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान तक की भाषा, यहाँ की सोंधी बोलियों (जैसे भोजपुरी, बुंदेली, कन्नौजी) और मुंशी प्रेमचंद से लेकर महादेवी वर्मा तक के वैभवशाली साहित्यिक योगदान की गहराई से चर्चा करेंगे। यह एक ऐसी यात्रा है जो आपको प्रदेश की सांस्कृतिक और बौद्धिक जड़ों से जोड़ देगी।

उत्तर प्रदेश: भाषा, बोली एवं साहित्य
हिन्दी भाषा का विकासक्रम
हिन्दी, देवभाषा संस्कृत की उत्तराधिकारिणी है। इसका विकासक्रम नीचे दिए गए प्रवाह चित्र (Flowchart) से समझा जा सकता है:
संस्कृत
(1500 ई.पू. से)
➞
पालि
(प्रथम देशभाषा)
➞
प्राकृत
(महावीर के उपदेश)
➞
अपभ्रंश
(चरम विकास)
➞
अवहट्ट
(अंतिम अवस्था)
➞
प्राचीन/आरम्भिक हिन्दी
भारतीय आर्य भाषा के कालखंड
1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा
समय: 1500 ई. पू. से 500 ई. पू.
- वैदिक संस्कृत
- लौकिक संस्कृत
2. मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा
समय: 500 ई. पू. से 1000 ई.
- पालि एवं प्राचीन प्राकृत
- प्राकृत
- अपभ्रंश एवं अवहट्ट
3. आधुनिक भारतीय आर्य भाषा
समय: 1000 ई. से अब तक
- हिन्दी, बांग्ला, उड़िया, असमिया
- मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिन्धी
उत्तर प्रदेश के प्रमुख भाषा संस्थान
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
स्थापना: 30 दिसम्बर, 1976 (लखनऊ)
राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की स्मृति में। राष्ट्रभाषा हिन्दी का विकास एवं विस्तार।
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानम्
स्थापना: 31 दिसम्बर, 1976 (लखनऊ)
संस्कृत, पालि एवं प्राकृत भाषाओं एवं साहित्य का सर्वांगीण विकास।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी
स्थापना: 29 मार्च, 1927 (प्रयागराज)
हिन्दी, उर्दू, ब्रजभाषा, भोजपुरी, बुन्देली तथा अवधी साहित्य की रक्षा।
उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी
स्थापना: 1972 (लखनऊ)
उर्दू भाषा के विकास, संरक्षण एवं संवर्द्धन हेतु।
हिन्दी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (1927) के अनुसार हिन्दी क्षेत्र की 18 बोलियों को 5 वर्गों (उपभाषाओं) में बांटा गया है:
- पश्चिमी हिन्दी: खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, बुन्देली, हरियाणवी (बाँगरू), कन्नौजी
- पूर्वी हिन्दी: अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
- राजस्थानी: मारवाड़ी, जयपुरी/ढूँढाड़ी, मेवाती, मालवी
- बिहारी: भोजपुरी, मगही, मैथिली
- पहाड़ी: गढ़वाली, कुमाऊँनी, नेपाली
उत्तर प्रदेश की प्रमुख बोलियाँ (क्षेत्र विवरण)
खड़ी बोली (कौरवी)
- प्रथम महाकाव्य: प्रिय-प्रवास
- प्रथम कवि: अमीर खुसरो
- क्षेत्र: सहारनपुर, मेरठ, गाजियाबाद, बिजनौर, रामपुर आदि (मेरठ की मानक मानी जाती है)।
ब्रजभाषा
- विशेषता: रीतिकाल में प्रधानता।
- उपबोलियां: भुक्सा, डांगी, अन्तर्वेदी।
- क्षेत्र: आगरा, मथुरा, अलीगढ़, बरेली, बदायूं आदि।
अवधी
- रूप: ठेठ अवधी (सूफी काव्य) व साहित्यिक (रामचरितमानस)।
- विस्तार: 'फिजी' देश में भी।
- क्षेत्र: लखनऊ, अयोध्या, प्रयागराज, कानपुर, सीतापुर आदि।
भोजपुरी
- विशेषता: हिन्दी प्रदेश में सर्वाधिक बोली जाने वाली।
- विस्तार: सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस आदि देशों में।
- क्षेत्र: वाराणसी, गोरखपुर, बलिया, आजमगढ़ आदि।
उत्तर प्रदेश का समृद्ध साहित्य एवं युग
भारतेन्दु युग
हिन्दी गद्य का नया स्वरूप। ब्रजभाषा, संस्कृत, अंग्रेजी का हिन्दी रूपांतरण। (प्रमुख: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रताप नारायण मिश्र)
रीतिकाल (1643-1843)
रस, अलंकार, काव्यांगों का विकास। (प्रमुख: बिहारी, मतिराम, पद्माकर, भिखारीदास)
छायावाद (1918-1936)
सांस्कृतिक जागरण, राष्ट्रीयता, प्रकृति वर्णन। (प्रमुख: जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत)
प्रगतिशील साहित्य
सामाजिक समानता पर बल। 1936 में लखनऊ में अधिवेशन (अध्यक्ष: प्रेमचन्द)। (प्रमुख: त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल)
भाषा और उसका विकास
सार्थक शब्दों के समूह को भाषा कहते हैं। डॉ. बाबूराम सक्सेना के अनुसार- 'जिन ध्वनि-चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उसको समष्टि रूप से भाषा कहते हैं।'
प्राचीन भारत में वर्तमान उत्तर प्रदेश का क्षेत्र 'मध्य देश' कहा जाता था। यहाँ के लोग भिन्न-भिन्न काल में अलग भाषाएँ बोलते और लिखते आए हैं। संस्कृत इस देश की सबसे पुरानी भाषा है, जिसका प्रयोग हजारों वर्ष पूर्व लोग करते थे। इसका प्राचीनतम् रूप विश्व के प्रथम ग्रन्थ 'ऋग्वेद' में देखने को मिलता है। संस्कृत को 'आर्यभाषा' या 'देवभाषा' भी कहते हैं। यह लगभग 3500 वर्ष पुरानी है। हिन्दी इसी आर्यभाषा 'संस्कृत' की उत्तराधिकारिणी है।
संस्कृत भाषा के दो रूप हैं-
- वैदिक संस्कृत
- लौकिक संस्कृत
- वैदिक संस्कृत के प्रयोग का समय 1500 ई. पू. से 1000 ई. पू. माना जाता है।
- लौकिक संस्कृत के प्रयोग का समय 1000 ई. पू. और उसके बाद माना गया है।
- संसार की विभिन्न भाषाओं को लिखने के लिए अनेक लिपियाँ प्रचलित हैं। हिन्दी, संस्कृत, मराठी, नेपाली आदि भाषाएँ देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं।
- देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। ब्राह्मी लिपि का प्रयोग वैदिक आर्यों ने शुरू किया।
भाषा-परिवार
ऐसी भाषाओं का समूह, जिनका जन्म एक ही मूल भाषा से हुआ हो, 'भाषा-परिवार' कहलाता है। विश्व में आज लगभग 3000 भाषाएँ हैं, जिन्हें 12 भाषा परिवारों में समेटा गया है।
भारत अनेक भाषाओं की समृद्ध साहित्यिक परम्पराओं के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ संसार की चार भाषा-परिवारों की भाषाएँ बोली जाती हैं। यही कारण है कि भारत को 'बहुभाषी' देश कहते हैं।
हिन्दी 'भारतीय आर्यभाषा परिवार' की भाषा है। संस्कृत भाषा से लेकर पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि सोपानों से गुजरती हुई हिन्दी आज समूचे भारत की संपर्क भाषा बन चुकी है।
| भाषा परिवार |
बोलने वालों का प्रतिशत |
| भारोपीय (भारत-यूरोपीय) |
73 प्रतिशत |
| द्रविड़ (मलयालम, कन्नड़, तेलुगू, तमिल) |
25 प्रतिशत |
| चीनी-तिब्बत-बर्मी |
1.3 प्रतिशत |
| आग्नेय |
0.7 प्रतिशत |
भारतीय आर्य भाषाएँ
भारोपीय (भारत-यूरोपीय) भाषा-परिवार अत्यंत विशाल परिवार है। इस भाषा-परिवार की महत्वपूर्ण शाखा है- भारतीय आर्य भाषा परिवार। इस परिवार में हिन्दी, पंजाबी, सिन्धी, गुजराती, मराठी, असमिया, उड़िया, बांग्ला, कश्मीरी आदि भाषाएँ शामिल हैं। ऐतिहासिक विकासक्रम के आधार पर भारतीय आर्य भाषा को तीन काल खंडों में विभक्त किया जाता है-
- प्राचीन भारतीय आर्य भाषा - वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत (1500 ई. पू. से 500 ई. पू.)
- मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा - पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट (500 ई. पू. से 1000 ई. तक)
- आधुनिक भारतीय आर्य भाषा- बांग्ला, उड़िया, असमिया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिन्धी (1000 ई. से अब तक)
मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा - इसे तीन कालखंडों में विभक्त किया गया है-
- पालि एवं प्राचीन प्राकृत (600 ई. पू. से प्रथम शताब्दी तक)
- प्राकृत (प्रथम शताब्दी से से 800 ई. तक)
- अपभ्रंश (500 ई. से 1200 ई. तक)
पालि भारत की प्रथम देशभाषा थी। इसे 'पुरानी प्राकृत' भी कहते हैं। गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश पालि भाषा में दिये। कालांतर में उत्तर भारत के भिन्न-भिन्न भागों में जिस भाषा का विकास एवं व्यवहार्य रूप देखने को मिला उसे 'प्राकृत' भाषा कहते हैं। जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अपने उपदेश प्राकृत में दिये।
मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा का चरम विकास 'अपभ्रंश' में हुआ। अपभ्रंश से हिन्दी, बांग्ला, गुजराती, मराठी, पंजाबी आदि कई भाषाओं का विकास हुआ। अपभ्रंश की अंतिम अवस्था अवहट्ट थी, जिससे हिन्दी (पुरानी हिंदी) का उद्भव हुआ।
उत्तर प्रदेश में भाषा संस्थान
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान
प्रदेश में हिन्दी भाषा व साहित्य के विकास और विज्ञान व प्रौद्योगिकी के विस्तार में राष्ट्रभाषा हिन्दी की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए 30 दिसम्बर, 1976 को लखनऊ में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की स्थापना की गयी। इस संस्थान को राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की पुण्य स्मृति के अवशेष के रूप में स्वीकार किया जाता है।
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानम्
संस्कृत, पालि एवं प्राकृत भाषाओं एवं उनके साहित्य के सर्वांगीण विकास हेतु 31 दिसम्बर, 1976 को लखनऊ में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानम् की स्थापना की गयी।
उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान
भारतीय भाषाओं एवं उनके साहित्य के प्रचार-प्रसार एवं विकास हेतु लखनऊ में उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान की स्थापना की गयी है। संस्थान द्वारा चिकित्सा, स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग, तकनीकी, प्रशासनिक, प्रबन्धकीय एवं विधि के क्षेत्र में पाठ्यपुस्तकों एवं पत्रिकाओं का हिन्दी में मौलिक एवं अनुवाद प्रकाशन का कार्य किया जाता है।
हिन्दुस्तानी एकेडेमी, प्रयागराज
राष्ट्रभाषा हिन्दी और उसके साहित्य के विकास के साथ उर्दू, ब्रजभाषा, भोजपुरी, बुन्देली तथा अवधी साहित्य की रक्षा एवं उनके विकास हेतु 29 मार्च, 1927 को हिन्दुस्तानी एकेडेमी, प्रयागराज की स्थापना की गयी। संस्था द्वारा भारतीय भाषाओं में मौजूद उच्च कोटि के साहित्य का हिन्दी भाषा में अनुवाद एवं प्रकाशन का कार्य कराया जाता है।
उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी
उर्दू भाषा के विकास, संरक्षण एवं संवर्द्धन के उद्देश्य से 1972 में उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी, लखनऊ की स्थापना की गयी। अकादमी द्वारा उर्दू के मौलिक एवं अनुदित पुस्तकों के प्रकाशन एवं उन पर पुरस्कार की योजना चलायी जाती है।
हिन्दी का विकासक्रम
हिन्दी के विकासक्रम को इस प्रकार समझा जा सकता है-
- संस्कृत → पालि → प्राकृत → अपभ्रंश → अवहट्ट → प्राचीन/आरम्भिक हिन्दी
उत्तर भारत में अपभ्रंश के सात भेद या रूप प्रचलित थे, जिनसे आधुनिक भारतीय भाषाओं का जन्म हुआ। यह सात रूप थे - शौरसेनी, पैशाची, ब्राचड़, खस, महाराष्ट्री, मागधी, अर्द्धमागधी।
उत्तर प्रदेश की राजभाषा
उत्तर प्रदेश में 'देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी' को अक्टूबर, 1947 में राजभाषा घोषित किया गया। राजभाषा हिन्दी का प्रयोग प्रदेश के समस्त कार्यालयों में 26 जनवरी, 1968 से अनिवार्य कर दिया गया और इसका अनुपालन न करना अनुशासनहीनता की श्रेणी में रखा गया है।
भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इस दिन को 'हिन्दी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। भारत के अतिरिक्त हिन्दी भाषा मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद एण्ड टोबैगो, गुयाना और नेपाल में बोली जाती है। दुनिया में लगभग 50 करोड़ लोगों द्वारा हिन्दी बोली जाती है, जबकि हिन्दी समझने वालों की संख्या इससे कहीं अधिक है।
वर्ष 1989 में उत्तर प्रदेश राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, (1989) द्वारा उर्दू को प्रदेश की द्वितीय राजभाषा घोषित किया गया।
क्षेत्रीय भाषाओं का विकास
प्रदेश सरकार ने हिन्दी और उर्दू के साथ देश की अन्य भाषाओं के प्रचार-प्रसार की भी व्यवस्था की है। इस उद्देश्य से पांच जनपदों- लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज, आगरा और मुरादाबाद में भारतीय भाषा केन्द्र स्थापित किये गये हैं। इन केन्द्रों में बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी, सिन्धी, उड़िया, कश्मीरी, नेपाली और असमिया कुल 13 भाषाओं के प्रशिक्षण दिये जाते हैं।
बोली
एक छोटे क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है। बोली में साहित्य रचना नहीं होती।
- उपभाषा - जब किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र का विस्तार हो जाता है तो वह बोली न रहकर 'उपभाषा' बन जाती है।
- भाषा - साहित्यकार जब उपभाषा को अपने साहित्य में प्रतिष्ठित कर उसे सर्वमान्य रूप प्रदान कर देते हैं तथा उसका क्षेत्र विस्तार हो जाता है, तो वह 'भाषा' बन जाती है।
- विभाषा - विभाषा का क्षेत्र बोली की अपेक्षा अधिक विस्तृत है। यह एक प्रांत या उपप्रांत में प्रचलित होती है। हिन्दी की विभाषाएँ हैं-ब्रजभाषा, अवधी, खड़ी बोली, भोजपुरी एवं मैथिली।
- सर्वप्रथम एक अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारी जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1927 ई. में अपनी पुस्तक 'भारतीय भाषा सर्वेक्षण' में हिन्दी का उपभाषाओं व बोलियों में वर्गीकरण प्रस्तुत किया। हिन्दी क्षेत्र की समस्त बोलियों को पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है। इन्हें उपभाषा कहा जाता है।
इन उपभाषाओं में हिन्दी की 18 बोलियाँ सम्मिलित हैं, जिन्हें 5 वर्गों में रखा गया है-
- पश्चिमी हिन्दी - खड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, बुन्देली, हरियाणवी (बाँगरू), कन्नौजी
- पूर्वी हिन्दी - अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी
- राजस्थानी - मारवाड़ी (पश्चिमी राजस्थान), जयपुरी/ ढूँढाड़ी (पूर्वी राजस्थान), मेवाती (उत्तरी राजस्थान), मालवी (दक्षिणी राजस्थान)
- बिहारी - भोजपुरी, मगही, मैथिली
- पहाड़ी - गढ़वाली, कुमाऊँनी, नेपाली
उत्तर प्रदेश की प्रमुख बोलियाँ एवं उनका क्षेत्र
- खड़ी बोली - खड़ी बोली का मूलनाम 'कौरवी' है। यह नाम वर्ष 1801 तक अस्तित्व में रहा। 'कौरवी' नाम राहुल सांकृत्यायन ने दिया। खड़ी बोली का क्षेत्र सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बागपत, बिजनौर, हापुड़, गाजियाबाद, मेरठ, शामली, अमरोहा, सम्भल, मुरादाबाद, रामपुर है। इनमें मेरठ की खड़ी बोली आदर्श और मानक मानी जाती है।
- 'प्रिय-प्रवास' खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है। खड़ी बोली के प्रथम कवि अमीर खुसरो थे।
- सर्वप्रथम खड़ी बोली शब्द का प्रयोग 'लल्लू लाल' और 'सदल मिश्र' ने किया।
- ब्रजभाषा - आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, अलीगढ़, मैनपुरी, एटा, हाथरस, बदायूं, बरेली इसके क्षेत्र हैं। रीतिकाल में इसी भाषा की प्रधानता थी। नैनीताल के तराई क्षेत्र में प्रचलित ब्रजभाषा का नाम बुक्सा (भुक्सा) पड़ा। भुक्सा (बुक्सा), डांगी, अन्तर्वेदी, भरतपुरी इसकी उपबोलियां हैं।
- बुन्देली - यह बुन्देलखण्ड की बोली है। झांसी, जालौन, हमीरपुर, ओरछा, उरई, महोबा इसके क्षेत्र हैं।
- कन्नौजी - इटावा, फर्रुखाबाद, शाहजहाँपुर, हरदोई, पीलीभीत, एवं कानपुर क्षेत्र में यह बोली जाती है।
- अवधी - कानपुर, उन्नाव, लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, सीतापुर, फतेहपुर, लखीमपुर खीरी, अयोध्या, गोंडा, प्रयागराज, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, जौनपुर एवं मिर्जापुर इस भाषा के क्षेत्र हैं। अवधी भाषा के दो रूप मिलते हैं- 1. ठेठ अवधी, 2. साहित्यिक अवधी
- ठेठ अवधी में सूफी कवियों की रचनाएं आती हैं, जबकि साहित्यिक अवधी के अंतर्गत गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' जैसी रचनाओं को सम्मिलित किया जाता है। 'फिजी' में अवधी बोली जाती है। गहोरा, जुड़र अवधी भाषा की उपबोलियां हैं।
- बघेली - यह बोली सोनभद्र, प्रयागराज, माँडला, बालाघाट, बाँदा, फतेहपुर, हमीरपुर में बोली जाती है।
- भोजपुरी - यह वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर, मऊ, बलिया, चंदौली, गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, आजमगढ़, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर, अम्बेडकर नगर आदि क्षेत्रों में बोली जाती है। हिन्दी प्रदेश में सर्वाधिक लोगों द्वारा प्रयोग की जाने वाली बोली भोजपुरी है।
- भोजपुरी शब्द का प्रथम प्रयोग रेमण्ड ने किया। भारत के अतिरिक्त कई अन्य देशों - सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस, गुयाना, त्रिनिडाड एण्ड टोबैगो में भी भोजपुरी बोली जाती है।
उत्तर प्रदेश का साहित्य
साहित्य के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश का योगदान सदैव श्रेष्ठ रहा है। वैदिक साहित्य के बड़े भाग की रचना इसी क्षेत्र में हुई। यही कारण है कि वैदिक ग्रंथों में यहां के नगरों, नदियों और शासकों के नाम प्रमुखता से मिलते हैं। 'शतपथ ब्राह्मण' की विदेह माधव कथा में 'सदानीरा' नदी का उल्लेख मिलता है, जो वर्तमान गोरखपुर और देवरिया (कुशीनगर) से गुजरकर बिहार जाने वाली नदी 'गण्डक' का पुराना नाम है। यह स्थापित सत्य है कि उत्तर वैदिक काल में आर्यों का निवास 'सदानीरा' के तट तक था। यहां रहकर उन्होंने वैदिक साहित्य की रचना की।
वर्तमान उत्तर प्रदेश के गुन्दफर्न अथवा गोनर्द (वर्तमान गोण्डा) के निवासी पतंजलि ने योगसूत्र के अतिरिक्त संस्कृत व्याकरण के महान ग्रन्थ 'महाभाष्य' की रचना की।
अयोध्या के निकट बहने वाली 'तमसा' नदी के तट पर वाल्मीकि को 'रामायण' के सृजन का विचार आया और वे विश्व के 'प्रथम कवि' कहलाये। इसके अतिरिक्त सम्राट हर्षवर्धन (606-647 ई) के दरबारी कवि बाणभट्ट ने कन्नौज में रहकर हर्षचरित एवं कादम्बरी जैसी कालजयी ग्रन्थों की रचना की। साकेत (वर्तमान 'अयोध्या') में जन्में अश्वघोष ने महायान सम्प्रदाय से जुड़े 'बुद्धचरित', 'सौन्दरानन्द' और 'सारिपुत्र प्रकरण' जैसे महान ग्रन्थों की रचना की।
हिन्दी साहित्य
हिन्दी गद्य को व्यावहारिक प्रयोगों के लिए विकसित करने का कार्य लखनऊ के मुंशी इंशा अल्लाह खां, आगरा के लल्लू जी लाल तथा प्रयाग के सदासुख लाल नियाजी ने किया। इटावा के राजा लक्ष्मण सिंह और वाराणसी के शिव प्रसाद 'सितारेहिन्द' ने हिन्दी भाषा को विकसित और समृद्ध बनाया।
भारतेन्दु युग
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी भाषा को नया स्वरूप प्रदान किया। भारतेन्दु और उनके युग के रचनाकारों में बालकृष्ण भट्ट (प्रयागराज), राधामोहन गोकुल (आगरा), काशीनाथ खत्री (प्रयागराज), राधाकृष्ण दास (वाराणसी), श्रीनिवास दास (मथुरा), प्रताप नारायण मिश्र (कानपुर) तथा तोताराम वर्मा (अलीगढ़) आदि ने हिन्दी भाषा और साहित्य को लोकप्रिय बनाया। इन लेखकों ने ब्रजभाषा, संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी के शब्दों का हिन्दी में रूपान्तरण कर उसे व्यापक बनाने का कार्य किया।
- ब्रजभाषा में बल्लभ, सूरदास, चैतन्य, निम्बार्क, राधा-वल्लभी आदि कवियों अथवा उनके सम्प्रदायों ने उत्तर प्रदेश में साहित्य के विकास का कार्य किया।
रीतिकाल
रस, अलंकार, गुण, ध्वनि, नायिका भेद आदि काव्यांगों से रीतिकाल (वर्ष 1643 से 1843 ई.) का विकास हुआ। इस काल के रचनाकारों में बिहारी (मथुरा), चिन्तामणि (कानपुर), मतिराम (कानपुर), भिखारीदास (प्रतापगढ़), पद्माकर (बांदा), सूरति मिश्र (आगरा), श्रीधर उपाध्याय (प्रयागराज), बेनी प्रवीन (लखनऊ) आदि के नाम प्रमुख हैं। इस विधा का काव्य बीसवीं शताब्दी तक रचा जाता रहा।
छायावाद (1918-1936 ई.)
- यह वह युग हैं, जिसमें साहित्य, रस, अलंकार एवं श्रृंगार सम्बन्धी विषयों से हटकर सांस्कृतिक जागरण, कल्पना एवं मनुष्य के चिन्तन के लिए प्रतिबद्धता दिखायी देती है। श्रीधर पाठक ने 'हिन्दी प्रदीप' में एक लेख लिखकर देश प्रेम आदि विषयों पर लिखने और रीतिकाल के लेखन को छोड़ने का आग्रह किया। श्रीधर पाठक प्रथम स्वच्छन्दतावादी रचनाकार थे, जिन्होंने कांग्रेस से पहले जयहिन्द का नारा दिया। प्रयागराज में सुमित्रा नन्दन पन्त और महादेवी वर्मा का नियमित आना-जाना था। यहीं से छायावाद का विकास हुआ।
- मैथिलीशरण गुप्त (चिरगांव, झांसी) के प्रकृति वर्णन ने इस विधा को लोकप्रिय बनाया। भाषा को मानकीकृत और व्यवस्थित करने के साथ ही देश प्रेम, राष्ट्रीयता और नये विचारों के प्रति ग्रहण करने की भावना छायावाद की पहचान बनी।
- महावीर प्रसाद की 'सरस्वती' से इसके विकास में योगदान मिला। इस काल की रचनाओं में अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के 'प्रियप्रवास' की राधा, मैथिलीशरण गुप्त के 'साकेत' की सीता, जयशंकर प्रसाद के 'कामायनी' की श्रद्धा, प्रेमचन्द के 'सेवासदन' की सुमन व गोदान की मालती आदि स्त्रियां भारतीय समाज के आदर्शमय यथार्थवादी युग का प्रतिनिधित्व करती हैं।
उत्तर प्रदेश का कथा साहित्य
प्रेमचन्द के 'गबन' और 'गोदान' जैसे कालजयी उपन्यासों के अतिरिक्त 'पूस की रात', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'सद्गति', 'कफन', 'नशा', 'ठाकुर का कुआं', 'सवा सेर गेहूँ' आदि कहानियों में सामाजिक यथार्थ का अद्वितीय चित्रण मिलता है। दूसरी तरफ भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, अज्ञेय, जैनेन्द्र तथा इलाचन्द्र जोशी ने मानव मन को केन्द्र में रखकर उपन्यासों की रचना की। इन कथाकारों ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में अनेक नैतिक और सामाजिक प्रश्नों को उठाया।
- विवेकीराय का 'बबूल', रामदरश मिश्र का 'जल टूटता हुआ' तथा अब्दुल बिस्मिल्लाह का 'झीनी-झीनी बीनी चदरिया' इस काल की महत्वपूर्ण रचनाएं हैं।
- शैलेश मटियानी की रचना 'मुठभेड़', विभूति नारायण राय की 'कर्फ्यू', मैत्रेयी पुष्पा का 'इदन्नमम्' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास इसी काल में लिखे गये।
मुंशी प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, यशपाल, उपेन्द्र नाथ 'अश्क', सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' आदि ने कहानी विधा को विभिन्न आन्दोलनों और परिवर्तनों के दौर से गुजारते हुए आम आदमी की पीड़ा को स्वर देने का कार्य किया। इन लेखकों में कुछ अन्य
प्रमुख नाम हैं- राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, अमरकान्त, शैलेश मटियानी, शिखर जोशी, विभूति नारायण राय, रामलाल, दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, गिरिराज किशोर, गोविन्द मिश्र, मैत्रेयी पुष्पा, ममता कालिया, शिवानी, प्रियंवद, मुद्राराक्षस, वीरेन्द्र सारंग आदि।
नवजागरण काल
हिन्दी साहित्य के नवजागरण काल के रचनाकारों में सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रा नन्दन पंत, जयशंकर प्रसाद तथा महादेवी वर्मा के नाम प्रमुख हैं। हरिवंश राय बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, भगवती चरण वर्मा आदि ने वर्जित रचना क्षेत्र के प्रतिबंधों को छोड़ उन्मुक्तता और सहजता को अपनी कविता का विषय बनाया।
प्रगतिशील साहित्य
लेखन में सामाजिक समानता के पक्षधर लेखकों के संगठन 'प्रगतिशील लेखक संघ' की नींव यद्यपि सज्जाद ज़हीर के प्रयासों से 1935 में लंदन में पड़ी किन्तु इसकी वास्तविक स्थापना 10 अप्रैल, 1936 को लखनऊ अधिवेशन में हुई। लखनऊ के रिफ़ाह-ए-आम क्लब में आयोजित इस अधिवेशन की अध्यक्षता मुंशी प्रेमचन्द ने की थी।
इस विधा के रचनाकारों में त्रिलोचन, शीलजी तथा केदारनाथ अग्रवाल के नाम प्रमुख हैं। कुशीनगर में पैदा हुए सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' इसी विचारधारा से जुड़े लेखक माने जाते हैं।
नरेश मेहता (कार्यक्षेत्र-प्रयागराज), शमशेर, धर्मवीर भारती, कुंवर नारायण, रघुपति सहाय 'फिराक गोरखपुरी', केदारनाथ सिंह आदि लेखकों ने उत्तर प्रदेश के साहित्य को विश्व भर में लोकप्रिय बनाने का कार्य किया।
गीत एवं गज़ल
गीत और गज़ल के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के रचनाकारों का योगदान महत्वपूर्ण है। गोपाल दास 'नीरज', दुष्यंत कुमार, उमाकांत मालवीय, मोहन अवस्थी, सोम ठाकुर, अदम गोंडवी, के.पी. सक्सेना, गोरख पाण्डेय, महेश्वर तिवारी आदि का इस क्षेत्र में अमूल्य योगदान रहा।
नाट्य साहित्य
नाट्य साहित्य के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट, देवकीनन्दन त्रिपाठी, गोपाल दास, शीतला प्रसाद आदि को उत्तर प्रदेश समेत सम्पूर्ण भारत में नाटक और रंगमंच की भूमि तैयार करने का श्रेय जाता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटकों में सामाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता पर बल दिया।
रामकुमार वर्मा, जगदीश चन्द्र माथुर, लक्ष्मीकांत वर्मा, मुद्राराक्षस, विपिन कुमार, उर्मिल कुमार थपलियाल आदि ने हिन्दी नाटक को समर्थ और समकालीन बनाया। इसके अतिरिक्त नेमिचंद जैन और गिरीश रस्तोगी का नाट्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही।
आलोचना एवं समीक्षा
आलोचना और पुस्तक समीक्षा का आरम्भ उत्तर प्रदेश से माना जाता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बदरी नारायण चौधरी 'प्रेमधन' तथा बालकृष्ण भट्ट इस विधा के प्रवर्तक थे। बाबू श्याम सुन्दर दास तथा रामचन्द्र शुक्ल ने न केवल हिन्दी आलोचना की भाषा विकसित की, बल्कि हिन्दी साहित्य के अनेक मानक भी निर्धारित किए। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा को मानकीकृत करके हिन्दी को गद्य और पद्य की एक भाषा बनाया।
रामविलास शर्मा, शिवदान सिंह चौहान, नामवर सिंह, विजयदेव नारायण साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, परमानन्द श्रीवास्तव, रामचन्द्र तिवारी, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, नन्द दुलारे वाजपेयी, मधुरेश, वागीश शुक्ल, सुशील सिद्धार्थ और कृष्ण मोहन ने हिन्दी आलोचना को समृद्ध बनाया।
आत्मकथा एवं यात्रा वृत्तांत
आत्मकथा, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण तथा जीवनी जैसी विधाओं में उत्तर प्रदेश में विशेष कार्य हुए। श्याम सुन्दर दास की 'मेरी आत्म कहानी' तथा हरिवंश राय बच्चन की चार खंडों में प्रकाशित 'क्या भूलूँ, क्या याद करूँ', 'नीड़ का निर्माण', 'बसेरे से दूर' और 'दशद्वार से सोपान तक' का आत्मकथा विधा में विशेष महत्व है।
- यात्रा वृत्तांतों में अज्ञेय का 'अरे यायावर रहेगा याद' विषय की जीवंतता का श्रेष्ठ उदाहरण है।
- जीवनी की दृष्टि से विष्णु प्रभाकर के 'आवारा मसीहा' को मानक समझा जाता है। यह बांग्ला उपन्यासकार शरद चन्द्र की जीवनी है।
- दूधनाथ सिंह की 'लौट आ ओ धार' और काशी नाथ सिंह की 'काशी का अस्सी' संस्मरण विधा की श्रेष्ठ रचना मानी जाती है।
| उत्तर प्रदेश के प्रमुख साहित्यकार |
| नाम |
जन्म/निवास |
| 1. रामचंद्र शुक्ल |
बस्ती |
| 2. महादेवी वर्मा |
फर्रूखाबाद |
| 3. राहुल सांकृत्यायन |
आजमगढ़ |
| 4. हरिवंशराय बच्चन |
प्रयागराज |
| 5. मुंशी प्रेमचंद्र |
वाराणसी |
| 6. जयशंकर प्रसाद |
वाराणसी |
| 7. जायसी |
रायबरेली |
| 8. मैथलीशरण गुप्त |
झांसी |
| 9. जैनेन्द्र कुमार |
अलीगढ़ |
| 10. भारतेंदु हरिश्चन्द्र |
वाराणसी |
| 11. तुलसीदास |
काशगंज |
| 12. अज्ञेय |
कुशीनगर |
| 13. अमृतलाल नागर |
आगरा |
| 14. यशपाल |
फिरोजपुर |
उर्दू साहित्य
उर्दू भाषा एवं साहित्य के विकास में उत्तर प्रदेश का प्रमुख योगदान रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एटा जनपद के अन्तर्गत पटियाली में जन्मे अमीर खुसरो ने यद्यपि कुछ पद्यात्मक रचनाओं से उर्दू साहित्य को प्रस्तुत करने का कार्य किया किन्तु उर्दू गद्य का वास्तविक विकास 18वीं शताब्दी में प्रारम्भ हुआ।
- उर्दू के तीन महान शायर गालिब, मीर तथा नज़ीर अकबराबादी ने आगरा में जन्म लिया था। अवध का नवाब आसिफुद्दौला स्वयं उच्चकोटि का शायर था।
- उर्दू नाटककारों में अवध के नवाब वाजिद अली शाह 'अख्तर' ने 'राधा कन्हैया का किस्सा' तथा आगा हसन अमानत ने 'इन्द्रसभा' लिखकर उर्दू साहित्य को नया मुकाम दिया।
- उत्तर प्रदेश के कुछ अन्य प्रख्यात शायरों में रघुपति सहाय 'फ़िराक गोरखपुरी', सुरूर जहानाबादी, मौ. मोहम्मद अली 'जौहर', नौबत राय 'नज़र', हसरत मोहानी, अज़गर गोंडवी, अकबर इलाहाबादी, आरज़ू लखनवी, जाफर अली खां 'असर' आदि के नाम प्रमुख हैं।
- उर्दू गद्य के प्रथम लेखक लखनऊ के मिर्जा रज़ब अली बेग 'सुरूर' थे। उन्होंने अवध के नवाब नसीरूद्दीन हैदर के शासनकाल में 'फसान-ए-अजायब' की रचना की।
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