उत्तर प्रदेश की चित्रकला एवं शिल्प

उत्तर प्रदेश की चित्रकला एवं शिल्प

उत्तर प्रदेश की माटी सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर कला और शिल्प का एक ऐसा सजीव सफरनामा समेटे हुए है, जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देती है। मिर्ज़ापुर की गुफाओं में उकेरे गए आदिमानव के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से लेकर मुग़ल काल की बारीक नक्काशी और आज के समय में विश्व पटल पर छा रहे 'एक जिला-एक उत्पाद' (ODOP) तक UP का हर कोना अपने आप में एक अनूठी रचनात्मकता का गवाह है। इस विस्तृत लेख में आप लखनऊ की नज़ाकत भरी चिकनकारी, बनारस की रेशमी ज़री, भदोही के बेशकीमती कालीन और गोरखपुर के टेराकोटा समेत राज्य की उन सभी प्रमुख चित्रकलाओं एवं शिल्पकलाओं की वैभवशाली जानकारी पढ़ेंगे, जो हमारी सांस्कृतिक पहचान और आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
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उत्तर प्रदेश: चित्रकला एवं शिल्पकला
मुगल चित्रकला का क्रमिक विकास
बाबर

बेहज़ाद तथा शाह मुज़फ़्फ़र की प्रशंसा। युद्धों में व्यस्त।

हुमायूँ

मीर सैय्यद अली व अब्दुस्समद द्वारा 'दास्तान-ए-अमीर हम्जा' की शुरुआत।

अकबर

'तस्वीर खाना' की स्थापना। 'हमज़ानामा' व 'रज़्मनामा' चित्रित।

जहांगीर

स्वर्ण काल। पक्षियों, पशुओं व प्रकृति का जीवंत चित्रण।

शाहजहां

छवि चित्र (Portraits) व किनारों (Borders) के अलंकरण पर जोर।

औरंगजेब

चित्रकला धर्मनिषिद्ध घोषित। राजकीय संरक्षण समाप्त।

प्रमुख चित्रकला शैलियाँ
प्रागैतिहासिक चित्रकला
  • मिर्ज़ापुर: 1867-68 में ए.सी.एल. कार्लाइल द्वारा खोज। लिखुनियाँ, घोड़मंगर, भण्डारिया।
  • बांदा क्षेत्र: मानिकपुर में 'चोंचदार पुरूष', करियाकुंड में शिकार के चित्र।
  • रंग: मुख्य रूप से लाल गेरू (Hematite)।
लोक एवं क्षेत्रीय कलाएँ
  • चौकपूरन: फर्श सजावट। चावल के आटे व खड़िया से ज्यामितीय आकृतियां।
  • पिछवई चित्रकला: सूती कपड़े पर श्रीनाथ जी (कृष्ण) का चित्रण।
  • ब्रज चित्रकला: कृष्ण लीला, गोपी-ग्वाल और प्रकृति पर आधारित।
अन्य ऐतिहासिक शैलियाँ
  • बुन्देला शैली: मुगल-राजस्थानी से भिन्न, छोटे माथे और सपाट टीले।
  • राजपूत शैली: रागमाला, राधा-कृष्ण व श्रृंगारमयी नारी का चित्रण।
  • जैन चित्रकला: जौनपुर (कल्पसूत्र पाण्डुलिपि - 1465 ई.)।
  • रूमी-कलम: 19वीं सदी में लखनऊ। अवध + यूरोपीय शैली का मिश्रण।
उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध हस्तशिल्प
कढ़ाई एवं वस्त्र शिल्प
  • ज़रदोज़ी: सोने-चांदी के धागों से कढ़ाई (लखनऊ, वाराणसी, आगरा)।
  • बनारसी ज़री (किनखाब): ज़री, आमरू और अवरावन साड़ियां।
  • चिकनकारी: सूती कपड़े पर सफेद धागे से फूलों की कढ़ाई (लखनऊ)।
  • मुकेश बादला: धातु के तारों से 'फरदी' व 'कामदारी' आकृतियां।
धातु एवं पत्थर का काम
  • मुरादाबाद: पीतल पर नक्काशी व जड़ाई।
  • वाराणसी: धातु पर उभारदार काम (कसेरा समुदाय), मुलायम पत्थर पर जाली का काम।
  • आगरा: संगमरमर पर 'पित्र दूरा' (Pietra-Dura) जड़ाई का काम।
  • महोबा: गौरा पत्थर (मुलायम सफेद पत्थर) शिल्प।
मिट्टी, लकड़ी व अन्य शिल्प
  • टेराकोटा: मिट्टी के खिलौने (हाथी, पंचमुखी गणेश) - गोरखपुर
  • काली मिट्टी के बर्तन: निजामाबाद, जिंक-मरकरी से चमक।
  • लकड़ी शिल्प: सहारनपुर (नक्काशी), मैनपुरी (तारकशी), बनारस (रंगीन खिलौने)।
  • कांच शिल्प: फिरोजाबाद (चूड़ियां), वाराणसी (कांच के मनके)।
  • इत्र निर्माण: जलीय आसवन विधि से प्राकृतिक इत्र - कन्नौज
प्रमुख भौगोलिक संकेतक (GI Tags) प्राप्त उत्पाद

नोट: उत्तर प्रदेश भारत में सर्वाधिक हस्तशिल्प GI टैग (60+) वाला राज्य है।

क्षेत्र / जिला GI टैग प्राप्त उत्पाद
लखनऊ चिकनकारी, ज़रदोज़ी
वाराणसी (बनारस) ज़री साड़ी, गुलाबी मीनाकारी, लकड़ी के रोगन व खिलौने, धातु उभारदार काम, कांच मनका, पत्थर जाली काम, मेटल कॉस्टिंग
आगरा दरियां, लेदर फुटवेयर
मिर्ज़ापुर एवं भदोही हस्तनिर्मित दरियां (मिर्ज़ापुर), हस्तनिर्मित कारपेट (भदोही)
अन्य महत्वपूर्ण जिले गोरखपुर: टेराकोटा कन्नौज: इत्र मुरादाबाद: धातु शिल्प सहारनपुर: लकड़ी शिल्प फिरोजाबाद: कांच निजामाबाद: काली मिट्टी बर्तन मेरठ: कैंचियां अलीगढ़: ताला
शिल्प विकास हेतु प्रमुख सरकारी योजनाएं
योजना का नाम मुख्य उद्देश्य
एक जिला-एक उत्पाद (ODOP) स्थानीय शिल्पों का संरक्षण, ब्रांडिंग, पर्यटन से जुड़ाव और राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय विपणन।
यूपी डिजाइन संस्थान हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्रों के लिए प्रशिक्षित डिजाइनरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना पारंपरिक कारीगरों के कौशल विकास व रोजगार को प्रोत्साहन।
पेंशन व सम्मान योजनाएं मुख्यमंत्री हस्तशिल्प पेंशन योजना, संत कबीर हथकरघा पुरस्कार, मुख्यमंत्री हथकरघा बुनकर सम्मान।

चित्रकला

प्रागैतिहासिक युग
उत्तर प्रदेश में चित्रकला के प्रारम्भिक साक्ष्य उच्च पुरापाषाणकाल (Upper Paleolithic Age) एवं मध्य पाषाणकालीन (Mesolithic Age) मनुष्यों द्वारा अपने निवास के रूप में प्रयोग किये गये शैलाश्रयों (Rock Shelters) में बनाये गये चित्रों के रूप में मिलते हैं। भारत में सर्वप्रथम चित्रित शैलाश्रयों की खोज 1867-68 में ए.सी.एल. कार्लाइल द्वारा मिर्ज़ापुर के सोहांगी पहाड़ियों में की गई। उसके बाद कई चित्रित शैलाश्रय, चंदौली, सोनभद्र, मिर्ज़ापुर, प्रयागराज, मऊ, बांदा और आगरा में प्राप्त हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर और बांदा क्षेत्र शैल चित्रों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

मिर्ज़ापुर के चित्र

प्रयागराज एवं वाराणसी के निकटवर्ती मिर्ज़ापुर जनपद में सोन नदी से लगी कैमूर पर्वत श्रृंखला विद्यमान है, जो विन्ध्य पहाड़ियों का भाग है। यहां 105 से अधिक शैलाश्रय एवं गुफाएं, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'दरी' कहा जाता है, प्राप्त हुई हैं। भित्ति चित्रकला (Mural Painting) के रूप में गुफाओं की दीवारों (Walls) एवं छतों (Ceilings) पर अंकित विभिन्न प्रकार के आखेट दृश्य, नृत्य-संगीत एवं पशुओं के चित्र तत्कालीन आदिम मनुष्यों की सोच, सौन्दर्यबोध एवं कलाप्रियता की जानकारी देते हैं। यहां लिखुनियाँ, विजयगढ़, कोहवर, सोरहोघाट, भण्डारिया, बागापथरी, कांडाकोट, घोड़मंगर, सौहरीरौप, मोहरापथरी, खोड़हवा आदि स्थान पर से लालगेरू अथवा धाऊ पत्थर (Hematite) से बने 5000 ई.पू. के अनेक भित्तिचित्र प्राप्त हुए हैं। स्थानीय लोग इन चित्रों को 'रकत की पुतरिया' नाम से पुकारते हैं। अधिकांश चित्र गेरू, कोयला अथवा हिरौंजी से बनाये गये हैं। चित्रों में प्रायः लाल, मिश्रित गेरू (Ochre), सफेद, पीले और हरे रंग का प्रयोग किया गया है।

मिर्ज़ापुर में गरई नदी के किनारे बसे 'लिखुनियाँ' में 'हाथी के शिकार' का एक सुन्दर शैलचित्र मिला है। चित्र में लम्बे भाला लिए हुए कुछ घुड़सवार पालतू हथिनी की मदद से जंगली हाथी को पकड़ने का प्रयास करते दिखाये गये हैं। एक अन्य चित्र में नृत्यवादन करते लोगों का अंकन है।
  • घोड़मंगर नामक स्थान से गैंडे के आखेट का चित्र मिला है, जिसमें शिकारियों का समूह एक गैंडे पर भाले से प्रहार कर रहा है जबकि गैंडे ने एक शिकारी को अपनी सींग से ऊपर उछाल दिया है। भण्डारिया से एक ऊँट का सुन्दर चित्र प्राप्त हुआ है।
  • कांडाकोट के निकट 'ढोकवा महारानी' नामक प्रसिद्ध शैलाश्रय है, जहां 'प्रेत का रहस्यमय चित्र' के अतिरिक्त 'साही का आखेट' का अंकन मिलता है।
  • सोरहोघाट में 'सुअर के आखेट' का एक जीवंत चित्र है, जिसमें सुअर के खुले मुँह के माध्यम से इसकी पीड़ा को दर्शाया गया है।
  • विजयगढ़ में तीन मनुष्यों को लाल, पीले और सफेद रंग से बनाया गया है।

बांदा क्षेत्र

प्रदेश के बांदा क्षेत्र अंतर्गत मानिकपुर में गेरू से बने अनेक शैलचित्र मिले हैं। एक चित्र में सुसज्जित द्वार पर एक 'चोंचदार पुरूष' को बैठा दिखाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह गुफा कोई तंत्र-मंत्र शाला थी। यहीं करियाकुंड में 'बारहसिंगा का पीछा करते हुए धनुषधारी शिकारियों' का चित्र अंकित है। इस युग के शैलचित्रों में मुख्यतः मनुष्य के साथ पशुओं को दिखाया गया है। बावजूद इसके, लिखुनियाँ एवं कोहवर में 'मयूर' के चित्र भी मिले हैं।

चौकपूरन
चौकपूरन फर्श की सजावट के लिए उत्तर प्रदेश की एक लोक कला है। इसे सोनारपना भी कहते हैं। चौकपूरन द्वारा सजावट सामान्यतः त्यौहारों और मांगलिक कार्यक्रमों के अवसरों पर की जाती है। इनका मुख्य उद्देश्य देवताओं का आह्वान करना होता है। इसे स्वागत के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। चौक पूरने के लिए चावल का आटा, चूना या खड़िया व अन्य घरेलू तौर पर उपलब्ध वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। पारम्परिक चौकपूरन कलाकृतियों में ज्यामितीय आकृतियों यथा वृत्तों, वर्गों और त्रिभुजों का उपयोग किया जाता है। कलश और स्वास्तिक जैसे शुभ प्रतीकों का भी उपयोग होता है। यह परम्परा सिंधु घाटी सभ्यता के समय से चली आ रही है। इसे पारम्परिक रूप से महिलाएं बनाती हैं। इसे केवल हाथों से बनाया जाता है।

मुगल चित्रकला

बाबर

भारत में मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर का चित्रकला के प्रति स्वाभाविक आकर्षण था। अपनी आत्मकथा 'तुजुक-ए-बाबरी' में उसने दो चित्रकारों-बेहज़ाद तथा शाह मुज़फ़्फ़र की प्रशंसा की है। बावजूद इसके, युद्ध में अनवरत व्यस्त रहने के कारण वह इस क्षेत्र में कुछ अधिक कर न सका।

हुमायूँ

हुमायूँ ने अपने शासनकाल में निरन्तर भटकने एवं संघर्ष करने के बावजूद भारत में चित्रकला की नींव रखी। उसने ईरान के दो कलाकारों - मीर सैय्यद अली तथा ख्वाजा अब्दुस्समद 'शीरी कलम' को बुलाकर अपने दरबार में रखा और उन्हें 'दास्तान-ए-अमीर हम्जा' तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी। दोनों कलाकारों ने अपने अन्य सहयोगियों के साथ इस कार्य को पूर्ण किया। पैगम्बर मुहम्मद साहब के चाचा अमीर हमजा के साहसिक कारनामों वाले इस ग्रंथ में 1375 चित्र हैं।

अकबर

  • अकबर को चित्रकला में विशेष रूचि थी। आईन-ए-अकबरी में अबुलफज़ल ने बताया है कि अकबर ने सौ से अधिक चित्रकारों की नियुक्ति की, जो फतेहपुर सीकरी के एक विशेष भवन में कार्य करते थे। अकबर द्वारा चित्रकला के लिए स्थापित इस विशेष भवन को 'तस्वीर खाना' कहा जाता था।
  • अकबर ने कलाकारों के सहयोग से 1562 ई. में एक विशाल सचित्र पाण्डुलिपि 'हमज़ानामा' तैयार कराना आरम्भ किया। पाण्डुलिपि तैयार होने में चौदह वर्ष लगे। इसमें 1400 बड़े आकार के पूर्ण मुगल लघु चित्र शामिल थे। हमज़ानामा के आज भी लगभग 170 फोलियो विश्व के विभिन्न संग्रहालयों में मौजूद बताये जाते हैं।
  • आईन-ए-अकबरी के अनुसार अकबर के दरबार में तेरह उच्च कोटि के हिन्दू और चार मुसलमान चित्रकार थे। इनमें प्रमुख नाम थे- मीर सैय्यद अली, ख्वाजा अब्दुस्समद 'शीरी कलम', फर्रुख कलम, दसवन्त, बसावन, मिस्कीन, केशव, जगन्नाथ, लाल, महेश, माधव, खेमकरन, हरिवंशराम, सानवाला आदि।
  • अकबर के शासनकाल में बने चित्र अपने ऐतिहासिक विषयवस्तु के कारण फारसी परम्परा और भारतीय शैली के समन्वय की विशिष्टता प्रस्तुत करते हैं। अकबर ने अपने शासन काल में अनेक ग्रंथों को चित्रित कराया।
  • इन चित्रित ग्रंथों में प्रमुख हैं- 'रज़्मनामा' (महाभारत), रामायण, तारीख-ए-खानदाने तैमूरिया, हमजानामा, तारीख-ए-रशीदी, वाकयात-ए-बाबरी, खम्सा निजामी, अनवार-ए-सुहेली, बहरिस्तान जामी आदि।

जहांगीर

जहांगीर चित्रकला का महान संरक्षक था। वह न केवल एक कुशल चित्रकार था, बल्कि उसकी अपनी चित्रशाला (Studio) भी थी। वह शिकार के दृश्यों, पक्षियों और फूलों की चित्रकारी पसंद करता था। उसकी चित्रकला में रूपवादी (Formalist) शैली की प्रधानता है। प्रकृति प्रेमी होने के कारण उसने पक्षियों और पशुओं के बड़े ही जीवंत चित्र तैयार कराये। उसके दरबार में अबुल हसन, उस्ताद मंसूर, फर्रुखबेग, बिशनदास आगा रज़ा, मोहम्मद मुराद, माधव, मनोहर, गोवर्धन जैसे विख्यात चित्रकार मौजूद थे। उस्ताद मंसूर विख्यात पक्षी विशेषज्ञ चित्रकार था, जिसे जहांगीर ने 'नादिर-उल-अस्र' की उपाधि प्रदान की थी। इसके अतिरिक्त अबुल हसन को 'नादिर-उज़-जमा' (युग शिरोमणि) की उपाधि दी थी।

पिछवई चित्रकला
पिछवई चित्रकला श्रीनाथ के मंदिर से संबद्ध है। यह चित्र सामान्यतः एक सूती कपड़े पर पारम्परिक रंगों का उपयोग कर बनाये जाते हैं। सामान्य तौर पर इन चित्रों को देवता के कक्ष में टांगा जाता है। इनका निर्माण गौड़ अथवा पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के सदस्यों द्वारा किया जाता है। कृष्ण का श्रीनाथ जी के रूप में चित्रण इनका मुख्य विषय है। चित्रों में रासलीला, होली, अन्नकूट (गोवर्धन पूजा) आदि विषयों का प्रयोग विभिन्न त्यौहारों और अवसरों पर किया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि मथुरा स्थित श्रीनाथ जी का मंदिर पिछवई चित्रकला का केन्द्र था, जिसे 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के आक्रमण के भय से राजस्थान के नाथद्वारा (उदयपुर) में स्थानान्तरित होना पड़ा। पिछवई चित्रकार भी मंदिर के साथ स्थानान्तरित हो गये तथा इस परम्परा को जारी रखा।

शाहजहां

शाहजहां को भवन निर्माण (स्थापत्य) से विशेष प्रेम था, जिसके कारण वह चित्रकला को अपने पिता जहांगीर की तरह यथेष्ठ प्रोत्साहन नहीं दे सका। बावजूद इसके, उसने अपने पिता की चित्रकला परम्परा को जारी रखा। उसके दरबार में जहांगीर की चित्रशाला के चित्रकार पूर्ववत कार्य करते रहे। उसके समय में छवि चित्र (Portraits) और पाण्डुलिपि (Illustrating Books) तैयार किये जाते थे। मोहम्मद फ़कीरुल्ला, मीर हाशिम, गोवर्धन, विचित्तर, चित्रमन आदि उसके दरबार के प्रमुख चित्रकार थे। शाहजहां के समय में चित्रकारी में रंगों की चमक बढ़ गयी और अलंकरण के लिए 'किनारा' (Border) का उपयोग होने लगा। शाहजहां का ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह चित्रकला का प्रेमी था। उसने चालीस चित्रों का एक संग्रह (Album) तैयार कराया था, जो वर्तमान में लंदन की लाइब्रेरी में सुरक्षित है।

औरंगजेब

औरंगजेब चित्रकला का कट्टर विरोधी था। उसने चित्रकला को धर्मनिषिद्ध घोषित कर दिया। बावजूद इसके, चित्रकारी पूरी तरह रुकी नहीं, किंतु इसे बादशाह का संरक्षण मिलना समाप्त हो गया। राजपूत राजाओं के दरबारों में कुलीनों और उनके संबंधियों के छवि चित्रण बनाए जाते रहे।

बुन्देला चित्रकला

बुन्देलखण्ड के शासक राजा वीरसिंह को मुगल बादशाह जहांगीर ने अपने दरबार में तीन हजारी मनसबदारी का पद प्रदान किया था। इसी वंश का राजा शत्रुजीत (1762-1801 ई.) चित्रकला का प्रेमी और संरक्षक था। इसके अनेक सुंदर चित्र मिले हैं। एक चित्र में इसे अश्व पर बैठे दिखाया गया है, जिसके हाथ में लम्बी तलवार है। व्यक्ति विशेष के अतिरिक्त इस शैली में कृष्ण लीला, बिहारी सतसई, रागमाला चित्रावली, रसराज आदि चित्र प्राप्त हुए हैं।
बुन्देला चित्रकला की शैली मुगल और राजस्थानी शैलियों से भिन्न है। इस शैली के चित्रों में माथा छोटा और वस्त्रों को अलंकारिक बनाया गया है। चित्रों की पृष्ठभूमि में प्रायः सपाट टीले बनाये गये हैं।

राजपूत चित्रकला

राजपूत शैली की चित्रकला के विकास में कन्नौज, बुन्देलखण्ड के चंदेल शासकों का विशेष योगदान रहा। इन चित्रों में सामाजिक जीवन संबंधी विषयों की प्रधानता है। नायक-नायिका, रागमाला, राधा-कृष्ण एवं श्रृंगारमयी नारी का चित्रण अधिक है। इस शैली के अधिकांश चित्र दीवारों अथवा बड़े आकार के कागजों व कपड़ों पर मिलते हैं।

स्ट्रीट आर्ट
स्ट्रीट आर्ट/ग्राफिटी का सामान्य उद्देश्य असंतोष का प्रदर्शन रहा है, किन्तु भारत में इसका प्रयोग प्रचलित लोकप्रिय संदेशों और सौंदर्यीकरण हेतु किया जाता रहा है। इसे सामुदायिक भवनों, सार्वजनिक स्थलों और सार्वजनिक रूप से नजर आने वाली अन्य जगहों पर बनाया जाता है। यह कला उत्तर प्रदेश में तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
उत्तर प्रदेश में लखनऊ, अयोध्या, प्रयागराज, वाराणसी तथा गोरखपुर समेत कई शहरों को बड़े आकार के भित्ति चित्रों द्वारा सुसज्जित किया जा चुका है। प्रयागराज को 'पेंट माई सिटी' योजना के अंतर्गत एक जीवंत आर्ट गैलरी के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसे सबसे बड़ी चित्रकला के रूप में 'गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड' में शामिल किया गया है। चित्रकारों द्वारा दीवारों, पुलों, स्तम्भों, भवनों, जल टैंकों आदि को उनके कैनवास की भांति उपयोग किया गया है।
प्रयागराज, अयोध्या, गोरखपुर और वाराणसी की स्ट्रीट आर्ट में कई देशी और विदेशी कलाकारों ने अपना योगदान दिया है।

ब्रज चित्रकला

इस शैली के चित्र मथुरा, वृंदावन तथा गोकुल की पृष्ठभूमि पर तैयार करते हैं। इनमें वासुदेव कृष्ण, गोपी-ग्वाल, प्रेम, प्रकृति तथा इनसे जुड़ी हुई भावनात्मक अभिव्यक्ति की प्रधानता है।

जैन चित्रकला

ग्यारहवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्य जौनपुर, अवध तथा आस-पास के क्षेत्र में इस चित्रकला शैली का विकास हुआ। इसका प्रसार गुजरात, बंगाल, मारवाड़, मालवा आदि क्षेत्रों में भी हुआ। इस शैली में अनेक सचित्र ग्रंथों को तैयार किया गया, जिनका मुख्य विषय जैन धर्म था। जौनपुर में तैयार किया गया जैन ग्रन्थ 'कल्पसूत्र' की सचित्र पाण्डुलिपि इस सम्बन्ध में विशेष उल्लेखनीय है। कल्पसूत्र की इस प्रति को देवीदास गौड़ कायस्थ ने 1465 ई. में तैयार किया था।

आधुनिक चित्रकला

उत्तर प्रदेश में आधुनिक चित्रकला का विकास अतीत की नींव पर हुआ। शुरूआती दिनों में इस पर मुगल, बुंदेला और राजपूत शैली का स्पष्ट प्रभाव दिखता है।
उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में लखनऊ और उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में एक अलग शैली का प्रचलन हुआ, जिसमें प्राचीन कला को आधुनिक प्रयोगों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया। इस शैली को 'रूमी-कलम' कहा गया। इसमें मुगल एवं अवध शैली की विशेषताओं को अपनाया गया, किन्तु साथ ही यूरोपीय कला की भी भद्दे रंग से अनुकृति की गई। इस शैली में व्यक्ति की वास्तविक (Natural) आकृति के अंकन (शबीह) पर विशेष बल दिया गया।

शिल्पकला

उत्तर प्रदेश को प्राचीन एवं विविधतापूर्ण शिल्पों के लिए जाना जाता है। गुप्त शासन में शिल्पकारों ने संगठित होकर 'श्रेणी' एवं 'निगम' नामक संस्थाएं बनायी थीं। इसके अतिरिक्त मौर्यकाल में शिल्प एवं शिल्पकारों को विशेष स्थान प्राप्त था।
प्रदेश की अर्थव्यवस्था में हस्तशिल्प का महत्वपूर्ण योगदान है। देश के हस्तशिल्प निर्यात में उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प निर्यात का हिस्सा 44 प्रतिशत है। प्रदेश के कारपेट निर्यात का हिस्सा 39 प्रतिशत और चमड़े के निर्यात का हिस्सा 26 प्रतिशत है।

उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध शिल्प इस प्रकार हैं-

कढ़ाई शिल्प

ज़रदोज़ी
सुंदरतम शिल्पों में से एक ज़रदोज़ी में सोने और चांदी के धागों से कढ़ाई की जाती है। तांबे और स्वर्ण लेपित रेशम के धागों का भी उपयोग होता है। सुंदरता बढ़ाने के लिए हीरे, मोती जैसे कीमती पत्थरों को कपड़ों के साथ सिला जाता है। ज़री के काम द्वारा त्रिविमीय आकृतियां बनायी जाती हैं। लखनऊ, वाराणसी, आगरा और बरेली ज़रदोज़ी के प्रमुख केन्द्र हैं। परिधान, टोपियां, दुपट्टे, चूड़ियां आदि ज़रदोज़ी के उत्पादों में प्रमुख हैं।

बनारसी ज़री वस्त्र
ज़री वस्त्र, उभरी हुई कलाकृतियों द्वारा अत्यधिक खूबसूरती से सुसज्जित वस्त्र होते हैं, जिनकी मांग अमीरों और शासकीय वर्ग के बीच रही है। बनारसी वस्त्र अत्यधिक मुलायम होते हैं, जिन्हें रेशम के धागों का प्रयोग कर जीवंत रंगों से सजाया जाता है।

इसे तीन वर्गों में रखा जाता है-
  1. ज़री (अत्यधिक ज़री के काम से सृजित)
  2. आमरू (रेशम के धागे से साज-सज्जा का काम, जैसे- तनचाई)
  3. अवरावन (रेशम और आर्गेंजा कपड़े से बने पारदर्शी वस्त्र)
बनारसी ज़री वस्त्र को किनखाब भी कहते हैं, जिसका अर्थ है सोने का कपड़ा। प्रसिद्ध बनारसी साड़ी को बनाने में छह से चौदह दिन लगते हैं। बनारस के मदनपुरा और अलईपुरा क्षेत्र ज़री के वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध हैं।

चिकनकारी
परंपरागत रूप से सूती और मसलिन कपड़े पर सफेद धागे से की जाने वाली इस कढ़ाई की शुरूआत नूरजहां से मानी जाती है, किंतु अब रंग-बिरंगे धागे और शिफान, मुसलिन, ऑर्गेन्जा, आर्गेन्डी और रेशम जैसे कपड़े भी प्रयोग किये जाते हैं। चिकनकारी में फूलों से सम्बन्धित आकृतियां उकेरी जाती हैं, जिन्हें पहले ब्लॉक प्रिंटिंग द्वारा कपड़े पर छापा जाता है।
लखनऊ की चिकन की साड़ियाँ और कुर्ते गर्मी में पहनने के लिए उत्तम माने जाते हैं।
'अलीगढ़ काम' में फूलों से संबंधित आकृतियों, जैसे पंखुड़ियों और पत्तियों का प्रयोग किया जाता है। इसे प्रायः अलीगढ़ की महिलाओं द्वारा किया जाता है।

मुकेश बादला
मूलतः यह लखनऊ का शिल्प है। चिकनकारी के साथ उसकी खूबसूरती बढ़ाने के लिए इसका प्रयोग होता है। धातु के बने तारों को कपड़े में घुसाकर और घुमा-घुमा कर सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं। आकृतियों को दो प्रकारों-फरदी का काम (बिंदुएं) और कामदारी (अनेक खूबसूरत आकृति) में बांटा जाता है।

धातु का काम

मुरादाबाद पीतल के काम के लिए प्रसिद्ध है। यहां धातु को सजाने की अनेक तकनीकें, जैसे- खुदाई, नक्काशी, जड़ाई, ठकाई और सोने-चांदी की परत चढ़ाना आदि का उपयोग होता है। मुरादाबाद समेत इटावा, वाराणसी और सीतापुर क्षेत्र कांसे के काम के लिए जाने जाते हैं। धातु से देवी-देवताओं की मूर्तियां, साज-सज्जा की वस्तु और पारंपरिक वस्तुएं जैसे- ताम्रपत्र, कंचनथाल और पंचपत्र भी बनाये जाते हैं।
बनारस धातु के उभारदार काम के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें लचीली धातुओं को उल्टी तरफ से हथौड़ों से पीटकर सुन्दर कलाकृतियां बनायी जाती हैं। इस कार्य के लिए प्रसिद्ध कसेरा समुदाय के लोगों को पारंपरिक आभूषण, दरवाजे, दीवारों की सजावट का सामान, छत्र, चंवर, महंगी धातुओं के बर्तन आदि बनाने में महारत हासिल है। इसे 'खाल उभार का काम' भी कहते हैं।

कारपेट और हथकरघा का काम

भदोही, मिर्जापुर और खमरिया हाथ से बने गांठयुक्त कारपेट (Knotted Carpet) के लिए प्रसिद्ध हैं। देश की 90 प्रतिशत कारपेट की मांग को भदोही पूरा करता है। कारपेट की गुणवत्ता का आधार गांठों का घनत्व होता है। रंगों के जीवंत उपयोग (कभी-कभी दो से अधिक रंग) व पर्शियन आकृतियों का प्रयोग कर कारपेट को सजाया जाता है। कृत्रिम रेशम से बने कश्मीरी कारपेटों की विदेश में अच्छी मांग है।
शाहजहांपुर और आगरा सूती और ऊनी कारपेटों के लिए जाने जाते हैं। मिर्जापुर की हाथ से बनी दरियां प्रसिद्ध हैं।
गाजीपुर को जूट से बनी वॉल हैंगिंग (दीवारों को सजाने के लिए लटकायी जाने वाली एक कलाकृति) के लिए जाना जाता है, जिसे विभिन्न रंगों के धागों को मिलाकर हथकरघे पर बुना जाता है। इसे अपनी बनावट के लिए जाना जाता है। उकेरी गई आकृतियों में परिदृश्य और देवी-देवताओं की आकृतियां होती हैं।

पत्थर का काम

प्राचीन समय में मथुरा और बनारस को लाल बलुआ पत्थर से बनी हिन्दू और बौद्ध मूर्तियों के लिए जाना जाता था। मुगल काल में संगमरमर का काम प्रसिद्ध हुआ और इससे ताजमहल और फतेहपुर सीकरी को सजाया गया। पुष्पीय और ज्यामितीय आकृतियों से सुसज्जित आगरा का मोजेक का काम, जाली का काम और जड़ाई का काम प्रसिद्ध है। जड़ाई के काम के अंतर्गत पत्थर में बने खांचों में सुंदर रंग-बिरंगे पत्थर (कभी-कभी बहुमूल्य पत्थर) लगाकर सुन्दर आकृतियां बनाई जाती हैं। जड़ाई के काम को पित्र दूरा (Pietra-Dura) भी कहते हैं।
वृंदावन संगमरमर और सेलखड़ी के उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है।
महोबा गौरा पत्थर शिल्प के लिए जाना जाता है, जहां मुलायम सफेद पत्थर, जिसे आसानी से काटा जा सकता है, का प्रयोग किया जाता है।
वाराणसी मुलायम पत्थर पर जाली के काम के लिए प्रसिद्ध है। जड़ाई का काम और मूल्यवान पत्थरों को लगाकर सुन्दरता को और बढ़ाया जाता है। जालीदार हाथी इस कला का प्रसिद्ध नमूना है।

कुम्हार शिल्प

प्राचीनतम शिल्प में से एक कुम्हार शिल्प के पुरातात्विक साक्ष्य मेरठ के समीप आलमगीरपुर से मिले हैं, जो सिंधु घाटी सभ्यता का एक स्थान है।
सफेद पार्श्व पर नीली और हरी आकृतियों से युक्त खुर्जा, चुनार और रामपुर की चमकदार कुम्हार शिल्प की वस्तुएं प्रसिद्ध हैं।
आजमगढ़ के निजामाबाद की चमकदार काली मिट्टी का कुम्हार द्वारा उपयोग धान के खेत के कीचड़ से बने 'काबिज' नामक चूर्ण के रूप में किया जाता है। जिंक और मरकरी के चूर्ण को खांचों में भरने से इसे चांदीयुक्त चमक प्राप्त होती है। अपनी मजबूती और कम दाम के कारण खुर्जा के मिट्टी के बर्तन (सुराही आदि) घरेलू उपयोग में लाये जाते हैं। खुर्जा कुम्हार शिल्प की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अच्छी मांग है।

चमड़े का काम

कानपुर और आगरा के कारीगर पारंपरिक रूप से चमड़े के काम से जुड़े हैं। बाजीराव पेशवा ने अपनी सेना के लिए घोड़े की काठी, जूते, चमड़े के वस्त्र व अन्य सामान बनवाने के लिए इस कला को प्रश्रय दिया। बाद में मशीनीकृत उद्योगों ने इस शिल्प की जगह ले ली।

टेराकोटा

मिट्टी से तैयार किये जाने वाले इस शिल्प का प्रमुख केन्द्र गोरखपुर है। इसके अंतर्गत खिलौने और अन्य सजावटी सामान बनाये जाते हैं। यहां के कारीगर हाथों और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करते हैं। गैंडा, हाथी, महावतदार घोड़ा, पंचमुखी गणेश और एक मुखी गणेश यहां के कलाकारों की विशिष्ट कृतियां हैं। प्रदेश सरकार द्वारा इसके विकास हेतु हाल में कई महत्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं। टेराकोटा को 'एक जिला, एक उत्पाद' योजना में शामिल करते हुए इसके निर्यात के प्रयास किये जा रहे हैं।

हस्त ब्लाक छपाई

फर्रुखाबाद हस्त ब्लाक छपाई के लिए जाना जाता है, जिसमें नक्काशी किये हुए लकड़ी के ब्लॉक द्वारा कपड़े पर छपाई की जाती है। यहां हस्त चित्रकारी और ब्लॉक छपाई दोनों का प्रयोग किया जाता है।
अम्बेडकर नगर का टांडा विस्तारपूर्वक की हुई छपाई के लिए और बुलंदशहर का जहांगीराबाद हल्के रंगों और गहरी रूपरेखाओं के साथ छपाई के लिए जाना जाता है।
वाराणसी, लखनऊ और गाजियाबाद का पिलखुवा हाथ से छपाई के अन्य प्रमुख केन्द्र हैं।

आभूषण

लखनऊ और बनारस मीनाकारी के काम के लिए जाने जाते हैं। यहां आभूषणों के ऊपर खनिज पदार्थों की परत चढ़ाकर उन्हें अलग-अलग रंग और चमक दी जाती है। मुगलों द्वारा प्रारम्भ की गयी बनारस की गुलाबी मीनाकारी सफेद परत पर गुलाबी निशानों के लिए प्रसिद्ध है। एक विशेष क्षत्रिय जाति से आने वाले बनारस के मीनाकार चांदी को इसकी चमक के कारण, कच्चे पदार्थ के रूप में प्राथमिकता देते हैं। लखनऊ की चांदी की वस्तुओं, जैसे- आभूषण के डिब्बे, तश्तरी, कटोरी, सिगरेट के डिब्बे आदि, को चांदी, बिदरी और जारबुलैण्ड से सजाया जाता है।

लकड़ी का काम

कश्मीर से आये लोगों द्वारा शुरू किया गया सहारनपुर का लकड़ी का काम अपनी सजावटी नक्काशी और जड़ाई के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीर से प्रभावित आकृतियों को सुंदरता पूर्वक शीशम, शाल और देवदार की लकड़ी पर उकेरा जाता है।
मैनपुरी को तारकशी के काम के लिए जाना जाता है। इसमें लकड़ी के सामानों, जैसे फर्नीचर और डिब्बों आदि पर पीतल के तार से जड़ाई का काम किया जाता है।
बनारस लकड़ी के खिलौनों के लिए प्रसिद्ध है। इन खिलौनों पर चमक लाने के लिए रोगन (Lacquer) की परत चढ़ाई जाती है और फिर गिलहरी की पूंछ के बालों से बने ब्रश से गहरे रंग लगाये जाते हैं।

कांच का काम

फिरोजाबाद कांच की चूड़ियों, झूमरों और अन्य सजावटी सामानों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। कांच के काम को मुगलों का संरक्षण मिला और इसे इमारतों के लिए प्रयोग किया गया।
सहारनपुर 'पंचकोरा' खिलौनों के लिए प्रसिद्ध है।
वाराणसी कांच के मनकों (Beads) के लिए प्रसिद्ध है। इन्हें एक विशेष प्रक्रिया (लैम्प वाइंडिंग) द्वारा बनाया जाता है।

इत्र निर्माण

कन्नौज में 'जलीय आसवन' नामक प्राचीन विधि से इत्र अभी तक बनाया जाता है। कन्नौज सबसे बड़ा प्राकृतिक इत्र निर्माता है, जो रसायनों से रहित होता है। प्राकृतिक होने के कारण इसे सौंदर्य उत्पादों और दवाइयों में भी प्रयोग किया जाता है। कन्नौज के इत्र की देशी और विदेशी बाजारों में भारी मांग है। इत्र को पुराना करने के लिए ऊंट की चमड़ी से बनी बोतलों का प्रयोग होता है।

हड्डियों की नक्काशी

इस प्राचीन शिल्प को अवध के नवाबों का संरक्षण मिला। लखनऊ और बाराबंकी का यह शिल्प दुनिया भर में प्रसिद्ध है। अनेक सजावटी सामान
जैसे- आभूषण, डिब्बे, दीपक, चाकू के लिए म्यान, बालों के लिए पिन आदि इस शिल्प से बनाये जाते हैं। यद्यपि इस शिल्प के उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग है, किंतु यह विलुप्त होने की कगार पर है।

हस्तशिल्प विकास के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाएं

1. एक जिला-एक उत्पाद (ODOP)
इस योजना के अन्तर्गत जिले में कुछ विशिष्ट उत्पादों/शिल्पों का चयन करके उनके उत्पादन और विपणन की सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इसके निम्न उद्देश्य हैं-
स्थानीय शिल्पों का संरक्षण और विकास
स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय की बढ़ोतरी
उत्पादकता में वृद्धि और कौशल विकास
पैकेजिंग एवं ब्रांडिंग में सुधार कर उत्पाद में बदलाव
उत्पाद को पर्यटन के साथ जोड़ना
ODOP की अवधारणा को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाना

2. यूपी डिजाइन संस्थान (UP Institute of Design)
इसे राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान के मार्गदर्शन में हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्रों के लिए प्रशिक्षित डिजाइनरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु स्थापित किया गया है।

3. विशिष्ट हस्तशिल्प प्रादेशिक पुरस्कार योजना

4. प्रशिक्षण और कौशल विकास के लिए डिजाइन वर्कशॉप स्कीम

5. विशेषज्ञ कारीगरों के लिए पेंशन स्कीम

6. हस्तशिल्प विपणन प्रोत्साहन योजना

7. विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना

8. मुख्यमंत्री हस्तशिल्प पेंशन योजना

9. इंडस्ट्रियल स्टेट योजना

10. जिला उद्योग केन्द्र योजना

11. उद्यमिता विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम

12. संत कबीर हथकरघा पुरस्कार योजना

13. मुख्यमंत्री हथकरघा बुनकर सम्मान योजना

उत्तर प्रदेश के प्रमुख भौगोलिक संकेतक टैग प्राप्त शिल्प

अपने विशिष्ट हस्तशिल्प के लिए जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) प्राप्त करने के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश भारत के राज्यों में प्रथम स्थान पर है। उत्तर प्रदेश को जून, 2025 तक 60 से अधिक हस्तशिल्प पर जीआई टैग प्राप्त हो चुका है। इस क्षेत्र में 55 जीआई के साथ तमिलनाडु द्वितीय स्थान पर है।
उत्तर प्रदेश के जीआई टैग में वाराणसी और पूर्वांचल के प्रमुख जीआई उत्पाद सम्मिलित हैं।
  1. लखनऊ की चिकनकारी
  2. बनारसी जरी का काम और साड़ी
  3. भदोही के हस्तनिर्मित कारपेट
  4. आगरा की दरियां
  5. फर्रुखाबादी छपाई
  6. लखनऊ की जरदोजी
  7. फिरोजाबादी कांच
  8. कन्नौज का इत्र
  9. कानपुरी चमड़े की काठी
  10. मुरादाबाद का धातु का काम
  11. सहारनपुर का लकड़ी का काम
  12. मेरठ की कैंचियां
  13. खुर्जा का कुम्हार शिल्प
  14. बनारस की गुलाबी मीनाकारी
  15. बनारस की लकड़ी का रोगन और खिलौने
  16. मिर्जापुर की हस्तनिर्मित दरियां
  17. निजामाबाद के काले मिट्टी के बर्तन
  18. बनारस का धातु का उभारदार काम
  19. बनारसी कांच मनका
  20. गाजीपुर का वॉल हैंगिंग
  21. बनारस का मुलायम पत्थर का जाली का काम
  22. गोरखपुर का टैराकोटा का काम
  23. जलेसर का मेटल क्राफ्ट
  24. बनारस का मेटल कॉस्टिंग क्राफ्ट
  25. आगरा का लेदर फुटवेयर
  26. अमरोहा की ढोलक
  27. बागपत की होम फर्निशिंग
  28. बाराबंकी का करघा उत्पादन
  29. कालपी का हस्त निर्मित कागज
  30. महोबा का गौरा पत्थर
  31. शजर पत्थर क्राफ्ट
  32. अलीगढ़ का ताला
  33. नगीना लकड़ी शिल्प

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।