उत्तर प्रदेश का आधुनिक इतिहास | uttar pradesh ka adhunik itihas

उत्तर प्रदेश का आधुनिक इतिहास

उत्तर प्रदेश की माटी ने न सिर्फ वैभवशाली साम्राज्यों का उत्कर्ष देखा है, बल्कि यह विदेशी हुकूमत की बेड़ियों और आजादी की पहली सिंहगर्जना का भी गवाह रहा है। मुगलों के पतन के बाद क्षेत्रीय रियासतों की आपसी खींचतान से लेकर 1857 की क्रांति की वह चिंगारी जो मेरठ से उठी और पूरे देश में दावानल बन गई- उत्तर प्रदेश के इस आधुनिक इतिहास ने भारत का भाग्य तय किया है। इस लेख में आप अवध के नवाबों के पतन, अंग्रेजों की कूटनीति, रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस और अलीगढ़ व देवबंद जैसे वैचारिक आंदोलनों की पूरी और प्रामाणिक गाथा पढ़ेंगे। आइए, उस दौर के पन्नों को पलटते हैं जिसने गुलामी की जंजीरों को झकझोर कर रख दिया था।

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मुगल साम्राज्य का पतन और उत्तर प्रदेश

औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता से परिपूर्ण संकीर्ण एवं संकुचित नीतियों ने मुगल साम्राज्य के विकास को अवरूद्ध कर दिया। परिणाम यह हुआ कि औरंगजेब के बाद मात्र 50 वर्षों में 8 मुगल शासक सिंहासन पर बैठे, जिन्होंने एक वर्ष या उससे अधिक समय तक शासन किया। इनमें से किसी मुगल बादशाह को वह जनसमर्थन नहीं मिला, जिसके बल पर पूर्ववर्ती शासकों ने स्थायी शासन-प्रशासन देने का काम किया था।
इस अस्थिर और अलोकप्रिय शासन व्यवस्था के कारण मुगल साम्राज्य कई बार विभाजन और विद्रोह का शिकार हुआ। वर्तमान उत्तर प्रदेश क्षेत्र सन् 1757 ई. तक पांच स्वतंत्र राज्यों में विभक्त हो चुका था।
यह राज्य थे-
  • बरेली और मेरठ के उत्तर भाग में पठान सरदार नाजिब खान का राज्य।
  • मेरठ तथा दोआब क्षेत्र रुहेलखण्ड में रुहेल शासक रहमत खां का राज्य।
  • मध्य दोआब क्षेत्र में फर्रूखाबाद के नवाब का राज्य।
  • वर्तमान अयोध्या (फैजाबाद), लखनऊ, सुल्तानपुर, जौनपुर, बाराबंकी, श्रावस्ती जिलों पर अवध के नवाब शुजाउद्दौला का शासन।
  • बुन्देलखण्ड क्षेत्र के झांसी, ललितपुर, जालौन, चित्रकूट आदि जिलों पर मराठों का राज्य।
मुगल साम्राज्य का पतन: 1757 के 5 स्वतंत्र राज्य
रुहेलखण्ड
शासक: रहमत खां
क्षेत्र: मेरठ तथा दोआब
फर्रूखाबाद
शासक: नवाब का राज्य
क्षेत्र: मध्य दोआब
अवध
शासक: शुजाउद्दौला
क्षेत्र: अयोध्या, लखनऊ, जौनपुर
बुन्देलखण्ड
शासक: मराठा
क्षेत्र: झांसी, ललितपुर, जालौन
बरेली व मेरठ (उत्तर)
शासक: पठान सरदार नाजिब खान
अंग्रेजों का उत्तर प्रदेश पर अधिकार (क्रम)
1761 - 1764 पानीपत (1761) व बक्सर युद्ध (1764) में अवध के नवाब की हार
1780 - 1801 राजा चेत सिंह की अधीनता और सादात अली द्वारा अंग्रेजों को क्षेत्र सौंपना
1803 मराठों की पराजय; अलीगढ़, आगरा, झाँसी आदि पर ब्रिटिश कब्ज़ा
1833 पृथक 'आगरा प्रेसीडेन्सी' का गठन व नए गवर्नर की नियुक्ति
1857 की क्रांति: महत्वपूर्ण घटनाक्रम
29 मार्च 1857 बैरकपुर में मंगल पाण्डे द्वारा विद्रोह
10 मई 1857 मेरठ से खुला विद्रोह व दिल्ली प्रस्थान
जून 1857 कानपुर, लखनऊ व झाँसी में विद्रोह
17 जून 1858 रानी लक्ष्मीबाई शहीद व दमन शुरू
1857 के पश्चात प्रमुख आंदोलन व संस्थाएं
किसान व एका आंदोलन
उद्देश्य: लगान वृद्धि का विरोध
प्रमुख नेता: बाबा रामचन्द्र, मदारी, पासी
वर्ष: 1918 (किसान सभा), 1921 (एका)
अलीगढ़ आंदोलन
उद्देश्य: मुस्लिमों में आधुनिक व अंग्रेजी शिक्षा
संस्थापक: सर सैय्यद अहमद खां
परिणाम: 1920 में AMU की स्थापना
देवबंद आंदोलन
उद्देश्य: शुद्ध इस्लामिक शिक्षा, अंग्रेजी का विरोध
स्थान/नेता: सहारनपुर / मुहम्मद कासिम ननौतवी
शैक्षिक एवं अन्य सुधार
राधास्वामी मत (1861): शिवदयाल सिंह (आगरा)
BHU (1916): एनी बेसेंट व पं. मदनमोहन मालवीय

उत्तरकालीन मुगल सम्राट

नाम कार्यकाल
बहादुर शाह प्रथम 1707 - 1712 ई.
फर्रूखसियर 1713 - 1719 ई.
मुहम्मद शाह 1719 - 1748 ई.
अहमदशाह बहादुर 1748 - 1754 ई.
आलमगीर द्वितीय 1754 - 1758 ई.
शाह आलम द्वितीय 1759 - 1806 ई.
अकबर द्वितीय 1806 - 1837 ई.
बहादुर शाह द्वितीय 1837 - 1857 ई.

उत्तर प्रदेश पर अंग्रेजों का अधिकार

क्षेत्रीय राज्यों की यह स्थिति अधिक दिनों तक स्थिर नहीं रह सकी। इनके शासकों की एक-दूसरे पर वर्चस्व कायम करने की प्रवृत्ति ने यहां अंग्रेजों का मार्ग प्रशस्त किया। सन् 1761 का पानीपत का तृतीय युद्ध यूं तो सीधे तौर पर अफगान आक्रमणकारी अहमदशाह अब्दाली और भारतीय मराठों के बीच था, लेकिन अवध के नवाब शुजाउद्दौला समेत नाजिब खां (बरेली-मेरठ का शासक), रहमत खां (रुहेलखण्ड), सादुल्लाह खां आदि ने जिस प्रकार अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया, उसने स्थानीय प्रशासनिक और सैन्य कमजोरी को दुनिया के सामने उजागर कर दिया।
  • सन् 1764 ई. के बक्सर युद्ध में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजाउद्दौला एवं बंगाल के नवाब मीरकासिम पर ईस्ट इण्डिया कंपनी की जीत ने भारतीयों के माथे पर 'गुलामी' शब्द लिख दिया, जिसे लम्बे संघर्ष से प्राप्त स्वतंत्रता के बाद ही मिटाया जा सका।
  • इस युद्ध के बाद मुगल सम्राट एवं अवध के नवाब अंग्रेजों के हाथ की कठपुतली बन गये, जबकि मीरकासिम ने अपनी जिन्दगी अज्ञातवास में गुजारी।
  • अंग्रेजों ने 1780 ई. में बनारस के शासक राजा चेत सिंह को भी अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया।
  • शुजाउद्दौला के बाद आसफउद्दौला और फिर 1797 ई. में उसका भाई सादात अली अवध का नवाब बना। सादात अली ने 1801 ई. में सुरक्षा की गारंटी के बदले में अंग्रेजों को प्रयागराज, गोरखपुर क्षेत्र, रूहेलखण्ड क्षेत्र, कानपुर, फतेहपुर, इटावा, एटा, दक्षिण मिर्जापुर एवं कुमायूं का क्षेत्र सौंप दिया। कुछ दिन बाद फर्रूखाबाद के नवाब ने भी अपना क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिया।
  • अंग्रेजों ने 1803 ई. में मराठों को पराजित कर अलीगढ़, मेरठ, आगरा, झांसी, बांदा, हमीरपुर, जालौन तथा आस-पास के समूचे क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार वर्तमान उत्तर प्रदेश के लगभग समूचे क्षेत्रफल पर अंग्रेजों का शासन स्थापित हो गया।
  • उत्तर प्रदेश का यह सम्पूर्ण क्षेत्र कई वर्षों तक बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन रहा। यहां गवर्नर जनरल का शासन था। सन् 1833 ई. में इस क्षेत्र को 'आगरा प्रेसीडेन्सी' के रूप में अलग पहचान मिली और यहां एक अलग गवर्नर की नियुक्ति हुई।

1857 की क्रांति और उत्तर प्रदेश

भारत पर अंग्रेजी सत्ता की स्थापना के सौ वर्ष बाद 1857 में देश का प्रथम स्वाधीनता संघर्ष सामने आया। इसकी शुरूआत 10 मई, 1857 को उत्तर प्रदेश के मेरठ से हुई, यद्यपि इसकी योजना काफी पहले कानपुर के निकटवर्ती बिठूर में तैयार हुई थी। कुछ इतिहासकारों के अनुसार नाना साहब (धूं-धूं पंत) के साथ मिलकर अजीमुल्ला खां ने बिठूर में इस स्वाधीनता संघर्ष की योजना तैयार की थी। उस समय इस संघर्ष को आरम्भ करने की तिथि 31 मई, 1857 निश्चित की गई थी, किंतु परिस्थितियां ऐसी पैदा हुईं कि यह पहले आरम्भ हो गया।
1857 के विद्रोह की शुरूआत सैनिकों द्वारा गाय और सुअर की चर्बी युक्त कारतूस को मुंह से खोलने से इंकार करने के साथ हुई। अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय सैनिकों के असंतोष को डराकर दबाने की कोशिश की तो स्थिति विस्फोटक हो गयी। 34वीं नेटिव इन्फेन्ट्री के सैनिक बलिया निवासी मंगल पाण्डे ने बैरकपुर छावनी में 29 मार्च, 1857 को अपने सार्जेण्ट मेजर के ऊपर गोली चला दी और अपने सहकर्मियों को विद्रोह के लिए ललकारा। अंग्रेज अधिकारियों ने इस पर मंगल पाण्डे और उसके एक साथी को फांसी की सजा देते हुए 34वीं रेजीमेंट को समाप्त कर दिया।
इसी तरह के विद्रोह के बाद लखनऊ रेजीमेंट को भी समाप्त कर दिया गया। 24 अप्रैल, 1857 को मेरठ में तीसरी घुड़सवार रेजिमेंट के 90 में से 85 सैनिकों ने चर्बी युक्त कारतूस प्रयोग करने से मना कर दिया तो कोर्ट मार्शल कर उन्हें दीर्घकालीन कारावास का दण्ड सुनाया गया। 9 मई को विद्रोही सैनिकों को नंगाकर अपमानित किया गया। अगले दिन 10 मई को सैनिकों ने खुला विद्रोह कर अपने बंदी साथियों को छुड़ा लिया।
विद्रोही सैनिकों ने अपने अधिकारियों पर गोली चलायी और दिल्ली के लिए प्रस्थान कर गये। 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर विद्रोहियों ने मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय 'जफर' को भारत का सम्राट घोषित कर दिया। शीघ्र ही लखनऊ, कानपुर, बरेली, झांसी, वाराणसी और प्रयागराज (इलाहाबाद) में विद्रोह फैल गया।
कानपुर में तात्या टोपे के साथ नाना साहेब ने अंग्रेजों को चुनौती दी, तो झांसी में विद्रोह का नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई ने किया।
  • लखनऊ में विद्रोहियों का नेतृत्व अवध की बेगम हजरत महल ने किया। अनेक देशी शासक इस विद्रोह में तटस्थ बने रहे, जबकि कुछ शासकों ने विद्रोह के दमन में अंग्रेजों का साथ दिया।
  • 5 जून, 1857 को विद्रोहियों ने कानपुर पर अधिकार कर लिया और नाना साहेब को 'पेशवा' घोषित कर दिया। लखनऊ में ब्रिटिश रेजिडेन्ट हेनरी लारैन्स विद्रोहियों के हाथों मारा गया। झांसी में रानी लक्ष्मीबाई को शासक घोषित कर दिया गया। बरेली में खान बहादुर खान ने बतौर नवाब नाज़िम सत्ता अपने हाथ में ले ली।
  • दिल्ली से अधिकार छिन जाने से अंग्रेजों की शक्ति को गहरी ठेस पहुंची। पंजाब से सेना बुलाकर उन्होंने 21 सितम्बर को दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया और बहादुर शाह द्वितीय को गिरफ्तार कर रंगून भेज दिया। इस संघर्ष में अंग्रेज योद्धा जॉन निकलसन (John Nicholson) मारा गया। अंग्रेजों ने 6 दिसम्बर, 1857 को कानपुर और मार्च, 1858 में लखनऊ पर पुनः अधिकार कर लिया। तात्या टोपे कानपुर से भागने में सफल रहे और रानी लक्ष्मीबाई का साथ देने झांसी पहुंच गये।
  • अंग्रेज सेना ने ह्यूरोज के नेतृत्व में 3 अप्रैल, 1858 को झांसी पर अधिकार कर लिया। रानी लक्ष्मीबाई सहयोगी तात्या टोपे के साथ ग्वालियर चली गयीं, लेकिन जून, 1858 में अंग्रेजों ने उन पर वहां भी आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों से लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई 17 जून, 1858 को दुर्ग की दीवारों के पास शहीद हो गईं। ग्वालियर के महाराज सिंधिया के एक सामंत ने तात्या टोपे को पकड़कर अंग्रेजों को सौंप दिया और उन्हें फांसी दे दी गई।
  • मई-जून 1858 में बरेली, बनारस और प्रयागराज (इलाहाबाद) पर भी अंग्रेजों का दोबारा अधिकार हो गया। लखनऊ और शाहजहांपुर में विद्रोह का नेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल पराजित होने के बाद नेपाल चली गयीं, जहां उनकी मृत्यु हो गयी। जुलाई, 1858 तक विद्रोह पूरी तरह समाप्त हो गया।
उत्तर प्रदेश में 1857 की क्रांति के प्रमुख केन्द्र एवं नेतृत्वकर्ता
केन्द्र भारतीय नेतृत्वकर्ता ब्रिटिश नेतृत्वकर्ता
लखनऊ बेगम हजरत महल, विर्जिस कादिर कोलिन केम्पवेल
कानपुर नाना साहब, तात्या टोपे जनरल हैवलॉक
झाँसी रानी लक्ष्मीबाई जनरल ह्यूरोज
प्रयागराज मौलवी लियाकत अली कर्नल नील
फ़ैजाबाद मौलवी अहमदुल्लाह कर्नल नील
बरेली खान बहादुर खान कोलिन कैम्पवेल
मथुरा देवी सिंह कर्नल नील
कालपी तात्या टोपे कर्नल नील
फतेहाबाद अज़ीमुल्ला जनरल रेनर्ड
जगदीशपुर बाबू वीर कुंअर सिंह विलियम टेलर एवं विंसेंट आथर
गोरखपुर गजाधर सिंह -

1857 के विद्रोह के परिणाम

1857 विद्रोह के चलते भारत के संबंध में ब्रिटेन की नीतियों, स्थानीय प्रशासनिक ढाँचे तथा अंग्रेजों के रवैये में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
ब्रिटिश क्राउन ने भारत में शासन-प्रशासन का अधिकार ईस्ट इंडिया कम्पनी से अपने हाथ में ले लिया। इलाहाबाद में 1 नवम्बर, 1858 को आयोजित दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने ब्रिटेन की महारानी की घोषणा पढ़ते हुए कहा कि अब एक भारत मंत्री (सचिव) तथा 15 सदस्यीय कौंसिल द्वारा भारत में शासन-प्रशासन संचालित किया जायेगा। भारत सचिव के पद पर ब्रिटिश कैबिनेट के सदस्य की नियुक्ति होगी, जिससे वह ब्रिटिश संसद के प्रति जवाबदेह होगा।
दिल्ली डिवीजन को उत्तर-पश्चिम से विभाजित कर इसकी राजधानी आगरा से इलाहाबाद स्थान्तरित कर दी गयी।
1858 अधिनियम के अनुसार भारत में गवर्नर जनरल का पद समाप्त कर दिया गया और उसकी जगह वॉयसराय का पद सृजित हुआ। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वॉयसराय बने, जो अंतिम गवर्नर जनरल भी थे।
अंग्रेजों ने क्षेत्रीय विस्तार की नीति का त्याग कर देशी राजाओं को उनकी क्षेत्रीय प्रतिष्ठा एवं अधिकारों की रक्षा का आश्वासन दिया। ब्रिटिश सरकार ने निजी वंशज के अभाव में देशी शासकों के गोद लेने के अधिकार को स्वीकार कर लिया।
  • अवध के तालुकदारों के प्रति ब्रिटिश हुकूमत ने नरमी बरती और उनकी कुछ जमीनें वापस दे दी गईं। बावजूद इसके, तालुकदारों का प्रभाव कम हो गया। उनकी सत्ता बहाल नहीं हो सकी।
  • अंग्रेजों को यह बात समझ में आयी कि देशी शासक और भू-स्वामी साम्राज्य के मजबूत स्तंभ साबित होंगे, अतः यह निर्णय लिया कि भारतीय समाज के सभी रूढ़िवादी और प्रक्रियावादी शक्तियों को सरकार सुरक्षा देगी, जो लोगों को प्रतिक्रियाओं के खिलाफ अंग्रेजों का साथ देंगे।
  • भारत में सामाजिक एवं शिक्षा सुधार सम्बन्धी नीतियों का अंग्रेजों ने परित्याग कर दिया। उन्हें डर था कि भारतीय शिक्षित हो जायेंगे तो ब्रिटिश साम्राज्य के हितों को हानि पहुंचेगी।
  • भारतीय सेना में ब्रिटिश सैनिकों का अनुपात बढ़ाया गया तथा उन्हें अच्छे हथियार उपलब्ध कराए गए।
  • भारतीयों को लड़ाकू और गैर- लड़ाकू नस्लों में बाँटकर धर्म अथवा क्षेत्रीय आधार पर सिख रेजिमेंट, जाट रेजिमेंट, गोरखा रेजिमेंट आदि का गठन किया गया।
  • प्रशासन की उच्च सेवाओं में अंग्रेजों के एकाधिकार पर बल दिया गया। भारतीय सिविल सर्विसेज परीक्षा का स्थान लंदन में रखा गया। इसका पैटर्न इस तरह बनाया गया था कि भारतीयों को इससे दूर रखा जा सके। यही कारण है कि सन् 1920 तक उच्च सेवाओं में भारतीयों की संख्या बेहद कम थी।

1857 विद्रोह : भारतीय इतिहास में निर्णायक मोड़
  • 1887 का विद्रोह कई अर्थों में भारतीय इतिहास में नया मोड़ साबित हुआ। इस विद्रोह के बाद से ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का अंत कर भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन को हस्तान्तरित कर दिया गया।
  • विद्रोह के बाद भारतीय शासन अधिनियम 1858 बनाया गया, जिससे निर्देशक सभा नियंत्रण मण्डल एवं गुप्त समिति का अंत कर दिया गया। इनके अधिकारों एवं शक्तियों के प्रयोग का दायित्व ब्रिटिश मंत्रिमण्डल के सदस्य 'भारतमंत्री' (The Secretary of State for India) को सुपुर्द कर दिया गया।
  • विद्रोह के साथ ही भारत में मुगल साम्राज्य का अंत हो गया। ब्रिटिश साम्राज्ञी ने भारतीय जनता को बलपूर्वक ईसाई बनाने से रोकने तथा कृषकों एवं भू-स्वामियों की भूमि के अपहरण की आशंका को दूर करने का आश्वासन दिया। सेना में भारतीयों और अंग्रेजों का अनुपात 2:1 रखना सुनिश्चित हुआ।
  • 1857 विद्रोह के परिणामस्वरूप भारतीयों में अग्रेंजी सत्ता के विरुद्ध आंदोलन एवं एकता की भावना का विकास हुआ, जिससे आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन को बल मिला।

1857 के विद्रोह के बाद अन्य आंदोलन

किसान आंदोलन
  • अंग्रेज 1857 के विद्रोह को दबाने में सफल रहे, लेकिन देश के इस प्रथम स्वाधीनता संघर्ष ने आगे चलकर अनेक आंदोलनों को जन्म दिया। इनमें उत्तर प्रदेश का किसान आन्दोलन प्रमुख है।
  • 1857 के विद्रोह पर नियंत्रण पा लेने के बाद अंग्रेजों ने अवध के तालुकदारों (बड़े जमींदार) को भूमि लौटा दी और उन पर किसानों से अधिक लगान वसूली के लिए दबाव बनाया। इससे उत्तर प्रदेश के किसानों में भारी असंतोष पैदा हो गया। इसी बीच 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने से आवश्यक वस्तुओं के मूल्य में भारी वृद्धि हुई, जिससे किसानों की दशा अत्यंत दयनीय हो गईं।
  • इसी परिप्रेक्ष्य में मदनमोहन मालवीय, गौरीशंकर मिश्र तथा इन्द्र नारायण द्विवेदी की प्रेरणा से फरवरी 1918 में 'उत्तर प्रदेश किसान सभा' का गठन हुआ। संगठन का उद्देश्य किसानों को एकजुट करना था। प्रतापगढ़, इलाहाबाद (प्रयागराज ) और जौनपुर इस आंदोलन के केन्द्र रहे। किसान सभा की 400 से अधिक शाखाएं स्थापित हो गईं। झिंगुरी पाल सिंह और दुर्गापाल के बाद बाबा रामचन्द्र ने इसे विस्तार देने का कार्य किया। जवाहर लाल नेहरू तथा गौरीशंकर मिश्र जैसे नेताओं का इनको सहयोग प्राप्त था।
  • सन् 1920 में देश में कांग्रेस द्वारा असहयोग आंदोलन (1920-22 ई.) आरम्भ किया गया तो इसके क्रियान्वयन को लेकर किसानों में मतभेद पैदा हो गया। बाबा रामचन्द्र ने ' अवध किसान सभा' नाम से अलग संगठन बना लिया। नये संगठन को बाबा रामचन्द्र की आकर्षक प्रचार शैली के चलते भारी लोकप्रियता मिली। दिसम्बर, 1920 में अयोध्या में आयोजित रैली में एक लाख किसानों ने भाग लिया। इस रैली के बाद अंग्रेजी हुकूमत का ध्यान इस संगठन की तरफ गया और दमनात्मक कार्रवाई तेज कर दी गईं। 1921 के मध्य तक किसान सभा का प्रभाव खत्म सा हो गया।

एका आंदोलन
लगान में अत्यधिक वृद्धि और वसूली में उत्पीड़न को लेकर मदारी, पासी और सहदेव के नेतृत्व में सीतापुर, हरदोई और बहराइच के किसानों ने 'एका आंदोलन' शुरू किया। इस आंदोलन को कुछ जमींदारों का भी समर्थन प्राप्त था। 1922 में असहयोग आंदोलन स्थगित होने के साथ ही यह आंदोलन भी समाप्त हो गया।

अलीगढ़ आंदोलन
अंग्रेजी 'हुकूमत के पक्षधर सैय्यद अहमद खां ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। ईस्ट इंडिया कंपनी की न्यायिक सेवा में कार्य करते हुए उन्होंने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों का साथ दिया था। सैय्यद अहमद ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य शिक्षा क्षेत्र में किए। उन्होंने 1858 में मुरादाबाद और 1863 में गाजीपुर में विद्यालयों की स्थापना कर अपने अभियान की शुरूआत की। 1875 में सैय्यद अहमद ने मुस्लिमों को आधुनिक शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से अलीगढ़ मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल स्कूल की स्थापना की, जो 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में परिवर्तित हो गया।
सर सैय्यद अहमद खां ने मुस्लिम समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया। दास व्यवस्था और पीरी-मुरीदी प्रथा (पीर को गुरू मानकर श्रद्धालु बनना) का उन्होंने विरोध किया। 1864 में 'साइन्टिफिक सोसाइटी' की स्थापना कर अनेक अंग्रेजी ग्रंथों का उर्दू में अनुवाद कराया। उन्होंने 'राजभक्त मुसलमान' और 'तहजीब-उल-अखलाक' नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। अलीगढ़ आंदोलन में उनके अन्य साथी थे- मौलाना शिबली नोमानी, अल्ताफ हुसैन, नजीर अहमद एवं चिराग अली।

देवबंद आंदोलन
मुस्लिम समाज को पारम्परिक रूप से जागरूक, नैतिकतापूर्ण और समृद्ध बनाने के उद्देश्य से 1866-67 ई. में इस आंदोलन की शुरूआत हुईं। इसका मुख्य केन्द्र सहारनपुर जनपद अन्तर्गत देवबंद था। इसके संस्थापक मुहम्मद कासिम ननौतवी और रसीद अहमद गंगोही ने देवबंद में इस्लामिक शिक्षा केन्द्र 'मदरसे' की स्थापना की, जहां अंग्रेजी शिक्षा एवं पश्चिमी संस्कृति को प्रतिबंधित करते हुए 'कुरान एवं हदीस' को आधार बनाकर शुद्ध इस्लामिक शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को सरकारी नौकरी के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए धार्मिक नेता तैयार कर मुस्लिम समाज का धार्मिक एवं नैतिक पुनरुद्धार करना था ।
देवबंद ने भारत पर विदेशी शासन के विरुद्ध ' जेहाद' का नारा दिया और सैयद अहमद द्वारा चलाए गये अलीगढ़ आंदोलन का विरोध किया। इस आंदोलन के प्रबल समर्थक शिवलीनूमानी ने 1884-85 में लखनऊ में दारूल उलूम तथा नदवतुल उलमा की स्थापना की।

सिख एवं अन्य आंदोलन
मुस्लिम सुधार आंदोलन की तरफ हिंदू और सिख समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता के विरूद्ध भी कई आंदोलन शुरू हुए। इन आंदोलनों में मुख्य है- 'राधास्वामी मत', जिसकी स्थापना 1861 में शिवदयाल सिंह साहब आगरा में की। इस मत के अनुयायी हिन्दू और सिख दोनों थे। इसमें नकली गुरुओं और आडम्बर की निंदा की गई है।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एनी बेसेंट ने जुलाई, 1898 में वाराणसी में सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज की स्थापना की, जिसे बाद में उन्होंने पं. मदनमोहन मालवीय को समर्पित कर दिया। इस कालेज की प्रेरणा से आगे चलकर 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

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Kartik Budholiya

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उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।