उत्तर प्रदेश का मध्यकालीन इतिहास | uttar pradesh ka madhyakalin itihaas

उत्तर प्रदेश का मध्यकालीन इतिहास

उत्तर प्रदेश का मध्यकालीन इतिहास केवल युद्धों और सत्ताओं के टकराव की गाथा नहीं है, बल्कि यह कला, संस्कृति और आध्यात्मिक जागरण का एक जीवंत सफरनामा है। दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ने से लेकर जौनपुर के शर्की साम्राज्य की भव्यता, सूफी और भक्ति संतों की ज्ञानमयी गूंज और मुगलों के वैभवशाली दौर तक, उत्तर प्रदेश की धरती ने हर युग को अपने हृदय में सहेजा है। इस विस्तृत लेख में आपको गुलाम वंश से लेकर मुगलों के उत्थान-पतन, मनसबदारी व इक्ता जैसी प्रशासनिक व्यवस्थाओं और अवध के नवाबों के सुनहरे लेकिन संघर्षपूर्ण दौर की पूरी और प्रामाणिक जानकारी मिलेगी।
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  • उत्तर प्रदेश के मध्यकालीन इतिहास का प्रारम्भ गुलाम वंश की स्थापना के साथ माना जा सकता है।
  • मुहम्मद गोरी के सबसे महत्त्वपूर्ण गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ई. में गुलाम वंश की स्थापना की। अधिक दान देने के कारण इसे 'लाख बख्श' कहा गया है। मिनहाज सिराज ने कुतुबुद्दीन ऐबक को 'हातिमताई' कहा है। गोरी की अनुपस्थिति में ऐबक ने 1192 ई. में मेरठ के विद्रोह को खत्म करने का कार्य किया। ऐबक के गुणों से प्रभावित होकर गोरी ने उसे 'मलिक' की उपाधि से नवाज़ा था।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक का उत्तराधिकारी उसका दामाद इल्तुतमिश (1210-1236 ई.) हुआ। इसे उत्तर भारत में तुर्क साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। सुल्तान बनने से पूर्व यह बदायूं का इक्तेदार (गवर्नर) था। बदायूं को उस समय सल्तनत में सर्वोच्च माना जाता था।
  • इल्तुतमिश ने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। इसे दिल्ली का प्रथम सुल्तान माना जाता है। गोरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम होने के कारण इसे 'गुलाम का गुलाम' कहा गया। इसने सल्तनत काल में सर्वप्रथम अपने नियमित सिक्के जारी किए, जो शुद्ध अरबी शैली में थे।
  • चाँदी के सिक्के 'टंका' कहे जाते थे, जो 175 ग्रेन के थे। तांबे के सिक्के 'जीतल' कहलाते थे। इल्तुतमिश ने अपने चालीस विश्वसनीय तुर्क सरदारों का एक दल गठित किया था, जिसे 'तुर्कान-ए-चिहालगानी' या 'चालीसा' कहा जाता था।
इल्तुतमिश के बाद बलबन (1265-87 ई.) दिल्ली का शक्तिशाली शासक हुआ। इसने तुर्कान-ए-चिहालगानी को समाप्त करते हुए सर्वप्रथम 'राजत्व का सिद्धांत' (Theory of Kingship) और 'नियामत-ए-खुदाई' अथवा 'दैवीय राजत्व के सिद्धांत' का प्रतिपादन किया। इसने भारत में प्रसिद्ध फारसी त्योहार 'नौरोज' को आरम्भ कराया।
दिल्ली सल्तनत में कुल पांच वंशों ने शासन किया - गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश, सैय्यद वंश तथा लोदी वंश। वर्तमान उत्तर प्रदेश का लगभग सम्पूर्ण क्षेत्र दिल्ली सल्तनत का अंग रहा।
तुगलक वंश के सुल्तान फिरोज तुगलक ने वर्तमान उत्तर प्रदेश क्षेत्र में दो प्रसिद्ध नगरों की स्थापना की- जौनपुर एवं फिरोज़ाबाद। पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र में जौनपुर की स्थापना उसने अपने चचेरे भाई फखरुद्दीन जौना खां (मुहम्मद बिन तुगलक) की स्मृति में करायी। दूसरा नगर फिरोजाबाद उसने दिल्ली के निकट यमुना नदी के तट पर बसाया, जिसे फिरोजशाह कोटला नाम से जाना जाता है। फिरोज शाह तुगलक ने मेरठ स्थित अशोक के स्तम्भ लेख को दिल्ली ले जाकर स्थापित कराया।

फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु के बाद नसीरुद्दीन मुहम्मद तुगलक के शासन में उसके प्रमुख अमीर मलिक सरवर, जो कि एक किन्नर था (ख्वाजा खाँ), ने विद्रोह कर जौनपुर में 'शर्की सल्तनत' नाम से स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली। सुल्तान मुहम्मदशाह तुगलक द्वितीय ने अमीर मलिक सरवर को 'मलिक-उश शर्क' (पूर्व का स्वामी) की उपाधि प्रदान की थी। इसी के आधार पर उसने 'शर्की साम्राज्य' की स्थापना कर इटावा से बंगाल तक तथा विन्ध्याचल से नेपाल तक अपनी सत्ता स्थापित कर ली। जौनपुर को राजधानी बनाकर मलिक सरवर ने इस साम्राज्य पर स्वतंत्र रूप से शासन किया।
मलिक सरवर के बाद इब्राहिम शाह के शासनकाल में जौनपुर ने शिक्षा, संस्कृति, कला, संगीत, साहित्य और व्यापार के क्षेत्र में विशेष प्रगति की। इस शासन-व्यवस्था ने हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक सद्भाव की अनूठी मिसाल कायम की। इन्हीं विशेषताओं और प्रगति के चलते जौनपुर को 'शिराज-ए-हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान की रोशनी/प्रकाश) नाम से ख्याति मिली।

दिल्ली सल्तनत: उत्तर प्रदेश में सत्ताओं का क्रम

गुलाम वंश

कुतुबुद्दीन ऐबक (1206 ई.)
स्थापना, लाख बख्श

इल्तुतमिश:
तुर्कान-ए-चिहालगानी

बलबन:
राजत्व का सिद्धांत

तुगलक व शर्की वंश

फिरोज तुगलक:
जौनपुर व फिरोजाबाद की स्थापना

मलिक सरवर:
शर्की साम्राज्य (जौनपुर)
'शिराज-ए-हिन्दुस्तान'

लोदी वंश

बहलोल लोदी:
शर्की साम्राज्य का पतन

सिकन्दर लोदी:
आगरा की स्थापना (1506)
गुलरूखी कविताएं

प्रमुख इस्लामिक कर व्यवस्था

उश्र

मुस्लिमों की भू-उपज पर कर।
प्राकृतिक सिंचाई: 1/10 भाग
कृत्रिम सिंचाई: 1/5 भाग

खराज

गैर-मुस्लिमों से लिया जाने वाला भूमिकर।
दर: उपज का 1/3 से 1/2 भाग तक।

खुम्स

युद्ध में लूटी सम्पत्ति या खजाने पर कर।
1 हिस्सा सुल्तान, 4 हिस्से सैनिकों को।

जकात

मुस्लिमों की आय पर 2.5% कर।
गरीब और जरूरतमंदों के कल्याण हेतु।

जज़िया

गैर-मुस्लिमों (जिम्मी) पर सैन्य छूट व संरक्षण के बदले। (अकबर ने हटाया, औरंगजेब ने पुनः लगाया)

इक्ता और मनसबदारी व्यवस्था (तुलनात्मक अध्ययन)

विशेषता इक्ता व्यवस्था (सल्तनत काल) मनसबदारी व्यवस्था (मुगल काल)
प्रारम्भ / स्रोत इल्तुतमिश द्वारा लागू (पश्चिम एशिया से) अकबर द्वारा लागू (मंगोलिया से प्रेरित)
अधिकारी इक्तेदार या मुक्ता / मुक्ती मनसबदार (जात और सवार श्रेणी)
कार्यक्षेत्र (जागीर) मुक्ती अपनी इक्ता (जागीर) में ही रहते थे और प्रशासन देखते थे। अक्सर जागीर में नहीं रहते थे, राज्य के अन्य हिस्से में सेवा देते थे।
वंशानुगत स्वरूप शुरुआत में नहीं, लेकिन फिरोज शाह तुगलक के समय वंशानुगत हो गई। यह वंशानुगत नहीं थी। (प्रोन्नति, अवनति व बर्खास्तगी संभव थी)

मुगलकाल: प्रमुख शासक व उनके कार्य

बाबर (1526-1530 ई.)

पानीपत का प्रथम युद्ध (1526)खानवा का युद्ध (1527)
मुगल साम्राज्य की स्थापना, तुलगमा पद्धति व उस्मानी विधि का प्रयोग, आगरा को राजधानी बनाया।

हुमायूं (1530-1556 ई.)

चौसा युद्ध (1539)बिलग्राम युद्ध (1540)
शेरशाह से पराजित। अबुल फजल द्वारा 'इंसान-ए-कामिल' कहा गया। पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर मृत्यु।

अकबर (1556-1605 ई.)

पानीपत का द्वितीय युद्ध (1556)दीन-ए-इलाही (1582)
फतेहपुर सीकरी की स्थापना, जजिया व तीर्थयात्रा कर समाप्त। मनसबदारी व दहसाला (जब्ती) व्यवस्था लागू।

जहांगीर (1605-1627 ई.)

न्याय की जंजीर12 राजाज्ञायें
आइन-ए-जहांगीरी लागू की। प्रयागराज में खुसरो का मकबरा। विलियम हॉकिंस का दरबार में आगमन।

शाहजहां (1628-1658 ई.)

ताजमहलस्वर्णकाल
वास्तुकला व कला का स्वर्णकाल। 'दार-उल-बका' कालेज स्थापित। ट्रेवर्नियर, बर्नियर व मनूची की भारत यात्रा।

औरंगजेब (1658-1707 ई.)

धार्मिक कट्टरतामुगल पतन
मंदिरों को ध्वस्त कराया, जजिया कर पुनः लागू। नवरोज, कलमा, झरोखा दर्शन जैसी प्रथाएं समाप्त कीं।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख भक्ति संत

रामानन्द (प्रयागराज)

भक्ति आंदोलन को दक्षिण से उत्तर लाए। 'राम' की भक्ति आरम्भ की। उपदेश हिन्दी में दिए।

कबीर (काशी/मगहर)

निर्गुण ब्रह्म के उपासक। बीजक के रचयिता। बाह्य आडम्बरों का कड़ा विरोध किया। (मृत्यु: मगहर)

रैदास/रविदास (काशी)

एकेश्वर निर्गुण ब्रह्म में आस्था। 'रायदासी सम्प्रदाय' की स्थापना की।

तुलसीदास (राजापुर, बांदा)

सगुण भक्ति शाखा (रामभक्त)। 'रामचरितमानस' की रचना की। अकबर के समकालीन।

वल्लभाचार्य (काशी/मथुरा)

'शुद्धाद्वैत' में विश्वास। वासुदेव कृष्ण की भक्ति। अनुयायी 'अष्टछाप' कहलाए।

सूरदास (रूनकता, आगरा)

कृष्ण भक्त (अष्टछाप कवि)। ब्रजभाषा में सूरसागर, सूरसारावली व साहित्य लहरी की रचना।

अवध के नवाबों का कालक्रम

नवाब का नाम शासन काल मुख्य तथ्य
सआदत खां (बुरहान-उल-मुल्क) 1722 - 1739 अवध स्वतंत्र राज्य घोषित, नया राजस्व बन्दोबस्त
सफदरजंग 1739 - 1754 मुगल बादशाह का वजीर
शुजा-उद्-दौला 1754 - 1775 बक्सर युद्ध में पराजित, इलाहाबाद की संधि
आसिफ-उद्-दौला 1775 - 1797 राजधानी फैजाबाद से हटाकर लखनऊ की
वजीर अली 1797 - 1798 -
सआदत अली 1798 - 1809 -
नासिरूद्दीन हैदर 1809 - 1837 -
नासिरूद्दौला 1837 - 1847 -
वाजिद अली शाह 1847 - 1856 अंतिम नवाब। 'अख्तर पिया' उपनाम। कुशासन के आरोप में डलहौजी द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य में विलय।

इस्लामिक कर व्यवस्था

इस्लामिक कानून के अनुसार निम्न प्रकार के कर होते थे-
उश्र - यह भू उपज पर लगाया जाने वाला कर था। यह केवल मुस्लिमों पर लगाया जाता था। इसे प्राकृतिक साधनों से सिंचित भूमि के लिए उपज का 1/10 भाग और कृतिम साधनों से सिंचित भूमि के लिए उपज का 1/5 भाग तय किया गया था।
खराज - यह गैर-मुस्लिमों से लिया जाने वाला भूमिकर था। इसकी दरें विभिन्न सुल्तानों के अन्तर्गत एक तिहाई से आधी तक रहीं।
खुम्स - यह युद्ध में लूटी हुई सम्पत्ति तथा छुपी हुई सम्पत्ति अथवा खजाने पर लगाया जाता था। सामान्यतः इसका एक हिस्सा सुल्तान को और चार हिस्से सैनिकों को दिए जाते थे। फिरोजशाह के समय सुल्तान के चार हिस्से हो गये थे।
जकात - यह कर भी केवल मुस्लिमों के लिए था। इसका उपयोग गरीब और जरूरतमंद मुस्लिमों के लिए होता था। इसकी दर को आय का ढाई प्रतिशत निर्धारित किया गया था।
जज़िया - यह गैर-मुस्लिमों पर लगाया जाने वाला कर था, जिन्हें इस्लामिक कानून के अनुसार 'जिम्मी' कहा जाता था। इसे गैर-मुस्लिमों पर सैन्य सेवाओं से छूट और सरकारी संरक्षण के बदले लगाया जाता था। महिलाएं, बच्चे, अपंग और बेरोजगार को इससे बाहर
रखा गया था। फिरोजशाह ने इसे ब्राह्मणों के ऊपर भी लगा दिया, जिन्हें इससे पहले तक छूट प्राप्त थी। अकबर ने जज़िया हटा दिया था, किन्तु औरंगजेब ने इसे फिर लगा दिया।

इक्ता व्यवस्था

'इक्ता व्यवस्था', भारत में पश्चिम एशिया से दिल्ली के तुर्क सुल्तानों के साथ आयी। इल्तुतमिश ने इसे भारत में आधिकारिक रूप से लागू किया।
  • इक्ता व्यवस्था के अन्तर्गत दिल्ली सुल्तान अपने राज्य को सरदारों के बीच कई इलाकों, जिन्हें 'इक्ता' कहते थे, में बांट देते थे। यही इक्ते आगे चलकर सूबा या प्रांत बने।
  • इक्ते का स्वामी 'मुक्ता / मुक्ती' या 'वलि' कहलाता था। इसका काम इक्ता का प्रशासन देखना, कर वसूलना और सेना रखना था। मुक्ता सैनिकों की तनख्वाह इक्ता के राजस्व से देते थे। वे लगभग पूरी तरह स्वतंत्र थे और सैनिकों की तनख्वाह देने के बाद बचा अतिरिक्त राजस्व रखने के हकदार थे। बाद में जब सुल्तान शक्तिशाली हो गये तब उन्होंने इक्ता के राजस्व का आंकलन, मुक्ती और सैनिकों की तनख्वाह का निर्धारण शुरू कर दिया। अब अतिरिक्त राजस्व, राजकोष में जमा करना पड़ता था।
  • यह एक वंशानुगत व्यवस्था नहीं थी और सुल्तान द्वारा मुक्ती का किसी भी दूसरे इक्ता में स्थानान्तरण संभव था।
  • फिरोज शाह तुगलक के समय इक्ता वंशानुगत हो गया और बही-खातों की त्रुटियों की सज़ा कम कर दी गयी।
  • सल्तनत काल में राज्य की कुल जमीन का अधिकतर भाग इक्ते का हिस्सा था। जमीन के वह हिस्से जहां सुल्तान का सीधा नियंत्रण था और वह स्वयं राजस्व एकत्र करता था, 'खालसा' कहलाते थे। सूबा सबसे बड़ी प्रशासनिक इकाई थी। उसके नीचे शिक और परगना थे। परगना का प्रमुख 'आमिल' होता था।
दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने 1448 ई. में जौनपुर को जीतकर शर्की साम्राज्य का पतन कर दिया। यह पूरा साम्राज्य दोबारा दिल्ली सल्तनत का अंग बन गया। इसी वंश के सिकन्दर लोदी (1489-1517) ने 1506 में आगरा शहर की नींव रखी और उसे अपनी उप-राजधानी बनाया।
सिकन्दर लोदी शिक्षित और विद्वान था। वह 'गुलरूखी' नाम से कविता लिखता था। उसने मस्जिदों को सरकारी संस्था का रूप प्रदान कर उन्हें शिक्षा के केन्द्र के रूप में स्थापित करने का सराहनीय कार्य किया। इसके शासनकाल में भी जौनपुर शिक्षा, कला, साहित्य और व्यापार का केन्द्र बना रहा।
सुप्रसिद्ध कवि, सूफी एवं 'पद्मावत' के रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी ने जौनपुर में ही शिक्षा प्राप्त की थी।
सिकन्दर लोदी के बाद उसका पुत्र इब्राहिम लोदी 1517 ई. में 'इब्राहिम शाह' की उपाधि के साथ आगरा के सिंहासन पर बैठा।

उत्तर प्रदेश में भक्ति आंदोलन

मध्यकालीन भारत का 'भक्ति आंदोलन' वस्तुतः छठी शताब्दी ई.पू. में वैदिक कर्मकाण्डों के विरुद्ध लोकप्रिय हुए बौद्ध एवं जैन धर्म के समानान्तर खड़े हुए वैष्णव एवं शैव सम्प्रदाय से जुड़े संतों के प्रयास का नया रूप था। दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाले सन्त 'अलवार' और शैव धर्म का प्रचार करने वाले 'नयनार' नाम से जाने गये। इस भक्ति आंदोलन को दक्षिण से उत्तर में लाने का कार्य रामानन्द ने किया।

रामानन्द
रामानुज के शिष्य रामानन्द का जन्म प्रयागराज के अनसुइया में हुआ था। उन्होंने प्रत्येक जाति के लोगों को अपना शिष्य बनाया और उपदेश आम आदमी की भाषा हिन्दी में दिया। 'एकेश्वरवाद' पर बल देते हुए रामानन्द ने विष्णु की जगह 'राम' की भक्ति आरम्भ की। कबीर, रैदास, सेना आदि इनके प्रमुख शिष्य हुए। भक्ति आंदोलन की लोकप्रियता का परिणाम रहा कि यह निर्गुण और सगुण दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। निर्गुण सम्प्रदाय में सबसे बड़ा नाम जहां कबीर का सामने आता है, वहीं सगुण भक्ति शाखा को आगे बढ़ाने का कार्य चैतन्य, तुलसीदास, वल्लभाचार्य, सूरदास व मीरा ने किया।

जब्ती और दहसाला

जब्ती, भूमि कर निर्धारण का एक वैज्ञानिक तरीका था जो भूमि सर्वेक्षण पर आधारित था। दहसाला, जब्ती का बेहतर स्वरूप था।
  • दहसाला व्यवस्था में कर की दरों को निश्चित करने का प्रयास किया गया। इसके लिए दस वर्षों तक (1570-71 से 1579-80) वास्तविक उपज, स्थानीय मूल्य, उत्पादकता और कुल कृषि क्षेत्र के बारे में जानकारी एकत्र की गयी। यह व्यवस्था मुल्तान, दिल्ली, अवध, आगरा और लाहौर के सूबों में लागू थी।
  • यद्यपि दहसाला का शाब्दिक अर्थ 'दस साल' होता है किन्तु यह न तो दस वर्षों की व्यवस्था थी, न ही स्थायी व्यवस्था। राज्य के पास इसे परिवर्तित करने का अधिकार था। फिर भी यह व्यवस्था आमूल-चूल परिवर्तनों के साथ सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक चलती रही। इस व्यवस्था को 'टोडरमल की बंदोबस्त व्यवस्था' भी कहते हैं, क्योंकि इसकी शुरूआत टोडरमल ने करवायी थी।
  • इस व्यवस्था के कई लाभ थें। राज्य कर की राशि पहले से ही किसान और राज्य दोनों को पता होती थी। बाढ़, सूखा आदि से फसल के नुकसान की स्थिति में राहत का प्रावधान था।
  • पोलज (हर साल बुआई), परती (एक या दो साल खाली छोड़ी गयी), कचर (तीन साल खाली छोड़ी गयी) और बंजर (पांच साल खाली छोड़ी गयी) भूमि के प्रकार होते थे।

कबीर
सुल्तान सिकन्दर लोदी के समकालीन कबीर का जन्म 1440 ई. (तिथि को लेकर मतभेद है) में काशी में हुआ। अपने जन्म और गुरू के सम्बन्ध में कबीर ने स्वयं कहा है- 'काशी में परगट भये, रामानन्द चेताये'। जाति-धर्म की संकीर्णता से ऊपर उठकर एक सच्चे सुधारक की तरह उन्होंने समाज में व्याप्त हर तरह की बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने धार्मिक कर्मकाण्ड, बाह्य आडम्बर, अवतारवाद एवं मूर्तिपूजा का विरोध करते हुए 'एकेश्वर वाद' सिद्धांत पर आधारित निर्गुण ब्रह्म का प्रचार किया। कबीर ने राम को भी निर्गुण स्वरूप में स्वीकार किया। उनका मानना था कि ईश्वर का निवास मंदिर, मस्जिद, काशी या काबा में न होकर मनुष्य के दिलों में होता है। अनपढ़ होते हुए भी कबीर ने अपना संदेश जन-जन तक पहुँचाने के लिए दोहों की रचना की, जिनका संकलन 'बीजक' के रूप में उपलब्ध है। ब्राह्मणवादी रूढ़िवादिता को चुनौती देते हुए उन्होंने अपना प्राण वर्तमान संतकबीर नगर जनपद अंतर्गत 'मगहर' (1510 ई.) में त्यागा। कबीर स्वयं लिखते हैं- 'जो कबीरा काशी मरे तो हरि को कौन निहोरा'।

रैदास (रविदास)
रामानन्द के शिष्य रैदास का जन्म 1482 में काशी में हुआ। यह जूते बनाने का काम करते थे। अपना बचा समय लोगों की सेवा व भक्ति-भजन में बिताते थे। उन्होंने बाह्य आडम्बरों, जातिवाद, कर्मकाण्ड, अवतारवाद आदि का विरोध करते हुए एकेश्वर निर्गुण ब्रह्म में आस्था व्यक्त की। इनके अनुयायियों ने 'रायदासी सम्प्रदाय' की स्थापना की।

तुलसीदास
तुलसीदास का जन्म 1523 ई. में बांदा जिले के राजापुर गांव में हुआ था। यह मुगल बादशाह अकबर और मेवाड़ के शासक राणा प्रताप के समकालीन थे। सगुण भक्ति शाखा के प्रमुख कवि/भक्त तुलसीदास ने विष्णु के अवतार राम का गुणगान करते हुए 'रामचरितमानस' की रचना की।

बल्लभाचार्य
कृष्ण भक्ति शाखा के प्रमुख संत बल्लभाचार्य का जन्म 1479 ई. में काशी में हुआ था। यह 'शुद्धाद्वैत' में विश्वास रखते थे। इन्होंने कभी सन्यास नहीं लिया किन्तु कृष्णदेव राय के समय में विजयनगर में वैष्णव सम्प्रदाय की स्थापना की। बल्लभाचार्य ने 'श्रीनाथ जी' के रूप में वासुदेव कृष्ण की भक्ति पर बल दिया। इनकी रचनाएं हैं- सुबोधिनी, सिद्धांत रहस्य तथा अणुभाष्य।
अपने जीवन का अधिकतर समय बल्लभाचार्य ने काशी और वृंदावन में व्यतीत किया। इनके अनुयायी 'अष्टछाप' नाम से जाने जाते थे।

सूरदास
वल्लभाचार्य के शिष्य सूरदास का जन्म 1478 ई. में वर्तमान आगरा-मथुरा मार्ग पर स्थित रूनकता नामक ग्राम में हुआ था। यह मुगल बादशाह अकबर और जहांगीर के समकालीन थे। कृष्ण भक्त सूरदास ने ब्रजभाषा में सूरसागर, सूरसारावली तथा साहित्य लहरी की रचना की। यह अष्टछाप के कवि थे।

इज़ॉरा व्यवस्था

जहांदार शाह के वजीर जुल्फिकार खां ने राज्य की आर्थिक स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से भूमि कर की इज़ॉरा व्यवस्था को बढ़ावा दिया। इसमें सबसे अधिक बोली लगाने वाले को भूमि कर वसूलने का ठेका देने की परम्परा शुरू हुई। इससे बिचौलियों की एक नई श्रेणी का जन्म हुआ, जिन्हें 'तालुकदार' अथवा 'इज़ारेदार' कहा गया। इज़ारेदार के लिए यह व्यवस्था थी कि वह सरकार को एक निश्चित धन देकर बदले में किसानों से अपनी इच्छानुसार लगान वसूल कर सकते थे।
सामान्य रूप से इज़ॉरा व्यवस्था वहाँ लागू की जाती थी, जहाँ किसानों के पास संसाधनों का अभाव होता था। इज़ारेदार संसाधन प्रदान करते थे। इस व्यवस्था से किसानों के ऊपर अत्यधिक अत्याचार हुए।

मुगलकाल

बाबर (1526-1530 ई.)

जहीरूद्दीन मुहम्मद बाबर ने 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी (अफगान) को पराजित कर भारत में मुगल साम्राज्य (1526-1707 ई.) की स्थापना की। 'बाबरनामा' के अनुसार पंजाब के सूबेदार दौलत खां लोदी एवं आलम खां के अतिरिक्त राणा सांगा ने बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए निमंत्रण दिया था। इस युद्ध में बाबर ने पहली बार 'तुलगमा युद्ध पद्धति' तथा तोपों को सजाने में 'उस्मानी विधि' (दो गाड़ियों के मध्य तोपों को रखकर चलाना) का प्रयोग किया था। पानीपत के प्रथम युद्ध में उस्ताद अली और मुस्तफा खां नामक दो प्रसिद्ध निशानेबाजों ने बाबर के तोपखाने का नेतृत्व किया था। इस युद्ध में विजय के पश्चात बाबर ने आगरा को अपनी राजधानी बनाया।
मार्च, 1527 में आगरा से 40 किलोमीटर दूर लड़े गये खानवा के युद्ध में बाबर ने मेवाड़ के शासक राणा सांगा को परास्त कर भारत में मुगल साम्राज्य को स्थापित करने का कार्य किया। युद्ध में अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए बाबर ने शराब पीने और बेचने पर प्रतिबंध लगाते हुए मुसलमानों पर लगने वाले 'तमगा कर' (एक व्यापारिक कर) को समाप्त करने की घोषणा की।
बाबर ने खानवा के युद्ध में 'जेहाद' की घोषणा की थी। इस युद्ध में विजय के पश्चात बाबर ने 'गाजी' (धर्म प्रचारक योद्धा) उपाधि धारण की। 1529 में घाघरा के युद्ध में बाबर ने बंगाल और बिहार की संयुक्त सेना को पराजित किया।

हुमायूं (1530-1556 ई.)

दिसम्बर, 1530 में बाबर की मृत्यु के बाद उसके ज्येष्ठ पुत्र हुमायूं का आगरा में राज्याभिषेक हुआ। अफगान अभी भी मुगलों के प्रबल शत्रु बने हुए थे। इस बीच जौनपुर, लखनऊ एवं मानिकपुर पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर चुके पटना (बिहार) के अफगान सरदार महमूद लोदी के साथ 1532 ई. में हुमायूं का युद्ध हुआ। इस युद्ध में पराजित होकर महमूद लोदी भाग गया।

हुमायूं : इंसान-ए-कामिल
  • हुमायूं की प्रशंसा करते हुए अबुल फजल ने उसे 'इंसान-ए-कामिल' कहा है, जिसका अर्थ होता है-'सम्पूर्ण व्यक्ति'। दूसरी तरफ अनेक इतिहासकार हुमायूं को 'समय पर सही निर्णय न ले पाने वाला' कमजोर व्यक्ति बताते हैं। हुमायूं के बारे में लेनपुल का एक कथन काफी प्रसिद्ध है- “हुमायूं जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते हुए अपनी जान दे दी।”
  • अबुल फजल का पक्ष देखें तो हुमायूं एक न्याय प्रिय, रहमदिल, अच्छा योद्धा एवं नेक इंसान था। आगरा के सिंहासन पर बैठते ही उसने अपने भाइयों में साम्राज्य का बंटवारा कर दिया। ऐसा करने वाला वह मुगल वंश का एकमात्र शासक हुआ। यद्यपि उसके भाइयों ने जरूरत पर उसकी कभी मदद नहीं की, जो उसकी असफलता का कारण बना।
  • मेवाड़ की राजमाता कर्णवती ने जब बहादुरशाह के आक्रमण से सुरक्षा के लिए हुमायूं को राखी भेजकर सहायता की मांग की तो उसने इसके लिए भी पूरा प्रयास किया। इसी प्रकार शेर खां के साथ 'चौसा के युद्ध' में पराजित होने के बाद उसने गंगा नदी में कूदकर एक भिश्ती की सहायता से अपनी जान बचायी और बदले में भिश्ती को एक दिन का बादशाह बना दिया।
  • योद्धा के रूप में हुमायूं ने राज्याभिषेक से पूर्व बाबर के साथ पानीपत, खानवा तथा चन्देरी समेत उन सभी युद्धों में भाग लिया था, जिसमें उन्हें विजय प्राप्त हुई। हिन्दुस्तान के सिंहासन पर बैठने के बाद उसने कलिंग, दौहरिया, चुनारगढ़, मच्छीवाड़ा, सरहिन्द आदि युद्ध में जीत हासिल की, किन्तु चौसा और बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में पराजित होकर उसे भागना पड़ा। इसके बाद वह लम्बे समय तक दर-दर भटकता रहा।
हुमायूं 1539 ई. में गंगा नदी के उत्तरी तट पर स्थित 'चौसा' नामक स्थान पर अफगान सरदार शेर खां से पराजित हो गया। इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद शेर खां ने 'शेरशाह' की उपाधि धारण की और 1540 ई. में बिलग्राम की लड़ाई में हुमायूं को पराजित कर कन्नौज, बिलग्राम, आगरा और दिल्ली पर कब्जा कर लिया। 1545 ई. में कालिंजर अभियान के दौरान शेरशाह की मृत्यु होने के बाद हुमायूं को आगरा के सिंहासन पर बैठने का पुनः अवसर मिला, किंतु वह अधिक दिनों तक सत्ताभोग नहीं कर सका। जनवरी 1556 ई. में दीनपनाह स्थित पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर उसकी मृत्यु हो गई।

अकबर (1556-1605 ई.)

हुमायूं की मृत्यु के बाद मात्र 13 वर्ष की आयु में अकबर ने हिन्दुस्तान की सत्ता संभाली। नवम्बर, 1556 में पानीपत के द्वितीय युद्ध में 'हेमू' (विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाला भारत का अंतिम एवं चौदहवां राजा) को परास्त कर अकबर ने हिन्दुस्तान पर पूरी तरह आधिपत्य कर लिया। उसकी सेना ने 1559 ई. में ग्वालियर, 1560 ई. में जौनपुर तथा 1561 ई. में मालवा एवं चुनार के किले पर अधिकार कर लिया। अकबर ने 1569 ई. में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में कालिंजर पर विजय प्राप्त कर यहां के पराजित शासक राजा रामचन्द्र को प्रयाग के पास जागीर दे दी। 1583 में अकबर ने 'प्रयाग' का नाम बदलकर 'इलाहाबाद' कर दिया।

दीन-ए-इलाही/तौहीद-ए-इलाही
  • धर्म और दर्शन में अकबर की गहरी रुचि थी। उसने 'सुलह-ए-कुल' की नीति अपनाई जिसका शाब्दिक अर्थ 'सभी के लिए शान्ति' होता है। उसने 1575 ई. में फतेहपुर सीकरी में 'इबादत खाना' बनवाया। इबादतखाने में वह अलग-अलग धर्मों के विद्वानों के साथ धार्मिक और आध्यात्मिक मुद्दों पर विचार-विमर्श करता था। उसे यह भी विश्वास था कि ईश्वर एक है, जिसके अनेक रूप हैं।
  • अकबर ने 1582 ई. में 'दीन-ए-इलाही' की शुरूआत की। यह 'दैवीय एकेश्वरवाद' पर आधारित था। अकबर ने सभी धर्मों की अच्छी बातें लेकर दीन-ए-इलाही की नींव रखी। उसने दीन-ए-इलाही के प्रचार-प्रसार के लिए कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की। दीन-ए-इलाही की कोई पवित्र जगह और पवित्र किताब नहीं थी। नये सदस्यों को अकबर रविवार के दिन स्वयं सदस्यता दिलवाता था। अकबर नये सदस्यों को एक मंत्र देता था जिसे 'शास्त' कहते थे। अबुल फज़ल, फैजी और बीरबल ने दीन-ए-इलाही की सदस्यता ली।
  • दीन-ए-इलाही अकबर के साथ ही खत्म हो गया। हालांकि जहांगीर ने नये सदस्यों को जोड़ने और शास्त देने की प्रक्रिया जारी रखी।
1572 ई. में अकबर ने गुजरात विजय के बाद शेख सलीम चिश्ती के आदर में आगरा से 36 किमी. दूरी पर 'फतेहपुर सीकरी' नामक शहर का निर्माण कराया। अकबर ने आगरा में लाल किले का निर्माण कराया। इलाहाबाद और लाहौर में भी उसने किले का निर्माण कराया।
अकबर के दरबार को सुशोभित करने वाले नौ रत्नों में से दो बीरबल और टोडरमल उत्तर प्रदेश से थे। बीरबल का जन्म 'काल्पी' (वर्तमान 'जालौन' जनपद) के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अकबर ने इन्हें 'राजा' और 'कविराज' की उपाधि प्रदान की थी। 'दीन-ए-इलाही' को स्वीकार करने वाला यह प्रथम एवं अंतिम हिंदू राजा थे। टोडरमल का जन्म लखनऊ के निकटवर्ती सीतापुर के एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनकी नियुक्ति पहले गुजरात के दीवान और फिर प्रधानमंत्री के रूप में हो गई। दीवान-ए-अशरफ के पद पर कार्य करते हुए टोडरमल ने भूमि सुधार के कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
अकबर ने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता दिखाई और उनकी अच्छी बातों को ग्रहण करने का प्रयास किया। अगस्त 1563 ई. में अकबर ने तीर्थयात्रा कर को समाप्त कर दिया। 1564 ई. में उसने गैर-मुस्लिमों पर लगने वाले 'जजिया कर' की वसूली बंद करा दी। अकबर ने सभी धर्मों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए 'सुलह-ए-कुल' की नीति अपनाई। इसका उद्देश्य सार्वभौमिक सहिष्णुता थी। इसने 1582 ई. में 'दीन-ए-इलाही' (तौहीद-ए-इलाही) की स्थापना की और इसे 'राजकीय धर्म' घोषित कर स्वयं इसका प्रवर्तक बन गया। विसेंट स्मिथ के अनुसार 'दीन-ए-इलाही अकबर के अहंकार एवं निरंकुशता की भावना की उपज थी।'
अकबर ने अनेक राजपूत राजाओं को विश्वास में लेकर उन्हें अपना स्वामीभक्त बना लिया। इससे मुगल साम्राज्य को नयी शक्ति मिली। अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था के आधार पर सैन्य संगठन तैयार किया। यह मनसबदारी दशमलव पद्धति पर आधारित थी। मुगल मनसबदारी प्रणाली मध्य एशिया (मंगोलिया) से ली गई थी।

मनसबदारी
मनसबदारी, अकबर के शासन की एक विशिष्ट व्यवस्था थी, जो मंगोल प्रशासन व्यवस्था से प्रेरित थी।
मनसब, सरकारी अधिकारियों को दी जाने वाली एक श्रेणी थी। इस श्रेणी के दो भाग होते थे- जात और सवार। जात से शासन व्यवस्था में व्यक्तिगत स्थिति और तनख्वाह का निर्धारण होता था। 'सवार' से मनसबदार द्वारा रखी जाने वाली सेना की टुकड़ी के आकार का पता चलता था।
  • मनसबदार को ऐसी जागीर दी जाती थी जिससे उसके सैनिकों की तनख्वाह और उसकी खुद की तनख्वाह के बराबर धन वसूला जा सके। यह वंशानुगत व्यवस्था नहीं थी और मनसबदारों की प्रोन्नति, अवनति और बर्खास्तगी संभव थी।
  • जोत के अनुसार तीन प्रकार के मनसबदार हो सकते थे। मनसबदार (500 जोत के नीचे), अमीर (500-2500 जोत के बीच) और अमीर-ए-उम्दा (2500 जोत के ऊपर)।
  • जहांगीर 'दो-अस्पा-सिंह-अस्पा' व्यवस्था लाया, जिसके अंतर्गत मनसबदारों को एक निश्चित संख्या में घुड़सवार रखने होते थे।
  • मनसबदारी और इक्ता व्यवस्था का मूलभूत अंतर यह था कि ज्यादातर मनसबदार न तो अपनी जागीर में रहते थे और न वहां का प्रशासन देखते थे। वे राज्य के दूसरे हिस्से में अपनी सेवायें प्रदान करते थे। हालांकि वे फिर भी जागीर के राजस्व के हकदार होते थे। मुक्ती, निश्चित रूप से अपनी जागीर में रहते और प्रशासनिक व्यवस्था देखते थे।

जहांगीर ( 1605-1627 ई. )

अकबर की मृत्यु के बाद उसके पुत्र सलीम का राज्याभिषेक 'नूरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर बादशाह गाजी' की उपाधि के साथ 3 नवम्बर, 1605 ई. को आगरा के किले में हुआ। सत्ता संभालने के तुरंत बाद जहांगीर ने लोक-कल्याण संबंधी 12 राजाज्ञायें (दस्तूर-उल-अमल) जारी कीं, जिन्हें 'आइन-ए-जहांगीरी' कहा जाता है।
इन राजाज्ञाओं में शामिल थे- 'तमगा' नामक एक कर की वसूली पर रोक, शराब व अन्य मादक पदार्थों की बिक्री एवं निर्माण पर प्रतिबंध, मार्गों के किनारे कुआं, सराय एवं मस्जिदों का निर्माण, सप्ताह के दो दिन गुरूवार (जहांगीर के राज्याभिषेक का दिन) एवं रविवार (अकबर के जन्म का दिन) को पशुओं की हत्या पर रोक, सजा के रूप में नाक-कान काटने की प्रथा पर रोक आदि।
जहांगीर ने आगरा किले के शाहबुर्ज एवं यमुना तट पर खम्भे में शुद्ध सोने से निर्मित 'न्याय की जंजीर' लगायी थी, जिसे 'जंजीर-ए-अदली' कहा जाता था। इसमें 60 घंटिया लगी थीं। उसने 'श्रीकांत' नामक व्यक्ति को 'हिन्दुओं का जज' नियुक्त किया था।
बादशाह बनने के तुरंत बाद जहांगीर को अपने पुत्र खुसरो के विद्रोह का सामना करना पड़ा। विद्रोह में खुसरो को संरक्षण देने के आरोप में जहांगीर ने सिखों के पांचवें गुरू अर्जुन देव को फांसी की सजा दी। बाद में जहांगीर के दूसरे पुत्र 'खुर्रम' (शाहजहां) ने खुसरो की हत्या कर दी।
  • खुसरो का मकबरा प्रयागराज स्थित 'खुसरो बाग' में स्थित है।
  • जहांगीर ने तेहरान निवासी मिर्जा गयासबेग की विधवा पुत्री 'मेहरून्निसा' से विवाह कर उसे 'नूरमहल' की उपाधि दी, जो आगे चलकर 'नूरजहां' के नाम से विख्यात हुई। जहांगीर ने फारसी में लिखी आत्मकथा 'तजुक-ए-जहांगीरी' में कहा है कि गुलाब से इत्र
  • निकालने की विधि की जन्मदात्री नूरजहां की मां अस्मत बेगम थीं।
  • ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा 1608 ई. में जहांगीर के दरबार में विलियम हॉकिंस को ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम का राजदूत बनाकर भेजा गया था। किसी मुगल दरबार में आने वाला यह प्रथम ब्रिटिश राजदूत था। जहांगीर ने उसे 'इंग्लिश खां' की उपाधि से सम्मानित किया था।

शाहजहां ( 1628-1658 ई. )

  • शाहजहां फरवरी, 1628 में आगरा के सिंहासन पर बैठा। सत्ता प्राप्त करने के लिए उसने अपने परिवार के कई सदस्यों की हत्या करवायी। नूरजहां को पेंशनर बनाकर लाहौर भेज दिया गया।
  • शाहजहां ने हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के लिए एक अलग विभाग स्थापित किया। उसने गो-हत्या पर से प्रतिबंध उठा लिया हालांकि कुछ दिन बाद पुनः प्रतिबंध लगा दिया। शाहजहां ने हिन्दुओं को मुसलमान दास रखने पर पाबंदी लगा दी।
  • शाहजहां का विवाह अर्जुमन्दबानो बेगम, जिसे 'मुमताज महल' के नाम से जाना गया, से हुआ था। मुमताज की मृत्यु 1631 ई. में हो गयी। मृत पत्नी की स्मृति में शाहजहां ने विश्वप्रसिद्ध 'ताजमहल' का निर्माण (1631 से 1648 ई. के मध्य) कराया।
  • वास्तुकला संगीत एवं साहित्य आदि क्षेत्रों में बहुआयामी विकास होने के कारण शाहजहां के शासनकाल को 'मध्यकालीन इतिहास का स्वर्णकाल' कहा जाता है।
  • 'गंगालहरी' एवं 'गंगाधर' जैसी पुस्तकों के रचनाकार पंडित जगन्नाथ को शाहजहां ने अपने दरबार में 'राजकवि' का पद दिया था।
  • शाहजहां के शासनकाल में अनेक विदेशी यात्रियों ने भारत की यात्रा की। इन यात्रियों में प्रमुख थे- फ्रांस के ट्रेवर्नियर (जौहरी) एवं बर्नियर (चिकित्सक), इटली के मनूची एवं मुण्डी। मनूची ने अपनी पुस्तक 'स्टोरियो डी मोगोर' में अपनी यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया है।
  • शाहजहां ने 'दार-उल-बका' नामक कालेज स्थापित किया था।

औरंगजेब (1658-1707 ई.)

बादशाह शाहजहां को आगरा के किले में कैद कर उसके पुत्र औरंगजेब ने जुलाई 1658 ई. में अपना राज्याभिषेक कराया। इस काल में औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता के कारण मुगल साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया। इसने नवरोज समारोह, सूर्य पंचाग तथा सिक्कों पर कलमा खुदवाने की परम्परा को समाप्त कर दिया। इसने पानदारी (चुंगी), 'राहदारी' (सड़क कर) तथा किसानों पर लगने वाले अबवाब कर की वसूली पर रोक लगा दी।
औरंगजेब ने अपनी धार्मिक कट्टरता के चलते काशी के 'विश्वनाथ मंदिर' एवं मथुरा के 'केशव राय मंदिर' समेत अनेक हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कराया। उसने तीर्थयात्रा कर को पुनः लागू करते हुए सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया।
मुगल साम्राज्य औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही बिखर गया। इसके बाद इस वंश में कोई प्रभावशाली शासक नहीं हुआ। मुगल काल के अंतिम शासकों में महत्वपूर्ण नाम हैं- बहादुर शाह (1707-1712 ई.), जहांदार शाह (1712-1713 ई.), फर्रुखसियर (1713-1719 ई), मुहम्मद शाह (1719-1748 ई.), अहमदशाह (1748-1754 ई.), आलमगीर द्वितीय (1754-1759 ई.), शाह आलम द्वितीय (1759-1806 ई.), अकबर द्वितीय (1806-1837 ई.), बहादुर शाह द्वितीय (1837-1857 ई.)।

अवध के नवाब

वर्तमान उत्तर प्रदेश का 'अवध' क्षेत्र मुगल साम्राज्य का सूबा था। 1722 ई. में बादशाह मुहम्मदशाह ने सहादत खां बुरहानउल्मुल्क को अवध का सूबेदार नियुक्त किया, लेकिन सआदत खां ने कुछ समय पश्चात 'अवध' को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया। 1723 ई. में इसने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के उद्देश्य से अवध का नया 'राजस्व बन्दोबस्त' (Revenue Settlement) घोषित कर जमींदारों के कर्ज से दबे किसानों को राहत दिलाने का प्रयास किया। 1739 ई. में इसने नादिरशाह को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया, किंतु आक्रमणकारी को वायदा के अनुसार धन न दे पाने के कारण इसने आत्महत्या कर ली।
यह शासन में हिन्दू-मुसलमान नागरिकों में भेद करने वाला नहीं था।
सआदत खां के बाद उसका भतीजा और दामाद सफदरजंग अवध का नवाब एवं मुगल बादशाह मुहम्मद शाह का वजीर बना। इसके राज्य में इलाहाबाद का प्रांत भी शामिल था। सफ़दरजंग की मृत्यु 1754 ई. में हुई, जिसके बाद शुजाउद्दौला अवध का नवाब वजीर बना।
बक्सर के युद्ध में नवाब शुजाउद्दौला अंग्रेजों से पराजित हुआ और उसे इलाहाबाद संधि करनी पड़ी। उसने कंपनी को क्षतिपूर्ति के रूप में 50 लाख रुपये दिये, जिसके बदले में उसे अपना राज्य वापस मिल गया।
  • शुजाउद्दौला के बाद अवध का नवाब बनने वाले आसफउद्दौला (1775-95 ई.) ने राज्य की राजधानी फैजाबाद से हटाकर लखनऊ कर दी।
  • वाजिद अली शाह अवध का अंतिम नवाब हुआ।
  • यह 'रंगीलाशाह' एवं 'अब्दुल मंसूर मिर्जा' नाम से भी प्रसिद्ध था।
  • इसका एक उपनाम 'अख्तर पिया' भी था।
  • वर्ष 1856 में लार्ड डलहौजी ने आउट्रम रिपोर्ट को आधार बनाते हुए कुशासन का आरोप लगाकर वाजिद अली शाह को सत्ता से हटाकर अवध का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय कर लिया। वाजिद अली शाह को ₹12 लाख वार्षिक पेंशन दे कर कलकत्ता भेज दिया गया।
  • नवाब वाजिद अली शाह की गीत, संगीत और नृत्य में विशेष अभिरूचि थी। कत्थक नृत्य में यह स्वयं कृष्ण बनकर भाग लेता था।
  • अंग्रेजों द्वारा अवध से कलकत्ता भेजे जाने के दौरान इसने रास्ते में ही गीत लिखा था, "बाबुल मोरा नैहर छूटा जाए।"

अवध के नवाब

नवाब शासन काल
सआदत खां बुरहान-उल-मुल्क 1722-1739
सफदरजंग 1739-1754
शुजा-उद्-दौला 1754-1775
आसिफ-उद्-दौला 1775-1797
वजीर अली 1797-1798
सआदत अली 1798-1809
नासिरूद्दीन हैदर 1809-1837
नासिरूद्दौला 1837-1847
वाजिद अली शाह 1847-1856

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।