उत्तर प्रदेश का प्राचीन इतिहास
उत्तर प्रदेश की माटी सिर्फ एक राज्य की भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की गौरवशाली सभ्यता का पालना रही है। बेलन घाटी के पाषाणकालीन अवशेषों से लेकर आलमगीरपुर की हड़प्पा संस्कृति और सारनाथ में गूंजते बुद्ध के प्रथम उपदेश तक, यूपी के कण-कण में इतिहास जीवित है। इस विस्तृत लेख में आप वैदिक काल के 'मध्य देश', आठ महाजनपदों के उदय, मौर्य व गुप्त साम्राज्य के स्वर्ण युग और कन्नौज के वैभवशाली इतिहास की सबसे प्रामाणिक व रोचक जानकारी पढ़ेंगे।
उत्तर प्रदेश का इतिहास उतना ही पुराना है, जितनी 'मानव सभ्यता' (Human Civilisation)। प्राचीन काल में गंगा के मैदानी क्षेत्र में स्थित होने के कारण इसे 'मध्य देश' नाम से जाना जाता था। हाल में विभिन्न स्थलों पर हुए उत्खनन में प्राप्त अनेक महत्वपूर्ण अवशेषों से इस क्षेत्र की प्राचीनता का पता चलता है।
प्राचीन भारतीय इतिहास को तीन काल खण्डों में विभाजित किया जाता है-
- प्रागैतिहासिक काल (मानव उत्पत्ति से 3000 ई.पू.)
- आद्य ऐतिहासिक काल (3000 ई.पू. से 600 ई.पू.)
- ऐतिहासिक काल (600 ई.पू. से आगे)
- प्रागैतिहासिक काल में पाषाण संस्कृतियों को रखा जाता है।
- आद्य ऐतिहासिक काल के अंतर्गत सिंधु घाटी और ऋग्वैदिक सभ्यता को सम्मिलित किया जाता है।
- मौर्य काल से ऐतिहासिक काल की शुरुआत होती है।
प्रागैतिहासिक काल (Pre-Historical Period)
मानव सभ्यता का आरम्भ पाषाण काल में हुआ। इसे तीन काल में विभक्त किया गया है -
- पुरापाषाण काल (Paleolithic Age)
- मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)
- नवपाषाण काल (Neolithic Age)
पुरापाषाण काल में मानव पूरी तरह 'असभ्य, बर्बर एवं जंगली' (Paleolithic Savagery) था। वह प्रायः नदियों के किनारे अथवा गुफाओं में रहता एवं शिकार कर भोजन संग्रह का कार्य करता था। इस युग के अनेक महत्वपूर्ण स्थल उत्तर प्रदेश में प्राप्त हुए हैं, जिनसे भारत के प्रारम्भिक इतिहास का पता चलता है। इन पुरापाषाण कालीन स्थलों में प्रमुख नाम हैं- 'बेलन घाटी'।
बेलन घाटी दुनिया के उन प्राचीनतम स्थलों में से एक है, जहां मानव का प्रथम बसाव हुआ। यह सोनभद्र से निकलने वाली और यहां बहने वाली बेलन नदी (टोंस की सहायक नदी) की घाटी में स्थित है।
यहां पुरापाषाण काल के तीनों काल- निम्न पुरापाषाण काल (The Lower Paleolithic Age), मध्य पुरापाषाण काल (Middle Paleolithic Age) तथा उच्च पुरापाषाण काल (The Upper Paleolithic Age) के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
बेलन घाटी पुरास्थल की खोज एवं उत्खनन कार्य का श्रेय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. जी.आर. शर्मा को जाता है। यहां लोहंदा नाले के समीप अस्थिनिर्मित 'मातृदेवी' (Mother Goddess) की एक सुन्दर मूर्ति मिली है। इस तरह की मूर्ति भारत में अन्यत्र कहीं नहीं प्राप्त हुई है। यहां के निवासी आरम्भ में आखेट आदि के लिए क्वार्टजाइट (कठोर एवं रूपांतरित पत्थर) से बने औजारों का प्रयोग करते थे, किन्तु कालान्तर में जैस्पर एवं चर्ट आदि चमकीले पत्थरों की सहायता से 'फलक-औजार' (Flake tools) बनाये जाने लगे।
- पुरापाषाण कालीन अवशेष सोनभद्र स्थित सिंगरौली घाटी तथा वाराणसी क्षेत्र के चकिया (जनपद-चंदौली) में भी प्राप्त हुए हैं।
उत्तर प्रदेश का प्राचीन इतिहास
(महत्वपूर्ण तथ्यों का फ्लोचार्ट)
ऐतिहासिक कालक्रम (Chronological Journey)
प्रागैतिहासिक काल
पाषाण काल (बेलन घाटी, लहुरादेव)
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आद्य ऐतिहासिक काल
हड़प्पा संस्कृति (आलमगीरपुर, हुलास)
➔
ऐतिहासिक काल
वैदिक एवं मौर्य काल (600 ई.पू. से आगे)
उत्तर प्रदेश के 8 प्रमुख महाजनपद
कोसल
राजधानी: श्रावस्ती
क्षेत्र: अयोध्या, लखनऊ
काशी
राजधानी: वाराणसी
क्षेत्र: वाराणसी परिक्षेत्र
कुरु
राजधानी: इन्द्रप्रस्थ
क्षेत्र: मेरठ, दिल्ली
पांचाल
राजधानी: कांपिल्य/अहिच्छत्र
क्षेत्र: रूहेलखण्ड, बदायूं
शूरसेन
राजधानी: मथुरा
क्षेत्र: मथुरा
वत्स
राजधानी: कौशाम्बी
क्षेत्र: प्रयागराज
मल्ल
राजधानी: कुशीनगर, पावा
क्षेत्र: कुशीनगर, देवरिया
चेदि
राजधानी: शुक्तिमती
क्षेत्र: बुंदेलखण्ड
भगवान बुद्ध की उत्तर प्रदेश में यात्रा
जन्म व बचपन
कपिलवस्तु (सिद्धार्थनगर)
➔
प्रथम उपदेश
सारनाथ (धर्मचक्र प्रवर्तन)
➔
सर्वाधिक उपदेश
श्रावस्ती (कोसल राज्य)
➔
महापरिनिर्वाण
कुशीनगर (मल्ल गणराज्य)
प्राचीन भारत में उत्तर प्रदेश स्थित 7 गणराज्य
(यहां जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि शासन करते थे)
कपिलवस्तु के शाक्य
रामग्राम के कोलिय
पिप्पलिवन के मोरिय
कुशीनगर के मल्ल
पावा के मल्ल
समसुमारगिरि के मग्ग
केसपुत्त के कलाम
उत्तर प्रदेश में प्राप्त सम्राट अशोक के प्रमुख अभिलेख
- 📌 अहरौरा (मिर्जापुर)लघु शिलालेख
- 📌 मेरठवृहद स्तंभ लेख
- 📌 प्रयाग (इलाहाबाद)वृहद स्तंभ लेख ('रानी का अभिलेख')
- 📌 सारनाथ (वाराणसी)लघु स्तंभ लेख (राजकीय चिन्ह)
- 📌 कौशाम्बीलघु स्तंभ लेख
उत्तर प्रदेश में मृदभांड संस्कृतियां (Pottery Cultures in U.P.)
प्राचीन इतिहास की जानकारी पुरातात्विक स्रोतों पर निर्भर है। पुरातात्विक स्रोतों में मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उत्खनन में किसी स्थान पर प्राप्त मृदभांड से अनुमान लगाया जाता है कि वहां के निवासियों की तत्कालीन परिस्थिति, जीवन-स्तर, समाज संरचना, व्यक्तिगत व सामाजिक सोच आदि कैसी थी? उत्तर प्रदेश में कई काल के मृदभांड प्राप्त हुए हैं-
गैरिक मृदभांड संस्कृति (OCP)
- काल: 2000 ई.पू. से 1500 ई.पू. तक
- स्थल: बिसौली (बदायूं), राजपुर, परसू, मायापुर, सईपई, अतरंजीखेड़ा, हस्तिनापुर, अहिच्छत्र, बिठूर आदि।
- विशेषता: यहां कच्ची ईंटों से बने वर्गाकार एवं गोलाकार मकान मिले हैं। इस काल में घर सरकंडों से बनाए जाते थे, जिन पर मिट्टी का लेप कर दिया जाता था। इस संस्कृति का पतन कदाचित बाढ़ के कारण हुआ।
काले एवं लाल मृदभांड संस्कृति (BRW)
- काल: हड़प्पाकालीन
- स्थल: अतरंजीखेड़ा, अहिच्छत्र, हस्तिनापुर, आलमगीरपुर आदि।
चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति (PGW)
- काल: वैदिक काल (ऋग्वैदिक एवं उत्तर वैदिक)
- स्थल: अहिच्छत्र, आलमगीरपुर, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, जोखेड़ा, मथुरा आदि।
उत्तरी काले पॉलिश युक्त मृदभांड संस्कृति (NBPW)
- काल: उत्तर वैदिक काल से मौर्यकाल (500 - 100 ई.पू.)
- स्थल: अहिच्छत्र, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, कौशाम्बी, श्रावस्ती आदि।
मध्यपाषाण काल के प्रमुख तथ्य
- उत्तर प्रदेश में मध्य पाषाण काल के प्रमुख स्थल हैं - सराय नाहर राय, महादहा, दमदमा एवं चौपानी माण्डो। सराय नाहर राय, महादहा एवं दमदमा वर्तमान प्रतापगढ़ जनपद में स्थित हैं।
- सराय नाहर राय और महादहा से स्थायी झोपड़ियां बनाकर रहने के साक्ष्य मिले हैं।
- सराय नाहर राय में झोपड़ी का फर्श एवं 'अस्थाई निवास स्थान' के अवशेष मिले हैं। यहां 14 शवाधान एवं 8 गर्त चूल्हे (Pit hearths) भी प्राप्त हुए हैं। शवों का सिर पश्चिम और पैर पूर्व में रखा गया है।
- सराय नाहर राय में युद्ध अथवा बाह्य मानवीय आक्रमण के स्पष्ट साक्ष्य मिले हैं। चूल्हों से पशुओं की अधजली हड्डियां प्राप्त हुई हैं, जिससे यहां के निवासियों के खान-पान का पता चलता है।
- महादहा में कुछ युगल समाधियां भी प्राप्त हुई हैं, अर्थात स्त्री एवं पुरुष को एक साथ कब्र में दफनाया गया है। यहां हड्डियों से बने बाणाग्र (Arrowheads) एवं आभूषण मिले हैं। दोनों स्थलों पर लघु पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं।
- दमदमा में 41 शवाधान एवं कुछ गर्त चूल्हे मिले हैं। इनमें 5 युगल समाधियां हैं, जबकि एक समाधि में तीन मानव शवों को एक साथ रखा गया है। यहां भी लघु पाषाण उपकरण के साथ-साथ हड्डियों से बने आभूषण प्राप्त हुए हैं। प्रयागराज के निकट लेखहिया नामक शिलाश्रय से सर्वाधिक 17 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं।
नवपाषाण काल के प्रमुख तथ्य
- प्रदेश के नवपाषाण कालीन स्थलों में प्रयागराज में बेलन नदी के तट पर स्थित कोल्डिहवा, महगड़ा एवं पंचोह के अतिरिक्त संत कबीरनगर जनपद के लहुरादेव का नाम प्रमुख है। इन पुरास्थलों से कृषि, कच्ची ईंट तथा घास-फूस से बने आवास के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
- कोल्डिहवा में जहां 7000-6000 ई.पू. धान की खेती के साक्ष्य मिले हैं, वहीं नवीनतम शोध के आधार पर लहुरादेव को भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि के प्राचीनतम स्थल के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। यहां 9000-8000 ई.पू. में धान की खेती के साक्ष्य मिले हैं।
आद्य ऐतिहासिक काल (Proto-Historical Period)
इस काल में मनुष्य ने धातुओं का प्रयोग आरम्भ किया। सर्वप्रथम तांबा का प्रयोग हुआ, बाद में कांसा और फिर लोहे का उपयोग शुरू किया गया। आरम्भिक दिनों में मनुष्य ने पाषाण उपकरणों के साथ ही तांबा का उपयोग किया। इसे 'ताम्र पाषाणिक संस्कृति' (Chalcolithic Culture) कहा गया। इसका समय 3000-500 ई.पू. निर्धारित किया जाता है। इस संस्कृति का बड़ा भाग हड़प्पा संस्कृति (सिंधु सभ्यता) के रूप में जाना जाता है।
उत्तर प्रदेश में इस काल के महत्वपूर्ण पुरास्थल मेरठ और सहारनपुर में प्राप्त हुए हैं।
- ताम्रपाषाणिक संस्कृति की अवधि में तांबा में टिन मिलाकर 'कांसा' बनाने की विधि विकसित हुई, जिसने पहले ताम्र-कांस्य युगीन संस्कृति और फिर कांस्ययुगीन सभ्यता को जन्म दिया। 'हड़प्पा संस्कृति' इसी युग का प्रतिनिधित्व करती है। यह दक्षिण एशिया की 'प्रथम नगरीय संस्कृति' थी, जिसका समय रेडियोकार्बन काल निर्धारण विधि से 3500-1300 ई.पू. के मध्य निर्धारित किया गया है। इसका परिपक्व चरण 2600-1900 ई.पू. माना जाता है।
- हड़प्पा संस्कृति की अब तक 1400 से अधिक बस्तियों का पता लगाया जा चुका है। इसका सबसे पूर्वी स्थल था उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद अंतर्गत यमुना की सहायक हिंडन नदी के तट पर बसा नगर आलमगीरपुर। इस पुरास्थल की खोज 1958 में यज्ञदत्त शर्मा ने की। इसे 'परसाराम का खेरा' नाम से भी जाना जाता है।
- आलमगीरपुर में मनके, रोटी बेलने की चौकी तथा कटोरी के अनेक टुकड़े मिले हैं। मिट्टी के बर्तनों पर मोर, गिलहरी आदि के चित्रों के अतिरिक्त कुछ लिपि भी प्राप्त हुई है, जिससे ज्ञात होता है कि यहां के निवासी लेखनकला से परिचित थे।
- आलमगीरपुर के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश में हुलास (सहारनपुर), बड़ागांव (सहारनपुर), मानपुरा (बुलंदशहर), कैराना (शामली) तथा माण्डी गांव (मुजफ्फरनगर) आदि स्थलों की पहचान हड़प्पाकालीन बस्तियों के रूप में की गई है।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख हड़प्पा कालीन स्थल
आलमगीरपुर
- आलमगीरपुर वर्तमान मेरठ जिले में शहर से लगभग 25 किमी पश्चिम स्थित है। यह हड़प्पा संस्कृति का सबसे पूर्वी स्थल है।
- आलमगीरपुर यमुना की सहायक हिण्डन नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। इसका समय 3300-1300 ई.पू. माना जाता है।
- इसका प्राचीन टीला 'परशुराम का टीला' नाम से जाना जाता है। यह पूरब से पश्चिम 60 मीटर तथा उत्तर से दक्षिण 50 मीटर क्षेत्र में फैला है।
- यहां मिट्टी के बर्तन मिले हैं, जिनपर 'बुस्ट्रोफेडन' लिपि (चित्रात्मक लिपि) अंकित है।
हुलास
- हुलास सहारनपुर जिले में यमुना नदी के तट पर स्थित है। यहां प्रारंभिक हड़प्पा से लगाय उत्तर हड़प्पा कालीन तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
- खुदाई में हुलास से तांबे की बनी वस्तुएं, खिलौना गाड़ी, मनके, टेराकोटा, चूड़ियां आदि प्राप्त हुई हैं।
- यहां लिपि युक्त मुहरें मिली हैं, जिनका उपयोग कदाचित विशिष्ट पहचान के लिए किया जाता रहा होगा।
- हुलास में कृषि गतिविधियों के साक्ष्य मिले हैं। यहां चना, मटर, रागी, जौ आदि की खेती होती थी।
मंडी गांव
- हड़प्पा कालीन स्थल मंडी गांव मुजफ्फरनगर जिले में यमुना नदी के पूर्वी तट पर बसा है।
- यहां हड़प्पाकालीन आभूषणों का समृद्ध भण्डार मिला है।
- मंडी गांव में तांबे के बर्तन तथा सोने के मनके प्राप्त हुए हैं।
- यहां विभिन्न आकार-प्रकार और खोखले सिर वाले मनके बड़ी संख्या में मिले हैं।
- सोने से निर्मित विभिन्न प्रकार के मोती यहां प्राप्त हुए हैं।
बड़ागांव
- सहारनपुर जिला अन्तर्गत मस्करा नदी तट पर बसे बड़ागांव (बड़गांव) की पहचान हड़प्पा स्थल के रूप में हुई है।
- इसे उत्तर हड़प्पाकालीन क्षेत्र माना जाता है।
- यहां गेरुवर्णी मृदभांड (OCP) प्राप्त हुए हैं, जो उत्तर हड़प्पा एवं वैदिक संस्कृति के मध्य के संबंधों को स्पष्ट करते हैं।
सनौली
- बागपत जिला स्थित सनौली हड़प्पा स्थल का उत्खनन कार्य डा. डी.वी. शर्मा के नेतृत्व में हुआ। वहां उत्तर हड़प्पा कालीन संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
- सनौली में हड़प्पा कालीन कब्रगाह (सिमेट्री) मिला है। इस तरह के कब्रगाह हड़प्पा (पंजाब, पाकिस्तान), कालीबंगा (राजस्थान), धौलावीरा (गुजरात) में भी मिले हैं।
भटपुरा एवं मानपुरा
- हड़प्पा कालीन यह दोनों स्थल बुलंदशहर जनपद में स्थित हैं।
- यहां हड़प्पा कालीन मृदभांड एवं मिट्टी के खिलौने मिले हैं।
वैदिक संस्कृति एवं सिंधु संस्कृति में अंतर
| वैदिक संस्कृति |
सिंधु संस्कृति |
| 1. ग्रामीण सभ्यता थी। |
1. नगरीय सभ्यता थी। |
| 2. लोहे से बने उपकरण प्राप्त हुए हैं। |
2. लोहे से बने उपकरण प्राप्त नहीं हुए हैं। |
| 3. घोड़ा एक महत्वपूर्ण पशु था। |
3. घोड़े के निश्चित साक्ष्य नहीं मिले हैं। |
| 4. गाय को विशेष स्थान प्राप्त था। |
4. मुद्राओं पर गाय का अंकन नहीं है। |
| 5. मूर्ति पूजा के निश्चित साक्ष्य नहीं मिले हैं। |
5. मृण्मूर्तियों एवं पाषाण मूर्ति से पता चलता है कि मूर्ति पूजा होती होगी। |
| 6. अस्त्र-शस्त्र तथा कवच आदि बनाना जानते थे। |
6. रक्षा उपकरण जैसी वस्तुएं प्राप्त नहीं हुई हैं। |
| 7. व्याघ्र का उल्लेख नहीं मिलता। हाथी का उल्लेख भी कम प्राप्त होता है। |
7. मुहरों पर व्याघ्र एवं हाथी का अंकन पर्याप्त मात्र में है। |
| 8. वैदिक धर्म पुरुष देवता प्रधान था। |
8. मातृ देवी की पूजा का प्रचलन ज्यादा था। |
| 9. धर्म एवं जीवन में यज्ञ का महत्वपूर्ण स्थान था। |
9. यज्ञ के साक्ष्य अत्यंत कम है। |
| 10. लेखन कला के प्रचलन का साक्ष्य नहीं मिलता। |
10. लेखन कला से परिचित थे। |
| 11. आर्य प्रखर नासिका वाले थे। |
11. सिंधु सभ्यता के लोग चपटी नाक वाले थे। |
| 12. भवन निर्माण में लकड़ी व बांस का प्रयोग होता था। |
12. भवन-निर्माण में ईंट का प्रयोग होता था। |
ऐतिहासिक काल (Historical Period)
लोहा का प्रयोग शुरू होने से इस काल में विकास को गति मिली। वैदिक सभ्यता की शुरूआत इसी काल में हुई, जिसे आर्य सभ्यता नाम से भी जाना जाता है। अध्ययन की दृष्टि से वैदिक काल को दो भाग में विभाजित किया जाता है-
- ऋग्वैदिक अथवा पूर्व वैदिक काल (1500-1000 ई.पू.)
- उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई.पू.)
ऋग्वैदिक सभ्यता का ज्ञान ऋग्वेद से प्राप्त होता है। इसके प्रवर्तक आर्य थे, जिनका निवास गंगा की ऊपरी घाटी क्षेत्र से अफगानिस्तान एवं वर्तमान पंजाब तक था। सात नदियों का क्षेत्र होने के कारण इसे 'सप्त सैंधव' कहा गया। यह नदियां थीं- सिंधु, सरस्वती, शतद्रु (सतलज), परूष्णी (रावी), विपासा (व्यास), अस्किनी (चेनाब) एवं वितस्ता (झेलम)।
आर्यों ने उत्तर वैदिक काल में लोहे की जानकारी मिलने के बाद अपना विस्तार पंजाब से आगे बढ़कर गंगा-यमुना दोआब, हिमालय और विंध्याचल जैसे परवर्ती प्रदेशों में कर लिया। वैदिक साहित्य में इस क्षेत्र को 'मध्य देश' कहा गया है। इसमें वर्तमान उत्तर प्रदेश के कुरु, पांचाल और काशी जैसे राज्य शामिल थे।
कुरु राज्य का विस्तार मेरठ से दिल्ली व हरियाणा तक था। इसकी राजधानी आसंदीवत थी, जिसकी पहचान हस्तिनापुर के रूप में की जाती है। यहां के प्रसिद्ध राजा उद्दालक आरुणि का उल्लेख छांदोग्य उपनिषद में प्राप्त होता है।
पांचाल राज्य वर्तमान कानपुर से वाराणसी के मध्य गंगा के मैदान में फैला था। वर्तमान बदायूं, बरेली और फर्रूखाबाद इसमें शामिल थे। इसकी राजधानी कांपिल्य (वर्तमान फर्रूखाबाद का एक नगर) थी। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां 60,000 मुनियों की सभा में सम्पूर्ण महाभारत कथा का वाचन किया गया था। उत्तर वैदिक काल में यहां का राजा प्रवाहण जाबालि हुआ, जो अपने ज्ञान के लिए प्रसिद्ध था।
काशी वर्तमान वाराणसी क्षेत्र में स्थित थी। उत्तर वैदिक काल में अजातशत्रु काशी का राजा था।
महाजनपद काल
वैदिक काल के बाद समूचे आर्यावर्त में महाजनपदों का शासन स्थापित हुआ। बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तर निकाय' एवं जैन ग्रंथ 'भगवतीसूत्र' में 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है, जिनमें से 8 वर्तमान उत्तर प्रदेश में स्थित थे।
यह महाजनपद थे- कोसल (वर्तमान अयोध्या, श्रावस्ती, बस्ती एवं लखनऊ क्षेत्र), काशी, कुरू, पांचाल, शूरसेन (वर्तमान मथुरा क्षेत्र), वत्स (आधुनिक प्रयागराज क्षेत्र), मल्ल (आधुनिक कुशीनगर क्षेत्र) और चेदि (आधुनिक बुंदेलखण्ड क्षेत्र)।
कोसल जनपद आधुनिक अवध के लगभग बराबर था। इसकी राजधानी राप्ती नदी (प्राचीन नाम 'इरावती') के तट पर स्थित 'श्रावस्ती' थी। इसके राजा महाकोसलादेव ने काशी को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया था। इन्होंने अपनी पुत्री महाकोसलादेवी का विवाह मगध सम्राट् बिम्बिसार के साथ किया था, जिसमें 'काशी' दहेज के रूप में प्रदान की गई थी। महाकोसलादेव का उत्तराधिकारी प्रसेनजीत हुआ, जो बुद्ध का समकालीन था। बिम्बिसार की हत्या के बाद इसने मगध पर
आक्रमण कर अजातशत्रु से काशी वापस लेने का प्रयास किया, किंतु बाद में अपनी पुत्री 'वाजिरा' का विवाह अजातशत्रु के साथ कर काशी को पुनः दहेज के रूप में दे दिया।
- काशी जनपद वर्तमान वाराणसी परिक्षेत्र में स्थित था। प्राचीन काल में यह शिक्षा, समृद्धि और शिल्प-व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। राजा ब्रह्मदत्त के शासनकाल में काशी का पड़ोसी राज्य कोसल के साथ कई बार युद्ध हुआ। अंत में कोसल की विजय हुई।
- कुरु जनपद वर्तमान मेरठ (हस्तिनापुर) और दिल्ली क्षेत्र में स्थित था। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। उत्तर वैदिक काल की अपेक्षा अब इसकी ख्याति काफी कम रह गई थी, किंतु बौद्ध धर्म के जातक ग्रंथों में 'कुरु-धर्म' की चर्चा बार-बार की गई है।
- पांचाल जनपद गंगा-यमुना दोआब के पूरब और वर्तमान रूहेलखण्ड क्षेत्र में मौजूद था। उत्तरी पांचाल की राजधानी 'अहिच्छत्र' (वर्तमान बरेली क्षेत्र) और दक्षिण पांचाल की राजधानी कांपिल्य (वर्तमान बदायूं एवं फर्रूखाबाद क्षेत्र) थी।
- वत्स जनपद काशी के दक्षिण-पश्चिम में (वर्तमान प्रयागराज क्षेत्र) स्थित था। इसकी राजधानी यमुना नदी के तट पर स्थित कौशाम्बी थी।
गणराज्य
छठी शताब्दी ई.पू. वर्तमान उत्तर प्रदेश में 7 गणराज्य थे। उनके नाम थे- शाक्य, कोलिय, मोरिय, कुशीनगर के मल्ल, पावा के मल्ल, भग तथा कलाम। इन राज्यों में राजनीतिक व्यवस्था किसी राजा के अधीन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक थी। इसमें जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि शासन करते थे। शासक निरंकुश नहीं, बल्कि जनता के सेवक की भांति शासन करते थे। इस तरह के अधिकांश गणराज्य हिमालय की तलहटी में स्थित थे।
प्राचीन भारत में उत्तर प्रदेश स्थित महाजनपद
| जनपद |
राजधानी |
| मल्ल |
कुशनारा, पावा |
| काशी |
वाराणसी |
| कोसल |
श्रावस्ती |
| वत्स |
कौशाम्बी |
| चेदि |
शुक्तिमती |
| शूरसेन |
मथुरा |
| कुरू |
इंद्रप्रस्थ |
| पांचाल |
कांपिल्य, अहिच्छत्र |
गणराज्यों की राजनीतिक व्यवस्था
- राजतंत्र के विपरीत गणतंत्र में राज्य की शक्ति गण, लोक अथवा समूह में होती थी। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था थी। इसमें जनता द्वारा चुने हुए लोग शासन चलाते थे, अतः वह निरंकुश अथवा स्वेच्छाचारी नहीं होते थे।
- गण के दूसरे मुख्य अधिकारी उपराजा (उपसभापति), सेनापति तथा भण्डारगारिक (कोषाध्यक्ष) थे। इनके अतिरिक्त शासन में परामर्श के लिए अष्टकुलक नामक संस्था होती थी, जिसमें प्रमुख आठ कुलों के प्रतिनिधि हिस्सा लेते थे।
बौद्ध ग्रंथों (जातक) के अनुसार गणराज्यों में राजा का चुनाव सीधे जनता द्वारा किया जाता था। सर्वसम्मत से चयनित होने के कारण राजा को 'महासम्मत' कहा गया है। जनता द्वारा चुने गए सदस्यों का संगठन 'परिषद' कहलाती थी। इसके भवन को 'संस्थागार' कहा जाता था। प्रमुख सदस्यों की सभा 'अष्टकुलक' के नाम से जानी जाती थी। प्रशासन के सभी निर्णय बैठक में आमसहमति से लिए जाते थे। आम सहमति न बन पाने पर मतदान कराया जाता था।
प्राचीन भारत में उत्तर प्रदेश स्थित गणराज्य
| गणराज्य |
वर्तमान क्षेत्र |
| कपिलवस्तु के शाक्य |
सिद्धार्थनगर |
| रामग्राम के कोलिय |
गोरखपुर जनपद |
| पिप्पलिवन के मोरिय |
गोरखपुर क्षेत्र |
| कुशीनगर के मल्ल |
कुशीनगर क्षेत्र |
| पावा के मल्ल |
फाज़िलनगर क्षेत्र |
| समसुमारगिरि के मग्ग |
मिर्जापुर क्षेत्र |
| केसपुत्त के कलाम |
गंगा-यमुना दोआब |
बौद्ध धर्म और उत्तर प्रदेश
बौद्ध और जैन धर्म के प्रसार की दृष्टि से उत्तर प्रदेश के आठ महाजनपदों का महत्वपूर्ण स्थान है। बुद्ध शाक्य गणराज्य (कोसल जनपद) के राजकुमार थे। शाक्यों के गणप्रमुख शुद्धोदन बुद्ध के पिता थे। शाक्य वंश के लोग कोसल के इक्ष्वाकु की एक शाखा थे। कोसल नरेश प्रसेनजीत ने शाक्य वंश में वैवाहिक संबंध स्थापित किये थे, जिससे उत्पन्न पुत्र विढूढब उनका उत्तराधिकारी बना। कोसल राज्य (वर्तमान लखनऊ, अयोध्या, बाराबंकी, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर आदि जनपदों का क्षेत्र) की राजधानी श्रावस्ती में बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश दिए।
प्रत्येक वर्ष चार माह का वर्षा काल वे यहीं व्यतीत करते थे। श्रावस्ती में ही बुद्ध ने अंगुलिमाल नामक डाकू को सुधार कर अपना शिष्य बनाया था। यहीं श्रावस्ती के एक व्यापारी अनाथपिण्डक (सुदात) ने बुद्ध को 'जेतवन' नामक विहार स्वर्ण मुद्राओं से खरीदकर दान में दिया था। श्रावस्ती के ही एक व्यापारी की पुत्री विशाखा ने बुद्ध को 'पुब्बाराम' नामक विहार दान में प्रदान किया था।
उत्खनन से ज्ञात हुआ है कि प्राचीनकाल में श्रावस्ती की आकृति अर्धचन्द्राकार थी। कोसल का राजा प्रसेनजीत बुद्ध का परम अनुयायी था। इसने बौद्ध संघ को श्रावस्ती में 'राजकाराम' और 'मल्लिकाराम' नामक विहार दान में दिये थे।
वत्स की राजधानी कौशाम्बी थी। यहां का राजा उदयन बुद्ध का अनन्य था। इसने बुद्ध को 'घोषिताराम' नामक विहार भेंट में दिया था।
बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ (ऋषिपत्तन) के 'मृगदाव' में दिया, जिसे 'धर्मचक्र प्रवर्तन' (Turnings of the Wheel) कहा जाता है। बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश पांच ब्राह्मण कुमारों को दिया था, जिनके नाम थे- कुण्डिन्य, वप्प, भद्रिक, अश्वजीत और महानाम।
उत्तर प्रदेश में बौद्ध स्थल
- कपिलवस्तु - इसकी पहचान वर्तमान सिद्धार्थनगर के रूप में की जाती है। बुद्ध के पिता शुद्धोदन यहां के शासक थे।
- सारनाथ - इसका प्राचीन नाम ऋषिपत्तन था। बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहते हैं। बुद्ध ने अपने बौद्ध संघ की स्थापना यहां की थी।
- कुशीनगर - बुद्ध की यह परिनिर्वाण स्थली है। यह मल्ल गणराज्य (वर्तमान कुशीनगर एवं देवरिया) की राजधानी थी।
- श्रावस्ती - राप्ती नदी के तट पर स्थित यह नगर कोसल राज्य की राजधानी थी। बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश यहीं दिए।
- रामग्राम - इसकी पहचान वर्तमान गोरखपुर के रामगढ़ ताल के रूप में की जाती है। यह कोलिय गणराज्य की राजधानी थी। बुद्ध की पत्नी यशोधरा यहां की राजकुमारी थी।
- देवदह - यह बुद्ध का ननिहाल था। इसकी पहचान वर्तमान महाराजगंज के नेपाल सीमा पर स्थित नगर ठूंठीबारी के रूप में की जाती है।
- पावा - यह वर्तमान कुशीनगर के फाजिलनगर-सठियांव क्षेत्र में स्थित है। बुद्ध यहीं पर चुन्दकर्मार के घर भोजन कर बीमार हुए, जिसके बाद कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हो गया।
मल्ल गणराज्य आधुनिक कुशीनगर एवं देवरिया जनपदों में स्थित था। इसमें मल्लों के 9 गण (राज्य) शामिल थे। इसकी राजधानियां थीं- पहली कुसिनारा अथवा कुशीनगर (आधुनिक कसया उपनगर के निकट 'अनुरुधवा') तथा दूसरी 'पावा' (वर्तमान सठियांव-फाजिलनगर)। गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण (निधन) 483 ई.पू. में वैशाख पूर्णिमा के दिन 80 वर्ष की आयु में हिरण्यवती नदी (वर्तमान गंडक) के तट पर स्थित कुसिनारा में हुआ। निर्वाणोपरान्त बुद्ध के अस्थि अवशेषों पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया, जिनमें से चार के स्थान उत्तर प्रदेश में हैं।
बुद्ध के अस्थि अवशेष पर निर्मित उत्तर प्रदेश के स्तूप
| स्तूप |
निर्माता |
| कपिलवस्तु |
शाक्य |
| कुशीनगर |
मल्ल |
| रामग्राम |
कोलिय |
| पावा |
मल्ल |
बौद्ध धर्म: महत्वपूर्ण तथ्य
- बुद्ध के जन्म, किशोरावस्था से लेकर मृत्यु (महापरिनिर्वाण) तक की अधिकांश घटनाएं उत्तर प्रदेश में घटित हुईं। यहीं ऋषि पत्तन (सारनाथ) में उन्होंने अपना प्रथम उपदेश दिया।
- बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनका विवाह कोलिय गणराज्य (राजधानी-रामग्राम, जिसकी पहचान वर्तमान गोरखपुर के रामगढ़ताल क्षेत्र के रूप में की जाती है) की राजकुमारी यशोधरा के साथ हुआ था। 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को रात में सोते हुए छोड़कर ज्ञान की खोज में निकल पड़े। उन्होंने गोरखपुर के निकट अनोमा नदी (वर्तमान आमी) को पार कर राजगृह का मार्ग अपनाया। सिद्धार्थ के इस गृहत्याग को बौद्ध ग्रंथों में 'महाभिनिष्क्रमण' कहा गया है।
- गया में उरुवेल नामक स्थान पर निरंजना नदी के तट पर 'सम्बोधि' प्राप्त करने के पश्चात सिद्धार्थ 'बुद्ध' कहलाए। उन्होंने अपना प्रथम उपदेश ऋषिपत्तन (वर्तमान सारनाथ, जो वाराणसी के निकट है) के 'मृगदाव' में दिया।
- सारनाथ में दिए बुद्ध के प्रथम उपदेश को 'धर्मचक्रप्रवर्तन' (Turning of the Wheel) कहा गया।
- बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश श्रावस्ती (वर्तमान श्रावस्ती जिला) में दिये, जो कोसल राज्य की राजधानी थी। श्रावस्ती सरयू नदी के तट पर बसा था।
बौद्ध धर्म-दर्शन
- बौद्ध धर्म चार आर्य सत्य (दुःख, दुःख समुदाय, दुःख निरोध तथा दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा), आष्टांगिक मार्ग तथा दस शील में विश्वास रखता है।
- अनिश्वरवाद एवं अनात्मवाद- बौद्ध धर्म ईश्वर और आत्मा दोनों के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता। बुद्ध ने ईश्वर के नाम पर कभी सहमति व्यक्त नहीं की, किन्तु पुरजोर खण्डन भी नहीं किया।
- बुद्ध ने हर तरह के पूजा-पाठ, यज्ञ आदि कर्मकाण्डों का विरोध किया। उन्होंने चतुर्वर्ण व्यवस्था को कुछ संशोधनों के साथ स्वीकार किया।
- आत्मा के अस्तित्व को नकारते हुए भी बौद्ध धर्म पुनर्जन्म को स्वीकार करता है। इसके अनुसार पुनर्जन्म आत्मा का नहीं इच्छाओं और तृष्णा का होता है।
- बुद्ध की शिक्षाओं में सर्वप्रमुख है- 'मज्झिम प्रतिपदा' अर्थात मध्यम मार्ग। इसके अनुसार मनुष्य को न तो अधिक विलास करना चाहिए और न ही सीमा से अधिक संयम बरतना चाहिए।
- प्रतीत्य समुत्पाद- यह बौद्ध धर्म का प्रमुख सिद्धांत है। इसका अर्थ है, किसी वस्तु अथवा घटना के होने पर अन्य वस्तु अथवा घटनाओं की उत्पत्ति होती है।
बौद्ध धर्म के संप्रदाय
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के सौ वर्ष पश्चात उनके अनुयायियों का एक समूह पुराने नियमों एवं नीतियों में समय के अनुरूप परिवर्तन की मांग करने लगा, जबकि कुछ अन्य अनुयायी बुद्ध के बताये सिद्धांतों पर बगैर किसी परिवर्तन के चलना चाहते थे। इस विवाद और मतभेद के कारण आगे चलकर बौद्ध धर्म दो संप्रदायों में विभक्त हो गया-
हीनयान
यह बुद्ध के उन अनुयायियों का संघ था, जो बुद्ध के बताये मार्ग पर पूर्ववत चलना चाहते थे और किसी भी तरह के परिवर्तन के विरुद्ध थे। इन्हें रूढ़िवादी तथा छोटी जहाज (हीनयान) पर सवार कहा गया।
महायान
यह परिवर्तनवादियों का संघ था। इसके अनुयायी बौद्ध धर्म के आरंभिक कठोर नियमों में उदारवादी बदलाव के पक्षधर थे। अधिक संख्या में होने के कारण इन्हें 'महायान' (बड़ी जहाज) कहा गया।
महायान से आगे चल कर 'वज्रयान' नामक संप्रदाय का उदय हुआ, जो तंत्र-मंत्र एवं जादू-टोना, टोटका आदि में विश्वास रखता था।
जैन धर्म और उत्तर प्रदेश
जैन धर्म के प्रवर्तक (प्रथम तीर्थंकर) ऋषभदेव अयोध्या के सूर्यवंश में पैदा हुए थे। जैन ग्रंथों के अनुसार ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती सम्राट हुए। उन्हीं के नाम पर इस देश का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा।
जैन धर्म में कुल चौबीस तीर्थंकर हुए। इनमें दूसरे से बाईसवें तीर्थंकर तक का स्पष्ट विवरण प्राप्त नहीं होता। तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ (पुरुषादनीयम्) काशी के नागवंशी राजा अश्वसेन के पुत्र थे। उन्होंने जैन धर्म के चार महत्वपूर्ण व्रतों की स्थापना की। ये व्रत हैं- अहिंसा (Non- violence), सत्य (Truth), अस्तेय (Non-stealing) तथा अपरिग्रह (Non-attachment)। इनके अनुयायियों को 'निर्ग्रन्थ' कहा जाता था।
जैन धर्म के अंतिम प्रवर्तक महावीर स्वामी का जन्म स्थान और कार्यस्थल यद्यपि मगध रहा, किन्तु उत्तर प्रदेश में उनके अनुयायियों की संख्या पर्याप्त थी। महावीर ने जैन धर्म के पंच महाव्रतों में ब्रह्मचर्य (Chastity) को सम्मिलित किया। उत्तर प्रदेश में मथुरा, काशी, कौशाम्बी, हस्तिनापुर, श्रावस्ती, अयोध्या, देवगढ़, महोबा, काकण्डी, तथा रौनाही (प्राचीन रत्नगिरी) जैन धर्म के प्रमुख केन्द्र रहे हैं।
जैन धर्म : महत्त्वपूर्ण तथ्य
- जैन धर्म ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता किन्तु आत्मा का अस्तित्व स्वीकार करता है। इसके अनुसार आत्मा न सिर्फ मनुष्य अथवा जीव-जन्तुओं में, बल्कि पत्थरों, वृक्षों तथा अन्य पदार्थों में भी होती है।
- जैन धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है किन्तु इसके अनुसार पुनर्जन्म आत्मा का नहीं बल्कि अधूरे कर्मों पर का होता है।
- जैन धर्म देवताओं एवं यक्ष-यक्षणी के अस्तित्व को स्वीकार करता है, किन्तु इन्हें अपने तीर्थंकरों का सहयोगी मानता है।
- जैन धर्म में संल्लेखना अथवा संथारा का सिद्धांत अत्यंत प्रचलित है। इसके अनुसार अन्न-जल का परित्याग कर शरीर त्याग करना निर्वाण (मुक्ति) का श्रेष्ठ मार्ग है। मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य एवं राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष समेत अनेक लोगों ने संल्लेखना विधि से अपने प्राण त्यागे थे। यह प्रथा आज भी प्रचलित है।
भागवत/वैष्णव/शैव धर्म
जैन और बौद्ध धर्म की भांति भागवत, वैष्णव, शैव तथा शाक्त धर्म के लिए भी उत्तर प्रदेश महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक 'इण्डिका' में लिखा है कि जोबारेस (यमुना) तट के निवासी शूरसेनोई (वंश अथवा जाति) लोग शूरसेन (आधुनिक मथुरा) में हेराक्लीज (वासुदेव कृष्ण) की उपासना करते थे। इसी प्रकार गुप्त सम्राट स्कन्दगुप्त के गाजीपुर स्थित भीतरी अभिलेख में वासुदेव कृष्ण (शारंगिल) की पूजा के लिए गांव दान में देने का उल्लेख है।
गुप्तकाल में ही भारत के प्रथम शिखर युक्त मंदिर का निर्माण हुआ, जिसे देवगढ़ (ललितपुर जिला) के प्रसिद्ध दशावतार मंदिर के रूप में जाना जाता है। यहां शेष शैया पर विराजमान विष्णु की सुन्दर प्रतिमा स्थापित है। उत्तर प्रदेश में काशी, अयोध्या, मथुरा, प्रयागराज आदि भागवत (वैष्णव) धर्म के मुख्य केन्द्र रहे।
काशी और मथुरा उत्तर प्रदेश में शैव धर्म के मुख्य केन्द्र हैं। मेगस्थनीज के अनुसार शूरसेन (मथुरा) के निवासी 'डायनोसिस' (शिव) की पूजा करते थे।
प्रदेश के गोरखपुर में शैवधर्म के नाथ अथवा गोरक्ष सम्प्रदाय की नींव पड़ी, जो आज भी हठ योग की अपनी विशिष्टता के लिए दुनिया भर में जाना जाता है।
मौर्यकाल
मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य (321-297 ई. पू.) के पिता ने कोलिय गणराज्य अन्तर्गत रामग्राम (वर्तमान गोरखपुर जनपद) के निकट 'मोरिय' राज्य की स्थापना की थी। मोरिय राज्य की राजधानी पिप्प्लिवन उसी स्थान पर थी जहां आज गोरखपुर जनपद की राजधानी गांव है।
उत्तर प्रदेश में अशोक के अभिलेख
| स्थान |
अभिलेख |
| अहरौरा (मिर्जापुर) |
लघु शिलालेख |
| मेरठ |
वृहद स्तंभ लेख |
| प्रयाग |
वृहद स्तंभ लेख |
| सारनाथ |
लघु स्तंभ लेख |
| कौशाम्बी |
लघु स्तंभ लेख |
चाणक्य (विष्णुगुप्त/कौटिल्य) की सहायता से घनानन्द को पराजित कर चन्द्रगुप्त मौर्य मगध का सम्राट बना। उसके साम्राज्य में कोसल, काशी, पांचाल समेत आज का सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश समाहित था।
चन्द्रगुप्त मौर्य का एक 'ताम्रपत्र अभिलेख' (Copper Plate Inscription) गोरखपुर के दक्षिणी भाग 'सोहगौरा' (कौड़ीराम) में प्राप्त हुआ है। इसकी भाषा प्राकृत एवं लिपि ब्राह्मी है। इसमें अकाल के दौरान जनता के लिए अनाज के तीन कोठार बनवाने का उल्लेख है।
मौर्य वंश में चन्द्रगुप्त के बाद बिन्दुसार और फिर अशोक शासक हुए। कलिंग विजय के बाद अशोक ने दिग्विजय के स्थान पर 'धम्म विजय' की नीति का अनुसरण किया। इस दौरान उसने जनता तक अपने संदेश पहुंचाने के लिए 40 से अधिक शिलालेख एवं स्तम्भ लेख बनवाये।
उत्तर प्रदेश में सम्राट अशोक (273-232 ई.पू.) के 5 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। इन सभी अभिलेखों की भाषा प्राकृत एवं लिपि ब्राह्मी है। अशोक के स्तम्भ मथुरा और चुनार की पहाड़ियों से लाए गए लाल बलुआ पत्थरों (Red Sandstone) से निर्मित हैं। अशोक के मेरठ स्तम्भ लेख को सुल्तान फिरोजशाह तुगलक बाद में दिल्ली लेकर चला गया। सारनाथ स्तम्भ लेख के 'सिंहशीर्ष' (Lion Capital) को भारत के राजकीय चिन्ह के रूप में स्वीकार किया गया है। अशोक के अभिलेखों की खोज 1750 ई. में टी. पैंथलर ने की, जबकि इन्हें पढ़ने में सफलता सर्वप्रथम 1837 में जेम्स प्रिंसेप को मिली।
- अशोक के इलाहाबाद (प्रयागराज) अभिलेख को 'रानी का अभिलेख' कहा जाता है।
- अशोक के सारनाथ स्तंभ लेख एवं इलाहाबाद स्तंभ लेख में बौद्ध संघ में फूट डालने वाले भिक्षु एवं भिक्षुणियों के लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी है।
मौर्य सम्राट अशोक ने उत्तर प्रदेश में अनेक स्तूपों का निर्माण कराया। इनमें प्रमुख हैं- सारनाथ में प्राप्त धमेख एवं चौखंडी स्तूप। दोनों के निर्माण में ईंट और रोड़ी का बड़ी मात्रा में इस्तेमाल किया गया है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक ने चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण कराया था।
प्रयाग-प्रशस्ति लेख
प्रयाग-प्रशस्ति लेख को 'समुद्रगुप्त का इलाहाबाद स्तंभ लेख' भी कहा जाता है। इस लेख के आरम्भ में मौर्य सम्राट अशोक का लेख मिलता है, किंतु आगे चलकर समुद्रगुप्त के अमात्य हरिषेण ने इस पर अपने सम्राट के विजय अभियान का विस्तार से उल्लेख किया। यह ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में लिखा गया अभिलेख है। अभिलेख की प्रारंभिक पंक्तियां पद्यात्मक तथा बाद की गद्यात्मक हैं। गद्य और पद्य के इस मिश्रण के कारण इसे 'चम्पू शैली' कहा जाता है। अभिलेख पर समुद्र गुप्त के आर्यावर्त के 12 राज्यों, आटविक क्षेत्र के 18 राज्यों तथा दक्षिणापथ के 12 राज्यों पर विजय प्राप्त करने का उल्लेख है।
इस अभिलेख पर आगे चलकर मुगल सम्राट जहांगीर ने भी अपना लेख दर्ज कराया। पूर्व में यह अभिलेख कौशाम्बी में मौजूद था, जिसे बाद में अकबर ने मंगाकर प्रयागराज के किले में सुरक्षित करा दिया।
- मौर्य शासन अपने केन्द्रीय प्रशासन के लिए जाना जाता है। केन्द्रीय प्रशासन 18 विभागों में विभक्त था, जिसे तीर्थ कहते थे। समाहर्ता राजस्व विभाग और सन्निधाता कोष विभाग का अध्यक्ष था। कर्मान्तिक उद्योग विभाग का अध्यक्ष एवं अन्तर्वेशिक सम्राट के निजी सुरक्षा का जिम्मेदार अधिकारी था। तीर्थ के मुखिया को अमात्य कहा जाता था।
- तीर्थ अनेक छोटे विभागों में विभक्त थे। पण्याध्यक्ष वाणिज्य विभाग का मुखिया तथा एग्रोनोमोई मार्ग निर्माण एवं राजस्व विभाग का अधिकारी था। रूप्यदर्शक मुद्रा निरीक्षक था।
मौर्योत्तर काल
मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ की हत्या कर पुष्यमित्र शुंग 185 ई.पू. में मगध का सम्राट बना। शुंग वंश के इस प्रथम शासक के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी उसके 'अयोध्या अभिलेख' से प्राप्त होती है। इस अभिलेख में बताया गया है कि पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ कराये थे।
- पुष्य मित्र शुंग के अश्वमेध यज्ञ के पुरोहित थे- पंतजलि, जिन्होंने 'महाभाष्य' नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की। पुष्यमित्र शुंग के अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख कालीदास के नाटक मालविकाग्निमित्रम् में भी मिलता है।
- मालविकाग्निमित्रम् में मालविका और अग्निमित्र (पुष्यमित्र शुंग का पुत्र और उत्तराधिकारी) की प्रणयकथा वर्णित है।
पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में यूनानी (यवन) शासक डिमिट्रियस ने अपने सेनापति मिनाण्डर (मिलिन्द) के साथ भारत पर आक्रमण किया, किन्तु पराजित होकर उसे वापस लौटना पड़ा। बाद में डिमिट्रियस और मिनाण्डर ने भारत के पश्चिमोत्तर सीमा पर 'साकल' (वर्तमान स्यालकोट) को राजधानी बनाकर शासन किया। हिन्द-यवन (Indo-Greek) शासक के रूप में प्रसिद्ध इन्हीं राजाओं ने भारत में पहली बार 'मानक स्वर्ण सिक्के' (स्टेटर) जारी किए।
शुंग शासन के बाद 73 ई.पू. में कण्व वंश की सत्ता स्थापित हुई। कण्व वंश के चार राजाओं ने कुल 45 वर्ष तक शासन किया। इसी समय 71 ई.पू. में भारत पर शकों का प्रथम आक्रमण हुआ। इस घटना के चौदह वर्ष बाद 57 ई.पू. में मालवा (उज्जैन) के राजा विक्रमादित्य ने शकों को भारत से खदेड़ कर 'विक्रम संवत' की स्थापना की।
भारत पर शकों का दूसरा आक्रमण 78 ई. में हुआ। इस विजय के उपलक्ष्य में शकों ने 78 ई. में शक संवत की स्थापना की। शकों ने अपनी सत्ता मथुरा, पंजाब, उज्जयनी और महाराष्ट्र में स्थापित की। इसी क्रम में कुषाण शासक कनिष्क ने पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) से शासन करते हुए मथुरा को अपनी 'द्वितीय राजधानी' बनाया। कनिष्क ने मथुरा में 'खरपल्लान' और वाराणसी में 'वनस्पर' को अपना राज्यपाल नियुक्त किया था। इसने भारत में सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के जारी किये।
कनिष्क द्वारा कश्मीर के कुण्डलवन में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन वसुमित्र की अध्यक्षता में की गयी। यहीं पर बौद्ध धर्म 'हीनयान' और 'महायान' नामक दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया।
कनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध के अतिरिक्त यूनानी, पारसी एवं वैदिक देवताओं के भी चित्र मिले हैं। भारत में मूर्ति बनाने की कला 'मथुरा शैली' और 'गांधार शैली' इसी काल में शुरू हुई। सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्ति का निर्माण इसी काल में मथुरा शैली में हुआ।
शुंग और कण्व वंश के बाद आंध्र सातवाहन एवं इक्ष्वाकु वंश का शासन हुआ। सातवाहन वंश के गौतमी पुत्र शातकर्णी ने शकों के क्षहरात वंश को पराजित कर पुनः अपने वंश की स्थापना की।
इक्ष्वाकु वंश के शासकों को पुराणों में 'श्री पर्वतीय' तथा 'आंध्रभृत्य' कहा गया है।
विक्रम संवत
भारत पर शकों का प्रथम आक्रमण 71 ई.पू. हुआ, जिसका वर्णन जैन ग्रंथ 'कालकाचार्य कथनम' में प्राप्त होता है। इसके अनुसार शकों ने उज्जैन के राजा गर्दभिल्ल को मार कर समूचे मध्य भारत पर कब्जा कर लिया। शकों का शासन काफी क्रूरतापूर्ण एवं हिंसक था।
शकों के इस आक्रमण के 14 वर्ष बाद, 57 ई.पू. में गर्दभिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य ने भारतीय राजाओं का एक संघ बनाकर शकों को पराजित कर खदेड़ने का काम किया। इस सफलता के उपलक्ष में विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में 'विक्रम संवत' की स्थापना की।
शक संवत्
'विक्रम संवत' की स्थापना के 135 वर्ष बाद 78 ई. में शकों ने भारत पर दूसरा आक्रमण किया, जिसमें उन्हें व्यापक सफलता प्राप्त हुई। इस सफलता के उपलक्ष में 78 ई. में 'शक संवत्' की स्थापना हुई।
'विक्रम संवत' और 'शक संवत' के मध्य 135 वर्ष का अंतराल है।
इतिहासकारों का मानना है कि भारत पर शकों के द्वितीय आक्रमण का नेतृत्व कुषाण शासक कनिष्क ने किया, जिसने मथुरा को अपनी द्वितीय राजधानी तथा वाराणसी को प्रांतीय शासन इकाई बनाया था।
भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर शक संवत पर आधारित है।
गुप्त शासनकाल
गुप्त वंश के वास्तविक संस्थापक चन्द्रगुप्त प्रथम (319-334 ई.) ने अपना राज्य प्रयाग से अयोध्या के बीच स्थापित किया। इसे गुप्त संवत (319 ई.) का संस्थापक भी माना जाता है। इसके 'राजा-रानी' प्रकार के स्वर्ण सिक्के प्राप्त हुए हैं। चन्द्रगुप्त प्रथम के पुत्र समुद्रगुप्त (335-375 ई.) ने सम्पूर्ण आर्यावर्त, दक्षिणापथ और आटविक क्षेत्र को जीतकर एक बड़े साम्राज्य की स्थापना की। समुद्रगुप्त के इस विजय अभियान का विवरण उनके 'प्रयाग प्रशस्ति' (स्तम्भ लेख) में मिलता है। विसेंट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को 'भारत का नेपोलियन' कहा है।
समुद्रगुप्त के सुयोग्य पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय (375-415 ई) ने भारत से शक शासन को समाप्त कर 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। इनके विजय अभियान का विवरण दिल्ली स्थित 'मेहरौली लौह स्तंभ' पर मिलता है। भागवत धर्म में गहरी आस्था रखने के कारण चन्द्रगुप्त द्वितीय ने 'परम भागवत' की उपाधि धारण की। साहित्य, विज्ञान, ज्योतिष, गणित एवं कला के क्षेत्र में तीव्र प्रगति के कारण अनेक विद्वान इस शासनकाल को 'स्वर्ण युग' कहते हैं।
- कालीदास चन्द्रगुप्त द्वितीय के 'नवरत्नों' में शामिल थे। चीनी यात्री 'फाह्यान' इन्हीं के शासनकाल में भारत आया और 'फा-क्यों-की' नामक पुस्तक की रचना की।
- गुप्त वंश के अंतिम प्रभावशाली शासक स्कंदगुप्त का 'भीतरी स्तंभ लेख' गाजीपुर के सैदपुर तहसील में स्थित है। इसमें भारत पर हूणों के प्रथम आक्रमण और स्कन्दगुप्त द्वारा उन्हें पराजित किये जाने का उल्लेख है। हूणों के आक्रमण का नेता 'खुशनवाज' था।
- भारत में 'शिखर युक्त मंदिरों' का निर्माण गुप्तकाल में आरम्भ हुआ। इसका सुन्दर उदाहरण है- देवगढ़ (ललितपुर) का दशावतार मंदिर। कानपुर में ईंटों से निर्मित 'भितरगांव का मंदिर' इसी काल का है।
पुष्यभूति वंश
सातवीं शताब्दी में उत्तर भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक पुष्यभूति वंश का हर्षवर्धन हुआ। यह मूलतः थानेश्वर (हरियाणा का अम्बाला क्षेत्र) का शासक था, किंतु बहनोई मौखरी नरेश ग्रहवर्मा की मालव नरेश देवगुप्त द्वारा हत्या किये जाने और बहन राजश्री के गृह एवं राज्य त्याग के बाद इसने कन्नौज की सत्ता संभाली। हर्षवर्धन ने अपनी राजधानी थानेश्वर से बदलकर कन्नौज कर ली। इसके साथ ही उत्तर भारत की राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र उत्तर प्रदेश का नगर कन्नौज बन गया।
हर्षवर्धन धर्मशील होने के साथ-साथ साहित्य एवं कला का प्रेमी था। इसके दरबारी कवि बाणभट्ट ने 'हर्षचरितम्' नामक ग्रन्थ की रचना की, जिससे तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम, प्रशासन और समाज की विस्तृत जानकारी मिलती है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया और 629 से 645 ई. तक यहां रहकर उसने बौद्ध धर्म का अध्ययन किया। उसने अपनी पुस्तक 'सी-यू-की' में भारत यात्रा का विवरण प्रस्तुत किया है।
ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में 'भारत' के लिए इन-तू (थियेन-तुन) शब्द का प्रयोग किया है।
हर्षवर्द्धन शासन के प्रत्येक पांचवें वर्ष प्रयाग में 'मोक्ष परिषद' का आयोजन करता था, जहां बुद्ध के अतिरिक्त शिव और सूर्य की भी पूजा की जाती थी। इस अवसर पर सम्राट पांच वर्षो में प्राप्त अपनी समस्त सम्पत्ति दान में दे देता था। ह्वेनसांग इस तरह के एक 'मोक्ष परिषद' में शामिल हुआ था।
हर्ष ने प्रयाग और कन्नौज में बौद्ध सम्मेलनों का आयोजन कराया था।
ह्वेनसांग के अनुसार मथुरा अपनी विद्वता और नैतिक आचरण के लिए विख्यात था। कन्नौज एक समृद्ध नगर था। इसे 'महोदयश्री' नाम से पुकारा जाता था। थानेश्वर 'अभिचार क्रिया' के लिए प्रसिद्ध था।
सम्राट हर्ष के साम्राज्य की सीमा कश्मीर से असम और दक्षिण में नर्मदा तट तक फैली थी। नेपाल भी इसके अधिकार क्षेत्र में था। चालुक्य सम्राट पुलकेशिन द्वितीय के एहोल-प्रशस्ति में हर्ष को 'सकलोत्तरापथेश्वर' अर्थात् सम्पूर्ण उत्तर भारत का स्वामी कहा गया है।
त्रिदलीय संघर्ष
हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद आठवीं शताब्दी की शुरूआत में कन्नौज पर यशोवर्मन का आधिपत्य हो गया। कुछ ही समय पश्चात कन्नौज पर अधिकार के लिए तीन शक्तिशाली राज्यों गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट के मध्य त्रिदलीय संघर्ष आरम्भ हो गया। यह संघर्ष दसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक चला।
त्रिदलीय संघर्ष में भाग लेने वाले प्रमुख राजा थे- पाल वंश के धर्मपाल, देवपाल, विग्रहपाल, नारायण पाल, गुर्जर-प्रतिहार वंश के वत्सराज, नागभट्ट द्वितीय, रामभद्र, मिहिरभोज तथा महेन्द्रपाल, राष्ट्रकूट वंश के ध्रुव, गोविन्द तृतीय, अमोघवर्ष प्रथम तथा कृष्ण द्वितीय।
लगभग 200 वर्षों तक चले इस युद्ध में गुर्जर प्रतिहारों की विजय हुई।
- गुर्जर-प्रतिहार वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक मिहिर भोज अथवा भोज प्रथम (836-889 ई.) हुआ। इसने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया। कला, साहित्य और धर्म को संरक्षण प्रदान किया।
- मिहिरभोज के अभिलेखों और सिक्कों पर उसकी उपाधि 'आदि वाराह' उत्कीर्ण है। वह वैष्णव धर्म का संरक्षक था।
- मिहिर भोज के शासनकाल में भारत आया अरब यात्री सुलेमान इसकी सेनाबल की प्रशंसा करते हुए इसे 'इस्लाम' का सबसे बड़ा शत्रु' कहता है।
गहड़वाल एवं चन्देल वंश
गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद 1080 ई. में चन्द्रदेव ने 'कन्नौज' में गहड़वाल वंश की स्थापना की। गोविन्द चन्द्र (1114-1154 ई.) इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक हुआ।
इसने अपने साम्राज्य की सीमा उत्तर प्रदेश से आगे बढ़ाकर मगध (बिहार) एवं मालवा (मध्य प्रदेश) तक विस्तृत कर लिया। युवराज रहते हुए इसने गजनी के शासक महमूद तृतीय को पराजित किया था। तुर्कों से काशी की रक्षा करने के कारण इसकी रानी कुमारदेवी ने अपने 'सारनाथ अभिलेख' में इसे 'हरि का अवतार' कहा है। गहड़वाल शासकों को 'काशी नरेश' कहा गया है।
गहड़वाल वंश का अंतिम शासक जयचन्द्र (1170-1193 ई.) दिल्ली-अजमेर के चौहान नरेश पृथ्वीराज तृतीय (पृथ्वीराज चौहान) का समकालीन था। जयचन्द्र के दरबार में प्रसिद्ध दार्शनिक एवं संस्कृत कवि 'श्री हर्ष' रहता था, जिसने 'नैषधचरित' नामक महाकाव्य की रचना की। इस ग्रन्थ में नल और दमयन्ती की प्रणयकथा प्रस्तुत की गयी है। मुहम्मद गोरी ने 1193 में चन्दावर (इटावा) के युद्ध में जयचन्द्र को पराजित कर उसकी हत्या कर दी।
- गुर्जर प्रतिहारों के पतन के साथ ही बुन्देलखण्ड में चन्देल वंश की स्थापना हुई। इस वंश के शासकों ने खजुराहो को अपनी राजधानी बनाया। यशोवर्मन, धंगदेव और विद्याधर इस वंश के पराक्रमी शासक हुए। धंगदेव के शासनकाल में खजुराहो के विश्वविख्यात मंदिर का निर्माण हुआ।
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