उत्तर प्रदेश की जनजातियां एवं उनकी समस्याएं
उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत केवल इसके ऐतिहासिक स्मारकों में ही नहीं, बल्कि उन घने जंगलों और तराई क्षेत्रों में भी बसती है, जहाँ सदियों से हमारी जनजातियां निवास कर रही हैं। प्रकृति को अपना सर्वस्व मानने वाले थारू, बुक्सा, गोंड और खरवार जैसे जनजातीय समुदायों की अपनी एक अलग ही अनूठी दुनिया और जीवंत लोक-परंपराएं हैं। इस विस्तृत लेख में हम उत्तर प्रदेश की प्रमुख जनजातियों के वैभवशाली इतिहास, उनकी अद्भुत जीवनशैली और उनके सामने खड़ी अशिक्षा, ऋणग्रस्तता व भूमि हस्तांतरण जैसी गंभीर चुनौतियों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
उत्तर प्रदेश में जनजातियां: एक दृष्टि (2011)
जनसंख्या के आँकड़े
- यूपी में कुल ST आबादी: 0.6%
- कुल ST जनसंख्या: 11,34,273
- भारत की कुल ST का: 1.09%
- अयोध्या और जालौन में कोई जनजाति नहीं है।
सर्वाधिक जनसंख्या वाले जिले
- 1. सोनभद्र (3,85,018) | 20.7%
- 2. बलिया (1,10,114)
- 3. देवरिया (1,09,894)
- 4. कुशीनगर (80,269)
- 5. ललितपुर (71,610)
न्यूनतम जनसंख्या वाले जिले
- 1. बागपत (14)
- 2. कन्नौज (15)
- 3. बदायूं (58)
- 4. एटा (140)
- 5. कासगंज/औरैया (150)
जनजाति मान्यता का कालक्रम (Chronology)
सन् 2000 से पूर्व
अविभाजित UP में केवल 5 जनजातियां मान्यता प्राप्त थीं।
अविभाजित UP में केवल 5 जनजातियां मान्यता प्राप्त थीं।
नवम्बर 2000
विभाजन। अधिकांश जनजातियां उत्तराखण्ड चली गईं।
विभाजन। अधिकांश जनजातियां उत्तराखण्ड चली गईं।
सन् 2002
संशोधन विधेयक द्वारा 10 नई जातियों को ST का दर्जा।
संशोधन विधेयक द्वारा 10 नई जातियों को ST का दर्जा।
वर्तमान स्थिति
यूपी में कुल 15 अधिसूचित जनजातियां हैं।
यूपी में कुल 15 अधिसूचित जनजातियां हैं।
प्रमुख जनजातियों का तुलनात्मक विवरण
गौंड / गोंड (सबसे बड़ा समूह)
- आबादी: 5,69,035 (सर्वाधिक)
- नस्ल व परिवार: आस्ट्रोलायड नस्ल, द्रविड़ परिवार।
- निवास: महराजगंज, गोरखपुर, बलिया, सोनभद्र आदि।
थारू (तराई क्षेत्र)
- वंश: किरात वंशज, कद में छोटे, चौड़ा मुख।
- विवाह प्रथा: 'बदला विवाह', विधवा विवाह ('लठभरवा' भोज)।
- त्योहार: दीपावली को शोक पर्व के रूप में मनाते हैं।
- योजना: 'थारू विकास परियोजना' (2 अक्टूबर)।
बुक्सा / भोक्सा
- निवास: मुख्य रूप से बिजनौर (बुक्सार क्षेत्र)।
- समाज: 'पटवार' राजपूत वंशज। पितृसत्तात्मक परिवार। स्त्रियों की दशा अच्छी।
- विवाह: क्रय-विवाह ('मालगति')। यह एक अनुबंध है।
- पंचायत: तख्त (सर्वोच्च), दरोगा, मुन्सिफ, सिपाही।
खरवार एवं माहीगीर
- खरवार: मिर्जापुर, सोनभद्र में निवास। शरीर से बलिष्ठ। 'करमा' इनका परम्परागत नृत्य है।
- माहीगीर: बिजनौर क्षेत्र। पेशे से मछुआरे। इस्लाम धर्म के अनुयायी। महाभारत में इनका उल्लेख है।
जनजातियों की समस्याएं और समाधान
प्रमुख समस्याएं:
- अशिक्षा और भयंकर ऋणग्रस्तता (साहूकारों द्वारा शोषण)।
- तराई क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण (थारू और भोक्सा सबसे अधिक शिकार)।
- वन सुरक्षा नीति के कारण जंगलों से विस्थापन (खरवार)।
- पारंपरिक पेशों का खात्मा (जैसे माहीगीरों के लिए तालाबों की कमी)।
सरकारी प्रयास व संरक्षण:
- SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989: 30 जनवरी 1990 से लागू।
- PESA Act 1996: ग्राम सभाओं को प्रथागत रीतियों के संरक्षण की शक्ति।
- जनजातीय संग्रहालय: मिर्जापुर, सोनभद्र और महराजगंज में स्थापना को मंजूरी।
संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Safeguards)
| अनुच्छेद (Article) | प्रावधान (Provision) |
|---|---|
| अनुच्छेद 15 (4) | अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए राज्य के विशेष उपबंध। |
| अनुच्छेद 16 (4) | राजकीय सेवाओं और नौकरियों में आरक्षण। |
| अनुच्छेद 46 | शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा, शोषण से संरक्षण। |
| अनुच्छेद 244 | अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के प्रशासन एवं नियंत्रण से संबंधित उपबंध। |
| अनुच्छेद 275 (1) | ST बाहुल्य क्षेत्रों में विकास योजनाओं के लिए विशेष अनुदान। |
| अनुच्छेद 330 व 332 | क्रमशः लोकसभा और राज्य विधान सभाओं में स्थानों का आरक्षण। |
| अनुच्छेद 338 (A) | राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन। |
- जनगणना 2011 के अनुसार उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या में अनुसूचित जनजाति (ST) की उपस्थिति 0.6 प्रतिशत है।
- जनगणना 2011 के अनुसार उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 11,34,273 है, जिसमें 5,81,083 पुरुष एवं 5,53,190 महिलाएं हैं।
- भारत की कुल अनुसूचित जनजातियों की संख्या का 1.09 प्रतिशत भाग उत्तर प्रदेश में पाया जाता है।
- सन् 2000 से पूर्व अविभाजित उत्तर प्रदेश में मात्र पाँच जनजातियाँ मान्यता प्राप्त थीं- थारू, बोक्सा भोटिया, जौनसारी (खस) और राजी।
- नवम्बर, 2000 में राज्य के विभाजन के बाद उक्त पांच जनजातियों की बड़ी संख्या उत्तराखण्ड राज्य में चली गई। मात्र दो जनजातियों थारू और बुक्सा के कुछ सदस्य उत्तर प्रदेश में रह गए।
- सन् 2002 में ‘‘अनुसूचित जातियां एवं अनुसूचित जनजातियां आदेश (दूसरा संशोधन) विधेयक 2002’’ पारित कर दस जातियों को ‘अनुसूचित जनजाति’ का दर्जा प्रदान किया गया। यह जनजातियां हैं - गोंड, चेरो, भुइया या भूनिया, पटारी, खैरवार, पहरिया, बैगा, पनखा या पनिका, सहरिया एवं अगरिया।
- उत्तर प्रदेश के पांच सर्वाधिक अनुसूचित जनजाति जनसंख्या वाले जिले हैं - सोनभद्र (3,85,018), बलिया (1,10,114), देवरिया (1,09,894), कुशीनगर (80,269), ललितपुर (71,610)।
- उत्तर प्रदेश के पांच न्यूनतम अनुसूचित जनजाति जनसंख्या वाले जिले हैं - बागपत (14), कन्नौज (15), बदायूं (58), एटा (140), कासगंज (150) एवं औरैया (150)।
- प्रदेश के पांच सर्वाधिक अनुसूचित जनजाति प्रतिशतता वाले जिले हैं- सोनभद्र (20.7%) ललितपुर (5.9%), देवरिया (3.5%), बलिया (3.4%), कुशीनगर (2.3%)।
- प्रदेश के न्यूनतम अनुसूचित जनजाति प्रतिशतता वाले 5 जिले हैं- बागपत (0.001%), कन्नौज (0.001%), बदायूं (0.002%), बुलंदशहर (0.006%), मुजफ्फरनगर (0.008%)। वर्तमान में कुल 15 जनजातियां उत्तर प्रदेश में अधिसूचित हैं।
- उत्तर प्रदेश के अयोध्या और जालौन जिलों में एक भी जनजाति प्राप्त नहीं होती।
- उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जनजाति समूह गोंड है। जनगणना 2011 के अनुसार राज्य में इनकी संख्या 5,69,035 है।
- गोंड समूह के पश्चात उत्तर प्रदेश में जनजातियों का सबसे बड़ा समूह खरवार (1,60,676) तथा थारू (1,05,291) हैं।
प्रदेश में प्रमुख जनजातियां एवं उनकी समस्याएं
गौंड/गोंड
गौंड उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक बड़ी जनजाति समूह (5,69,035) है। यह प्रदेश के महराजगंज, बस्ती, गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, देवरियां, मऊ, जौनपुर, आजमगढ़, वाराणसी, गाजीपुर, बलिया और सोनभद्र समेत कई जिलों में निवास करती है। यह आस्ट्रोलायड नस्ल तथा द्रविड़ परिवार की एक जनजाति है।
थारू
थारू उत्तर प्रदेश की सर्वप्रमुख जनजाति समूह है। इस जनजाति के लोग उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र गोरखपुर, महराजगंज, लखीमपुर, श्रावस्ती, बहराइच जिलों में निवास करते हैं। उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त यह उत्तराखण्ड के नैनीताल तथा बिहार के चम्पारण एवं दरभंगा जिलों में भी कुछ संख्या में पायी जाती है।
- थारू किरात वंशज (Kirat Dynasty) हैं और कई जातियों और उपजातियों में विभाजित हैं।
- थारू जनजाति के लोग कद में छोटे, पीले वर्ण, चौड़े मुखमण्डल वाले होते हैं।
- इनके उद्भव के विषय में विद्वानों में मतभेद है। एक वर्ग इन्हें राजपूतों का वंशज मानता है जबकि कुछ अन्य लोग इनका उद्गम मध्य एशिया के मूल निवासी मंगोलों से बताते हैं।
- थारू अपना मकान बनाने के लिये लकड़ी के लट्ठों और नरकुल आदि का प्रयोग करते हैं। इनके घर की दीवारें मिट्टी की नहीं होतीं।
- थारू पुरुष लंगोटी की तरह धोती लपेटते हैं और बड़ी चोटी रखते हैं। स्त्रियां रंगीन लहंगा, चोली, ओढ़नी और बूटेदार वस्त्र पहनती हैं। शरीर पर गुदना गुदवाना एवं आभूषण पहनना यह पसंद करती हैं।
- थारूओं का मुख्य भोजन चावल और मछली है। यह मछली, दूध, दही तथा जंगलों से आखेट किये जन्तुओं का मांस भी खाते हैं। भोजन को समयानुसार अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। सुबह के नाश्ते को कलेवा, दोपहर का भोजन मिझनी तथा शाम के भोजन को बेरी कहा जाता है।
- मदिरा, थारूओं का प्रमुख पेय है, जिसे वे सभी अवसरों पर प्रयोग करते हैं। चावल से निर्मित जाड़ नामक मदिरा इनके बीच काफी लोकप्रिय है।
- थारू जनजाति के लोग संयुक्त परिवार में रहते हैं। तराई क्षेत्र में कुछ ऐसे परिवार मिलते हैं, जिनके पारिवारिक सदस्यों की संख्या पाँच सौ तक होती है। परिवार का वृद्ध व्यक्ति पूरे कुल का मुखिया होता है।
- थारूओं में बदला विवाह (अर्थात बहनों के आदान-प्रदान) प्रथा प्रचलित है, यद्यपि यह प्रथा तेजी से समाप्त हो रही है। इन लोगों का विवाह फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में होता है।
- थारूओं में विधवा विवाह की प्रथा है। विधवा का पिता विवाह के समय जो भोज देता है उसे 'लठभरवा' कहा जाता है। दोनों पक्षों से विवाह तय हो जाने को पक्की जोड़ी कहा जाता है।
- थारू हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। महादेव, भैरव, देवी काली तथा राम-कृष्ण इनके प्रमुख आराध्य हैं। पूजा के लिए बांस के शिवलिंग का प्रयोग करते हैं।
- थारू भूत-प्रेत, जादू-टोना में विश्वास रखते हैं। पीपल समेत कई वृक्षों तथा गाय, बन्दर सांप आदि की भी इस समुदाय में पूजा की जाती है।
- थारू जनजाति के लोग मकर संक्रांति, होली, कन्हैया अष्टमी (जन्माष्टमी), दशहरा बजहर/बजहरा आदि हिन्दुओं के सभी त्योहार मनाते हैं।
- थारू दीपावली को शोक पर्व के रूप में मनाते हैं।
- थारू लोग होली का पर्व फाल्गुन की पूर्णिमा से लेकर आठ दिनों तक मनाते हैं। इस अवसर पर स्त्री-पुरुष मदिरापान करते हैं।
- थारू जनजाति को शिक्षित करने हेतु लखीमपुर खीरी में एक महाविद्यालय की स्थापना की गई है।
- थारू जनजाति के विकास हेतु प्रदेश सरकार द्वारा 2 अक्टूबर को 'थारू विकास परियोजना' प्रारंभ की गई है।
बुक्सा/भोक्सा
बुक्सा अथवा भोक्सा उत्तर प्रदेश की प्रमुख अनुसूचित जनजातियों में से एक है। यह प्रदेश के बिजनौर जिले में छोटी-छोटी ग्रामीण बस्तियों में निवास करती है। जिन क्षेत्रों में यह निवास करते हैं उसे बुक्सार या भोक्सार कहा जाता है।
- बुक्सा जनजाति के लोग कद में छोटे और मध्यम, चौड़ी मुखाकृति, छोटी आंख, भारी पलकें, चपटी नाक वाले होते हैं। साधारणतया पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ देखने में आकर्षक और सुन्दर होती हैं। इनका चेहरा मंगोल जैसा होता है।
- बुक्सा जनजाति की भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी है।
- इस जनजाति का संबंध 'पटवार' राजपूत घराना से माना जाता है। विलियम क्रुक ने बुक्सा जनजाति को राजपूतों का वंशज माना है।
- इस जनजाति में क्रय-विवाह पद्धति प्रचलित है। वधू प्राप्त करने के लिये वधु का मूल्य देना होता है। वधू के लिए जो धनराशि वर पक्ष द्वारा कन्या पक्ष को दी जाती है उसे 'मालगति' कहते हैं।
- बुक्सा जनजाति में विवाह एक अनुबंध है। यहाँ विधवा विवाह एवं बहुपत्नी प्रथा प्रचलन में है।
- इनमें विवाह प्रायः अधिक आयु (कन्या 18-20 वर्ष तथा वर 20-24 वर्ष) में किए जाते हैं।
- बुक्सा जनजाति में रक्त संबंध में विवाह वर्जित है।
- इनका परिवार पितृसत्तात्मक एवं पितृवंशीय होता है। परिवार का ज्येष्ठ पुरुष ही सत्तासम्पन्न मुखिया होता है।
- इस जनजाति में संयुक्त तथा वैयक्तिक दोनों प्रकार के परिवार पाये जाते हैं।
- बुक्सा जनजाति की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर निर्भर होती है। यह धान की खेती करते हैं। भोजन में चावल-मछली पसंद करते हैं।
- बुक्सा जनजाति में स्त्रियों की दशा अच्छी है। स्त्रियों को समाज में बराबरी और पुरुषों के साथी के रूप में सम्मान प्राप्त होता है।
- बुक्सा जनजाति शादी, तलाक एवं आपसी विवाद अपनी बिरादरी की पंचायत में सुलझाते हैं। पंचायत का सर्वोच्च अधिकारी तख्त (निष्पक्ष फैसलाकर्ता) कहलाता है। दरोगा (दण्ड देने वाला), मुन्सिफ (छानबीनकर्ता) तथा सिपाही (सूचनावाहक) उसके अधीन कार्य करते हैं।
- बुक्सा जनजाति में कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। काशीपुर की चामुंडा देवी इनमें प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त महादेव, काली, दुर्गा तथा राम, कृष्ण की भी पूजा होती है। ईसाइयों के समान यह क्रिसमस के अवसर पर 25 दिसंबर को बड़ा दिन भी मनाते हैं।
- बुक्सा जनजाति के पुरुष धोती, कुर्ता एवं सदरी पहनते हैं, जबकि महिलाएं लहंगा, चोली एवं ओढ़नी पहनना पसंद करती हैं। नई पीढ़ी के युवा आधुनिक परिधान अपनाने लगे हैं।
- इस समाज के लोग नौकरी करने की अपेक्षा कृषि एवं पशुपालन करना अधिक पसंद करते हैं।
- बुक्सा जनजाति में भू-अतिक्रमण तथा ऋणग्रस्तता की समस्या गंभीर है। इसके अतिरिक्त पेयजल, स्वास्थ्य, सफाई एवं सुगम यातायात आदि की समस्या से यह समाज ग्रस्त है।
- इस समाज की प्रगति एवं खुशहाली के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सन् 1983-84 में 'बुक्सा जनजाति विकास परियोजना' प्रारंभ की गई।
अनुसूचित जनजातियां
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग उत्तर प्रदेश तथा केन्द्र सरकार के जनजाति मंत्रालय के अनुसार निम्नलिखित 15 अनुसूचित जनजातियां हैं -
- थारू
- बोक्सा
- भोटिया
- राजी
- जौनसारी
- गोंड, धूरिया, नायक, ओझा, पठारी, राजगोंड (जिला महराजगंज, सिद्धार्थ नगर, बस्ती, गोरखपुर, देवरिया, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी, मिर्जापुर, और सोनभद्र में)
- खरवार, खैरवार (जिला देवरिया, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और सोनभद्र में)
- सहरिया (जिला ललितपुर में)
- पहड़िया (जिला सोनभद्र में)
- बैगा (जिला सोनभद्र में)
- पंखा, पनिका (जिला सोनभद्र और मिर्जापुर में)
- अगरिया (जिला सोनभद्र में)
- पतरी (जिला सोनभद्र में)
- चेरो (जिला सोनभद्र और वाराणसी में)
- भुइया, भुईयां (जिला सोनभद्र में)
जनजातियों को 'अनुसूचित जनजाति' क्यों कहा जाता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के अनुसार अनुसूचित जनजाति उन समुदायों को कहते हैं जो अनुच्छेद 342 में सूचीबद्ध हैं। वर्तमान में 700 से अधिक जनजातियां इस सूची में सम्मिलित हैं। संविधान के अनुच्छेद 342 में सूचीबद्ध (लिस्टेड) होने के कारण इन जनजातियों को 'अनुसूचित जनजाति' कहते हैं।
देश की जनसंख्या में 8.14 प्रतिशत होते हुए भी अनुसूचित जनजाति के लोग विकास की दौड़ में सबसे पीछे हैं। इनकी 52 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे निवास कर रही है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और परिवहन जैसी सुविधाओं से दूर होने के कारण अधिसंख्य जनजातियां जंगल अथवा पहाड़ को अपना प्राकृतिक निवास और वृक्षों पूर्वज मानती हैं। इनके अपने विशिष्ट सामाजिक रीति-रिवाज एवं पर्व-त्योहार हैं, जो सामान्यतः अन्य वर्ग से मेल नहीं खाते।
समाज की मुख्य धारा से कटे होने के कारण अनुसूचित जनजाति के लोगों का कई बार विभिन्न वर्गों द्वारा उत्पीड़न एवं शोषण होता है।
जनजातियों को इससे बचाने के लिए भारतीय संविधान में निम्नलिखित प्रावधान किये गये हैं -
- अनुच्छेद 15 (4): अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए राज्य विशेष उपबंध करेगा।
- अनुच्छेद 16 (4): राजकीय सेवाओं में आरक्षण
- अनुच्छेद 46: शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों के लिए विशेष प्रावधान, शोषण एवं सामाजिक अन्यास से संरक्षण।
- अनुच्छेद 244: अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के प्रशासन एवं नियंत्रण से संबंधित उपबंध।
- अनुच्छेद 275 (1): अनुसूचित जनजाति बाहुल्य क्षेत्रों में विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं के लिए विशेष अनुदान की व्यवस्था।
- अनुच्छेद 330: लोकसभा में स्थानों का आरक्षण
- अनुच्छेद 332: विधान सभाओं में स्थानों का आरक्षण
- अनुच्छेद 338 (A): राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन।
स्पष्ट है कि भारत के संविधान में अनुसूचित जनजातियों के उत्थान हेतु अनेक महत्वपूर्ण प्रावधान प्रतिष्ठापित किये गये हैं।
खरवार
- खरवार जनजाति मुख्यतः उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र, देवरिया, वाराणसी, गाजीपुर, बलिया तथा चंदौली जिलों में निवास करती है। इनका मूल निवास क्षेत्र पलामू (झारखण्ड) और अठारह हजारी क्षेत्र है। यह कई उपजातियों-सूरजवंशी, पटबंदी, दौलतबंदी, राउत, खेरी, मोंझयाली, मौगती, गोजूँ, अर्मिया आदि में विभाजित है।
- खरवार जनजाति के पुरुष शरीर से बलिष्ठ होते हैं। स्त्रियाँ भी पुरुषों की भाँति अच्छी कदकाठी युक्त और बहादुर होती हैं।
- खरवार जनजाति की भाषा व बोली पर प्रायः स्थानीय प्रभाव दिखाई देता है। इनकी वाणी में कर्कशता होती है। ये अनुनासिक ध्वनियों का प्रयोग करते हैं, जिसमें रे, तोर, मोर केकर, ओकर आदि शब्दों की अधिकता होती है।
- इस जनजाति के पुरुष साधारणतः घुटने तक धोती, बंडी/बनियान एवं सिर पर पगड़ी पहनते हैं। स्त्रियाँ साड़ी एवं आभूषण पहनती हैं।
- 'करमा' खरवार जनजाति का परम्परागत नृत्य है।
- खरवार जनजाति के प्रमुख देवता वनसन्ती, दूल्हादेव, घमसान, गोरइया, बघउस, शिव, दुर्गा, हनुमान आदि हैं। इनके अतिरिक्त यह वृक्षों एवं नाग-बिच्छू आदि की भी पूजा करते हैं। तंत्र-मंत्र में इनका अत्यधिक विश्वास है।
- खरवार जीवितपुत्रिका, अनंत चतुर्दशी, होली, नवरात्रि आदि पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इन पर्वों पर यह गायन एवं करमा नृत्य का आयोजन करते हैं।
माहीगीर
- माहीगीर जनजाति उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नजीबाबाद क्षेत्र में पायी जाती है। इसके अतिरिक्त यह सहारनपुर, मण्डवार, किरतपुर, जलालाबाद, मनेरा और धारानगर में भी पाये जाते हैं।
- पेशे से माहीगीर जनजाति मछुआरे हैं। इनका प्रमुख व्यवसाय मछली पकड़ना है, यद्यपि यह स्वयं को मछुआरा कहलाना पसंद नहीं करते।
- महाभारत में इस जनजाति का उल्लेख मिलता है।
- माहीगीर जनजाति के लोग इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं तथा विवाह अपने ही समुदाय में करते हैं।
- इस जनजाति में परिवार के सभी सदस्य चौका (रसोई) में एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह लोग स्प्रिट का प्रयोग शराब के रूप में करते हैं।
- माहीगीर जाति के समाज में पंचायतों का प्रचलन है। आपसी विवाद अथवा विवाह एवं तलाक का फैसला पंचायत में होता है, जिसमें बादशाह और वजीर जैसे पद निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ये पद वंशानुगत होते हैं।
प्रदेश में जनजातियों की समस्याएं
- उत्तर प्रदेश की जनजातियों में ऋणग्रस्तता गंभीर समस्या है। अधिकतर जनजातीय जनसंख्या अशिक्षित है, जिसके कारण इन्हें यह पता नहीं रहता कि ऋण लेते समय साहूकार या ठेकेदार अपने खातों में क्या प्रविष्टियाँ दर्ज करते हैं। इसके फलस्वरूप ये ऋण के बोझ से कभी उबर नहीं पाते।
- माहीगीर जनजाति के लोग परम्परागत मछुआरे हैं। नगरों और उपनगरों के निकट तालाबों की संख्या निरन्तर कम होने से इनका पेशा समाप्ति की ओर है। आर्थिक स्थिति खराब होने से इस समुदाय के लोग मजदूरी करने और रिक्शा चलाने को मजबूर हैं।
- जनजाति समुदाय में शिक्षा एवं जागरुकता का घोर अभाव है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भी यह कम विश्वास रखते हैं, जिससे अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का इन्हें सामना करना पड़ता है।
- माहीगीर सामूहिक रूप से स्प्रिट का प्रयोग शराब के रूप में करते हैं जो अल्पकाल में उनकी मौत का कारण बनती है।
- उत्तर प्रदेश की जनजातियों में भूमि हस्तांतरण की समस्या गंभीर है। यहाँ के तराई क्षेत्र की थारू और भोक्सा जनजातियाँ भूमि अधिग्रहण व हस्तांतरण की सबसे अधिक शिकार हुई है। पंजाबी जमींदारों, साहूकारों तथा व्यवसायियों ने इनका शोषण कर हजारों एकड़ भूमि हड़प ली है।
- खरवार जनजाति के लोग परम्परागत रूप से जंगलों पर आश्रित थे, किंतु नई वन सुरक्षा नीति के कारण इनके लिए वनों से लकड़ी काटना, पत्ते एवं दातून तोड़ना आदि कठिन हो गया है। अब इनके पास न अपनी कृषि भूमि है और न ही वनों का संरक्षण। इस स्थिति में इस समाज के लोग भिक्षाटन या मजदूरी करने को मजबूर हैं।
मिर्जापुर, सोनभद्र और महराजगंज में बनेंगे जनजातीय संग्रहालय
- उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र एवं महराजगंज में जनजातीय संग्रहालय बनेंगे।
- प्रदेश सरकार ने जनजातीय संग्रहालय की स्थापना हेतु मिर्जापुर में ग्राम अतरैला पांडेय, तहसील मड़िहान में 4.046 हेक्टेयर भूमि, जनपद सोनभद्र में ग्राम मारकुण्डी, तहसील राबर्ट्सगंज में 2.828 हेक्टेयर भूमि और महराजगंज में ग्राम कुंसरेवा, तहसील नौतनवां में 0.506 हेक्टेयर भूमि जो अद्यतन संस्कृति विभाग लखनऊ के पक्ष में आवंटित है, उसको समाज कल्याण विभाग के अधीन संचालित 'अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान' उत्तर प्रदेश, लखनऊ (TRI) के पक्ष में आवंटित किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
जनजातियों की स्थिति में सुधार हेतु सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद-366 (25) के अनुसार अनुसूचित जनजातियां वह आदिवासी समुदाय हैं जो अनुच्छेद 342 में अनुसूचित हैं। इन्हें यह दर्जा राष्ट्रपति द्वारा सम्बन्धित राज्य के राज्यपाल से परामर्श कर दिया जाता है।
- अनुसूचित जनजातियां परम्परागत रूप से जंगलों में रहने के कारण विकास की दौड़ में काफी पीछे हैं। अनेक जनजातियां जंगलों में विद्यमान वृक्षों को अपना पूर्वज मानती हैं, अतः उन्हें काटने का विरोध करते हुए अपने प्राचीन परम्पराओं एवं रीति-रिवाजों के संरक्षण का प्रयास करती हैं। इसके विपरीत, जंगल क्षेत्र में विद्यमान बेशकीमती प्राकृतिक संसाधनों के दोहन हेतु पूंजीपतियों एवं महाजनों द्वारा उन्हें विस्थापित करने का प्रयास किया जाता है।
- देश में अनुसूचित जनजातियों का जीवन आज भी बेहद कठिन और संकटपूर्ण है। उनकी स्थिति में सुधार के लिए भारत सरकार द्वारा अनेक गंभीर उपाय किये गये हैं, जिनमें दो मुख्य विधिक पहलें इस प्रकार हैं-
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
- पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 (PESA Act)
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 उत्तर प्रदेश समेत सम्पूर्ण भारत में 30 जनवरी 1990 से लागू है। इसमें प्रावधान किया गया है कि ऐसा कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जनजाति वर्ग का नहीं है, यदि इस वर्ग के किसी सदस्य के विरूद्ध अपमानजनक व्यवहार, जबर्दस्ती, दुर्व्यवहार अथवा किसी प्रकार क्षति पहुंचाने का कार्य करेगा तो उसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत न्यूनतम 6 माह और अधिकतम 5 वर्ष तक की सजा तथा जुर्माना से दण्डित किया जाएगा।
- अधिनियम में अनुसूचित जनजाति से सम्बद्ध पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक सहायता देने तथा मामलों को तेजी से निपटाने के लिए विशेष अदालतें स्थापित करने एवं विशेष लोक अभियोजक को निर्दिष्ट करने का भी प्रावधान है।
- अधिनियम में कुछ संशोधित प्रभावों के साथ सरकार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन, 2015 लागू किया है।
- पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 का उद्देश्य जनजातीय समुदाय को विशेषाधिकार देकर उनकी प्रथागत, धार्मिक और पारंपरिक रीतियों को संरक्षण प्रदान करना है। यह जनजातीय क्षेत्र की ग्राम सभाओं को शक्ति प्रदान करता है, जिससे वे लोगों की पारम्परिक प्रथाओं को संरक्षण, संवर्धन एवं सांस्कृतिक पहचान देते हुए उनके आपसी विवादों को प्रथागत तरीके से निपटाने में सक्षम हो सकें।
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