उत्तर प्रदेश की राजनैतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था | uttar pradesh ki rajnitik avn prashasnik vyavastha

उत्तर प्रदेश की राजनैतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था

ब्रिटिश काल के 'उत्तर-पश्चिम प्रांत' से लेकर आज के आधुनिक 'उत्तर प्रदेश' तक, इस राज्य के नाम और सत्ता के स्वरूप ने एक लंबा और ऐतिहासिक सफर तय किया है। आखिर यूपी का प्रशासनिक ढांचा कैसे काम करता है? राज्यपाल के पास कितनी शक्तियां होती हैं और मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद कैसे पूरे प्रदेश की बागडोर संभालते हैं? इस विस्तृत लेख में हम उत्तर प्रदेश की सम्पूर्ण राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था, इसके गौरवशाली इतिहास और कार्यपालिका के हर छोटे-बड़े पहलू पर प्रामाणिक और रोचक जानकारी लेकर आए हैं।
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उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक सफर (1836 - 1950)
1836
ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन 'उत्तर-पश्चिम प्रांत' (मुख्यालय: आगरा)
1858
1857 की क्रांति के बाद मुख्यालय आगरा से बदलकर प्रयागराज (इलाहाबाद) किया गया।
1877
अवध का विलय, नया नाम: 'उत्तर-पश्चिम प्रांत, आगरा एवं अवध'
1902
नाम परिवर्तित कर 'संयुक्त प्रांत आगरा एवं अवध' किया गया।
1921
'गवर्नर का प्रांत' घोषित। राजधानी प्रयागराज से लखनऊ स्थानांतरित।
1937
नाम संक्षिप्त कर 'संयुक्त प्रांत' (United Provinces) किया गया।
24 जनवरी, 1950
आधुनिक नाम 'उत्तर प्रदेश' अस्तित्व में आया।
उत्तर प्रदेश शासन प्रणाली का ढांचा
भारतीय संविधान (भाग-6) : राज्य शासन
विधायिका
(कानून बनाना)
कार्यपालिका
(कानून लागू करना)
न्यायपालिका
(न्याय व्यवस्था)
⬇ (कार्यपालिका संरचना) ⬇
राज्यपाल (संवैधानिक प्रमुख)
मुख्यमंत्री (वास्तविक प्रमुख)
राज्य मंत्रिपरिषद
महाधिवक्ता
वर्तमान प्रशासनिक इकाइयां (एक नज़र में)
मंडल (कमिश्नरी)
18
जिले
75
तहसील
351
विकास खण्ड
826
नगर निगम
17
ग्राम पंचायत
59,073
राज्यपाल पद पर विभिन्न समितियों की सिफारिशें
समिति / आयोग गठन वर्ष प्रमुख सिफारिशें (निष्कर्ष)
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (मोरार जी देसाई) 1966 राज्यपाल पद पर अराजनैतिक व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए।
राजमन्नार समिति (तमिलनाडु सरकार) 1970 अनुच्छेद 356 व 357 का विलोपन हो। नियुक्ति में राज्यों को शामिल किया जाए और राज्यपाल एक ही बार पद धारण करे।
सरकारिया आयोग 1980
(रिपोर्ट 1988)
राज्यपाल की नियुक्ति मुख्यमंत्री के परामर्श से होनी चाहिए।
पुंछी आयोग (न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी) 2005 अंतर्राज्यीय परिषद द्वारा तैयार सूची के आधार पर ही राज्यपाल की नियुक्ति की जाए।
मंत्रिपरिषद की श्रेणियां
कैबिनेट मंत्री

यह राज्य सरकार की वास्तविक कार्यकारिणी होती है। नीति निर्धारण में सर्वाधिक योगदान इन्हीं का होता है। ये विभिन्न समितियों के माध्यम से महत्वपूर्ण निर्णय लेते हैं।

राज्यमंत्री

ये द्वितीय श्रेणी के मंत्री होते हैं। इन्हें कैबिनेट मंत्रियों के सहयोग के लिए नियुक्त किया जाता है या कुछ मामलों में स्वतंत्र प्रभार भी दिया जा सकता है।

उपमंत्री

ये तृतीय श्रेणी के मंत्री हैं, जो कैबिनेट एवं राज्यमंत्रियों को उनके प्रशासनिक और संसदीय कार्यों में सहायता प्रदान करते हैं।


नामकरण एवं राजधानी

ईस्ट इंडिया कंपनी शासन के आरम्भिक दिनों में वर्तमान उत्तर प्रदेश और आस-पास के क्षेत्रों पर बंगाल प्रेसीडेंसी, दिल्ली और अवध के नवाबों का नियंत्रण था। जून, 1836 में यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन 'उत्तर-पश्चिम प्रांत' (North-Western Provinces) के रूप में परिवर्तित हो गया, जिसका मुख्यालय आगरा था। वर्ष 1856 में डलहौजी ने अवध पर आधिपत्य कर इसे कंपनी का हिस्सा बना दिया।
1857 की क्रांति के बाद 1858 में दिल्ली परिक्षेत्र को 'उत्तर-पश्चिम प्रांत' से बाहर करते हुए इसका मुख्यालय आगरा से बदल कर प्रयागराज (इलाहाबाद) कर दिया गया। वर्ष 1877 में 'उत्तर-पश्चिम प्रांत' और 'अवध' का आपस में विलय करते हुए इस सम्पूर्ण क्षेत्र का नाम 'उत्तर-पश्चिम प्रांत, आगरा एवं अवध' कर दिया गया। सन् 1902 में यह नाम पुनः परिवर्तित कर 'संयुक्त प्रांत आगरा एवं अवध' कर दिया गया। 1921 में इसे 'गवर्नर का प्रांत' घोषित करते हुए राजधानी (मुख्यालय) प्रयागराज से लखनऊ स्थानान्तरित कर दी गई। 1937 में प्रांत का नाम संक्षिप्त करते हुए 'संयुक्त प्रांत' (United Provinces) कर दिया गया।
24 जनवरी, 1950 को भारत के गवर्नर जनरल ने 'यूनाईटेड प्राविंसेज' (अल्टरनेशन ऑफ नेम) आर्डर-1950 को पारित कर संयुक्त प्रांत को 'उत्तर प्रदेश' नाम दिया।

शासन एवं प्रशासनिक व्यवस्था

भारतीय संविधान में देश की राज्यव्यवस्था को संसदीय प्रणाली के तहत संचालित करने की व्यवस्था दी गई है। संसदीय प्रणाली की व्यवस्था न केवल केन्द्र वरन् राज्य स्तर पर भी लागू है। संविधान का भाग-6 राज्यों के शासन-प्रशासन से सम्बन्धित है। संविधान के अनुसार उत्तर प्रदेश की शासन प्रणाली के तीन अंग हैं-
  • कार्यपालिका (Executive)
  • विधायिका (Legislature)
  • न्यायपालिका (Judiciary)

कार्यपालिका

भारतीय संविधान के छठे भाग के अनुच्छेद-153 से 167 तक में राज्य कार्यपालिका का विवरण दिया गया है। उत्तर प्रदेश की कार्यपालिका का स्वरूप केन्द्रीय कारिणी के सदृश्य है। इसमें सम्मिलित हैं-
  • राज्यपाल
  • मुख्यमंत्री
  • मंत्रिपरिषद
  • महाधिवक्ता

राज्यपाल

राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। वह केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में संघ एवं राज्य सरकार के बीच एक सेतु (Bridge) का कार्य करता है। राज्य कार्यपालिका के समस्त निर्णय राज्यपाल के नाम से लिए जाते हैं।
प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होता है। (अनुच्छेद 153) सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के अनुसार एक व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का भी राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है।

नियुक्ति एवं योग्यताएं

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्य में राज्यपाल को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत अथवा नियुक्त किया जाता है, उसका निर्वाचन नहीं होता।
  • राज्यपाल पद पर नियुक्ति के लिए आवश्यक है कि सम्बन्धित व्यक्ति भारत का नागरिक हो और उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो। (अनुच्छेद-157)
  • राज्यपाल पद पर नियुक्ति के लिए आवश्यक है कि वह संसद अथवा राज्य की विधायिका के किसी सदन का सदस्य न हो। यदि ऐसे किसी व्यक्ति की नियुक्ति राज्यपाल के रूप में होती है तो उसे राज्यपाल के कार्यालय में पद संभालने की तिथि से अपनी उक्त सदस्यता को छोड़नी होगी। [अनुच्छेद-158 (1)]
  • उसे किसी अन्य लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए। [(अनुच्छेद-158 (2)]

कार्यकाल

राज्यपाल का कार्यकाल उसके पद ग्रहण करने की तिथि से 5 वर्ष तक होता है, किंतु अपने पद को वह राष्ट्रपति के 'प्रसादपर्यन्त' (Pleasure of President) धारण करता है। (अनुच्छेद-156)

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक इकाइयां
  • मंडल (कमिश्नरी) - 18
  • जिले - 75
  • तहसील - 351
  • शहर एवं कस्बे - 915
  • विकास खण्ड - 826
  • न्याय पंचायत -
  • ग्राम पंचायत - 59,073
  • आबादी वाले गांव - 97,814
  • कुल गांव - 106,774
  • नगर निगम - 17
  • नगरपालिका परिषद - 200
  • नगर पंचायत - 546
स्रोत-सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार
  • संविधान में राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त को परिभाषित नहीं किया गया है। उच्चतम न्यायालय ने भी इसे 'न्यायप्रद' नहीं माना है।
  • राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल को कभी-भी पदच्युत किया जा सकता है। राष्ट्रपति द्वारा उसका एक प्रांत से दूसरे प्रांत में स्थानांतरण भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त राज्यपाल द्वारा स्वयं त्यागपत्र देकर भी पद को रिक्त किया जा सकता है।
  • राज्य की विधायिका अथवा उच्च न्यायालय द्वारा राज्यपाल को नहीं हटाया जा सकता है।

शपथ

राज्यपाल को पद की शपथ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिलायी जाती है। (अनुच्छेद-159)

वेतन एवं भत्ते

संसद द्वारा फरवरी, 2018 में पारित अधिनियम के अनुसार राज्यपाल को ₹ 3,50,000 मासिक वेतन प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त उसे निःशुल्क निवास स्थान, भत्ते एवं अन्य सुविधाएं प्राप्त होती हैं, जो संसद द्वारा नियत की जाती हैं।

कार्य एवं शक्तियां

कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियां
राज्यपाल राज्य सरकार के प्रशासन का अध्यक्ष है। राज्य सरकार के कार्यपालिका सम्बन्धी समस्त कार्य औपचारिक रूप से राज्यपाल के नाम से किये जाते हैं।
  • राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है। वह मुख्यमंत्री के परामर्श से मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति भी करता है।
  • मंत्रिपरिषद राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है।
  • राज्यपाल महाधिवक्ता, राज्य निर्वाचन आयुक्त, लोक सेवा आयोग के सदस्यों आदि की नियुक्ति करता है।
  • राज्यपाल मंत्रियों के बीच कार्यों का विभाजन करता है। वह मुख्यमंत्री से प्रशासनिक मामलों एवं विधायी प्रस्तावों के सम्बन्ध में सूचना मांग सकता है।
  • राज्यपाल राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति होता है। वह कुलपतियों की नियुक्ति भी करता है।
  • वह राज्य के संवैधानिक आपातकाल के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश कर सकता है।

विधायी शक्तियां
राज्यपाल की विधायी शक्तियां इस प्रकार हैं-
  • विधानसभा का सदस्य न होते हुए भी राज्यपाल राज्य विधान मंडल का अंग होता है। वह राज्य विधान मंडल के सत्र को आहूत, स्थगित एवं राज्य विधानसभा को भंग कर सकता है। वह विधान मंडल की बैठक को आम चुनावों के पश्चात एवं प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र को सम्बोधित भी करता है।
  • राज्य विधान मंडल द्वारा पारित कोई भी विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के पश्चात ही अधिनियम बनता है। वह विधान मंडल द्वारा पारित किसी भी विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है। धन विधेयक के अलावा अन्य किसी भी विधेयक को पुनर्विचार हेतु विधान मंडल को वापस लौटा सकता है। वह किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार हेतु सुरक्षित रख सकता है।
  • राज्यपाल विधान परिषद के कुल सदस्यों के छठे भाग को नामित कर सकता है। वह विधान सभा में एक आंग्ल भारतीय सदस्य की नियुक्ति कर सकता है।
  • राज्य विधान मण्डल के सत्र में न होने की स्थिति में राज्यपाल आवश्यकतानुसार किसी विषय पर अध्यादेश जारी कर सकता है। इस अध्यादेश की राज्य के विधानमण्डल से छ: सप्ताह के भीतर स्वीकृति आवश्यक होती है।
  • राज्यपाल मात्र राज्यसूची एवं समवर्ती सूची पर अध्यादेश जारी कर सकता है। उसके द्वारा जारी अध्यादेश छ: माह तक प्रभावी रहता है।
  • राज्यपाल राज्य से सम्बन्धित भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, राज्य वित्त आयोग एवं राज्य लोक सेवा आयोग की रिपोर्ट राज्य विधान सभा के सम्मुख प्रस्तुत करता है।

न्यायिक शक्तियां
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल से परामर्श कर निर्णय लिया जाता है।
  • राज्यपाल राज्य के उच्च न्यायालय के साथ परामर्श कर जिला न्यायाधीशों एवं अन्य अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानान्तरण एवं प्रोन्नति कर सकता है।
  • राज्यपाल को किसी अपराध में दोष सिद्ध अपराधी के दण्ड को क्षमा करने, स्थगित करने तथा दूसरे दण्ड में परिवर्तित करने या पूर्णत: माफ करने का अधिकार है। राज्यपाल मृत्युदण्ड को माफ नहीं कर सकता।

वित्तीय शक्तियां
  • कोई धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व अनुमति के बाद ही विधान सभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। किसी अनुदान की मांग उसकी सहमति के बाद ही की जा सकती है।
  • राज्यपाल यह सुनिश्चित करता है कि वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) को विधान मंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जाये।
  • राज्यपाल की अनुमति के बिना राज्य की आकस्मिक निधि (Contingency Fund) से कोई व्यय नहीं किया जा सकता है। राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund) राज्यपाल के अधिकार में रहती है।

राज्यपाल पर विभिन्न समितियों की सिफारिशें

पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा राज्यपाल से संबंधित विवाद को हल करने हेतु विभिन्न आयोगों एवं समितियों का गठन किया गया। कुछ प्रमुख समितियों की सिफारिशें इस प्रकार हैं-
  • प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ( 1966 )- मोरार जी देसाई की अध्यक्षता में बने प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) ने राज्यपाल पद पर अराजनैतिक व्यक्ति की नियुक्ति का सुझाव दिया था।
  • राजमन्नार समिति ( 1970 ) - तत्कालीन तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित इस कमेटी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 एवं 357 के विलोपन (Deletion) की सिफारिश करते हुए सुझाव दिया कि राज्यपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया में राज्यों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
समिति ने यह भी सिफारिश की कि राज्यपाल को एक ही बार पद धारण करना चाहिए।
  • पुंछी आयोग - वर्ष 2005 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन मोहन पुंछी की अध्यक्षता में केन्द्र-राज्य संबंधों पर गठित इस आयोग ने सिफारिश की कि अंतर्राज्यीय परिषद द्वारा एक सूची तैयार कर राज्यपाल की नियुक्ति उसी सूची के आधार पर की जानी चाहिए।
  • सरकारिया आयोग - 1980 में गठित इस आयोग ने 1988 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए सिफारिश की कि राज्यपाल की नियुक्ति मुख्यमंत्री के परामर्श से होनी चाहिए।

राज्यपाल एवं राष्ट्रपति के पद की तुलनात्मक स्थिति
राज्यपाल राष्ट्रपति
राज्यपाल राज्य कार्यपालिका का प्रमुख एवं राज्य का प्रथम व्यक्ति होता है। राष्ट्रपति भारत गणराज्य का प्रमुख एवं राष्ट्र का प्रथम नागरिक होता है।
राज्यपाल को राज्य विधि के तहत किसी अपराध में दोषी पाये गये व्यक्ति को क्षमादान, दण्ड कम करने, स्थगित करने अथवा दूसरे दण्ड में बदलने का अधिकार है। वह मृत्युदंड के संबंध में क्षमादान नहीं दे सकता। राष्ट्रपति केन्द्रीय विधि के तहत किसी अपराध में दोषी पाये गये व्यक्ति को क्षमा दान दे सकता है। इसके अतिरिक्त वह मृत्युदण्ड की सजा को भी माफ कर सकता है।
राज्य विधान मंडल के सत्र में न होने की स्थिति में राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है। ( अनुच्छेद 213 ) राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों के सत्र में न होने की स्थिति में अध्यादेश जारी कर सकता है। ( अनुच्छेद 123 )
राज्यपाल की नियुक्ति अथवा मनोनयन होता है। इस पद के लिए निर्वाचन नहीं होता। राष्ट्रपति का निर्वाचन होता है। यह निर्वाचन संसद एवं राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा होता है।
राज्यपाल अपने पद पर राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त बना रहता है। राष्ट्रपति को महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकता है।

राज्यपाल का पद एवं इससे जुड़े विवाद

बीते कुछ दिनों में राज्यपाल के पद को लेकर अनेक विवाद सामने आए हैं। विवाद के मूल में निहित है राज्यपाल को मिली विवेकाधिकार की शक्ति। इसकी शुरूआत 1959 में केरल सरकार की बर्खास्तगी से हुई थी, जो अभी तक अनवरत जारी है। भारतीय संविधान ने राज्यपाल को कुछ विवेकाधिकार एवं शक्तियां प्रदान की हैं -
  1. राज्य विधान मंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति की संस्तुति हेतु सुरक्षित करना।
  2. राज्य में राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा करना।
  3. मंत्रिपरिषद के किसी प्रशासनिक निर्णय एवं विधायी प्रस्ताव के विषय में सूचना मांगने की शक्ति।
इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 163 (2) के अंतर्गत यदि राज्यपाल के विवेकाधिकार पर कोई प्रश्न उठता है तो इस संबंध में राज्यपाल का निर्णय अंतिम एवं वैध होगा और उस पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है। यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों एवं आदेशों के माध्यम से यह व्यवस्था की है कि राज्यपाल का विवेकाधिकार न्यायिक पुनरीक्षा के अधीन है।

इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय इस प्रकार हैं-
जगदम्बिका पाल बनाम भारत सरकार एवं अन्य (1998)- वर्ष 1998 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने भाजपा की कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करते हुए लोकतांत्रिक कांग्रेस के जगदम्बिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी, जिसके बाद भाजपा इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहुँच गयी। मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कंपोजिट फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था। सदन के भीतर फ्लोर टेस्ट में कल्याण सिंह को 225 मत प्राप्त हुए जबकि जगदम्बिका पाल को मात्र 196 मत मिले। इस फ्लोर टेस्ट में परिणाम सामने आने के पश्चात जगदम्बिका पाल को मात्र 24 घंटे के बाद ही मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। इससे पूर्व कल्याण सिंह के बहुमत परीक्षण के प्रस्ताव को राज्यपाल ने खारिज कर दिया था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद उन्हें विधानसभा में बहुमत परीक्षण कराना पड़ा।

कम्पोजिट फ्लोर टेस्ट क्या है?
जब एक से अधिक व्यक्ति सरकार बनाने का दावा करते हैं एवं किसी भी दावेदार का बहुमत का दावा स्पष्ट न हो, इस स्थिति में राज्यपाल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर यह तय कर सकते हैं कि बहुमत किसके पास है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार इस प्रकार बहुमत का निर्णय सदन के भीतर होगा, न कि राजभवन में।

एस.आर. बोम्मई वाद 1994
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय राज्यपाल के विवेकाधिकार संबंधी शक्तियों को परिभाषित करने की दिशा में एक 'मील का पत्थर' साबित हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार किसी भी राज्य सरकार के बहुमत का निर्णय विधान मंडल में सदन के भीतर होना चाहिए, न कि राजभवन में। राष्ट्रपति शासन लगाने से पूर्व राज्य सरकार को शक्ति परीक्षण (Floor Test) का मौका देना चाहिए।
एस.आर. बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे, लेकिन बहुमत न होने के आधार पर राज्यपाल ने उनकी सरकार बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया था। बोम्मई ने इसे पहले उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। 11 मार्च, 1994 को सर्वोच्च न्यायालय के नौ जजों की बेंच ने अपने फैसले में एस.आर. बोम्मई को इस आधार पर दोबारा सरकार बनाने को कहा था कि बहुमत परीक्षण सदन के भीतर कराया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री

राज्यपाल यदि राज्य का संवैधानिक प्रमुख है तो मुख्यमंत्री राज्य सरकार एवं कार्यपालिका का वास्तविक प्रमुख होता है मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है (अनुच्छेद 164)। विधानसभा में बहुमत के नेता को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया जाता है।
मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री के परामर्श पर की जाती है।
मुख्यमंत्री विधान मंडल का सदस्य होता है। कोई व्यक्ति, जो विधान मंडल का सदस्य नहीं है, यदि उसकी मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त होती है तो उसके लिए छः माह के भीतर विधान मंडल का सदस्य निर्वाचित होना अनिवार्य है, अन्यथा उसे मुख्यमंत्री के पद का त्याग करना होगा।
मुख्यमंत्री विधान मंडल के दोनों सदनों (विधान सभा एवं विधान परिषद) में से किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है।
  • उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधान परिषद के सदस्य हैं।
  • मुख्यमंत्री को राज्यपाल पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है। वह विधानसभा में बहुमत रहने तक राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त अपने पद पर रहता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि राज्यपाल किसी भी समय मुख्यमंत्री को उसके पद से हटा सकता है। राज्यपाल मुख्यमंत्री को पद से तब तक बर्खास्त नहीं कर सकता है, जब तक कि उसे विधानसभा में बहुमत प्राप्त है। इसके अतिरिक्त राज्य में संवैधानिक व्यवस्था के छिन्न-भिन्न हो जाने पर अनुच्छेद 356 के तहत राज्यपाल की सिफारिश पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर मुख्यमंत्री को पद से हटाया जा सकता है।
  • मुख्यमंत्री के वेतन एवं भत्तों का निर्धारण राज्य विधान मंडल द्वारा किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल
नाम कार्यकाल
श्रीमती सरोजिनी नायडू 15 अगस्त, 1947 से 02 मार्च, 1949
श्री बी. बी. मलिक 03 मार्च, 1949 से 01 मई, 1949
श्री एच.पी. मोदी 02 मई, 1949 से 01 जून, 1952
डॉ. के.एल. मुंशी 02 जून, 1952 से 09 जून, 1957
श्री. वी.वी. वेंकटगिरि 10 जून, 1957 से 30 जून, 1960
डॉ. बी. रामाकृष्णा राव 01 जुलाई, 1960 से 15 अप्रैल, 1962
श्री विश्वनाथ दास 16 अप्रैल, 1962 से 30 अप्रैल, 1967
डॉ. बी. गोपाला रेड्डी 01 मई, 1967 से 30 जून, 1972
श्री शशीकांत वर्मा 01 जुलाई, 1972 से 13 नवम्बर, 1972
श्री अकबर अली खान 14 नवम्बर, 1972 से 24 अक्टूबर, 1974
डॉ. मारी चेन्ना रेड्डी 25 अक्टूबर, 1974 से 01 अक्टूबर, 1977
श्री जी.आर.डी. तपासे 02 अक्टूबर, 1977 से 27 फरवरी, 1980
श्री सी.पी.एन. सिंह 28 फरवरी, 1980 से 31 मार्च, 1985
श्री मो. उस्मान आरिफ 31 मार्च, 1985 से 11 फरवरी, 1990
श्री बी. एस. एन. रेड्डी 12 फरवरी, 1990 से 25 मई, 1993
श्री मोती लाल वोरा 25 मई, 1993 से 03 मई, 1996
श्री मो. शफी कुरैशी 03 मई, 1996 से 19 जुलाई, 1996
श्री रोमेश भंडारी 19 जुलाई, 1996 से 17 मार्च, 1998
श्री मो. शफी कुरैशी 17 मार्च, 1998 से 19 अप्रैल, 1998
श्री सूरजभान 20 अप्रैल, 1998 से 23 नवम्बर, 2000
श्री विष्णुकांत शास्त्री 24 नवम्बर, 2000 से 02 जुलाई, 2004
श्री सुदर्शन अग्रवाल 03 जुलाई, 2004 से 07 जुलाई, 2004
श्री टी.वी. राजेश्वर 08 जुलाई, 2004 से 27 जुलाई, 2009
श्री बी.एल. जोशी 28 जुलाई, 2009 से 23 जून, 2014
डॉ. अज़ीज़ कुरैशी 23 जून, 2014 से 22 जुलाई, 2014
श्री राम नाईक 22 जुलाई, 2014 से 28 जुलाई, 2019
श्रीमती आनंदी बेन पटेल 29 जुलाई, 2019 से आज तक

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री
नाम कार्यकाल
पं. गोविन्द वल्लभ पंत 01 अप्रैल, 1946 से 27 दिसंबर, 1954
डॉ. सम्पूर्णानन्द 28 दिसंबर, 1954 से 06 दिसंबर, 1960
श्री चन्द्रभानु गुप्त 07 दिसंबर, 1960 से 01 अक्टूबर, 1963
श्रीमती एस. कृपलानी 02 अक्टूबर, 1963 से 13 मार्च, 1967
श्री चन्द्रभानु गुप्त 14 मार्च, 1967 से 02 अप्रैल, 1967
चौधरी चरण सिंह 03 अप्रैल, 1967 से 25 फरवरी, 1968
राष्ट्रपति शासन 25 फरवरी, 1968 से 25 फरवरी, 1969
श्री चन्द्रभानु गुप्त 26 फरवरी, 1969 से 17 फरवरी, 1970
चौधरी चरण सिंह 17 फरवरी, 1970 से 01 अक्टूबर, 1970
राष्ट्रपति शासन 02 अक्टूबर, 1970 से 18 अक्टूबर, 1970
श्री त्रिभुवन एन. सिंह 18 अक्टूबर, 1970 से 04 अप्रैल, 1971
श्री कमलापति त्रिपाठी 04 अप्रैल, 1971 से 12 जून, 1973
राष्ट्रपति शासन 13 जून, 1973 से 08 नवम्बर, 1973
श्री एच.एन. बहुगुणा 08 नवम्बर, 1973 से 30 नवम्बर, 1975
राष्ट्रपति शासन 30 नवम्बर, 1975 से 21 जनवरी, 1976
श्री एन.डी. तिवारी 21 जनवरी, 1976 से 30 अप्रैल, 1977
राष्ट्रपति शासन 30 अप्रैल, 1977 से 22 जून, 1977
श्री रामनरेश यादव 23 जून, 1977 से 28 फरवरी, 1979
श्री बनारसी दास 28 फरवरी, 1979 से 17 फरवरी, 1980
राष्ट्रपति शासन 17 फरवरी, 1980 से 09 जून, 1980
वी.पी. सिंह 09 जून, 1980 से 19 जुलाई, 1982
श्री श्रीपति मिश्र 19 जुलाई, 1982 से 03 अगस्त, 1984
श्री एन.डी. तिवारी 03 अगस्त, 1984 से 10 मार्च, 1985
श्री एन.डी. तिवारी 11 मार्च, 1985 से 23 सितंबर, 1985
श्री वीर बहादुर सिंह 24 सितंबर, 1985 से 24 जून, 1988
श्री एन.डी. तिवारी 25 जून, 1988 से 05 दिसंबर, 1989
श्री मुलायम सिंह यादव 05 दिसंबर, 1989 से 24 जून, 1991
श्री कल्याण सिंह 24 जून, 1991 से 06 दिसंबर, 1992
राष्ट्रपति शासन 06 दिसंबर, 1992 से 04 दिसंबर, 1993
मुलायम सिंह यादव 04 दिसंबर, 1993 से 03 जून, 1995
सुश्री मायावती 03 जून, 1995 से 17 अक्टूबर, 1995
राष्ट्रपति शासन 18 अक्टूबर, 1995 से 17 अक्टूबर, 1996
राष्ट्रपति शासन 17 अक्टूबर, 1996 से 21 मार्च, 1997
सुश्री मायावती 21 मार्च, 1997 से 21 सितंबर, 1997
श्री कल्याण सिंह 21 सितंबर, 1997 से 12 नवंबर, 1999
श्री रामप्रकाश गुप्त 12 नवंबर, 1999 से 28 अक्टूबर, 2000
श्री राजनाथ सिंह 28 अक्टूबर, 2000 08 मार्च, 2002
राष्ट्रपति शासन 08 मार्च, 2002 से 03 मई, 2002
सुश्री मायावती 03 मई, 2002 से 29 अगस्त, 2003
श्री मुलायम सिंह यादव 29 अगस्त, 2003 से 13 मई 2007
सुश्री मायावती 13 मई, 2007 से 14 मार्च, 2012
श्री अखिलेश यादव 15 मार्च, 2012 से 19 मार्च, 2017
योगी आदित्यनाथ 19 मार्च, 2017 से 25 मार्च, 2022
योगी आदित्यनाथ* 25 मार्च, 2022 से वर्तमान

व्यक्ति के रूप में योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के 21वें मुख्यमंत्री हैं।

मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियां

मंत्रिपरिषद के सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है। मुख्यमंत्री द्वारा मंत्रियों के मध्य विभागों का वितरण किया जाता है और जब भी चाहे वह उन विभागों में परिवर्तन कर सकता है।
  • मुख्यमंत्री किसी मंत्री को पद से बर्खास्त करने की सिफारिश राज्यपाल से कर सकता है।
  • यदि मुख्यमंत्री की मृत्यु हो जाए या वह अपने पद से त्यागपत्र दे दे तो मंत्रिपरिषद विघटित हो जाती है। विघटन की यह स्थिति मंत्रिपरिषद के किसी अन्य सदस्य की आकस्मिक मृत्यु या त्यागपत्र से नहीं होती है।
  • मुख्यमंत्री, राज्यपाल एवं मंत्रिपरिषद के बीच संवाद की कड़ी है।
मुख्यमंत्री राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने, स्थगित करने एवं किसी भी समय विधानसभा को विघटित करने का भी परामर्श दे सकता है।

राज्य मंत्रिपरिषद

  • राज्य मंत्रिपरिषद के सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री के परामर्श पर की जाती है।
  • संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करेगा और मुख्यमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करेगा।
  • मंत्रिपरिषद में सामान्यतः राज्य विधानसभा अथवा विधान परिषद के सदस्य होते हैं, किंतु विशेष परिस्थितियों में मंत्रिपरिषद में ऐसे व्यक्तियों को शामिल किया जा सकता है जो राज्य विधानसभा अथवा विधान परिषद के सदस्य न हों।
  • मंत्रिपरिषद के ऐसे सदस्य को छः माह के भीतर दोनों सदनों में से किसी एक की सदस्यता लेनी होगी, अन्यथा उसे मंत्रिपरिषद की सदस्यता का त्याग करना होगा।

सदस्य संख्या एवं स्वरूप

संविधान के 91वें संशोधन विधेयक, 2003 के अनुसार राज्य में मंत्रिपरिषद के सदस्यों की अधिकतम संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक और मुख्यमंत्री समेत मंत्रियों की न्यूनतम संख्या 12 से कम नहीं होगी।
  • यदि राज्य विधान मंडल के किसी सदस्य की सदस्यता दल-बदल कानून के आधार पर रद्द होती है तो ऐसा व्यक्ति मंत्री पद से भी अयोग्य हो जायेगा।
  • राज्यपाल मंत्रिपरिषद को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है।
  • मंत्रिपरिषद का कार्यकाल राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त होता है।
मंत्रिपरिषद के प्रत्येक मंत्री को विधानसभा एवं विधान परिषद की कार्यवाही में भाग लेने एवं बोलने का अधिकार है, किंतु वोट देने का अधिकार उसी सदन में होगा जिसका वह सदस्य है।

मंत्रिपरिषद की श्रेणियां

मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की तीन श्रेणियां होती हैं-
  1. कैबिनेट मंत्री
  2. राज्यमंत्री
  3. उपमंत्री
प्रथम श्रेणी के मंत्रियों के समूह को मंत्रिमण्डल, जबकि तीनों श्रेणियों के मंत्रियों के समूह को सामूहिक रूप से मंत्रिपरिषद कहा जाता है।

मंत्रिपरिषद का उत्तरदायित्व

मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। यदि विधानसभा किसी मंत्री के विरुद्ध प्रस्ताव पारित कर दे तो सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है।
किसी मंत्री के व्यक्तिगत कार्यों के लिए मात्र संबंधित मंत्री उत्तरदायी होता है, न कि सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद। मुख्यमंत्री के त्यागपत्र देने अथवा बर्खास्त होने से मंत्रिपरिषद का स्वतः विघटन हो जाता है।

मंत्रिपरिषद की कार्य प्रणाली

  • राज्य की शासन प्रणाली में मंत्रिपरिषद का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
  • मंत्रिमण्डल की बैठक सामान्यतः सप्ताह में एक बार होती है, यद्यपि मुख्यमंत्री को यह अधिकार है कि वह आवश्यकता अथवा अपनी इच्छानुसार इसकी बैठक कभी भी बुला सकता है।
  • मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं। मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में बैठक की अध्यक्षता मंत्रिपरिषद के वरिष्ठ मंत्री द्वारा किया जाएगा।
  • मंत्रिपरिषद की बैठक में गणपूर्ति (Quorum) की अनिवार्यता नहीं होती।
  • बैठक में लिया गया निर्णय सामूहिक और सभी सदस्यों/मंत्रियों के लिए अनिवार्य रूप से स्वीकार्य होता है। यदि कोई मंत्री सामूहिक निर्णय को स्वीकार करने में असमर्थता व्यक्त करता है, तो उसे मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र देना होगा।

मंत्रिपरिषद के कार्य एवं शक्तियां

  • राज्य के शासन संचालन हेतु नीतियों का निर्माण मंत्रिपरिषद करती है।
  • शासन की कार्यपालिका को व्यवस्थापिका से जोड़ने का कार्य मंत्रिपरिषद करती है।
  • कार्यपालिक की वास्तविक शक्तियां मंत्रिपरिषद में निहित होती हैं। मंत्रिमण्डल को कई विभागों में विभक्त किया जाता है। प्रत्येक विभाग, जिसे मंत्रालय कहते हैं, का मुखिया एक मंत्री होता है।
  • यह निर्णय मंत्रिपरिषद द्वारा लिया जाता है कि किसी विधेयक को विधानसभा के किस अधिवेशन में प्रस्तुत करना है।
  • महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं विश्वविद्यालयों के कुलपति जैसे बड़े पदों पर नियुक्ति का निर्णय मंत्रिपरिषद द्वारा लिया जाता है। मंत्रिपरिषद की सलाह पर इन पदों पर नियुक्तियों की घोषणा राज्यपाल द्वारा की जाती है।
  • मंत्रिपरिषद की स्वीकृति पर विधान सभा में बजट प्रस्तुत किया जाता है।

कैबिनेट
मंत्रिपरिषद का वह भाग जिसमें कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। यह राज्य सरकार की वास्तविक कार्यकारिणी होती है। इसका राज्य की राजनैतिक-प्रशासनिक व्यवस्था से सम्बन्धित नीति निर्धारण में सर्वाधिक योगदान होता है।
कैबिनेट विभिन्न प्रकार की समितियों के माध्यम से कार्य करती है, जिन्हें कैबिनेट की समितियां कहते हैं।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।