उत्तर प्रदेश में लोक सेवाएं, लोक सेवा आयोग, लेखा परीक्षा, महान्यायवादी, संवैधानिक एवं गैर-संवैधानिक संस्थाएं
किसी भी राज्य के सुचारू संचालन और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए उसकी प्रशासनिक और संवैधानिक संस्थाएं रीढ़ की हड्डी होती हैं। उत्तर प्रदेश, जो कि आबादी में देश का सबसे बड़ा सूबा है, इसकी विशाल प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायपूर्ण कार्यप्रणाली को समझना हर प्रतियोगी छात्र के लिए बेहद जरूरी है। इस विस्तृत लेख में हम उत्तर प्रदेश में लोक सेवाओं के बुनियादी ढांचे, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की कार्यप्रणाली, महाधिवक्ता की शक्तियों से लेकर राज्य वित्त, सूचना, महिला और मानवाधिकार आयोगों जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं गैर-संवैधानिक निकायों के सफरनामे पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह प्रामाणिक जानकारी न केवल आपकी परीक्षा की तैयारी को नई धार देगी, बल्कि आपको प्रदेश के प्रशासनिक वैभव से भी गहराई से रूबरू कराएगी।
भारत एवं राज्य में लोक सेवाओं का वर्गीकरण
भारत में लोक सेवाएं
(Public Services in India)
(Public Services in India)
⬇
अखिल भारतीय सेवाएं
(IAS, IPS, IFS)
(IAS, IPS, IFS)
केंद्रीय सिविल सेवाएं
(रक्षा, आयकर, रेलवे)
(रक्षा, आयकर, रेलवे)
राज्य सिविल सेवाएं
(शिक्षा, प्रशासन, पुलिस)
(शिक्षा, प्रशासन, पुलिस)
⬇ (राज्य सेवाओं का वर्गीकरण)
राजपत्रित (Gazetted)
प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी
प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी
अराजपत्रित (Non-Gazetted)
तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी
तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी
राज्य सेवाओं की श्रेणियां और पद प्रकृति
| श्रेणी / समूह (Group) | प्रकृति (Nature) | अधिकारी / कर्मचारी का प्रकार | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| प्रथम श्रेणी (समूह 'क') | राजपत्रित | उच्च प्रशासनिक एवं नीति-निर्माता | सामान्य समयबद्ध वेतनमान वाले उच्चाधिकारी |
| द्वितीय श्रेणी (समूह 'ख') | राजपत्रित | विशेषज्ञ स्वरूप / अधीनस्थ सिविल सेवाएं | अधीनस्थ पुलिस सेवा के अधिकारी |
| तृतीय श्रेणी (समूह 'ग') | अराजपत्रित | अधीनस्थ कार्यपालक एवं लिपिकीय सेवाएं | नायब तहसीलदार, सब-इंस्पेक्टर, लिपिक |
| चतुर्थ श्रेणी (समूह 'घ') | अराजपत्रित | शारीरिक कार्य (कुशल/अकुशल) | चपरासी, ड्राइवर, चौकीदार, प्रयोगशाला सेवक |
उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण संस्थाएं एवं आयोग
उ.प्र. लोक सेवा आयोग (UPPSC)
- गठन 1 अप्रैल 1937 (भारत सरकार अधिनियम 1935)
- संरचना 1 अध्यक्ष + 8 सदस्य
- नियुक्ति राज्यपाल द्वारा
- कार्यकाल 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु (अनुच्छेद 316)
- प्रमुख कार्य: राज्य सेवाओं की परीक्षाएं आयोजित करना, सरकार को अनुशासनात्मक मामलों में सलाह देना।
लेखा परीक्षा (CAG)
- प्रावधान अनुच्छेद 148 (सर्वोच्च लेखा परीक्षा प्राधिकरण)
- नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा (प्रधानमंत्री की सलाह पर)
- कार्यकाल 6 वर्ष अथवा अगले आदेश तक
- ऑडिट के प्रकार:
1. अनुपालन लेखा परीक्षा
2. वित्तीय लेखा परीक्षा
3. निष्पादन लेखा परीक्षा
महाधिवक्ता (Advocate General)
- प्रावधान अनुच्छेद 165 (राज्य का सर्वोच्च विधिक अधिकारी)
- नियुक्ति राज्यपाल द्वारा (प्रसादपर्यन्त कार्यकाल)
- योग्यता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त होने की योग्यता (न्यूनतम 10 वर्ष का अनुभव)
- विशेष अधिकार: विधानमंडल की कार्यवाही में भाग ले सकता है, परन्तु मत देने का अधिकार नहीं है।
राज्य वित्त एवं सूचना आयोग
- राज्य वित्त आयोग:
➔ अनुच्छेद 243 (I) तथा 243 (Y)
➔ प्रत्येक 5 वर्ष में गठन (प्रथम: 1994)
➔ वर्तमान अध्यक्ष: दीपक कुमार - राज्य सूचना आयोग:
➔ गठन: 14 सितम्बर 2005 (RTI एक्ट 2005)
➔ कार्यकाल: 5 वर्ष या 65 वर्ष आयु
➔ मुख्य सूचना आयुक्त: राज कुमार विश्वकर्मा
राज्य महिला आयोग
- गठन 2002 (अधिनियम 2004, संशोधन 2013)
- संरचना 1 अध्यक्ष + 2 उपाध्यक्ष + 25 सदस्य (2 वर्ष का कार्यकाल)
- वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती बबीता चौहान
- शक्तियां: सिविल न्यायालय के समान (सम्मन जारी करना, दस्तावेज मंगाना)।
राज्य मानवाधिकार आयोग
- गठन 7 अक्टूबर 2002 (मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993)
- संरचना 1 अध्यक्ष + 4 सदस्य
- अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बाल कृष्ण नारायण
- सुविधाएं: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश/न्यायाधीश के समतुल्य।
लोक सेवाएं (Public Service)
- जनता के प्रति सरकार के कर्तव्यों एवं दायित्वों में लोक सेवा का महत्वपूर्ण स्थान है। लोक सेवकों की योग्यता तथा क्षमता एक कार्यकुशल एवं प्रभावी सरकार का आधार तैयार करती है।
- लोक सेवा उस महत्वपूर्ण सरकारी संस्था का नाम है, जिसमें राज्य के केन्द्रीय प्रशासन के कर्मचारी शामिल होते हैं। दूसरे शब्दों में, यह ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो प्रशासन एवं समाजसेवा में अपना जीवन अर्पित करते हैं।
- लोक सेवकों का कार्य न सिर्फ कानूनों को लागू करना होता है, बल्कि उनका निर्माण भी करना होता है।
- लोक सेवा का क्षेत्र मात्र करों से प्राप्त धनराशि को व्यय करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह निश्चित भी करता है, कि कितना धन एकत्र करना है और उसका स्रोत क्या होगा?
- लोक सेवाओं में वह अधिकारी शामिल होते हैं, जो देश में विभिन्न स्तरों पर सामान्य प्रकार के प्रशासनिक कार्य संपन्न करते हैं। केन्द्र और राज्य दोनों स्तरों पर इनकी नियुक्ति की जाती है।
उत्तर प्रदेश में लोक सेवा (Public Service in UP)
- उत्तर प्रदेश जैसे बृहत जनसंख्या एवं क्षेत्रफल वाले राज्य में लोक सेवाएं सरकारी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। यह ऐसे गैर-राजनीतिक एवं गुटनिरपेक्ष अधिकारियों का समूह होता है, जो उन कार्यों को पूरा करता है, जिन्हें प्रदेश कार्यपालिका द्वारा बनाये गए सम्पूर्ण नीतिगत ढांचे के अंतर्गत निर्धारित किया गया हो।
- लोक सेवकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पूर्ण ईमानदारी, प्रतिबद्धता एवं समर्पण के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे।
- लोक सेवा का कार्य न सिर्फ नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करना होता है, बल्कि नीतियों के निर्माण में राजनीतिक कार्यपालिका की सहायता करनी होती है।
- सामान्यतः यह माना जाता है कि सरकार कुछ अवधि तक विधान पालिका के बिना कार्य चला सकती है, किन्तु यह बिना लोक सेवा के सम्भव नहीं हो सकता।
लोक सेवा प्रबंधन विभाग
- उत्तर प्रदेश में लोक सेवा प्रबंधन विभाग सरकार का एक प्रमुख अंग है। इस विभाग द्वारा जनहित गारंटी अधिनियम, 2011 का कार्य क्रियान्वित किया जाता है।
- राज्य की जनता को निश्चित समय सीमा के भीतर सेवाएं प्रदान करने तथा उससे सम्बंधित और आनुषांगिक विषयों की व्यवस्था कराने के लिए उत्तर प्रदेश जनहित गारंटी अधिनियम, 2011 लागू किया गया है।
- लोक सेवा प्रबंधन विभाग द्वारा जनहित गारंटी अधिनियम की धारा-3 के अंतर्गत विभिन्न विभागों से प्राप्त प्रस्तावानुसार सेवाएं अधिसूचित किये जाने का कार्य सम्पादित किया जाता है।
- अधिनियम के अन्तर्गत अभी तक 47 विभागों की कुल 409 सेवाओं तथा समस्त विभागों की 10 सेवाओं, अर्थात् 419 सेवाओं को अधिसूचित किया जा चुका है।
लोक सेवा की संरचना
भारत में लोक सेवाओं को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है-
- अखिल भारतीय सेवाएं
- केंद्रीय सिविल सेवाएं
- राज्य सिविल सेवाएं
अखिल भारतीय सेवाएं
- अखिल भारतीय सेवाएं (AIS) केंद्र तथा प्रदेश की उच्च प्रशासनिक पदों पर सेवाएं प्रदान करती हैं।
- अखिल भारतीय सेवाओं के अंतर्गत अधिकारियों की भर्ती केंद्र सरकार द्वारा 'संघ लोक सेवा आयोग' के माध्यम से करके उन्हें विभिन्न राज्य संवर्गों में भेजा जाता है।
भारत में तीन अखिल भारतीय सेवाएं हैं-
- भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS)
- भारतीय पुलिस सेवा (IPS)
- भारतीय वन सेवा (IFS)
केंद्रीय सेवाएं
- केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों की भर्ती केंद्र सरकार द्वारा की जाती है तथा यह अधिकारी केंद्र सरकार की सेवा में कार्य करते हैं।
- इस सेवा के अधिकारी रक्षा, आयकर, रेलवे, सीमा शुल्क तथा विदेशी मामलों आदि से सम्बद्ध रहकर कार्य करते हैं।
राज्य सेवाएँ
- राज्य सेवाओं का आशय राज्य स्तर की सिविल सेवाओं से है। इसके अंतर्गत अधिकारियों की भर्ती राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा की जाती है।
- राज्य सेवा के अधिकारी मूलतः राज्य में अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं, यद्यपि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें केंद्र में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर भेजा जा सकता है, अथवा केन्द्र अपनी सेवाओं के लिए उन्हें बुला सकता है।
- राज्य सेवा के अंतर्गत मुख्य क्षेत्र हैं - शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक सेवाएँ, पुलिस सेवा आदि।
राज्य सेवाओं का वर्गीकरण
राज्य सेवाओं का वर्गीकरण दो आधार पर किया जा सकता है-
- प्रथम वर्ग की सेवाएं प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के रूप में वर्गीकृत की जाती हैं।
- द्वितीय वर्ग के अंतर्गत सेवाओं तथा पदों का वर्गीकरण 'राजपत्रित' और 'अराजपत्रित' के रूप में किया जाता है।
प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी की सेवाओं में राज्य सेवाओं का अधिकारी वर्ग आता है, जबकि तृतीय तथा चतुर्थ श्रेणी में क्रमशः लिपिक तथा शारीरिक कार्य करने वाले कर्मचारी शामिल किए जाते हैं।
- प्रथम श्रेणी की सेवाओं में सामान्य समयबद्ध वेतनमान वाले पद तथा सामान्य समयबद्ध वेतनमान से अधिक वेतन वाले कुछ पद शामिल होते हैं।
- द्वितीय श्रेणी की सेवाएं सामान्यतः विशेषज्ञ स्वरूप होती हैं। यह अधीनस्थ सिविल सेवाएं होती हैं, जैसे- अधीनस्थ पुलिस सेवा आदि।
- द्वितीय श्रेणी सेवाएं प्रथम श्रेणी सेवाओं की तुलना में स्तर तथा उत्तरदायित्व की दृष्टि से नीचे होती हैं।
तृतीय श्रेणी की सेवाओं को दो भागों में विभाजित किया गया है:
- अधीनस्थ कार्यपालक (उदाहरण- नायब तहसीलदार, पुलिस सब-इंस्पेक्टर, उप-शिक्षा निरीक्षक आदि)।
- लिपिकीय सेवाएं: इन पदों के लिए भर्ती आंशिक रूप से लोक सेवा आयोग द्वारा तथा आंशिक रूप से विभागीय या जिला अध्यक्षों के स्तर पर की जाती है।
चतुर्थ श्रेणी के अंतर्गत शारीरिक (manual) कार्य करने वाले कुशल अथवा अकुशल व्यक्ति आते हैं। इस श्रेणी के पदों में चपरासी, चौकीदार, ड्राइवर, बढ़ई, फिटर, रसोइये, प्रयोगशाला सेवक तथा इस प्रकार के अन्य पद शामिल हैं।
राजपत्रित और अराजपत्रित पद
- एक राजपत्रित सरकारी कर्मचारी वह होता है, जिसकी नियुक्ति, तबादला, पदोन्नति, सेवा निवृत्ति आदि की घोषणा राज्यपाल के आदेश द्वारा जारी की गई अधिसूचना के रूप में सरकारी राजपत्र में की जाती है।
- राजपत्रित अधिकारी अपने कार्यालय/विभाग का इंचार्ज होता है।
- राजपत्रित पदों में अखिल भारतीय सेवाएं तथा द्वितीय श्रेणी की राज्य सेवाएं शामिल होती हैं।
- अराजपत्रित पदों में तृतीय तथा चतुर्थ श्रेणी की सेवाएं सम्मिलित की जाती हैं।
- हाल के दिनों में वर्गीकरण ग्रेडिंग प्रणाली में कुछ परिवर्तन किए गये हैं। केन्द्र और राज्य स्तरों पर पदों को अब समूह 'क' और 'ख' के रूप में श्रेणीबद्ध किया जाता है।
- अराजपत्रित पदों को समूह 'ग' और समूह 'घ' में श्रेणीबद्ध किया जाता है।
लोक सेवा आयोग
- भारतीय संविधान के भाग 14 में अनुच्छेद 315 से 323 तक के प्रावधान लोक सेवा आयोग की शक्तियों, कार्य क्षेत्र एवं गठन से जुड़े हैं।
- लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक निकाय है।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग
- उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का गठन 1 अप्रैल 1937 को भारत सरकार अधिनियम 1935 की धारा 264 द्वारा किया गया। इसका मुख्यालय प्रयागराज (इलाहाबाद) तथा शिविर कार्यालय लखनऊ में स्थित है।
- स्थापना के समय आयोग में मात्र एक अध्यक्ष एवं दो सदस्य होते थे। आयोग के प्रथम अध्यक्ष डी. एल. ड्रेक ब्रॉकमैन तथा सदस्य रायबहादुर मान सिंह एवं खान बहादुर सैय्यद अबू मोहम्मद, नियुक्त किए गए थे। आयोग के प्रथम भारतीय अध्यक्ष खान बहादुर मोहम्मद अब्दुल अजीज थे।
- देश की स्वतंत्रता के समय डा. अमरनाथ झा आयोग के अध्यक्ष थे।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की संरचना
- उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में एक अध्यक्ष तथा 8 सदस्य होते हैं।
- आयोग के संविधान के अनुसार निर्णयों अथवा बैठकों के लिए कोरम अनिवार्य नहीं है, अतः इसके कई सदस्यों के पद प्रायः रिक्त रहते हैं।
- उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग का कार्य 'उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग विनियमन, 1976' द्वारा विनियमित होता है।
नियुक्ति एवं पदत्याग
- उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
- अनुच्छेद 316 के अनुसार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल पदग्रहण की तिथि से 6 वर्ष अथवा 62 वर्ष की आयु तक, जो पहले हो, निर्धारित है।
- आवश्यकतानुसार अध्यक्ष एवं सदस्य समय से पूर्व कभी भी अपने पद से त्यागपत्र दे सकते हैं।
- आयोग के अध्यक्ष अथवा सदस्य की पदावधि के पश्चात पुनर्नियुक्ति नहीं हो सकती है।
- उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है (अनुच्छेद 317)।
उ.प्र. लोक सेवा आयोग की भूमिका एवं कार्य
लोक सेवा आयोग का प्रमुख कार्य राज्य की सेवाओं में नियुक्तियों के लिए परीक्षाओं का आयोजन करना है।
उ.प्र. लोक सेवा आयोग द्वारा वर्तमान में 11 प्रमुख परीक्षाएं आयोजित
की जा रही हैं। कुछ प्रमुख परीक्षाएं इस प्रकार हैं-
- सम्मिलित राज्य/प्रवर अधीनस्थ सेवा परीक्षा
- सम्मिलित कृषि सेवा परीक्षा
- उत्तर प्रदेश न्यायिक सिविल जज परीक्षा
- सहायक अभियोजन अधिकारी परीक्षा
- खान निरीक्षक परीक्षा
- सहायक वन संरक्षक एवं क्षेत्रीय वन अधिकारी परीक्षा
- समीक्षा अधिकारी व सहायक समीक्षा अधिकारी भर्ती परीक्षा
- सहायक रजिस्ट्रार परीक्षा
- चिकित्साधिकारी भर्ती परीक्षा
- संयुक्त राज्य इंजीनियरिंग परीक्षा
- तकनीकी शिक्षा सेवा परीक्षा
उम्मीदवारों के चयन का आधार निम्नलिखित हो सकता है-
- मात्र साक्षात्कार के आधार पर।
- प्रतियोगी परीक्षा तथा साक्षात्कार के आधार पर।
- मात्र प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर।
- स्क्रीनिंग टेस्ट व साक्षात्कार के आधार पर।
- प्राथमिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा तथा साक्षात्कार के आधार पर।
- संबंधित सेवाओं की सेवा शर्तों के आधार पर पदोन्नति।
अनुशासनात्मक कार्रवाई में भूमिका
- प्रशासनिक एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में राज्य सरकार को सलाह देना।
- अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में नियम/दण्ड निर्धारित करना।
अन्य कार्य
- उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन सिविल पदों पर कार्यरत किसी अधिकारी के अनुशासनात्मक मुद्दे पर सरकार को परामर्श देना।
- राज्य में सिविल सेवकों की भर्ती के तरीकों पर सरकार को परामर्श देना और सेवा शर्तों के संबंध में रूपरेखा तैयार करना।
- उत्तर प्रदेश सरकार को सिविल सेवकों की भर्ती व अनुशासन आदि से जुड़े मुद्दों पर परामर्श देना।
- आयोग अपनी वार्षिक रिपोर्ट राज्यपाल को प्रस्तुत करता है, जिसे राज्यपाल विधान मण्डल (विधान सभा व विधान परिषद) के समक्ष रखते हैं।
उ.प्र. लोक सेवा आयोग के समक्ष चुनौतियां
लोक सेवकों के स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चयन में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) के समक्ष निम्नलिखित चुनौतियां हैं-
- नित्य प्रति बदल रही प्रौद्योगिकी को अपनाना व उसे लागू करना।
- बहुभाषा में परीक्षाओं को आयोजित करना तथा उनसे संबंधित विशेषज्ञों की टीम गठित करना।
- भ्रष्टाचार व इससे जुड़े आरोपों से अपनी छवि को बचाना तथा जनता का विश्वास बनाए रखना।
- परीक्षा पैटर्न में नियमित, आवधिक व जरूरी सुधार करना।
- सत्तारूढ़ दल से जुड़े पदाधिकारी अपने काडरों को प्रशासनिक पदों पर नियुक्त कराने का प्रयास करते हैं। इसे हतोत्साहित करने का प्रयास करना।
- तकनीकी विशेषज्ञों का अभाव, जिससे उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की भांति तत्परता से कार्य नहीं कर पाता है।
लेखा परीक्षा (Auditing)
- भारतीय संविधान के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षा (CAG) देश का सर्वोच्च लेखा परीक्षा प्राधिकरण है।
- संविधान के अनुच्छेद 148 के अंतर्गत देश में लेखा परीक्षा एवं संबंधित उत्तरदायित्व संबंधी निर्वहन हेतु नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) नामक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय की व्यवस्था की गयी है।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक
- भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ उनके उपक्रमों, प्राधिकरणों एवं निकायों की समस्त प्राप्तियों एवं व्ययों का लेखा परीक्षा (ऑडिट) करता है।
- संवैधानिक प्रावधान के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक पद देश के 'सर्वोच्च लेखा परीक्षा संस्थान' (SAI) का प्रमुख अंग है।
- देश के 'सर्वोच्च लेखा परीक्षा संस्थान' (SAI) का निर्माण 'नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक' (CAG) के साथ 'भारतीय लेखा परीक्षा एवं लेखा विभाग' (IAAD) द्वारा होता है।
नियुक्ति एवं पदावधि
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इसका कार्यकाल 6 वर्ष अथवा अगले आदेश तक, जो पहले हो, होता है।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 के अनुसार भारत का एक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक होगा, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा की जाएगी। उसे उसके पद से मात्र उसी विधि और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकेगा, जिस विधि से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
- नियंत्रक- महालेखा परीक्षक, अपने पद से हटने के पश्चात, भारत सरकार के या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य का पात्र नहीं होगा।
वेतन एवं अन्य शर्तें
- भारतीय संविधान के अनुसार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का वेतन और सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी जो संसद, विधि द्वारा अवधारित होंगी और जब तक वे इस प्रकार अवधारित नहीं की जाती हैं, तब तक ऐसी होंगी जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं।
- नियंत्रक - महालेखा परीक्षक के कार्यालय के प्रशासनिक व्यय, जिनके अन्तर्गत उस कार्यालय में सेवा करने वाले व्यक्तियों को या उनके संबंध में संदेय सभी वेतन, भत्ते और पेंशन हैं, भारत की संचित निधि (Consolidated fund) पर भारित होंगे।
- अनुच्छेद 151 के अनुसार भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक द्वारा तैयार संघ के लेखाओं संबंधी रिपोर्ट्स को राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगा।
- भारत के नियंत्रक - महालेखा परीक्षक की किसी राज्य के लेखाओं संबंधी रिपोर्ट्स को राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, जो उनको उस राज्य के विधानमण्डल के समक्ष रखवाएगा।
लेखा परीक्षा के प्रकार
भारत के नियंत्रक- महालेखा परीक्षक द्वारा की जाने वाली लेखा परीक्षा (ऑडिट) मुख्यतः तीन प्रकार की होती है-
- अनुपालन लेखा परीक्षा
- वित्तीय लेखा परीक्षा
- निष्पादन लेखा परीक्षा
- अनुपालन लेखा परीक्षा- इसका उद्देश्य यह आंकलन करना होता है कि कानूनों और विनियमों का किस स्तर तक पालन व सम्मान किया गया है।
- वित्तीय लेखा परीक्षा- वित्तीय लेखा परीक्षा यह सुनिश्चित करती है कि वित्तीय विवरण, वित्तीय स्थिति को उचित व सत्य रूप में प्रस्तुत करते हैं।
- निष्पादन लेखा परीक्षा- यह सार्वजनिक प्रशासन में अच्छे प्रदर्शन को बेहतर बनाने पर केंद्रित होती है। यह इस जाँच पर ध्यान देता है कि क्या सार्वजनिक कार्यक्रम और सेवाएं अर्थव्यवस्था की दक्षता और प्रभावशीलता के सिद्धांत को प्राप्त करती हैं?
यह उन स्थितियों की पहचान करती हैं, जो प्रदर्शन में बाधा डालती हैं
यह लेखा परीक्षक (ऑडिटर) को उपयुक्त सिफारिश प्रस्तुत करने में सक्षम बनाती है।
महाधिवक्ता (Advocate General)
- महाधिवक्ता एक संवैधानिक पद है।
- महाधिवक्ता राज्य में सर्वोच्च विधिक अधिकारी होता है, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
- महाधिवक्ता राज्य सरकार के विधिक सलाहकार के रूप में कार्य करता है एवं अपने कार्य संबंधी दायित्वों के अनुरूप उसे राज्य के सभी न्यायालयों के समक्ष सुनवाई का अधिकार है।
नियुक्ति
- महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा अपने विवेक से की जाती है।
- महाधिवक्ता पद पर नियुक्ति के लिए यह आवश्यक है कि सम्बन्धित व्यक्ति उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने की योग्यता रखता हो।
- मात्र भारतीय नागरिक ही राज्य के महाधिवक्ता पद पर नियुक्ति के पात्र होते हैं।
- महाधिवक्ता पद पर नियुक्ति के लिए वह व्यक्ति पात्र होगा, जिसने उच्च न्यायालय में न्यायाधीश अथवा अधिवक्ता के रूप में 10 वर्षों तक कार्य किया हो।
- महाधिवक्ता पद पर नियुक्ति के लिए आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति को अधिवक्ता के रूप में कार्य करने का न्यूनतम 5 वर्ष का अनुभव हो। जिला न्यायालय में कार्य करने का न्यूनतम 3 वर्ष का अनुभव तथा एक लोक सेवक के रूप में कार्य करने का न्यूनतम 10 वर्षों का अनुभव होना चाहिए।
- महाधिवक्ता पद पर नियुक्ति के लिए व्यक्ति की आयु 62 वर्ष से कम होनी चाहिए।
कार्यकाल
- संविधान द्वारा राज्य के महाधिवक्ता के पद की कार्य अवधि निर्धारित नहीं की गई है।
- अनुच्छेद 165(3) के अनुसार महाधिवक्ता का कार्यकाल राज्यपाल के प्रसादपर्यन्त होता है।
- महाधिवक्ता के प्रतिस्थापन का नाम देने के लिए राज्यपाल सदैव स्वतंत्र होता है।
- राज्यपाल किसी भी समय महाधिवक्ता को पदच्युत कर सकता है।
- राज्यपाल को नोटिस देकर महाधिवक्ता स्वयं अपने पद से सेवानिवृत्त हो सकता है।
वेतन/भुगतान
- संविधान में महाधिवक्ता का वेतन निर्धारित नहीं है। इसके स्थान पर राज्यपाल द्वारा यह निर्धारित किया जाता है कि महाधिवक्ता को कितना भुगतान किया जाएगा।
कार्य/अधिकार
- महाधिवक्ता को विधान मंडल के दोनों सदनों की कार्यवाही में शामिल होने, भाषण देने या विधान मंडल की किसी समिति का सदस्य बनने का अधिकार है, लेकिन वह किसी विधेयक, संकल्प आदि पर मत देने का अधिकारी नहीं है।
- इसके अतिरिक्त राज्य सरकार समय-समय पर आवश्यकतानुसार अपर महाधिवक्ता पद पर नियुक्तियां करती है।
उत्तर प्रदेश राज्य वित्त आयोग
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद-243 (आई) तथा 243 (वाई) में राज्य वित्त आयोग के गठन का प्रावधान है। व्यवस्थानुसार राज्य वित्त आयोग का गठन प्रत्येक 5 वर्ष पर किया जाता है। उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1947 की धारा 32(ए) के प्रावधानों के अंतर्गत राज्यपाल पंचायती राज एवं स्थानीय निकाय हेतु एक राज्य वित्त आयोग का गठन करेंगे।
- राज्य वित्त आयोग यह तय करता है कि राज्य को प्राप्त करों में निकायों, नगरपालिकाओं एवं पंचायती राज संस्थाओं की कितनी हिस्सेदारी होनी चाहिए।
- राज्य वित्त आयोग सरकार को यह भी सुझाव देता है कि निकायों, नगरपालिकाओं और पंचायती राज संस्थाओं की आर्थिक स्थिति कैसे मजबूत की जाए।
- प्रथम राज्य वित्त आयोग का गठन वर्ष 1994 में हुआ था। 5वें वित्त आयोग के अध्यक्ष श्री आनन्द मिश्रा हैं।
- उत्तर प्रदेश में छठे वित्त आयोग का गठन नवम्बर, 2021 में ही होना था, किन्तु चुनावों के कारण स्थगित हो गया।
- उत्तर प्रदेश राज्य वित्त आयोग का नया अध्यक्ष दीपक कुमार को बनाया गया है।
राज्य सूचना आयोग
- राज्य सूचना आयोग (उत्तर प्रदेश) का गठन सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15 के तहत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 14 सितम्बर, 2005 को किया गया।
- न्यायमूर्ति एम.ए. खान राज्य के प्रथम सूचना आयुक्त थे।
- सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 16(1) के अनुसार राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त तथा राज्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष (जो भी पहले हो) तक होगा। राज्य सूचना आयुक्त की पुनः नियुक्ति नहीं की जा सकेगी।
- राज्य के तीसरे राज्य मुख्य सूचना आयुक्त श्री जावेद उस्मानी थे, जो 16 फरवरी, 2020 तक इस पद पर बने रहे।
- उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) राज कुमार विश्वकर्मा को प्रदेश का नया मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही राज्य में 10 नए सूचना आयुक्तों की नियुक्ति भी की गई है।
राज्य महिला आयोग
- उत्तर प्रदेश में महिलाओं के उत्पीड़न संबंधी शिकायतों के निस्तारण तथा महिला सशक्तिकरण के लिये आवश्यक कदम उठाने के उद्देश्य से वर्ष 2002 में राज्य महिला आयोग का गठन हुआ। आयोग के क्रियाकलापों को कानूनी आधार देने के उद्देश्य से 2004 में उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग अधिनियम अस्तित्व में आया। पुनः 2007 और 26 अप्रैल, 2013 को राज्य महिला आयोग अधिनियम में संशोधन कर इसे पुनर्गठित किया गया।
- इस आयोग की वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती बबीता चौहान एवं उपाध्यक्ष श्रीमती अपर्णा यादव एवं श्रीमती चारू चौधरी हैं।
- आयोग की 25 सदस्य भी हैं। सभी का कार्यकाल 2 वर्ष होता है।
- महिला आयोग को सिविल न्यायालय की तरह सम्मन जारी करना, दस्तावेज मंगाना, लोक अभिलेख प्राप्त करना, साक्ष्यों और अभिलेखों के परीक्षण के लिए कमीशन जारी करना आदि शक्तियां प्राप्त हैं।
आयोग का उद्देश्य
- महिलाओं के कल्याण, सुरक्षा, संरक्षण संबंधी अधिकारों की रक्षा करना।
- महिलाओं के शैक्षिक, आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिए प्रयासरत रहना।
- महिलाओं को दिये गये संवैधानिक एवं विधिक अधिकारों से सम्बद्ध उपचारी उपायों के लिए अनुश्रवण के उपरान्त राज्य सरकार को सुझाव एवं संस्तुतियां प्रेषित करना।
आयोग की शक्तियाँ
- किसी वाद का विचारण करने के लिए सिविल न्यायालय को प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार।
- सम्मन करना।
- दस्तावेज मंगाना।
- लोक अभिलेख प्राप्त करना।
- साक्ष्यों और अभिलेखों के परीक्षण के लिए कमीशन जारी करना।
कार्यक्षेत्र
- सिविल न्यायालय को प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार।
- महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा।
- महिलाओं का सशक्तिकरण।
- महिला उत्पीड़न सम्बंधी शिकायतों पर प्रभावी कार्यवाही करना।
- बाल विवाह, दहेज एवं भ्रूण हत्या रोकना।
- कार्य स्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न पर रोक।
- महिलाओं से सम्बंधित कानून में आवश्यकतानुसार संशोधन हेतु शासन को संस्तुतियां देना।
- महिलाओं से सम्बंधित योजनाओं का प्रभावी रूप से क्रियान्वयन करना।
- महिला कारागारों, चिकित्सालयों, छात्रावासों, संरक्षणगृहों तथा अन्य सदृश्य गृहों का निरीक्षण।
आयोग की गतिविधियां
- व्हाट्सऐप नम्बर पर शिकायत- उत्तर प्रदेश महिला आयोग ने व्हाट्सएप नंबर जारी कर रखा है, जिसपर कोई पीड़ित महिला अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है। व्हाट्सऐप के माध्यम से महिला उत्पीड़न से सम्बंधित प्राप्त शिकायती प्रार्थना पत्रों पर आयोग द्वारा तत्काल संज्ञान लेकर सम्बन्धित जनपद के सक्षम अधिकारियों को जांच/आवश्यक कार्यवाही हेतु आदेशित कर उन पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाती है।
- शिकायतों पर नियमित सुनवाई- आयोग में विभिन्न माध्यमों से प्राप्त शिकायती प्रार्थना पत्रों पर त्वरित कार्यवाही कराने एवं पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने के उद्देश्य से सप्ताह के समस्त कार्य दिवसों में अध्यक्ष के निर्देशानुसार सदस्यों के पृथक-पृथक दिवस निर्धारित कर उनका नियत दिवसों पर प्रकरणों की सुनवाई कर शीघ्र निस्तारण किया जाता है।
स्थलीय जनसुनवाई
- प्रदेश की महिलाओं के उत्पीड़न सम्बन्धी शिकायतों के त्वरित निस्तारण हेतु आयोग के पदाधिकारियों द्वारा प्रदेश के समस्त जनपदों में प्रत्येक माह के प्रथम व तृतीय बुधवार को स्थलीय जनसुनवाई के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।
- विभिन्न गृहों का निरीक्षण- आयोग के पदाधिकारियों द्वारा विभिन्न जनपदों में संचालित बालिका गृहों, महिला अस्पतालों, महिला बन्दी गृहों एवं महिलाओं से सम्बन्धित विभिन्न गृहों का निरीक्षण कर संज्ञान में आयी कमियों को दूर करने के लिये सम्बन्धित अधिकारियों को निर्देशित किया जाता है। इस संबंध में आयोग आवश्यकतानुसार शासन को अपना सुझाव अथवा संस्तुतियाँ प्रेषित करता है।
- स्थलीय निरीक्षण- उ.प्र. राज्य महिला आयोग की पदाधिकारियों द्वारा प्रदेश के विभिन्न जनपदों में घटित महिला उत्पीड़न की गम्भीर घटनाओं का स्वतः संज्ञान लेते हुए पीड़िता एवं पीड़ित परिवार से भेंट कर आवश्यकतानुसार स्थलीय जांचोपरान्त सम्बन्धित अधिकारियों को त्वरित कार्यवाही करने के निर्देश दिये जाते हैं।
- स्वतः संज्ञान-आयोग द्वारा प्रदेश में महिला उत्पीड़न की घटनाओं पर रोकथाम और पीड़ित महिलाओं को त्वरित न्याय दिलाये जाने के उद्देश्य से मीडिया के विभिन्न माध्यमों (इलेक्ट्रानिक मीडिया एवं प्रिन्ट मीडिया) पर प्रसारित/प्रकाशित होने वाली घटनाओं का स्वतः संज्ञान लेते हुए घटना की जानकारी प्राप्त करने के साथ ही सम्बन्धित जिलों के पुलिस अधिकारियों को पत्र भेजकर घटनाओं पर समुचित कार्यवाही करने एवं पीड़िता को न्याय दिलाये जाने का प्रयास किया जाता है।
राज्य मानवाधिकार आयोग
- उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 21 के अनुसार 7 अक्टूबर, 2002 को किया गया।
- इसमें एक अध्यक्ष एवं चार सदस्यों की नियुक्ति की गई। इसके वर्तमान अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बाल कृष्ण नारायण हैं।
- उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों को क्रमशः उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं न्यायाधीश के समतुल्य समस्त सुविधायें एवं वेतन भत्ते अनुमन्य हैं। यदि आयोग के अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश रह चुके हैं तो उन्हें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समतुल्य समस्त सुविधायें, वेतन एवं भत्ते प्राप्त होंगे।
- मुख्यालय: लखनऊ
- अध्यक्ष: न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बाला कृष्ण नारायण
- अन्य सदस्य: आयोग में अध्यक्ष के अतिरिक्त अन्य सदस्य भी होते हैं, जिनमें न्यायिक और गैर-न्यायिक सदस्य शामिल हैं।
- कार्य: उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जाँच करता है, मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए कदम उठाता है, और राज्य सरकार को मानव अधिकारों से संबंधित मामलों पर सलाह देता है।
- शिकायतें कोई भी व्यक्ति या उसकी ओर से कोई अन्य व्यक्ति, आयोग में मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत दर्ज करा सकता है।
- यह आयोग मानव अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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