उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका

उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका

किसी भी सशक्त लोकतंत्र की नींव उसकी निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिका पर टिकी होती है। भारत के सबसे बड़े सूबे, उत्तर प्रदेश की न्याय व्यवस्था का सफरनामा भी बेहद गौरवशाली और ऐतिहासिक रहा है। वर्ष 1866 में स्थापित इलाहाबाद उच्च न्यायालय से लेकर न्याय को आम जनमानस के दरवाजे तक ले जाने वाले ग्राम और सचल न्यायालयों (Mobile Courts) तक, यूपी की न्यायिक प्रणाली ने समय के साथ खुद को लगातार सुदृढ़ किया है। इस विस्तृत लेख में हम उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका के संपूर्ण ढांचे, उच्च न्यायालय की शक्तियों, फास्ट ट्रैक कोर्ट और लोक अदालतों से जुड़े हर उस महत्वपूर्ण पहलू पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जो आपकी आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अचूक साबित होंगे।
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उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका: एक दृष्टि

⚖️ भारत में एकीकृत न्यायिक प्रणाली (पदानुक्रम)

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)
उच्च न्यायालय (High Court - UP)
अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts)

🏛️ इलाहाबाद उच्च न्यायालय: महत्वपूर्ण तथ्य

स्थापना
वर्ष 1866

भारत में स्थापित चौथा उच्च न्यायालय। (कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास के बाद)।

संवैधानिक प्रावधान
भाग 6 (अनुच्छेद 214-231)

मुख्य पीठ: इलाहाबाद।
स्थायी खंडपीठ: लखनऊ।

न्यायाधीश क्षमता
160 न्यायाधीश (स्वीकृत)

अधिकतम सेवानिवृत्ति आयु: 62 वर्ष

👨‍⚖️ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश

✓ नियुक्ति एवं योग्यता
  • नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा (कॉलेजियम प्रणाली)।
  • शपथ: राज्यपाल (अनुच्छेद 219)।
  • अनुभव: 10 वर्ष का न्यायिक अनुभव या उच्च न्यायालय में 10 वर्ष तक अधिवक्ता।
  • न्यूनतम आयु: कोई सीमा निर्धारित नहीं।
⚡ उच्च न्यायालय की शक्तियां
  • आरंभिक क्षेत्राधिकार: चुनाव विवाद, मूल अधिकार, अवमानना।
  • रिट अधिकारिता (अनुच्छेद 226): सुप्रीम कोर्ट से अधिक व्यापक (मूल अधिकार + सामान्य कानून)।
  • अभिलेखीय न्यायालय: निर्णयों को परिसाक्ष्य के रूप में रखना।
  • न्यायिक पुनर्विलोकन: कानूनों की संवैधानिकता की जांच।

🛑 न्यायाधीश निष्कासन प्रक्रिया (महाभियोग)

प्रस्ताव
LS(100) या RS(50) सदस्य
जांच समिति
(3 सदस्यीय)
संसद में मतदान
विशेष बहुमत से पास
राष्ट्रपति का आदेश
पद से निष्कासन

📌 जिला न्यायाधीश की दोहरी भूमिका (अनुच्छेद 233)

पद का नाम मामलों की प्रकृति अधिकार क्षेत्र
जिला न्यायाधीश (District Judge) सिविल (दीवानी) मामले जिले का सर्वोच्च न्यायिक पदाधिकारी (दीवानी)।
सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) आपराधिक (फौजदारी) मामले आपराधिक मामलों की सर्वोच्च सुनवाई।

🏢 गैर-संवैधानिक एवं विशेष न्यायालय

🚀 फास्ट ट्रैक कोर्ट
  • 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर स्थापना।
  • UP में नई पहल: 218 नए कोर्ट (144 यौन उत्पीड़न, 74 पॉक्सो एक्ट हेतु)।
  • न्यायालयों की कठोर प्रक्रियाओं से स्वतंत्र।
🤝 लोक अदालत (NALSA)
  • 1995 में NALSA द्वारा व्यावहारिक शुरुआत (अधिनियम-1987)।
  • प्रथम अदालत: 1982, गुजरात।
  • निर्णय अंतिम एवं बाध्यकारी होते हैं (सौहार्दपूर्ण निपटारा)।
🏘️ ग्राम एवं सचल न्यायालय
  • ग्राम न्यायालय (2009): पंचायत स्तर पर, न्यायाधीश 'न्यायाधिकारी' (प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट समकक्ष)।
  • 30 दिन के भीतर अपील का प्रावधान।
  • सचल (Mobile) कोर्ट: ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर न्याय, परिकल्पना डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम।
💻 अन्य प्रमुख न्यायालय
  • ई-कोर्ट: विधि मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित, ऑनलाइन समाधान।
  • राजस्व न्यायालय: शीर्ष- मण्डलायुक्त, न्यूनतम- नायब तहसीलदार।
  • हरित प्राधिकरण: पर्यावरण मामलों हेतु (2012)।

भारतीय संविधान ने एकीकृत न्यायिक प्रणाली की व्यवस्था दी है। देश में सबसे ऊपर है सर्वोच्च न्यायालय और उसके अधीन उच्च न्यायालय एवं निचली अदालतें हैं।
भारत में प्रथम उच्च न्यायालय की स्थापना वर्ष 1862 में हुई थी, जब कलकत्ता, बॉम्बे एवं मद्रास उच्च न्यायालय की स्थापना की गई। इस क्रम में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का भारत में स्थान चतुर्थ है, जिसकी स्थापना वर्ष 1866 में हुई थी।

उच्च न्यायालय

उच्च न्यायालय के कार्य एवं उनके गठन से संबंधित विषय संविधान के अनुच्छेद 214 से 231 (भाग 6) में वर्णित हैं। उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में अवस्थित है, जिसकी एक स्थायी खंडपीठ लखनऊ में स्थित है। वर्तमान में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 160 है। यह संख्या समय-समय पर राष्ट्रपति द्वारा परिवर्तनीय है।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश

नियुक्ति

उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति द्वारा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं राज्य के राज्यपाल के परामर्श पर तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल एवं उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु की कोई सीमा निर्धारित नहीं है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति 'कॉलेजियम प्रणाली' के तहत होती है।

योग्यता

उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने हेतु निम्न योग्यताएं होनी चाहिए-
  1. भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. भारत के न्यायिक पद पर न्यूनतम 10 वर्ष का कार्य अनुभव अथवा वह किसी उच्च न्यायालय (अथवा न्यायालयों) में एक अधिवक्ता के रूप में लगातार 10 वर्ष कार्य कर चुका हो।

शपथ

उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश के लिए पदभार ग्रहण करने से पूर्व राज्यपाल या उसके द्वारा नामित किसी सदस्य के समक्ष शपथ लेना अनिवार्य है। (अनुच्छेद 219)

कार्यकाल

यद्यपि संविधान ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के कार्यकाल की कोई अवधि निर्धारित नहीं की है किंतु यह प्रावधान है कि उच्च न्यायालय का न्यायाधीश अधिकतम 62 वर्ष की उम्र तक अपने पद पर बना रह सकता है।
उच्च न्यायालय का न्यायाधीश अपने पद से राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए त्यागपत्र दे सकता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसके पद से हटाने का संकल्प यदि संसद के दोनों सदनों द्वारा एक विशेष बहुमत से पास किया गया हो तो राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकता है।

निष्कासन की प्रक्रिया

राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उनके पद से निष्कासित कर सकता है जिसका आधार है-
  1. सिद्ध कदाचार
  2. अक्षमता
न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 के तहत न्यायाधीशों के निष्कासन की प्रक्रिया को परिभाषित किया गया है।
इसके अनुसार-
  • किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने हेतु लोकसभा अथवा राज्यसभा किसी भी सदन में प्रस्ताव लाया जा सकता है। लोकसभा के 100 अथवा राज्यसभा के 50 सदस्यों का हस्ताक्षरयुक्त प्रस्ताव सदन के अध्यक्ष/सभापति को देना होता है।
  • यह लोकसभा अध्यक्ष अथवा राज्यसभा के सभापति के विवेकाधिकार पर निर्भर होगा कि वह इस प्रस्ताव को स्वीकार करे या न करे।
  • यदि यह प्रस्ताव स्वीकृत होता है तो लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति (जिस सदन में स्वीकृत हुआ हो) की जिम्मेदारी है कि वह जांच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन करे।

समिति के सदस्य होंगे-
  1. उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या कोई न्यायाधीश।
  2. उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश।
  3. कोई विशिष्ट न्यायविद्।
  4. यह तीन सदस्यीय समिति आरोपों की जांच करेगी और अपनी रिपोर्ट संबंधित सदन को सौंपेगी।
  5. यदि समिति सम्बन्धित न्यायाधीश को दोषी पाती है तो सदन उस न्यायाधीश के विरुद्ध निष्कासन की प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
  6. यदि संसद के दोनों सदन विशेष बहुमत से इस प्रस्ताव को स्वीकृत करते हैं तो राष्ट्रपति उस न्यायाधीश को पद से निष्कासित कर सकता है।

उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता

किसी भी लोकतंत्र की निरंतरता, गतिशीलता एवं सफलता के लिए न्यायपालिका का निष्पक्ष एवं स्वतंत्र होना अति आवश्यक है। इसको ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने निम्न प्रावधान किए हैं-
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, परंतु राष्ट्रपति यह नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से करता है।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पर नहीं होते हैं। उन्हें उनके पद से महाभियोग की कठिन प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं स्टॉफ के वेतन-भत्ते आदि राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं। उन पर विधानमंडल में मतदान नहीं हो सकता।
  • उच्च न्यायालय को यह अधिकार है कि वह अपनी अवमानना के लिए किसी को दण्डित कर सकता है।
  • कार्यकाल के दौरान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन-भत्ते आदि में अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है, मात्र आपातकाल को छोड़कर।
  • उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश उस न्यायालय में बहस अथवा कार्य नहीं कर सकता, जहां वह न्यायाधीश रहा हो।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर संसद अथवा विधानमंडल में कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती, सिवाय तब जब उसके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया चल रही हो।

उच्च न्यायालय की शक्तियां एवं क्षेत्राधिकार

उच्च न्यायालय को संविधान द्वारा व्यापक शक्तियां प्रदत्त की गई हैं, जिससे वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा एवं कानून का शासन स्थापित कर सके।
उच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या से लेकर विधायिका द्वारा लाए गए किसी कानून की संविधान के दायरे में समीक्षा कर सकता है। उच्च न्यायालय को किसी मामले की सुनवाई का अधिकार है, जो उसके समक्ष प्रत्यक्ष या अपील द्वारा लाए जाते हैं। कुछ मामलों में उच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान भी ले सकता है।

उच्च न्यायालय की शक्ति एवं न्यायिक क्षेत्रों को इस प्रकार विभिन्न भागों में बांट सकते हैं-

आरंभिक क्षेत्राधिकार - आरंभिक क्षेत्राधिकार से तात्पर्य है कुछ मामलों की प्रथम सुनवाई सीधे उच्च न्यायालय में हो, न कि किसी अन्य न्यायालय के आदेश के पश्चात अपील के आधार पर। संसद सदस्यों एवं राज्य विधानमंडल सदस्यों के निर्वाचन सम्बन्धी विवाद, नागरिकों के मूल अधिकार एवं न्यायालयों के अवमानना सम्बन्धी मामलों में सीधे उच्च न्यायालय सुनवाई कर सकता है।

रिट अधिकारिता - उच्च न्यायालय को यह अधिकार है कि वह अनुच्छेद 226 के तहत नागरिकों के मूल अधिकारों के हनन एवं अन्य मामलों में रिट (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, उत्प्रेषण, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा) जारी कर सकता है।
उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता क्षेत्र सर्वोच्च न्यायालय के रिट अधिकारिता क्षेत्र से व्यापक है, क्योंकि उच्च न्यायालय रिट अधिकारिता के अंतर्गत मूल अधिकारों के साथ-साथ सामान्य कानून के प्रवर्तन हेतु भी रिट जारी कर सकता है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता मूल अधिकारों तक सीमित है।

अपीलीय अधिकारिता - उच्च न्यायालय में अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णयों को अपील के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है। यह व्यवस्था सिविल एवं आपराधिक दोनों मामलों में दिए गए निर्णयों के विरुद्ध हो सकती है।

अभिलेखीय न्यायालय - उच्च न्यायालय अभिलेखीय न्यायालय होता है। इसके निर्णयों को शाश्वत स्मृति एवं परिसाक्ष्य के लिए रखा जाता है एवं अधीनस्थ न्यायालयों में कार्यवाही के समय इस पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है।
अभिलेखीय न्यायालय के रूप में उच्च न्यायालय के पास अपनी अवमानना के लिए दंडित करने का भी अधिकार है।

न्यायिक पुनर्विलोकन का अधिकार - उच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 13 एवं 226 के तहत राज्य एवं केंद्र सरकार के विधिक एवं शासकीय आदेशों की संवैधानिकता के परीक्षण का अधिकार है।

अधीनस्थ न्यायालय

राज्य की न्यायपालिका एक उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालयों से मिलकर बनी हुई है। संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों से संबंधित उपबंधों की चर्चा की गई है।

अधीनस्थ न्यायालय
  • जिला न्यायालय
  • जिला मुंसफ न्यायालय
  • प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय
  • द्वितीय श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट का न्यायालय

जिला न्यायालय

संबंधित जिलों में जिला न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय होता है। इसका प्रमुख जिला एवं सत्र न्यायाधीश होता है। सिविल एवं आपराधिक मामलों में जिला एवं सत्र न्यायाधीश का पद सर्वोपरि होता है।

जिला न्यायाधीश

जिला न्यायाधीश की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय के परामर्श पर की जाती है। जिले में यह सर्वोच्च न्यायिक पदाधिकारी होता है।
जिला न्यायाधीश दो भूमिकाओं में कार्य करता है-
  • जिला न्यायाधीश जब आपराधिक मामलों की सुनवाई करता है तो वह 'सत्र न्यायाधीश' (Sessions Judge) कहलाता है।
  • जब वह सिविल मामलों की सुनवाई करता है तो 'जिला न्यायाधीश' (District Judge) कहा जाता है।

योग्यताएं
अनुच्छेद 233 के अनुसार जिला न्यायाधीश की योग्यताएं निम्न हैं-
  1. जिला न्यायाधीश नियुक्त होने वाला व्यक्ति सरकारी कर्मचारी नहीं होना चाहिए।
  2. एक अधिवक्ता के रूप में न्यूनतम सात वर्षों का अनुभव।
  3. उच्च न्यायालय से उसकी नियुक्ति की सिफारिश हो।
जिला न्यायाधीश के अतिरिक्त अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीश की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा लोक सेवा आयोग के द्वारा बनाये गये नियमों (जिसे लोक सेवा आयोग उच्च न्यायालय के परामर्श से बनाता है) के आधार पर की जाती है।

गैर-संवैधानिक न्यायालय

यद्यपि गैर-संवैधानिक न्यायालयों के विषय में संविधान में प्रावधान दिए गए हैं, परंतु इनकी स्थापना सामान्यतः संसद द्वारा पारित अधिनियम से होती है। इन न्यायालयों के सृजन की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि-
  • न्यायालयों, विशेषकर निचली अदालतों, में लंबित मामलों की बड़ी संख्या।
  • कारागारों में अत्यधिक भीड़ (Overcrowding), बहुत से कैदी ऐसे हैं जो अभियोगाधीन (Undertrial) हैं।

फास्ट ट्रैक कोर्ट

फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर की गई थी। वित्त आयोग ने अदालतों में लंबित मामलों को निपटाने के लिए 5 वर्ष के लिए 1729 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की सलाह दी थी। हालांकि फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था 5 वर्ष बाद भी जारी रखी गयी।
फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना सांविधिक (Statutory) होती है। यह न्यायालयों की कठोर प्रक्रियाओं से बाध्य नहीं होते हैं। इन्हें सेवानिवृत्त, जिला न्यायाधीशों, अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों द्वारा संचालित किया जाता है।

खोले जायेंगे 218 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट
उत्तर प्रदेश सरकार ने 218 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा को रोकना है। 218 में से 144 कोर्ट केवल यौन उत्पीड़न से संबंधित मामलों की सुनवाई करेंगे। शेष 74 पॉक्सो एक्ट के तहत आए मामलों की सुनवाई करेंगे। इसके लिए प्रदेश सरकार ने ₹75 लाख की राशि अनुमानित की है।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA)

इसकी शुरुआत 1995 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गयी। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण को एक सांविधिक संस्था का दर्जा दिया। इस प्राधिकरण को स्थापित करने का उद्देश्य पूरे देश में एक समान मुफ्त एवं सक्षम न्यायिक सेवा को समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंचाना है। भारत का मुख्य न्यायाधीश इस प्राधिकरण का मुख्य संरक्षक होता है।

प्राधिकरण द्वारा मुफ्त न्यायिक सेवा के लिए पात्रता
  • महिलाएं एवं बच्चे
  • अनुसूचित जाति एवं जनजाति के सदस्य
  • औद्योगिक कामगार
  • एक निश्चित सीमा से कम आय वाले व्यक्ति
  • व्यक्ति जो न्यायिक अभिरक्षा में है
  • प्राकृतिक या औद्योगिक आपदा पीड़ित
  • मानव तस्करी के शिकार

लोक अदालत

लोक अदालतें राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा संचालित होती हैं। इनकी स्थापना वैधानिक सेवा अधिकारिता अधिनियम-1987 (Legal Services Authority Act-1987) द्वारा हुई, जिन्हें व्यावहारिक रूप से 1995 में लागू किया गया।
लोक अदालतें किसी न्यायालय में लंबित मामले या अन्य विवाद जो अभी न्यायालय के समक्ष नहीं लाए गए हैं, ऐसे विवादों का सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटारा करती हैं।
लोक अदालतों की स्थापना का विचार सर्वप्रथम भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती द्वारा दिया गया था। देश में प्रथम लोक अदालत 1982 में गुजरात में आयोजित हुई थी। वर्ष 2002 में संसद द्वारा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम पारित कर लोक अदालतों को स्थायी बना दिया गया।
  • लोक अदालतों द्वारा दिए गए फैसले अंतिम एवं बाध्यकारी होते हैं।
  • लोक अदालतें अनौपचारिक अदालतें (Informal Courts) हैं।

ग्राम न्यायालय

ग्राम न्यायालय की स्थापना ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 द्वारा की गई है। यह 2 अक्टूबर, 2009 से प्रभाव में आया। इसका उद्देश्य न्याय की समयबद्ध उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
ग्राम न्यायालयों का न्यायाधीश 'न्यायाधिकारी' कहलाता है, जिसकी शक्तियां एवं योग्यता प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समकक्ष होती हैं। न्यायाधिकारी की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है।

ग्राम न्यायालय की शक्तियां एवं अधिकार क्षेत्र

ग्राम न्यायालय के पास सिविल एवं आपराधिक दोनों तरह के मामलों की सुनवाई का प्राधिकार होता है।
  • ग्राम न्यायालय चलते-फिरते न्यायालय (Mobile Courts) होते हैं, जो अपने निकटवर्ती गांवों में जाकर मामलों की सुनवाई करेंगे।
  • ग्राम न्यायालय प्रत्येक पंचायत में खण्ड स्तर पर स्थापित किये जायेंगे।
  • ग्राम न्यायालय द्वारा फैसला देने के 30 दिनों के भीतर उस फैसले को चुनौती देने का प्रावधान है। सिविल मामलों में जिला न्यायालय एवं आपराधिक मामलों में सत्र न्यायालय में अपील की जा सकती है।
  • 6 माह के भीतर जिला एवं सत्र न्यायालय को इन पर अपना फैसला देना होगा।
  • उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2019 में ग्राम न्यायालयों के प्रभावी प्रबंधन हेतु 72 नए पद सृजित किए हैं।

ई-कोर्ट

ई-न्यायालय परियोजना न्यायिक प्रक्रिया और उत्पादकता को गुणात्मक एवं मात्रात्मक तरीके से बढ़ाने और न्याय प्रणाली को सस्ती, सुलभ, किफायती और नागरिकों के लिए पारदर्शी बनाने में मदद करता है। यह परियोजना विधि मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा संचालित एवं वित्त पोषित है। ई-न्यायालय में सूचना एवं प्रौद्योगिकी के माध्यम से मामलों को ऑनलाइन सुलझाया जाता है।

सचल न्यायालय

सचल न्यायालय (Mobile Courts) से तात्पर्य ऐसे कोर्ट से है जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर सुनियोजित एवं समयबद्ध तरीके से ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय दिला सकें। इसकी परिकल्पना सर्वप्रथम पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने की थी। इस परियोजना का उद्देश्य है न्याय व्यवस्था को जनता के घर-घर पहुंचाना। सचल न्यायालय सिविल एवं आपराधिक दोनों मामलों की सुनवाई कर सकते हैं। इन्हें जमानत देने, सम्मन जारी करने, पुलिस रिपोर्ट प्राप्त करने, साक्ष्य अभिलेखन, फैसला देने, सजा देने एवं जेल भेजने तक का अधिकार प्राप्त है।

राजस्व न्यायालय

राजस्व सम्बन्धी मामलों की सुनवाई के लिए इन न्यायालयों की स्थापना की जाती है। इस श्रेणी में सबसे ऊपर मण्डलायुक्त का न्यायालय और सबसे नीचे नायब तहसीलदार का न्यायालय होता है। दोनों के बीच में जिलाधिकारी (District Magistrate), उपजिलाधिकारी (SDM) तथा तहसीलदार के न्यायालय होते हैं।
पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए 1982 में परिवार न्यायालय की स्थापना की गयी।
पर्यावरणीय मामलों की सुनवाई के लिए वर्ष 2012 में 'हरित प्राधिकरण' (Green Tribunal) की स्थापना की गयी।

दोस्तों, हमें उम्मीद है कि इस लेख में दी गई जानकारी आपके लिए मददगार साबित हुई होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सही और सटीक जानकारी होना बहुत जरूरी है। ऐसे ही महत्वपूर्ण टॉपिक्स को आसान भाषा में पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट WWW.UPGK.IN पर नियमित रूप से विजिट करते रहें। इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।