उत्तर प्रदेश के प्राचीन नगर एवं धरोहर

उत्तर प्रदेश के प्राचीन नगर एवं धरोहर

उत्तर प्रदेश की पावन माटी में केवल इतिहास के पन्ने नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष की सांस्कृतिक आत्मा बसती है। गंगा, यमुना और सरयू नदियों के किनारे बसे इस प्रदेश के प्राचीन नगरों ने मानव सभ्यता का उदय, शक्तिशाली महाजनपदों का वैभव और भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध व महावीर के पदचापों की गूंज बहुत करीब से सुनी है। इस ऐतिहासिक सफरनामे में हम आपको कौशाम्बी के प्राचीन व्यापारिक मार्गों से लेकर काशी के मोक्षदायी घाटों, और अयोध्या के स्वर्णिम काल से लेकर हड़प्पा कालीन आलमगीरपुर के अनसुलझे रहस्यों तक ले जाएंगे। आइए, उत्तर प्रदेश के प्राचीन नगरों एवं उनकी अमूल्य धरोहरों के इस गौरवशाली इतिहास को गहराई से जानें।
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उत्तर प्रदेश के प्राचीन नगर एवं धरोहर

उत्तर प्रदेश की पावन माटी में केवल इतिहास के पन्ने नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष की सांस्कृतिक आत्मा बसती है। गंगा, यमुना और सरयू नदियों के किनारे बसे इस प्रदेश के प्राचीन नगरों ने मानव सभ्यता का उदय, शक्तिशाली महाजनपदों का वैभव और भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध व महावीर के पदचापों की गूंज बहुत करीब से सुनी है।

अतरंजीखेड़ा: पुरातात्विक सांस्कृतिक विकास (Chronology)

गैरिक मृद्भाण्ड संस्कृति
(OCP)
कृष्ण-लोहित मृद्भाण्ड
(BRW)
चित्रित धूसर मृद्भाण्ड
(PGW)
उत्तरी काली चमकीली
(NBPW)

महाजनपद काल: प्रमुख राज्य और उनकी राजधानियाँ

महाजनपद / राज्य राजधानी / प्रमुख नगर विशेष ऐतिहासिक तथ्य
वत्स कौशाम्बी व्यापारिक केंद्र; शासक उदयन बुद्ध के समकालीन।
शाक्य कपिलवस्तु बुद्ध के पिता शुद्धोधन की राजधानी; बुद्ध का आरंभिक जीवन।
कोशल श्रावस्ती / साकेत / अयोध्या बुद्ध ने श्रावस्ती में सर्वाधिक उपदेश दिए; अनाथपिण्डक ने 'जेतवन' दान दिया।
पांचाल काम्पिल्य (दक्षिण) / अहिच्छत्र (उत्तर) काम्पिल्य में द्रौपदी स्वयंवर; अहिच्छत्र में 23वें तीर्थंकर को ज्ञान।
मल्ल कुशीनगर / पावा कुशीनगर में बुद्ध का और पावा में महावीर स्वामी का महापरिनिर्वाण।
शूरसेन मथुरा वैष्णव सम्प्रदाय का केंद्र; कुषाण कालीन 'मथुरा शैली' का विकास।
कौरव हस्तिनापुर राजा परीक्षित का शासन; प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव का निवास।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख ऐतिहासिक नगर

कौशाम्बी

वत्स राज्य जैन तीर्थ
  • छठें जैन तीर्थंकर श्री पद्मप्रभु की जन्मभूमि।
  • अशोक ने दो स्तम्भों पर ब्राह्मी लिपि में लेख उत्कीर्ण कराए।
  • कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में यहाँ के वस्त्रों की प्रशंसा।

काशी / वाराणसी

विद्वानों का राज्य
  • महाजनपद काल में अजातशत्रु का शासन।
  • सूती, रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों के लिए विश्वविख्यात।
  • 23वें जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की जन्मस्थली (नाग राजवंश)।
  • भारशिव नागवंशीय शासकों ने दस अश्वमेघ यज्ञ कराये (दशाश्वमेध घाट)।

कुशीनगर एवं पावा

बौद्ध जैन
  • कुशीनगर: गौतम बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली (शालवन)। लेटी हुई बुद्ध प्रतिमा स्थित है।
  • पावा: जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली (मल्ल राजा सस्तिपाल के प्रासाद में)।

अयोध्या (साकेत)

रामायण काल जैन तीर्थ
  • कोशल का प्रमुख नगर, सरयू नदी के तट पर।
  • जैन धर्म के प्रवर्तक ऋषभदेव का जन्म (सूर्यवंश)।
  • पुष्यमित्र शुंग ने यहाँ दो अश्वमेध यज्ञ किए (धनदेव का प्रस्तर लेख)।

मथुरा एवं वृन्दावन

वैष्णव केंद्र
  • मथुरा: मेगस्थनीज ने इसे 'शूरसेन' कहा। कुषाण काल में मूर्तिकला की 'मथुरा शैली' विकसित हुई।
  • वृन्दावन: बांके बिहारी, गोविन्ददेव (मानसिंह द्वारा 1590 में निर्मित) मन्दिर प्रसिद्ध हैं।

सारनाथ (ऋषिपत्तन)

धर्म चक्र प्रवर्तन
  • बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश (5 ब्राह्मणों को) यहीं दिया।
  • सम्राट अशोक द्वारा निर्मित 'धर्मराजिका स्तूप' और सिंह स्तम्भ (लाट)।

कन्नौज

हर्षवर्धन की राजधानी
  • प्राचीन नाम 'कन्या कुब्ज'।
  • हर्षवर्धन ने राजधानी स्थानेश्वर से कन्नौज स्थानान्तरित की।
  • 8वीं सदी में पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूटों के मध्य 'त्रिपक्षीय युद्ध' का केंद्र।

आलमगीरपुर

हड़प्पा सभ्यता
  • हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक पूर्वी पुरास्थल
  • मेरठ जिले में हिण्डन नदी के तट पर स्थित।
  • खोज: यज्ञदत्त शर्मा (1958 ई.)।

चित्रकूट

धार्मिक स्थल
  • पयस्विनी (मन्दाकिनी) नदी के तट पर।
  • भगवान राम का वनवास निवास तथा महर्षि वाल्मीकि का आश्रम।
  • तुलसीदास ने 'रामचरित मानस' की रचना यहीं की।

कौशाम्बी

  • प्राचीन काल में कौशाम्बी एक विशिष्ट नगर था। यह प्रयागराज से 48 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में यमुना तट पर स्थित था।
  • कौशाम्बी छठें जैन तीर्थंकर श्री पद्मप्रभु की जन्मभूमि बतायी जाती है।
  • सातवीं शताब्दी ई. में भारत आये चीनी यात्री युवान च्वांग (ह्वेनसांग) के अनुसार कौशाम्बी में दस से अधिक बौद्ध विहार थे, जो तब भग्नावशेष की स्थिति में पहुँच चुके थे।
  • कौशाम्बी का उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य में भी प्राप्त होता है। यहां खुदाई से पुरातत्व की अनेक महत्वपूर्ण सामग्री प्राप्त हुई है।
  • कौशाम्बी, महाजनपद काल में वत्स राज्य की राजधानी थी, जिसका शासक उदयन बुद्ध का समकालीन और उनका प्रिय शिष्य था।
  • कौशाम्बी को महाजनपद काल में उत्तर भारत का सबसे प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र माना जाता था।
  • कौशाम्बी में मौर्य सम्राट 'अशोक' ने दो स्तम्भों पर ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में लेख उत्कीर्ण कराए हैं। कौशाम्बी में एक अन्य कुषाण कालीन स्तम्भ प्राप्त हुआ है।
  • कौटिल्य ने अपनी पुस्तक 'अर्थशास्त्र' में कौशाम्बी में निर्मित वस्त्रों की प्रशंसा की है।
  • यहाँ गौतम बुद्ध की एक मूर्ति प्राप्त हुई है, जिस पर कुषाण कालीन लेख उत्कीर्ण है।

कपिलवस्तु

  • पौराणिक मान्यता के अनुसार कपिलवस्तु महर्षि कपिल की तपोभूमि थी।
  • महात्मा बुद्ध के पिता शाक्य नरेश शुद्धोधन की राजधानी कपिलवस्तु थी। बुद्ध के जीवन के आरंभिक 29 वर्ष यहीं बीते थे। गृहत्याग के बाद भी बुद्ध यहां कई बार आए। बौद्ध काल में यह एक समृद्धशाली नगर था।
  • चीनी यात्री फाह्यान ने इस नगर की बहुत प्रशंसा की है।
  • युवान-च्वांग (ह्वेनसांग) ने इस नगर की परिधि 4000 मील बताई है।
  • महाजनपद काल में कपिलवस्तु नगर की ख्याति अधिक थी, क्योंकि यह बुद्ध का गृह स्थान था। उनके विश्राम के लिए शाक्यों ने नगर के निकट निग्रोधाराम विहार का निर्माण कराया था। इस विहार में गौतम बुद्ध प्रथम बार 20,000 शिष्यों के साथ आये थे।
  • बौद्धग्रन्थ ललित विस्तर के अनुसार कपिलवस्तु उद्यानों, महलों, भवनों तथा हाट-बाजारों' से सुसज्जित था।
  • कपिलवस्तु व्यापार की दृष्टि से भी प्रसिद्ध था। यहाँ के नागरिक व्यापार में अधिक रुचि रखते थे।
  • कपिलवस्तु के निकट ही लुम्बिनी नामक ग्राम स्थित था, जहाँ गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था। गौतम बुद्ध की जन्मभूमि होने के कारण लुम्बिनी की गणना बौद्ध धर्म के चार प्रधान तीर्थों में की जाती है।

काशी

  • भारत के प्राचीनतम तीर्थ स्थलों में काशी का अपना विशिष्ट स्थान है। वैदिक ग्रन्थों में काशी का वर्णन एक समृद्ध और 'विद्वानों के राज्य' के रूप में किया गया है, जिसका राजा अजातशत्रु था।
  • वाराणसी काशी की राजधानी थी। पुराणों और स्मृतियों में काशी (वाराणसी) को प्राचीन नगर बताया गया है।
  • महाजनपद काल (600 ई.पू.) में काशी एक छोटा राज्य था, जिसे कोशल के राजा ने जीतकर अपने राज्य में मिला लिया था। बाद में कोशलनरेश महाकोसलादेव ने अपनी बेटी के विवाह में मगध सम्राट बिम्बसार को काशी दहेज के रूप में दे दिया।
  • काशी की गणना बुद्ध के प्रिय शिष्य आनन्द द्वारा तथागत के परिनिर्वाण हेतु बताये गए बड़े नगरों में की गई थी।
  • चीनी यात्रियों ने काशी को 'पो-लो-निस्से' कहा है।
  • डॉ. अल्तेकर के मत में इसका वाराणसी नाम पड़ने का कारण वरुणा (वरना) तथा अस्सी नदियों के बीच स्थित होना है।
  • मौर्य शासकों के समय में यह नगर शिक्षा और व्यापार का एक विशिष्ट केन्द्र था। इसके निकट सारनाथ में सम्राट अशोक ने एक स्तूप का निर्माण कराया था, जो उसी स्थान पर स्थित था, जहाँ गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) दिया था।
  • मौर्य शासकों के बाद यह नगर क्रमशः शुंगों तथा कण्वों के राज्य में सम्मिलित हो गया।
  • काशी (वाराणसी) प्रारम्भ से ही सूती, रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों के निर्माण हेतु प्रसिद्ध थी। यहाँ के रेशमी वस्त्रों की प्रशंसा पतंजलि ने अपनी पुस्तक 'महाभाष्य' में की है। काशी को पुराणों में 'शिवपुरी' कहा गया है। इस नगर की गणना भारत की सात मोक्षदायी पुरियों में की गई है।

कोशल (कोसल)

  • कोशल का उल्लेख एक देश के रूप में सर्वप्रथम भागवत पुराण में प्राप्त होता है। इसकी गणना षोडश महाजनपदों में एक विशिष्ट महाजनपद के रूप में की जाती थी।
  • कोशल, कुरु के पूरब तथा विदेह के पश्चिम में अवस्थित था। सदानीरा नदी, जिसे गण्डक से समीकृत किया जाता है, कोशल को विदेह से अलग करती थी।
  • कोशल की महत्ता का उल्लेख रामायण में मिलता है। राम के पश्चात कोशल दो भागों में विभाजित हो गया। राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश दक्षिण कोशल तथा छोटे पुत्र लव उत्तर कोशल के शासक बने।
  • बौद्ध तथा जैन ग्रंथों से ज्ञात होता है कि प्रभुत्व के निमित्त काशी तथा कोशल में प्रतिद्वन्द्विता थी, जिसके कारण दोनों के मध्य कई बार युद्ध हुए। कालान्तर में काशी राज्य कोशल जनपद में समाहित कर लिया गया।
  • महाजनपद काल में कोशल का प्रतापी राजा प्रसेनजीत हुआ, जो बुद्ध का समकालीन तथा उनका प्रियजन था।
  • कोशल की राजधानी श्रावस्ती में बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश दिए। अपना सर्वाधिक वर्षाकाल बुद्ध ने श्रावस्ती में बिताये। यहीं उन्होंने अंगुलिमाल नामक डाकू को अपना शिष्य बनाया था।
  • श्रावस्ती में ही अनाथपिण्डक नामक श्रेष्ठी ने स्वर्ण मुद्राओं के बदले खरीद कर 'जेतवन' बुद्ध को दान दिया था। यह आम का बागीचा बुद्ध को अतिप्रिय था, जिसे अनाथपिण्डक ने कोशल के राजकुमार जेत से खरीदकर बुद्ध को भेंट किया था।

काम्पिल्य

  • प्राचीन नगरी काम्पिल्य (कम्पिल) गंगा तट पर वर्तमान बदायूँ और फर्रुखाबाद के मध्य अवस्थित थी। यहां तेरहवें जैन तीर्थंकर श्री वासुपूज्य का जन्म हुआ था। यह जैन धर्म का पवित्र तीर्थ स्थल होने के कारण प्रख्यात था।
  • रामायण में काम्पिल्य का उल्लेख इन्द्रपुरी, अमरावती की भाँति भव्य और सुन्दर नगरी के रूप में मिलता है।
  • महाभारत के अनुसार काम्पिल्य पांचाल जनपद की राजधानी थी। यहां द्रौपदी के पिता द्रुपद का शासन था। यहाँ पर द्रौपदी का स्वयंवर आयोजित किया गया था।
  • छठीं शताब्दी ई.पू. पांचाल की गणना सोलह महाजनपदों में की जाती थी। वर्तमान में यहां बरेली, मुरादाबाद, बदायूं, पीलीभीत जैसे नगर स्थित हैं।
  • आधुनिक काम्पिल्य में दो प्रसिद्ध जैन मन्दिर हैं।
  • काम्पिल्य को कुछ विद्वानों ने प्रसिद्ध ज्योतिष आचार्य वराहमिहिर की जन्मस्थली माना है। वराहमिहिर चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। उन्होंने प्रसिद्ध ज्योतिषग्रन्थ 'बृहत्संहिता' की रचना की।

कुशीनगर

  • कुशीनगर गौतमबुद्ध की महापरिनिर्वाणस्थली है। प्राचीन भारत में यह राजनीतिक केन्द्र के साथ-साथ धार्मिक तथा व्यापारिक केन्द्र भी था।
  • छठी शताब्दी ई.पू. में यह मल्ल गणराज्य की राजधानी थी। बौद्ध ग्रन्थों में कुशीनगर की गणना कपिलवस्तु एवं पावा के साथ की गयी है।
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग के कथनानुसार यह नगर (कु-शिह-न-लो) रामग्राम (वर्तमान गोरखपुर) से एक सौ पचास मील की दूरी पर अवस्थित था। इस नगर की परिधि दो मील के लगभग थी।
  • फाह्यान के आने के समय यह नगर उजड़ चुका था। उसके वृत्तान्त से पता चलता है कि शालवन (जहां बुद्ध का महा परिनिर्वाण हुआ था) हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित था।
  • ह्वेनसांग ने लिखा है कि कुशीनगर के उत्तर-पूर्व कोने पर अशोक द्वारा निर्मित एक स्तूप मौजूद था। इस स्थान पर चुंद कर्मार का मकान था, जहाँ बुद्ध ने भोजन किया। यह भोजन बुद्ध की मृत्यु का कारण बना।
  • शालवन में ईंटों से निर्मित एक बड़ा चैत्य था, जिसमें एक मूर्ति रखी मिली है। इसमें गौतम बुद्ध उत्तर की ओर सिर किये लेटी अवस्था में प्रदर्शित किये गये हैं। यह प्रतिमा आज भी कुशीनगर के प्रसिद्ध मंदिर में विद्यमान है।

गोवर्धन

  • मथुरा जिले में वृन्दावन से लगभग तीस किलोमीटर दूरी पर यह नगर पर्वत पर स्थित है, जिसका उल्लेख योगिनीतंत्र में मिलता है।
  • महाभारत के उद्योग पर्व में कहा गया है कि अतिवृष्टि के कारण भगवान इन्द्र से अपनी गायों तथा पुरवासियों की रक्षा करने हेतु वासुदेव कृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका पर छत्र के रूप में गोवर्धन को धारण किया था।
  • भागवत पुराण के अनुसार गोवर्धन पहाड़ी पर चक्रेश्वर महादेव का मन्दिर तथा श्रीनाथ (गोपाल) की मूर्ति स्थित है।

चित्रकूट

  • प्रयागराज के दक्षिण-पश्चिम में 104 किलोमीटर दूर बाँदा जिले में चित्रकूट एक पहाड़ी पर स्थित है। रामायण के अयोध्याकाण्ड में इसे भारद्वाज आश्रम से 20 मील दूर स्थित बताया गया है।
  • भागवत पुराण तथा बौद्ध ग्रन्थ ललित विस्तर में चित्रकूट को एक पहाड़ी के रूप में वर्णित किया गया है।
  • जैनग्रंथ भगवती सूत्र में चित्रकूट को चित्तकुड कहा गया है।
  • कालिदास ने 'रघुवंशम' में इसे 'किसी वन्य वृषभ द्वारा अपने सींगों पर उठायी गयी चट्टान की भाँति' बताया है।
  • चित्रकूट पयस्विनी या मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। भारद्वाज आश्रम से लौटते समय भगवान राम ने यहाँ आकर कुछ दिनों तक निवास किया था।
  • मान्यता के अनुसार महर्षि वाल्मीकि का आश्रम यहीं था। यहाँ अनेक धार्मिक स्थल हैं। इनमें राघव, प्रयाग, कैलाश घाट, राम घाट तथा धृतिकल्प घाट महत्वपूर्ण हैं। रामघाट के पास पर्ण कुटी है, जहाँ भगवान राम ने निवास किया था।
  • महाकवि तुलसीदास ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा चित्रकूट में बिताया था। यहां रहकर उन्होंने 'रामचरित मानस' समेत अनेक ग्रन्थों की रचना की। यहां कुछ दिनों तक उनके साथ प्रसिद्ध कवि 'रहीम' भी रहे थे।

पावा

  • पावा जैनियों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल माना जाता है। प्राचीन समय में पावा नाम के तीन नगर थे। जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली पावा थी। बौद्ध ग्रंथों में भी उनकी निर्वाण स्थली पावा को बताया गया है।
  • अधिकांश विद्वानों की धारणा है कि पावा गंगा नदी के उत्तर में थी, किन्तु इसके निश्चित स्थान के विषय में मतभिन्नता है। फिर भी इसे कुशीनगर जनपद में आज के कसया, पडरौना तथा सठियांव क्षेत्र में स्थित माना जाता है। यहां जैन धर्म के अनेक प्राचीन अवशेष आज भी विद्यमान हैं।
  • पावा गोरखपुर जिले के पूरब में कुशीनगर जनपद के अन्तर्गत छोटी गंडक नदी के तट पर स्थित थी। अनेक विद्वानों के अनुसार पडरौना पावा का परिवर्तित रूप है, जो पावा, पावान, पाडरवान से पडरौना हो गया है। पावा का उल्लेख पालि ग्रंथों में मिलता है।
  • धर्म प्रचार के लिए गौतम बुद्ध का पावा में कई बार आगमन हुआ था। वह जीवन के अन्तिम वर्षों में यहाँ पधारे थे। उस समय गौतम बुद्ध ने यहां चुंद कर्मार नामक एक लोहार के यहाँ भोजन किया था, जो उनकी मृत्यु (महापरिनिर्वाण) का कारण बना।
  • जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी का परिनिर्वाण पावा में नरेश सस्तिपाल के प्रासाद में कार्तिक कृष्णा अमावस्या में हुआ था। यह पावा मल्ल राजाओं की राजधानी थी। यहाँ का प्रसिद्ध राजा सस्तिपाल था।

प्रयागराज

  • ऋग्वेद में प्रयाग का सर्वप्रथम विवरण मिलता है। ऋग्वेद के अनुसार प्रयाग अतिपवित्र तीर्थ स्थल था।
  • महाभारत के अनुसार यह समस्त संसार का पवित्रतम स्थान है। भगवत गीता के अनुसार यह एक धर्म क्षेत्र है।
  • प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में प्रयाग को गंगा तट पर स्थित एक पवित्र तीर्थ और घाट बताया गया है।
  • प्रयागराज में गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदियों का संगम है। हिन्दू इस संगम को बहुत पवित्र मानते हैं। कालिदास ने अपने महाग्रंथ 'रघुवंशम' में इस संगम का उल्लेख किया है।
  • यहाँ प्रति बारहवें वर्ष 'कुम्भ', 6 वर्ष पर 'अर्ध कुंभ' तथा तीसरे वर्ष 'कुंभ' पर्व का आयोजन होता है।
  • मुगल बादशाह अकबर ने प्रयागराज का नामकरण 'अल्लाह का घर' मानते हुए इलाहाबाद कर दिया था, जिसे बीते दिनों प्रदेश सरकार ने बदलकर इसका नाम पुनः प्रयागराज कर दिया।

वृन्दावन

  • मथुरा से लगभग 9 किलोमीटर की दूरी पर वृन्दावन बसा है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार यहां भगवान कृष्ण ने अपनी रास-लीलाएँ प्रदर्शित की थीं।
  • हरिवंश पुराण में वृन्दावन का वर्णन यमुना तट स्थित एक रमणीय वन के रूप में किया गया है। यहाँ पर वृन्दा (जो राधा के सोलह नामों में से एक है) ने तप किया और अपना भौतिक शरीर त्यागा था। यहाँ की देवी राधा हैं।
  • वृन्दावन में बहुत से मंदिर हैं, जिनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध बांके बिहारी, गोविन्ददेव और श्री रंगनाथ जी के मन्दिर हैं। इनके अतिरिक्त इस्कान टेंपल एवं प्रेममंदिर यहां के विशेष आकर्षण हैं। गोविन्द देव के मन्दिर का निर्माण सन् 1590 में महाराज मानसिंह ने करवाया था।

वाराणसी

  • वाराणसी का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद में काशी की राजधानी के रूप में हुआ है। सामान्यतः इसे काशी के नाम से ही जाना जाता है।
  • वाराणसी गंगा के उत्तरी तट पर दो सहायक नदियों वरुणा और अस्सी के बीच में स्थित है।
  • वाराणसी की ख्याति प्राचीन समय से प्रसिद्ध विद्या केन्द्र के रूप में रही है। मौर्य शासकों के समय में यह एक विशिष्ट केन्द्र था।
  • वाराणसी गौतम बुद्ध के समय में भी धर्म, संस्कृति और ज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण केन्द्र थी।
  • बुद्ध ने अपना प्रसिद्ध प्रथम धर्मोपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) यहां से 11 किमी दूर स्थित सारनाथ में दिया था।
  • वाराणसी प्राचीन काल में विख्यात व्यापारिक क्षेत्र था। यह नगर प्रारम्भ से ही सूती, रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था।
  • वाकाटक वंश के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि बघेलखण्ड के 'भारशिव' नागवंशीय शासकों ने वाराणसी के निकट गंगाघाटी को जीतकर दस अश्वमेघ कराये थे। प्रसिद्ध इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार दस अश्वमेघ यज्ञों का जहां अनुष्ठान हुआ, वही आज का दशाश्वमेध घाट है।
  • वाराणसी को जैन मतानुयायी अपना महत्वपूर्ण केन्द्र मानते हैं। जैन ग्रन्थों के अनुसार उनके 23वें तीर्थंकर स्वामी पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी के ही नाग राजवंश में हुआ था।
  • वाराणसी को पुराणों में 'शिवपुरी' कहा गया है।

मथुरा

  • प्राचीन मथुरा नगर आज भी यमुना तट पर स्थित है। इसकी गणना उत्तर-प्रदेश के विख्यात तीर्थ स्थानों में की जाती है।
  • प्राचीन ग्रन्थों में मथुरा के अन्य कई नाम भी मिलते हैं-मदुरा, मो-तुलो, मेथोरा, शौर्यपुर तथा शोदीपुर।
  • 305 ई.पू. भारत आए यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक 'इंडिका' में मथुरा को 'शूरसेन' नाम दिया है, जबकि युवान-च्वांग इस नगर को 'मो-तू-लो' कहता है। चीनी यात्री फाह्यान ने इसे 'मा-ताऊ-लों' कहकर पुकारा है।
  • जैन मतानुयायी मथुरा को 'तौरि-पुर' या 'सूर्यपुर' कहते हैं।
  • टॉलमी ने मथुरा को देवताओं का नगर कहकर पुकारा है।
  • पुराणों में इसे 'मोक्षदायिकापुरी' कहा गया है।
  • मथुरा के शासक यादव वंश के थे। यह नगर वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र था।
  • मथुरा में कई शताब्दियों तक बौद्धमत का प्रभुत्व बना रहा। यहां दूसरी शताब्दी ई.पू. के मध्य जैन धर्म का विशेष प्रचार था। इस समय यह नगर शुंगों के राज्य में सम्मिलित था।
  • शुंगों और आन्ध्र सातवाहन वंश के पतन के उपरान्त प्रथम शताब्दी ई. में मथुरा में शक क्षत्रपों का अभ्युदय हुआ, जिनके तीन अभिलेख तथा कुछ मुद्राएँ यहां मिली हैं।
  • विष्णु पुराण से ज्ञात होता है कि समुद्र गुप्त के शासन काल में यहाँ गणपति नाग नामक नरेश राज्य कर रहा था।
  • मथुरा से गुप्तकाल के कुछ लेख और मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
  • फाह्यान चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन-काल में मथुरा आया था और उसने यहाँ भिक्षुओं से भरे हुए अनेक विहार देखे थे।
  • मथुरा बुद्ध के प्रिय शिष्य महाकच्चायन की जन्म-भूमि थी। यहाँ अशोक द्वारा बनवाये गये तीन स्तूप प्राप्त हुए हैं।
  • कुषाण शासन काल (प्रथम शताब्दी ई.) में मथुरा में मूर्ति कला का विकास हुआ, जिसे 'मथुरा शैली' कहते हैं।

संकिसा

  • प्राचीन काल में संकिसा को 'संकाष्य' कहते थे। युवान-च्वांग (ह्वेनसांग) ने इसे 'कपित्थ' नाम से पुकारा हैं।
  • वर्तमान संकिसा उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्थित है। इसके एक टीले पर, जो पूर्व से पश्चिम तक 455 मीटर तथा उत्तर से दक्षिण तक 303 मीटर है, यहां आज भी कुछ प्राचीन भग्नावशेष हैं। इसके अन्दर विसारी देवी का एक मन्दिर है और निकट ही अशोक की एक लाट भी, जिस पर शिल्पकारी की गई है।
  • संकिसा पूर्वी पांचाल जनपद में सम्मिलित था।
  • बुद्धकाल में संकिसा की अधिक उन्नति हुई। पालि ग्रन्थों में विवरण मिलता है कि यहीं महात्मा बुद्ध स्वर्ग से उतरे थे। यह नगर तब से बौद्धों का प्रख्यात तीर्थ स्थल बन गया।
  • यहां कई बौद्ध स्तूप तथा विहार बने थे।
  • फाह्यान लिखता है कि यहाँ विहारों में 660-700 भिक्षुक निवास करते थे।
  • जैन धर्म में संकिसा को 14वें तीर्थंकर विमलनाथ की ज्ञान प्राप्ति का स्थान माना गया है।

सारनाथ

  • वाराणसी से लगभग 11 किलोमीटर उत्तर की ओर सारनाथ आज भी विद्यमान है। इस नगर को बौद्ध ग्रन्थों में 'ऋषिपत्तन' एवं 'मृगदाव' नाम से पुकारा गया हैं।
  • संबोधि (ज्ञान प्राप्ति) के पश्चात बुद्ध ने सारनाथ (ऋषिपत्तन) आकर पांच ब्राह्मणों को प्रथम उपदेश दिया था, जिसे 'धर्म चक्र प्रवर्तन' (Turning of the Wheel) नाम दिया गया।
  • मौर्य सम्राट अशोक ने सारनाथ में स्मारक स्वरूप लाटयुक्त प्रस्तर स्तम्भ का निर्माण कराया है। यहां दक्षिण की ओर ईंट से बने एक स्तूप का चिन्ह पाया गया है, जिसे 'धर्मराजिका स्तूप' कहते हैं।
  • अशोक का सारनाथ से सम्बन्ध इंगित करने वाला यहाँ एक पत्थर का बना हुआ परकोटा (Railing) प्राप्त हुआ है।
  • सम्राट अशोक के अतिरिक्त शुंग शासकों के भी दो स्मारक सारनाथ में मिले हैं, जिनमें एक स्तम्भ है। इस पर ब्राह्मी लिपि में दाताओं के नाम उत्कीर्ण हैं। दूसरा स्मारक मनुष्य के सिर का टुकड़ा है, जो वर्ष 1906-07 में मिला था।

साकेत

  • साकेत उत्तर कोशल की राजधानी तथा कोशल जनपद का वैभवशाली नगर था। जातकों में भी इसे महत्वपूर्ण नगर कहा गया है।
  • कुछ लोग साकेत और अयोध्या को एक ही मानते हैं, किन्तु यह विचार भ्रमपूर्ण हैं। पालिग्रन्थों में साकेत और अयोध्या दो भिन्न नगरों के रूप में वर्णित हैं। रिजडेविड्स साकेत को अयोध्या से भिन्न मानते हैं, परन्तु अभिधान चिंतामणि में साकेत, कोशल तथा अयोध्या को एक माना गया है। कालीदास ने साकेत और अयोध्या को एक ही माना है।
  • टॉलमी साकेत को 'सागेद' कहकर पुकारता है। ह्वेनसांग इसे 'विसाख' तथा फाह्यान 'शा-ची' कहता है।
  • विनयपिटक में वर्णन मिलता है कि साकेत से श्रावस्ती जाने वाले मार्ग पर दस्युओं का आतंक बना रहता था।

अयोध्या

  • अयोध्या भारत का एक अति प्राचीन नगर है। रामायण के अनुसार यह नगर सरयू नदी के तट पर बसा हुआ तथा कोशल का प्रमुख नगर था। नगर के मध्य बड़ी सुन्दर तथा चौड़ी सड़कें बनी हुई थीं। यह नगर बहुत सुन्दर ढंग से बसाया गया था और इसके भीतर निर्मित भवन कई मंजिलों के थे। अयोध्या में विभिन्न देशों से व्यापार के लिए वणिक आया करते थे।
  • अयोध्या से गौतम बुद्ध का विशेष सम्बन्ध था। कोशल के शासक प्रसेनजीत गौतम बुद्ध के प्रशंसक थे। इस नगर में धर्मप्रचार के लिए गौतम बुद्ध का कई बार आगमन हुआ था। नगर के लोगों ने उनके निवास के लिए एक सुन्दर विहार का निर्माण कराया था।
  • मौर्यकालीन अभिलेखों में अयोध्या का उल्लेख नहीं मिलता, परन्तु यहाँ कुछ मौर्यकालीन मुद्राएं मिली हैं।
  • शुंगों के शासन काल में अयोध्या एक प्रमुख नगर के रूप में उनके राज्य में सम्मिलित थी। यहाँ से प्राप्त धनदेव के प्रस्तर लेख से ज्ञात होता है कि पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया था।
  • गुप्तों के शासनकाल में अयोध्या एक राजनीतिक तथा धार्मिक केन्द्र थी। स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारियों की राजधानी मौखरियों के अभ्युदय के पूर्व तक अयोध्या में प्रतिष्ठित थी।
  • अशोक द्वारा निर्मित एक बौद्ध स्तूप, जो नदी के निकट स्थित था, का उल्लेख युवान-च्वांग ने किया है।
  • जैन धर्म के प्रवर्तक ऋषभदेव अयोध्या के सूर्यवंश में उत्पन्न हुए थे। जैन ग्रन्थों के अनुसार ऋषभदेव के पुत्र 'भरत' के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।

अहिच्छत्र

  • महाभारत में विवरण प्राप्त होता है कि अहिच्छत्र उत्तर पांचाल की राजधानी थी। यहां के शासक द्रुपद थे।
  • यह नगर वर्तमान में उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में स्थित आधुनिक रामनगर है।
  • समुद्र गुप्त के प्रयाग प्रशस्तिलेख में अच्युत नामक राजा का उल्लेख प्राप्त होता है। इस राजा की मुद्राएं अहिच्छत्र से प्राप्त हुई हैं।
  • अहिच्छत्र में सातवीं सदी में युवान-च्वांग (ह्वेनसांग) का आगमन हुआ था, जिसने इस देश की परिधि 3000 मील तथा नगर की परिधि 18 मील बताई है। 11वीं शताब्दी में भारत आने वाले विदेशी यात्री अलबरूनी ने भी अहिच्छत्र का उल्लेख वैभवशाली नगर के रुप में किया है।
  • वर्तमान समय में यह नगर कई मीलों तक फैले हुए किसी प्राचीन दुर्ग का भग्नावशेष प्रतीत होता है।
  • जैन धर्म की मान्यतानुसार 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को अहिच्छत्र में ही कैवल्य (पवित्र ज्ञान) प्राप्त हुआ था। इस तरह यह जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ है।

हस्तिनापुर

  • हस्तिनापुर भारत का प्रतिष्ठित नगर था, जो उत्तर प्रदेश के वर्तमान मेरठ जिले में गंगा तट पर स्थित था। हस्तिनापुर की पहचान मेरठ जिले के तहसील मवाना के मेराट नामक प्राचीन ग्राम के रुप में की जाती है।
  • महाभारत के अनुसार इस नगर की नींव हस्तिन् नामक व्यक्ति ने डाली थी। ऐसा पुराणों में भी कहा गया है। भागवत पुराण में हस्तिनापुर का नाम 'गजाह्वय' मिलता है।
  • हस्तिनापुर कौरवों की राजधानी के रुप में प्रख्यात था। कालान्तर में अर्जुन का प्रपौत्र परीक्षित यहाँ का शासक बना।
  • प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव इस नगर के निवासी थे।
  • हस्तिनापुर नगर का भीतरी भाग अनेक राजमार्गों द्वारा विभक्त था। ललितविस्तर में हस्तिनापुर को 'महानगर' कहा गया है।
  • इस नगर के प्राकार में बहुत ऊँचे-ऊँचे गोपुर बने थे।
  • राजमहल नगर के मध्य में बना था, जिसमें सरोवर तथा उद्यान की भी योजना थी। यहां के नागरिक धन-सम्पन्न, वर्ण व्यवस्था का पालन करने वाले, धर्म निरत तथा यज्ञादि में आस्था रखते थे।
  • यहां की खुदाई में पर्याप्त सामग्री मिली है, जिससे ज्ञात होता है कि कौशाम्बी तथा हस्तिनापुर में अधिक साम्यता थी।
  • विष्णु पुराण के अनुसार इस नगर के विनाश का कारण गंगा की बाढ़ बनी।

श्रावस्ती

  • आधुनिक अवध प्रांत का यह क्षेत्र महाजनपद काल में कोशल जनपद का प्रधान नगर था। यह नगर अचिरावती नदी के तट पर स्थित था, जिसकी पहचान आधुनिक राप्ती नदी के रुप में की जाती है।
  • वर्तमान लखनऊ, फैजाबाद, सुल्तानपुर, अयोध्या, बाराबंकी, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर आदि जनपद प्राचीन भारत में कोशल राज्य के हिस्सा थे, जिनकी राजधानी श्रावस्ती थी।
  • बौद्ध ग्रंथों के अनुसार यहां पर पहले सवत्थ नामक एक ऋषि रहते थे, जिनके नाम पर इसका नाम सावत्थी पड़ा।
  • महाभारत में विवरण प्राप्त होता है कि इस नगर के निर्माता श्रावस्तक नामक नृपति थे, जिनके नाम के आधार पर इस नगर का नाम श्रावस्ती पड़ा।
  • गौतम बुद्ध के समय श्रावस्ती भारत के छः प्रसिद्ध नगरों में शामिल थी।
  • कोशल जनपद का यह प्रधान नगर सदैव, रमणीय, दर्शनीय तथा समृद्ध था। इस नगर में भिक्षुओं की संख्या 5 करोड़ थी।
  • श्रावस्ती नगर के तीन प्रमुख विहार थे - जेतवन, पुब्बाराम तथा मल्लिकाराम।
  • श्रावस्ती में बौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण धर्मों का विशेष प्रचार था। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी का यहां कई बार आगमन हुआ था, जिन्होंने जैन धर्म का प्रचार श्रावस्ती में किया।
  • जैन मतानुयायी इस नगर को अपने तीसरे तीर्थंकर सम्भवनाथ तथा आठवें तीर्थंकर चन्द्रप्रभानाथ की जन्म भूमि मानते हैं।
  • युवान च्वांग के भारत आगमन के समय यह नगर उजड़ चुका था। वह लिखता है कि नगर में चारों ओर खंडहर ही खंडहर दिखाई देते थे।

कन्नौज

  • बाल्मीकि रामायण और महाभारत समेत अनेक प्राचीन ग्रन्थों में 'कन्या कुब्ज' नगर की चर्चा की गयी है, जिसकी पहचान आज 'कन्नौज' के रुप में की जाती है। पुरातात्विक उत्खनन में यहां कास्य युगीन अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  • पुष्यभूति वंश के सम्राट हर्षवर्धन (606-647ई.) के शासनकाल में कन्नौज अपने वैभव और ख्याति के चरमोत्कर्ष पर था। बाणभट्ट की पुस्तक 'हर्षचरित' के अनुसार हर्षवर्धन ने अपनी बहन राजश्री की रक्षा हेतु राज्य की राजधानी स्थानेश्वर से कन्नौज स्थानान्तरित कर दी थी।
  • चीनी यात्री युवान च्वांग (ह्वेनसांग) सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में कन्नौज आया था। उसने इस नगर की काफी प्रशंसा की है।
  • वर्तमान कन्नौज कानपुर से 80 किमी दूर गंगा नदी तट पर स्थित एक प्रसिद्ध व्यापारिक नगर है।
  • 8वीं सदी में कन्नौज पर नियंत्रण के लिए तत्कालीन भारत के तीन प्रमुख साम्राज्यों, पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूट, के मध्य संघर्ष हुआ था। इस संघर्ष को भारतीय इतिहास में 'त्रिपक्षीय युद्ध' के नाम से जाना जाता है।

आलमगीरपुर

  • यह हड़प्पा कालीन (2350-1750 ई.पू.) नगर है।
  • आलमगीरपुर हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक पूर्वी पुरास्थल था।
  • आलमगीरपुर की खोज 'भारत सेवक समाज' एवं पुरातत्ववेत्ता यज्ञदत्त शर्मा ने 1558 ई. में की थी।
  • यह नगर वर्तमान मेरठ जिले में यमुना की सहायक हिण्डन नदी के तट पर बसा था।
  • पुरातात्विक उत्खनन में यहां विशिष्ट प्रकार के मिट्टी के बर्तन, छत की टाइलें, फूलदान, गाड़ियां, बैल और सांप की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।

अतरंजीखेड़ा

अतरंजीखेड़ा एटा जनपद के अन्तर्गत गंगा की सहायक काली नदी के तट पर स्थित एक प्रागैतिहासिक स्थल है। इस स्थल की खोज 1961-62 ई. में अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी।
चीनी यात्री युवानच्वांग (ह्वेनसांग) ने अतरंजीखेड़ा के लिए 'पि-लो-शा-न' नाम का प्रयोग किया है।
अतरंजीखेड़ा में 'गैर-मृद्भाण्ड संस्कृति' से लेकर 'गुप्त वंश' तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं। काले एवं लाल मृद्भाण्ड भी प्राप्त हुए हैं।
यहां कुषाण वंश के लाल मृद्भाण्ड, मध्ययुगीन चमकदार बर्तन आदि के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां से हड़प्पाकालीन धान की खेती के साक्ष्य मिले हैं।
पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर अतरंजीखेड़ा को चार सांस्कृतिक भागों में विभाजित किया गया है -
  • गैरिक मृद्भाण्ड संस्कृति
  • कृष्ण-लोहित मृद्भाण्ड संस्कृति
  • चित्रितधूसर मृद्भाण्ड संस्कृति
  • उत्तरी काली चमकीली पात्र परम्परा संस्कृति

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।