उत्तर प्रदेश के प्रमुख पर्व, उत्सव एवं महोत्सव
उत्तर प्रदेश केवल एक भौगोलिक भूभाग नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा और असीम आस्था का धड़कता हुआ हृदय है। यहाँ की हवाओं में मेलों की सतरंगी छटा है, तो नदियों के घाटों पर उत्सवों का अलौकिक उल्लास। अयोध्या के विश्व रिकॉर्ड बनाते भव्य दीपोत्सव से लेकर ब्रज की विश्व प्रसिद्ध लठ्ठमार होली और प्रयागराज के महाकुंभ तक, यूपी का हर कोना अपनी एक अलग कहानी कहता है। इस विस्तृत लेख में हम उत्तर प्रदेश के प्रमुख पर्व, उत्सव और ऐतिहासिक मेलों की गौरवशाली परंपरा और यहाँ की गंगा-जमुनी तहजीब को करीब से जानेंगे। यह जानकारी न केवल आपकी सांस्कृतिक समझ को समृद्ध करेगी, बल्कि यूपी की सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी।
पर्व, उत्सव, मेले एवं महोत्सव क्षेत्र के सांस्कृतिक जीवन के प्रतीक होते हैं। इससे लोगों के सामान्य दैनिक जीवन में खुशी एवं परिवर्तन का संचार होता है। उत्तर प्रदेश में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध लगभग सभी वर्ग के लोग निवास करते हैं। इनके द्वारा समय-समय पर विभिन्न पर्व एवं उत्सव मनाये जाते हैं। अनेक अवसर पर स्थानीय स्तर से इनके द्वारा मेलों एवं महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
उत्तर प्रदेश के प्रमुख पर्व एवं उत्सव इस प्रकार हैं-
दीपावली
प्रकाश पर्व के रूप में दीपावली को कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को अक्टूबर-नवम्बर महीने में मनाया जाता है। दीपावली के दिन देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। भगवान राम के वन से अयोध्या लौटने का उत्सव मनाने के लिए लोग अपने घरों को प्रकाशित करते हैं। इस अवसर पर कुछ लोग पटाखे भी फोड़ कर अपनी खुशी एवं उत्साह का प्रदर्शन करते हैं। नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली), धनतेरस और भाई-दूज के दिन भी दीपावली के त्योहार से संबंधित हैं।
दीपावली पर्व से कायस्थ और वैश्य वर्ग के लोग नए वित्तीय वर्ष की शुरूआत करते हैं। वे पारंपरिक 'लेखा पुस्तक' और 'कलम' की पूजा करते हैं। इस प्रथा को 'कलम दवात पूजा' या 'चौपड़ पूजा' या 'चित्रगुप्त पूजा' कहते हैं।
अयोध्या का दीपोत्सव गिनीज बुक में
विगत कुछ वर्षों से दीपावली पर अयोध्या में भव्य दीपोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। वर्ष 2023 में दीपावली की पूर्व संध्या पर राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में यहां राम की पैड़ी के घाटों पर एक साथ 22.23 लाख मिट्टी के दीप जलाकर 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' बनाया गया।
होली
रंगों का पर्व होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। उत्सव की शुरूआत पूर्णिमा के दिन बड़ी-बड़ी होलिकाएं जला कर की जाती हैं। अगले दिन एक-दूसरे को रंग व गुलाल लगाकर उत्सव मनाया जाता है।
ब्रज की लठ्ठमार होली प्रसिद्ध है, जहां स्त्रियां पुरुषों को डंडों से मारती हैं और पुरुष बचने का प्रयास करते हैं।
नवरात्रि
नवरात्रि को 'शक्ति आराधना' के रूप में देवी दुर्गा के सम्मान में मनाते हैं। नवरात्रि के नौ दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है। पर्व के आठवें या नवें दिन श्रद्धालु कन्या पूजन करते हैं और उनको भोजन कराते हैं, जिनको सांकेतिक रूप से देवी दुर्गा का रूप माना जाता है। इस परंपरा को कंचन पूजा कहते हैं।
नवरात्रि का पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है- पहला चैत्र माह में 'चैत्र नवरात्रि' तथा दूसरा आश्विन माह में 'शारदीय नवरात्रि' के रूप में। चैत्र नवरात्रि से हिन्दू नव वर्ष का प्रारम्भ माना जाता है। इसके नवें दिन रामनवमी मनायी जाती है। शरद नवरात्रि में देवी दुर्गा के लिए अस्थायी पूजा स्थान स्थापित किये जाते हैं, जिन्हें पांडाल कहते हैं। इसके अंतिम दिन देवी दुर्गा द्वारा दैत्य महिषासुर का वध करने के उपलक्ष में दशहरा अथवा विजयदशमी मनाया जाता है।
रामनवमी
रामनवमी उत्तर भारत का एक प्रमुख पर्व है। पौराणिक मान्यता के अनुसार चैत्र माह की नवमी तिथि को मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। इस अवसर पर रामनवमी का पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।
इस आयोजन में रामायण का पाठ, मंदिरों में विशिष्ट अनुष्ठान, पूजा तथा कुछ जगहों पर भगवान श्रीराम की झांकियां निकाली जाती हैं।
दशहरा
दशहरा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की रावण के ऊपर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दौरान अनेक स्थान पर रामलीला का आयोजन होता है और दशहरे वाले दिन रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के पुतले जलाये जाते हैं। वर्ष 2020 में अयोध्या में संस्कृति मंत्रालय द्वारा रामलीला का आयोजन आरम्भ किया गया है।
शस्त्र पूजा अथवा आयुध पूजा की परंपरा दशहरा से जुड़ी हुई है। यह परंपरा योद्धा समुदाय और कारीगर समुदाय के बीच प्रचलित है। भारतीय सेना भी इस परंपरा का पालन करती है।
ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में दशहरा नहीं मनाया जाता है, क्योंकि यहां के लोग इसे रावण का जन्म स्थान मानते हैं।
मकर संक्रांति
इसे उत्तरायण अर्थात सूर्य के उत्तरी गोलार्द्ध में प्रस्थान के अवसर पर मनाया जाता है। श्रद्धालु दान करते हैं और पवित्र गंगा नदी में स्नान करते हैं। यह त्यौहार पतंग उड़ाने की प्रथा के लिए भी जाना जाता है। इस दिन बनने वाले व्यंजन खिचड़ी के नाम पर इस पर्व को 'खिचड़ी' भी कहा जाता है।
इस अवसर पर गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में एक माह तक चलने वाले भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।
जन्माष्टमी
भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि के रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। प्रत्येक वर्ष इस तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर मंदिरों को अत्यधिक सुंदरता से सजाया जाता है और प्रतीकात्मक रूप से श्रीकृष्ण के जन्म का अनुष्ठान किया जाता है। श्रद्धालुओं को पंचामृत प्रसाद के तौर पर दिया जाता है। रासलीला के साथ मनायी जाने वाली मथुरा और वृंदावन की जन्माष्टमी प्रसिद्ध है। रासलीला द्वारा कृष्ण की लीलाओं को याद किया जाता है।
रक्षाबंधन
इसे श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को एक पवित्र धागे के रूप में राखी बांधती हैं और भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन देते हैं। यह पर्व जैन समुदाय के लिए भी महत्व रखता है।
महाशिवरात्रि
यह शिव और शक्ति के मिलन का पर्व है। यह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। विवाह रात्रि के समय हुआ था, इसलिए इस व्रत में रात का विशेष महत्व है।
गंगा दशहरा
यह गंगावतरन अर्थात् गंगा के धरती पर अवतरित होने के उपलक्ष्य में ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दसवीं को मनाया जाता है। उत्सव इस पवित्र दिन के नौ दिन पूर्व ही शुरू हो जाता हैं। गंगा के घाटों पर भव्य पूजा का आयोजन किया जाता है और श्रद्धालु गंगा में स्नान करते हैं। गंगा के घाटों, विशेषकर वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर भव्य उत्सव आयोजित होता है।
देव दीपावली
इसे शिव की दैत्य त्रिपुराशुर के ऊपर विजय के उपलक्ष में मनाया जाता है, अतः इसे त्रिपुरोत्सव भी कहते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार देवता वाराणसी में गंगा स्नान करने के लिए आते हैं। उत्सव के तौर पर वाराणसी के घाटों पर लाखों दिए जलाए जाते हैं और गंगा को दीपदान कर भव्य आरतियां की जाती हैं।
धार्मिक अनुष्ठान के अतिरिक्त इस अवसर पर शहीदों के सम्मान में कार्यक्रम भी होते हैं।
वाराणसी के प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट पर इंडिया गेट का मॉडल बनाकर ‘अमर जवान ज्योति’ की अनुकृति पर सेना की तीनों टुकड़ियों के अधिकारी पुष्पचक्र चढ़ाकर सलामी देते हैं।
ईद-उल-फितर
यह मुस्लिमों का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार होता है, जो पवित्र रमज़ान महीने के आखिरी दिन पड़ता है। इसकी तिथि चांद दिखने के बाद ही निर्धारित होती है। मुस्लिम रमज़ान माह के दौरान व्रत रखते हैं, जिसे रोज़ा कहते हैं।
ईद उल-अज़हा
यह पर्व हज़रत इब्राहिम की कुर्बानी और समर्पण की याद में मनाया जाता है, जो ईश्वर को अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गये थे। इस पर्व को बकरे या अन्य जानवर की बलि और मक्का हज की शुरूआत के लिए भी जाना जाता है।
मुहर्रम
इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की कुर्बानी की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। यह मुहर्रम महीने के दसवें दिन मनाया जाता है। इस दिन ताज़िया जुलूस निकाला जाता है। शिया मुस्लिम इसे शोक के रूप में मनाते हैं। करबला की जंग में पैगम्बर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को यजीद की फौज ने नमाज पढ़ते समय सजदे में ही कत्ल कर दिया था।
| उत्तर प्रदेश के अन्य धार्मिक त्यौहार | ||
|---|---|---|
| त्यौहार | धर्म | विवरण |
| शरद पूर्णिमा | हिंदू | इसे कौमुदी या कोजागिरी (Moon Light) और कुमारी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को आयोजित होता है। |
| करवा चौथ | हिंदू | यह महिलाओं द्वारा मनाया जाता है, जो अपने पति की लम्बी आयु के लिए व्रत रखती हैं। व्रत की समाप्ति चन्द्रमा के दर्शन से होती है। |
| छठ | हिंदू | सूर्यदेव को समर्पित यह त्यौहार कार्तिक मास में चार दिनों तक पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। |
| मिलाद-उन-नबी | इस्लाम | यह उत्सव पैगम्बर मुहम्मद के जन्मदिवस और मृत्यु दिवस के रूप में मनाया जाता है। |
| शब-ए-मिराज | इस्लाम | इसे पैगम्बर मोहम्मद द्वारा अपनी स्वर्गीय यात्रा में ईश्वर के पास पहुंचने वाले दिन के रूप में मनाया जाता है। |
| क्रिसमस | ईसाई | इसे ईसामसीह के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। इसे सेंटाक्लाज के लिए भी जाना जाता है। |
| ईस्टर एवं गुड फ्राइडे | ईसाई | ईसाई मान्यताओं के अनुसार गुडफ्राइडे ईसा मसीह (जीसस) को सूली पर चढ़ाने और ईस्टर उनके पुनर्जीवित होने का दिन होता है। |
| गुरू पर्व अथवा गुरू नानक जयंती | सिख | यह कार्तिक पूर्णिमा पर गुरूनानक के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। गुरू अर्जुन देव, गुरू तेग बहादुर और गुरूगोविंद सिंह के जन्म दिवसों पर भी गुरू पर्व मनाया जाता है। |
| प्रकाश उत्सव | सिख | गुरू गोविंद सिंह के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। |
| बैसाखी | सिख | इसे 13 या 14 अप्रैल को खालसा पंथ की स्थापना और सिख नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। |
| लोहड़ी | सिख | यह फसल की कटाई का त्यौहार है। बसंत आगमन के समय इसे अग्नि जलाकर उसमें प्राप्त कृषि उपज का एक अंश भेंट चढ़ाकर मनाया जाता है। |
| महावीर जयंती | जैन | यह भगवान महावीर का जन्म दिवस होता है। मेरठ के हस्तिनापुर स्थित जैन मंदिर में इस दिन भव्य उत्सव आयोजित किया जाता है। |
| वर्षी तप | जैन | जैन तीर्थंकर ऋषभदेव से जुड़ा यह त्यौहार व्रत रखकर मनाया जाता है। |
| पर्यूषण पर्व | जैन | भादों माह में आठ से दस दिनों तक पूर्ण आत्मशुद्धि के लिए मनाया जाता है। |
| क्षमावाणी पर्व | जैन | पर्यूषण पर्व के समापन पर यह आयोजित होता है। इस अवसर पर पापों की क्षमायाचना करते हैं। |
| बुद्ध पूर्णिमा | बौद्ध | इसे भगवान बुद्ध के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। सारनाथ इसके उत्सव के लिए प्रसिद्ध है। |
मेले और उत्सव
मेले और उत्सव में किसी विशेष उद्देश्य, जैसे- मनोरंजन, सांस्कृतिक गतिविधियां, व्यावसायिक गतिविधियां आदि, के लिए लोगों का एकत्र होना होता है। उत्तर प्रदेश में प्रत्येक वर्ष लगभग 2250 मेले आयोजित होते हैं। मथुरा में सबसे अधिक 86 और उसके बाद कानपुर (79), हमीरपुर (79), झांसी (78), आगरा (72) और फतेहपुर (79) में मेले आयोजित होते हैं। पीलीभीत जिले में सबसे कम मेले लगते हैं।
उत्तर प्रदेश में कुछ प्रमुख मेले इस प्रकार हैं -
कुम्भ मेला
यह भारत का सबसे बड़ा और विश्व के सबसे बड़े मेलों में से एक है। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के अतिरिक्त यह अन्य तीन स्थलों हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में आयोजित होता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां समुद्र मंथन के समय अमृत की कुछ बूंदें गिर गई थीं।
प्रयाग में प्रत्येक 12 वर्ष पर ‘त्रिवेणी’ अर्थात् गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर कुंभ का आयोजन किया जाता है। इसमें प्रमुख हिंदू संत और लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। श्रद्धालु इस पवित्र अवसर पर गंगा में डुबकी लगाते हैं। मेला एक माह से अधिक समय तक चलता है। इस दौरान कुछ श्रद्धालु कल्पवास भी करते हैं।
- प्रयाग और हरिद्वार में प्रत्येक छ: वर्षों में अर्द्धकुंभ का आयोजन होता है। 144 वर्षों बाद आयोजित होने वाले कुंभ मेले को महाकुंभ कहा जाता है।
- सन् 2017 में कुम्भ मेले को यूनेस्को की अमूर्त विरासत घोषित किया गया।
वर्ष 2019 में प्रयागराज में आयोजित कुंभ की थीम थी - 'सर्वसिद्धिप्रदः कुंभ'। इस आयोजन का नारा था- 'दिव्य कुंभ, भव्य कुंभ' तथा 'चलो कुंभ चलें'।
माघ मेला
यह कुंभ के समान है। प्रत्येक वर्ष इसे प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। प्रत्येक 12वें वर्ष माघ मेला कुंभ के साथ ही पड़ता है। यह पूरे माघ माह के दौरान जारी रहता है। यहां भी श्रद्धालु कल्पवास करते हैं।
रामायण मेला
इसकी अवधारणा 1961 में राममनोहर लोहिया द्वारा प्रस्तुत की गयी थी। उनका मानना था कि रामायण के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों पर विचार-विमर्श करने से राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसे सर्वप्रथम 1973 में चित्रकूट में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने आयोजित कराया। बाद में 1982 में श्रीपति मिश्र द्वारा इसका आयोजन अयोध्या में शुरू हुआ। इसमें साधु-संत और रामायण के विद्वान भाग लेते हैं। इस अवसर पर रामलीला, रामायण के उपदेश व अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है।
जन्माष्टमी मेला
यह मेला मथुरा में नौ दिनों तक लगता है। इस अवसर पर श्रीकृष्ण के जीवन को रासलीला और चलचित्र के माध्यम से प्रदर्शित किया जाता है। अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जिनमें लाखों लोग प्रतिभाग करते हैं।
बटेश्वर मेला
आगरा के पास बटेश्वर में लगने वाला पशु मेला उत्तर भारत के सबसे बड़े पशु-मेलों में से एक है। यह संख्या और शैली में पुष्कर मेले के समान होता है। इसका आयोजन दीपावली के तीन सप्ताह पूर्व ऊंट, घोड़े, गधे, बकरी आदि जानवरों की प्रदर्शनी के साथ शुरू होता है। मेले में साधुओं एवं श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है और बटेश्वर मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठान किये जाते हैं।
ददरी पशु मेला
इसे बलिया के ददरी में आयोजित किया जाता है। यह बिहार के सोनपुर मेले के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा पशु-मेला होता है। एक महीने तक चलने वाला यह मेला दो चरणों में आयोजित होता है- पहला चरण कार्तिक पूर्णिमा के दस दिन पूर्व शुरू होता है, जिसमें व्यापारी भारत के कोने-कोने से सबसे अच्छी प्रजाति के पशु लेकर आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के बाद होने वाला दूसरा चरण विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जाना जाता है।
सरधना महोत्सव
इसे 'सरधना क्रिश्चियन मेला' भी कहते हैं। इसका आयोजन सरधना (मेरठ) के 'बेसिलिका ऑफ अवर लेडी ऑफ ग्रेसेस' नामक चर्च में किया जाता है। यह मेला मदर मरियम के सम्मान में नवंबर के पहले सप्ताह में आयोजित होता है। इस मेले में बड़ी संख्या में ईसाई श्रद्धालु और इतिहास प्रेमी सम्मिलित होते हैं।
नककटैया
सामान्य लोगों को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध मंच देने के उद्देश्य से इसे 1887 में बाबा फतेह राम ने शुरू किया था। इसे करवाचौथ के मौके पर वाराणसी के चेतगंज में आयोजित किया जाता है।
यह मेला रामायण की घटना लक्ष्मण द्वारा सूर्पनखा की नाक काटे जाने वाले भाग के अभिनय के लिए प्रसिद्ध है।
देवा-शरीफ मेला
यह वार्षिक मेला अक्टूबर-नवम्बर माह में दस दिनों के लिए बाराबंकी के देवा कस्बा में सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर लगता है। इस मेले द्वारा वारिस अली शाह और उनके पिता कुर्बान अली शाह को याद किया जाता है। इस मेले में एक बड़ा पशु बाजार, अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम, हस्तशिल्पों की बिक्री और खेलकूद के कार्यक्रम होते हैं। गंगा जमुनी तहजीब के प्रतीक समझे जाने वाले वारिस अली शाह के प्रति हिन्दुओं और मुस्लिमों दोनों वर्ग के मन में सम्मान होने के कारण इस मेले को हिन्दू-मुस्लिम एकता बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है।
नौचंदी मेला
यह मेला एक पशु मेले के रूप में मेरठ के नौचंदी देवी मंदिर के पास स्थित नौचंदी मैदान में 1672 में शुरू हुआ। प्रतिवर्ष यह मेला होली के बाद दूसरे रविवार से प्रारम्भ होता है। मेले में अनेक सांस्कृतिक, शिल्प और मनोरंजन के कार्यक्रम सम्मिलित होते हैं। इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक समझा जाता है।
गोरखपुर का खिचड़ी मेला
मकर संक्रांति के अवसर पर गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में यह खिचड़ी मेला 14 जनवरी से शुरू होता है। इस अवसर पर न सिर्फ देश बल्कि नेपाल समेत अन्य देशों से भी लोग गुरू गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने आते हैं।
मंदिर परिसर में इस अवसर पर लगभग एक माह तक चलने वाले मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें झूला, चरखी, खेल-तमाशा तथा खाने-पीने आदि के स्टॉल देखे जा सकते हैं।
| मेला/उत्सव | क्षेत्र | विवरण |
|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश के अन्य मेले व उत्सव | ||
| श्रावण झूला मेला | फैज़ाबाद और अयोध्या | कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन राम-लक्ष्मण और सीता की प्रतिमाएं मणि पर्वत पर ले जायी जाती हैं और उन्हें वहां श्रद्धालुओं द्वारा झूला झुलाया जाता है। |
| कैलाश मेला | कैलाश (आगरा) | इसे भगवान शिव के सम्मान में आयोजित किया जाता है। |
| शाकुम्भरी देवी मेला | सहारनपुर | यह नवरात्रि के दौरान शाकुम्भरी देवी सिद्धपीठ पर आयोजित होता है। |
| कांपिल्य मेला | कांपिल्य (फर्रुखाबाद) | जैन धर्म के 13वें तीर्थंकर विमलनाथ के जन्म स्थान पर आयोजित होता है। |
| होलिकोत्सव | मथुरा | ब्रज में होली का उत्सव वास्तविक होली के 45 दिन पहले ही शुरू हो जाता है। |
| परिक्रमा मेला | अयोध्या | कार्तिक मास में श्रद्धालु राम के वनवास के प्रतीक स्वरूप अयोध्या की 14 कोस की परिक्रमा करते हैं। |
| संकटमोचन उत्सव | वाराणसी | हनुमान जयंती पर प्रतिवर्ष शास्त्रीय संगीत और गायन का यह उत्सव आयोजित किया जाता है। |
| राम बारात | आगरा | यह 125 वर्ष पुरानी प्रथा, रामलीला का हिस्सा है। |
| गुड़िया मेला | गोवर्धन (मथुरा) | श्रद्धालु गुड़िया पूर्णिमा के अवसर पर गिरिराज पहाड़ की परिक्रमा करते हैं। |
| लट्ठमार होली | बरसाना (मथुरा) | होली उत्सव के दौरान नंदगांव के पुरुष बरसाने आते हैं, जहां महिलाएं उन्हें लाठियों से मारती हैं और पुरुष बचने का प्रयास करते हैं। |
| ध्रुपद मेला | वाराणसी | यह प्रसिद्ध गायकों के जमावड़े के लिए जाना जाता है। |
| देवीपाटन मेला | बलरामपुर | चैत्र नवरात्रि के दौरान पाटेश्वरी देवी शक्तिपीठ पर लगाया जाता है। |
| त्रिवेणी महोत्सव | प्रयागराज | फरवरी माह में संगम पर आयोजित होने वाला यह सांस्कृतिक उत्सव है। |
| कल्कि महोत्सव | संभल | इसमें धार्मिक कार्यक्रम किये जाते हैं और संतों का जमावड़ा लगता है। |
| सुलहकुल उत्सव | आगरा | कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ आयोजित यह हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देता है। |
| मटकी लीला | ब्रज बरसाना | इसे भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष के 13वें दिन मनाया जाता है। |
| नवरात्र मेला | मिर्जापुर | इसे विन्ध्यवासिनी देवी मंदिर स्थान पर चैत्रीय और शारदीय नवरात्रों में लगाया जाता है। |
| रामनवमी मेला | अयोध्या | अयोध्या में रामनवमी पर्व के समय आयोजित होता है। |
| उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित किये जाने वाले महोत्सव | ||
| लखनऊ महोत्सव | लखनऊ | यह महोत्सव प्रतिवर्ष लखनऊ की संस्कृति और विरासत को दिखाने के लिए 1975 से आयोजित किया जाता है। |
| काशी गंगा महोत्सव | वाराणसी | इसे प्रवासी भारतीय दिवस पर शास्त्रीय संगीत, हस्तशिल्प और नृत्य के साथ मनाया जाता है। |
| आयुर्वेद महोत्सव | झांसी | इसे प्रतिवर्ष आयुर्वेद के प्रचार के लिए आयोजित किया जाता है। |
| ताज महोत्सव | आगरा | ताजमहल के समीप शिल्पग्राम में आयोजित होने वाला यह 10 दिवसीय उत्सव 1992 से चला आ रहा है। यह उत्तर प्रदेश समेत भारत के सम्पन्न शिल्प, संस्कृति और नृत्य को प्रदर्शित करता है। |
| नोएडा शिल्पोत्सव | नोएडा | यह दस दिवसीय उत्सव शिल्प पर केन्द्रित होता है। |
| वाटर स्पोर्ट्स उत्सव | प्रयागराज/ वाराणसी | फरवरी में आयोजित इस उत्सव में कयाकिंग और कनोइंग जैसे वाटर स्पोर्ट्स शामिल होते हैं। |
| बुद्ध महोत्सव | सारनाथ, कौशाम्बी सिद्धार्थनगर, कुशीनगर |
बुद्ध महोत्सव स्थानीय शिल्प और संस्कृति के साथ बुद्ध के जीवन और दर्शन की झलक के लिए है। सारनाथ में 1998 से बुद्ध के जन्मदिवस पर बौद्ध महोत्सव आयोजित होता है। |
| कजरी महोत्सव | मिर्जापुर | सावन में आयोजित होता है और कजरी गायन के लिए प्रसिद्ध है। |
| गोरखपुर महोत्सव | गोरखपुर | शिल्प, उद्योग एवं सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करने वाला यह आयोजन जनवरी में होता है। |
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