उत्तर प्रदेश में विशेष राज्य चयन मानदण्ड, राजभाषा, संचित निधि, आकस्मिक निधि, राजनीतिक दल एवं राज्य निर्वाचन आयोग

उत्तर प्रदेश में विशेष राज्य चयन मानदण्ड, राजभाषा, संचित निधि, आकस्मिक निधि, राजनीतिक दल एवं राज्य निर्वाचन आयोग

उत्तर प्रदेश केवल भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य नहीं है, बल्कि यह देश की राजनीति और प्रशासनिक ढांचे का धड़कता हुआ हृदय है। 'विशेष राज्य' के दर्जे की उठती मांगों से लेकर, हिंदी और उर्दू के राजभाषा बनने तक का सफर बेहद दिलचस्प रहा है। आखिर कैसे राज्य की संचित और आकस्मिक निधियां पूरे तंत्र को ऊर्जा देती हैं? और पंचायत से लेकर विधानसभा तक, यूपी के सियासी गलियारों में क्षेत्रीय व राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का क्या रुतबा है? इस लेख में हम उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था, राज्य निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और सियासी दलों के उतार-चढ़ाव भरे सफरनामे का गहराई से विश्लेषण करेंगे, जो आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
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‘विशेष-राज्य’ चयन मानदण्ड (गाडगिल फॉर्मूला - 1969)
पृष्ठभूमि
5वें वित्त आयोग (1969) द्वारा पिछड़े राज्यों के लिए विशेष दर्जे की शुरुआत।
निर्धारित मानदण्ड
  • पहाड़ी व दुर्गम क्षेत्र
  • कम जनसंख्या घनत्व / जनजातीय बाहुल्य
  • अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं (रणनीतिक क्षेत्र)
  • आर्थिक एवं बुनियादी पिछड़ापन
  • वित्तीय संसाधनों की गैर-व्यवहार्य स्थिति
प्रथम चयनित राज्य (1969)
1. जम्मू और कश्मीर
2. असम
3. नगालैण्ड
राजभाषा: संवैधानिक उपबंध (भाग 5, 6 व 17)

संघ की राज भाषा

अनुच्छेद 343: देवनागरी लिपि में हिंदी संघ की राजभाषा।

अनुच्छेद 344: राजभाषा पर आयोग एवं संसदीय समिति का गठन (राष्ट्रपति द्वारा)।

प्रादेशिक भाषाएं

अनुच्छेद 346 & 347: राज्य विधानमंडल द्वारा राज्य की एक या अधिक भाषाओं या हिंदी को शासकीय प्रयोजनों हेतु अंगीकार करने का अधिकार।

न्यायालयों की भाषा

अनुच्छेद 348: जब तक संसद विधि द्वारा उपबंध न करे, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी में होंगी।

विशेष निदेश

अनुच्छेद 350: शिकायत निवारण हेतु किसी भी प्रयुक्त भाषा में अभ्यावेदन का अधिकार।

अनुच्छेद 351: हिंदी भाषा के विकास हेतु निदेश।

उत्तर प्रदेश की राजभाषा का सफरनामा
अक्टूबर 1947
देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी 'राज्य की राजभाषा' घोषित।
वर्ष 1951
उत्तर प्रदेश राजभाषा अधिनियम पारित। हिंदी को वैधानिक मान्यता प्राप्त।
26 जनवरी, 1968
प्रदेश के समस्त कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग अनिवार्य किया गया।
वर्ष 1989
राजभाषा अधिनियम में संशोधन कर 'उर्दू' को राज्य की द्वितीय राजभाषा घोषित किया गया।
उत्तर प्रदेश में प्रमुख राजनीतिक दल

भारतीय जनता पार्टी (BJP)

स्थापना: 6 अप्रैल, 1980

दर्जा: राष्ट्रीय दल

राष्ट्रवादी दल, जो समग्र मानवतावाद एवं अन्त्योदय की विचारधारा से प्रभावित है। विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल।

समाजवादी पार्टी (SP)

स्थापना: 4 अक्टूबर, 1992

दर्जा: राज्य स्तरीय / क्षेत्रीय दल

श्री मुलायम सिंह यादव द्वारा स्थापित। वर्तमान में यूपी की प्रमुख विपक्षी पार्टी। पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) पर केंद्रित।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC)

स्थापना: 28 दिसंबर, 1885

दर्जा: राष्ट्रीय दल

स्वतंत्रता आंदोलन के समय ए.ओ. ह्यूम द्वारा स्थापित देश की सबसे पुरानी पार्टी।

बहुजन समाज पार्टी (BSP)

स्थापना: 1984

दर्जा: राष्ट्रीय दल

श्री कांशीराम द्वारा स्थापित। दलितों, आदिवासियों एवं अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर केंद्रित। यूपी में 4 बार सरकार बनाई।

राष्ट्रीय लोकदल (RLD)

स्थापना: 1996

दर्जा: क्षेत्रीय दल

चौधरी अजीत सिंह द्वारा स्थापित। किसानों, मजदूरों एवं जाट समुदाय में लोकप्रिय। वर्तमान अध्यक्ष जयंत चौधरी।

‘विशेष-राज्य’ चयन मानदण्ड

  • भारत के संविधान में किसी राज्य को 'विशेष राज्य' का दर्जा देने का प्रावधान नहीं है। बावजूद इसके, आर्थिक, भौगोलिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े राज्यों को 'विशेष दर्जा' देने की मांग समय-समय पर उठती रहती है।
  • स्वतंत्रता के पश्चात भारत ने अपनी विकास यात्रा 'केंद्रीकृत योजनाबद्ध मॉडल' के साथ आरंभ किया, किन्तु शीघ्र ही यह महसूस किया गया कि विकास का लाभ देश के सभी क्षेत्रों को समान रूप से प्राप्त नहीं हो पा रहा है, जिससे विषमता पैदा हो रही है। इसका परिणाम था कि देश के अनेक पिछड़े व वंचित क्षेत्र विकास की मुख्य धारा से पीछे छूटते जा रहे थे।
  • वर्ष 1969 में पांचवें वित्त आयोग ने एक नयी पहल द्वारा इस विसंगति को दूर करने हेतु राज्यों के लिए 'विशेष श्रेणी का दर्जा' प्रदान करने की शुरुआत की, जिसके अंतर्गत इस श्रेणी में चयनित पिछड़े राज्यों हेतु कुछ अधिमान्य विशेष सुविधाओं व वित्त की व्यवस्था की गई।
राज्यों को 'विशेष श्रेणी का दर्जा' गाडगिल फार्मूले के आधार पर 'राष्ट्रीय विकास परिषद' द्वारा दिया गया। 'विशेष श्रेणी' के लिए मानदण्ड इस प्रकार निर्धारित किये गये-
  • पहाड़ी व कठिन/दुर्गम क्षेत्र
  • कम जनसंख्या घनत्व
  • जनजातीय जनसंख्या बाहुल्य क्षेत्र
  • अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं साझा करने वाले रणनीतिक क्षेत्र
  • आर्थिक एवं बुनियादी संरचना में पिछड़े क्षेत्र
  • राज्य के वित्तीय संसाधनों की गैर-व्यवहार्य स्थिति/प्रकृति (Non-viable nature)
गाडगिल फॉर्मूला पर पांचवें वित्त आयोग ने 1969 में 3 राज्यों को 'विशेष श्रेणी राज्य' का दर्जा प्रदान किया। यह राज्य थे-
  • जम्मू और कश्मीर
  • असम
  • नगालैण्ड
कुछ वर्ष पश्चात, वर्ष 1971 से 2001 के मध्य, विशेष श्रेणी का दर्जा देश के 11 राज्यों को प्रदान किए गए, जिनके नाम थे- असम, नगालैण्ड, मणिपुर, सिक्किम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, तेलंगाना तथा उत्तराखण्ड।
चौदहवें वित्त आयोग (2015-20) की सिफारिश पर केन्द्र सरकार ने 'विशेष श्रेणी के राज्य' का दर्जा समाप्त कर दिया, यद्यपि कुछ राज्यों को 'विशेष आर्थिक पैकेज' प्रदान किये जाते हैं।

राजभाषा (Official Language)

  • राजभाषा किसी राज्य अथवा देश की घोषित भाषा होती है, जो समस्त राजकीय प्रयोजन, अर्थात सरकारी काम-काज, में प्रयुक्त की जाती है।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अंतर्गत देवनागरी लिपि में हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा घोषित किया गया है।
  • संविधान के भाग 5 एवं 6 के क्रमशः अनुच्छेद 120 एवं 210 में तथा भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 तक में राजभाषा के संबंध में प्रावधान किए गए हैं।

इसके अनुसार राजभाषा से संबंधित उपबंध निम्नलिखित 4 भागों में विभक्त हैं-

संघ की राज भाषा

  • अनुच्छेद 343 के अंतर्गत संघ की राज भाषा के संबंध में प्रावधान किया गया है।
  • अनुच्छेद 344 में राजभाषा पर आयोग एवं संसदीय समिति गठित करने का प्रावधान है। इसके अनुसार राष्ट्रपति द्वारा संविधान लागू होने के 5 वर्ष पश्चात तथा उसके बाद 10 वर्ष की समाप्ति पर एक आयोग गठित किया जाएगा, जो एक अध्यक्ष एवं आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट विभिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा जिनको राष्ट्रपति नियुक्त करे।
  • राष्ट्रपति के आदेश में आयोग द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया परिनिश्चित की जाएगी।

प्रादेशिक भाषाएं

अनुच्छेद 346 और 347 के उपबंधों के अंतर्गत किसी राज्य का विधान मंडल, विधि द्वारा, संबंधित राज्य में प्रयुक्त की जाने वाली भाषाओं में से किसी एक या अधिक भाषाओं को, या हिंदी को उस राज्य के सभी अथवा किन्हीं शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा या भाषाओं के रूप में अंगीकार कर सकेगा। दूसरी तरफ, जब तक राज्य का विधान मंडल, विधि द्वारा, अन्यथा उपबंध न करे, तब तक राज्य के भीतर उन शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा, जिसके लिए उनका प्रयोग संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले किया जा रहा था।

उच्चत्तम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की भाषा

  • अनुच्छेद 348 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक उच्चत्तम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी।

विशेष निदेश

  • अनुच्छेद 350 के अंतर्गत यह व्यवस्था दी गयी है कि कोई व्यक्ति किसी समस्या निवारण के लिए संघ अथवा राज्य के किसी अधिकारी या प्राधिकारी को, यथास्थिति, संघ में या राज्य में प्रयुक्त होने वाली किसी भाषा में अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अधिकारी होगा।
  • अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास हेतु निदेश प्रस्तुत किए गये हैं।

उत्तर प्रदेश की राजभाषा

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 345 के अनुसार राज्य की विधायिका कानून द्वारा राज्य में प्रयोग की जाने वाली एक या अधिक भाषाओं अथवा हिंदी को राज्य के सभी, या किसी विशेष आधिकारिक उद्देश्यों हेतु राजभाषा के रूप में चुन सकती है।
  • उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सर्वप्रथम अक्टूबर 1947 में देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को 'राज्य की राजभाषा' घोषित किया गया।
  • उत्तर प्रदेश में राजभाषा अधिनियम 1951 के अधीन हिंदी को प्रदेश की राजभाषा के रूप में वैधानिक मान्यता प्रदान की गई।
  • राजभाषा अधिनियम 1951 के अनुसार देवनागरी लिपि में हिंदी राज्य की आधिकारिक भाषा होगी। इसके अनुसार राज्य सरकार आधिकारिक उद्देश्यों हेतु भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप के प्रयोग की अनुमति दे सकती है।
  • 26 जनवरी, 1968 से प्रदेश के समस्त कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग इस निर्देश के साथ अनिवार्य कर दिया गया कि आदेश का अनुपालन न करने पर अनुशासनहीनता मानी जाएगी।
  • उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 1989 में उपरोक्त अधिनियम में संशोधन कर 'उर्दू' को राज्य की द्वितीय राजभाषा घोषित किया गया, जिसका प्रयोग राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर अधिसूचित किए जाने वाले उद्देश्यों हेतु किया जा सकेगा।
  • राज्य में प्रचलित विभिन्न भाषाओं को संरक्षित एवं प्रोत्साहित करने हेतु प्रदेश सरकार द्वारा 5 जनपदों- लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, आगरा एवं मुरादाबाद, में भारतीय भाषा केन्द्र स्थापित किए गये हैं।

राज्य की संचित निधि

  • संविधान के अनुच्छेद 266(i) में राज्य के संचित निधि का प्रावधान किया गया है।
  • सरकार को प्राप्त होने वाले समस्त राजस्व आय (कर आय/करेत्तर आय), सरकार द्वारा लिए जाने वाले ऋण और ऋणों की वसूली से प्राप्त धनराशियाँ 'संचित निधि' में जमा की जाती हैं।
  • केन्द्र सरकार की निधि 'भारत की संचित निधि' के नाम से जानी जाती है, जबकि प्रदेशों की अपनी 'राज्य की संचित निधि' होती है।
  • सरकार का संपूर्ण व्यय संचित निधि से किया जाता है।
  • इस निधि की कोई राशि संसद की अनुमति के बिना व्यय नहीं की जा सकती है।
  • राज्यों को 'राज्य संचित निधि' से राशि व्यय करने हेतु राज्य विधान सभा से अनुमति लेनी होती है। इस निधि से धन व्यय करने हेतु विनियोग विधेयक पारित करना होता है।

अनुच्छेद 202(3) के अनुसार राज्य संचित निधि पर निम्नलिखित व्यय भारित होते हैं-
  • राज्यपाल की परिलब्धियां, भत्ते तथा उनके कार्यालय से संबंधित अन्य व्यय।
  • विधान सभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, विधान परिषद के सभापति और उपसभापति के वेतन और भत्ते।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों पर होने वाला व्यय।
  • राज्यों के दायित्व वाले ऋणभार एवं ऋण मोचन व्यय।
  • किसी न्यायालय या मध्यस्थ अधिकरण के निर्णय, डिक्री या पुरस्कार, पंचाट के अनुसार भुगतान हेतु अपेक्षित धनराशियां।
  • उच्च न्यायालय के अधिकारियों - कर्मचारियों के वेतन, भत्ते तथा पेंशन पर होने वाले व्यय, उच्च न्यायालय के अन्य प्रशासनिक व्यय।
  • न्यायालयों एवं आयोगों के व्यय तथा पेंशन पर होने वाले व्यय का समायोजन।
  • राज्य लोक सेवा आयोग के व्यय।
  • अन्य सभी व्यय, जिन्हें राज्य विधान मंडल द्वारा संचित निधि पर भारित किया गया हो।
इस निधि से मात्र निर्धारित विधि के अनुसार और केवल उन प्रयोजनों के लिए तथा उस रीति से जो संविधान में वर्णित हैं, धनराशियों का विनियोग करने के अतिरिक्त अन्य प्रकार से विनियोग नहीं किया जा सकता है।

राज्य की आकस्मिकता निधि

  • आकस्मिकता निधि की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 267(2) में की गई है।
  • इस निधि से सरकार द्वारा ऐसे व्यय किए जाते हैं, जो अपरिहार्य हों, अर्थात इन व्ययों को पूरा करने में विलंब नहीं किया जा सकता।
  • इस निधि से व्यय करने हेतु लोक सभा/राज्य विधान सभा की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं होती, किन्तु व्यय के पश्चात उसे सदन से स्वीकृत कराना अनिवार्य होता है।
  • कई बार सरकार के समक्ष ऐसे अवसर प्रस्तुत होते हैं, जब सरकार को विधान मण्डल की स्वीकृति मिलने से पूर्व ही अप्रत्याशित व्यय करने पड़ते हैं। इस प्रकार के व्यय हेतु 'आकस्मिकता निधि' अग्रदाय के रूप में राज्यपाल के पास रहती है।
  • इस निधि से धनराशि व्यय होने के पश्चात सदन की अनुमति से संचित निधि से उसकी भरपाई करा दी जाती है।
  • वर्तमान में इस निधि के लिए विधानमण्डल द्वारा प्राधिकृत धनराशि ₹600 करोड़ है।
  • यह निधि उत्तर प्रदेश आकस्मिकता निधि अधिनियम, 1950 के अंतर्गत नियमों द्वारा संचालित की जाती है। यह अधिनियम अपरिहार्य स्थिति में आकस्मिकता निधि से व्यय का प्रावधान करता है तथा प्रदेश की संचित निधि से आवश्यक धनराशि का आकस्मिकता निधि में अंतरण करता है।
  • आकस्मिकता निधि से राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 205 एवं 206 के अंतर्गत निहित प्रयोजनों हेतु भी अग्रिम दिया जा सकता है।

राष्ट्रीय राजनीतिक दल घोषित होने की शर्तें
भारतीय चुनाव आयोग की राजनीतिक दल और चुनाव चिन्ह संबंधी पुस्तिका के अनुसार देश में किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय दल की मान्यता प्रदान करने की निम्नलिखित शर्तें हैं-
  • संबंधित राजनीतिक दल को चार या इससे अधिक राज्यों में 'राज्य स्तरीय दल' के रूप मान्यता प्राप्त हुई हो।
  • संबंधित राजनीतिक दल को लोकसभा अथवा विधान सभा चुनावों में चार अलग-अलग राज्यों में कुल वैध मतों के 6 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हों तथा इसके अतिरिक्त 4 लोकसभा सीटों पर विजय प्राप्त हुई हो। अथवा
  • संबंधित राजनीतिक दल ने न्यूनतम 3 राज्यों में लोक सभा की कुल सीटों की कम-से-कम 2 प्रतिशत सीटें जीती हों।

राजनीतिक दल (Political Parties)

  • प्रतिनिधात्मक संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में राजनीतिक दलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।
  • संविधान का अनुच्छेद 19(1) एक मूलभूत अधिकार के रूप में प्रत्येक नागरिक को समूह या संघ बनाने या उसमें शामिल होने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29क (29A) लोगों के संघ या नागरिकों के समूहों को चुनाव आयोग में, राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराने का प्रावधान करता है।
  • भारतीय संविधान निर्माताओं ने राष्ट्र की विविधता एवं बहुलवाद को बनाए रखते हुए एक एकीकृत समाज व मजबूत एकता वाले राष्ट्र की परिकल्पना की थी। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत में सिद्धांतों पर आधारित ऐसी स्वस्थ राजनीतिक व्यवस्था विकसित होनी चाहिए जो सामाजिक एकता, राष्ट्र निर्माण तथा लोकतंत्र के ताने-बाने को अधिक मजबूती प्रदान करे।
  • संविधान की दसवीं अनुसूची में राजनीतिक दलों का उल्लेख मात्र एक विशिष्ट उद्देश्य, 'पार्टी से दल-बदल करने पर संसद के किसी भी सदन या विधान मण्डल से अयोग्य घोषित करने हेतु', किया गया है।
  • उपरोक्त अपवाद को छोड़कर संविधान में राजनीतिक दलों के निर्माण, वित्त या विनियमन के संबंध में कोई प्रावधान नहीं है।
  • भारत का चुनाव आयोग, चुनाव चिन्ह (आरक्षण - आवंटन) आदेश, 1968 के तहत जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल अथवा राज्य दल के रूप में मान्यता प्रदान करता है। इसका उद्देश्य मात्र चुनाव चिन्ह आवंटन है।
  • भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा हाल में जारी अधिसूचना के अनुसार देश में आज 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दल तथा 57 राज्य स्तरीय राजनीतिक दल हैं। इसके अतिरिक्त देश में 2,597 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल विद्यमान हैं।

चुनाव आयोग द्वारा देश में जिन 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान दी गयी है, उनके नाम हैं-
  • भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस (INC)
  • भारतीय जनता पार्टी (BJP)
  • बहुजन समाज पार्टी (BSP)
  • आम आदमी पार्टी (AAP)
  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M)
  • नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP)

चुनाव आयोग द्वारा कुछ समय पूर्व भारत की 3 पार्टियों से 'राष्ट्रीय राजनीतिक दल' का दर्जा वापस ले लिया गया है। यह राजनीतिक दल हैं -
  • राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP)
  • तृणमूल कांग्रेस पार्टी (TMC)
  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)

उत्तर प्रदेश में भारतीय चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त 'राजनीतिक राष्ट्रीय दल' इस प्रकार हैं -
  • भारतीय जनता पार्टी
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
  • बहुजन समाज पार्टी
उत्तर प्रदेश की संचित निधि और आकस्मिक निधि में अंतर
संचित निधि (Consolidated Fund) आकस्मिक निधि (Contigency Fund)
1. उत्तर प्रदेश की संचित निधि का संबंध भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 से है। 1. आकस्मिक निधि का संबंध संविधान के अनुच्छेद 267 से है।
2. संचित निधि की कोई उच्च सीमा निर्धारित नहीं है। 2. आकस्मिक निधि की ऊपरी सीमा निर्धारित होती है, उदाहरण: 26 जुलाई, 2020 को उत्तर प्रदेश में आकस्मिक निधि की उच्च सीमा ₹600 करोड़ से बढ़ाकर ₹1200 करोड़ कर दी गयी।
3. उत्तर प्रदेश की संचित निधि से भारित व्ययों का भुगतान होता है। 3. उत्तर प्रदेश की आकस्मिक निधि से आकस्मिक व्ययों का भुगतान होता है।
4. उत्तर प्रदेश की संचित निधि ने संविधान लागू होने के साथ ही कार्य करना प्रारम्भ कर दिया, जिसमें बाद में कुछ संशोधन भी हुए। 4. उत्तर प्रदेश आकस्मिक निधि का गठन 1950 में हुआ तथा इसमें 1972, 1973, 1976, 1985, 1989, 1990, 1995 और 2020 में संशोधन किये गये।
5. उत्तर प्रदेश की संचित निधि से धन निकासी मात्र विधि के अनुसार हो सकती है। 5. उत्तर प्रदेश की आकस्मिक निधि कार्यपालिका के अधीन होती है।

राज्यस्तरीय राजनीतिक दल घोषित होने की शर्तें
चुनाव आयोग द्वारा देश में राज्यस्तरीय राजनीतिक दल (राज्य दल) घोषित करने की निम्नलिखित शर्तें निर्धारित की गयी हैं-
  • संबंधित राजनीतिक दल ने राज्य की विधान सभा के आम चुनावों में कुल वैध मतों का न्यूनतम 6 प्रतिशत मत प्राप्त किया हो तथा राज्य विधान सभा में न्यूनतम 2 सीटें जीती हों। अथवा
  • लोक सभा चुनावों में राज्य के कुल वैध मतों का न्यूनतम 6 प्रतिशत मत प्राप्त किया हो, साथ ही कम-से-कम एक सीट पर विजय प्राप्त की हो। अथवा विधान सभा की कुल सीटों की 3 प्रतिशत सीटें या 3 सीटें, जो अधिक हो, जीती हों।

उत्तर प्रदेश राज्य चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं-
  • राष्ट्रवादी काँग्रेस पार्टी
  • बहुजन समाज पार्टी
  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
  • भारतीय जनता पार्टी
  • भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस
  • जनता दल (यूनाइटेड)
  • भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माले, लिबरेशन)
  • भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)
  • समाजवादी पार्टी
  • राष्ट्रीय लोक दल
  • राष्ट्रीय जनता दल
  • जनता दल (सेक्यूलर)
  • आल इण्डिया फारवर्ड ब्लाक
  • आल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन
  • आम आदमी पार्टी
  • इण्डियन यूनियन मुस्लिम लीग

'राष्ट्रीय पार्टी' को प्राप्त होने वाले लाभ
संविधान के अनुसार भारत में राजनीतिक दलों के लिए चुनाव आयोग से राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तरीय राजनीतिक दल होने का दर्जा प्राप्त करना अनिवार्य नहीं है। बावजूद इसके, 'राष्ट्रीय राजनीतिक दल' घोषित होने से पार्टियों को अनेक महत्वपूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं। उदाहरण-
  • राष्ट्रीय राजनीतिक दल को विशिष्ट चुनाव चिन्ह आवंटित किया जाता है, जिसका प्रयोग पूरे देश में किसी अन्य राजनीतिक दल द्वारा नहीं किया जा सकता।
  • राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तरीय राजनीतिक दल की मान्यता प्राप्त करने वाली पार्टियों को नामांकन दाखिल करने के लिए मात्र एक प्रस्तावक (Proposer) की आवश्यकता होती है।
  • राष्ट्रीय अथवा राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग से मतदाता सूची के दो सेट निःशुल्क प्रदान किए जाते हैं। इन दलों से चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को आम चुनावों में मतदाता सूची की एक प्रति निःशुल्क उपलब्ध करायी जाती है।
  • राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को अपना पार्टी कार्यालय स्थापित करने हेतु सरकार द्वारा भूमि अथवा भवन उपलब्ध कराया जाता है।
  • राष्ट्रीय राजनीतिक दल चुनाव प्रचार में 40 स्टार प्रचारक तक रख सकते हैं, जिनका यात्रा व्यय पार्टी प्रत्याशियों के चुनावी खर्च में नहीं जोड़ा जाता है।
  • चुनाव के समय राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को दूरदर्शन तथा रेडियो पर प्रसारण एवं प्रचार करने की मंजूरी मिलती है।

राजनीतिक दलों का पंजीकरण

  • राजनीतिक दलों के पंजीकरण की प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29A के अंतर्गत निर्धारित है।
  • एक राजनीतिक दल जो उपरोक्त उपबंध के अंतर्गत पंजीकृत होना चाहता है, उसे अपने गठन के 30 दिनों के भीतर चुनाव आयोग के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करना होता है। यह आवेदन, आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 व जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29A द्वारा प्राप्त अधिकारों के तहत निर्धारित प्रारूप के अनुसार होना चाहिए।

राजनीतिक दलों के कार्य

निर्वाचकों का प्रतिनिधित्व
  • राजनीतिक दल जनता से जुड़े मुद्दे एवं उनकी शिकायतों को शासन - प्रशासन स्तर पर उठाते हैं तथा उनके निराकरण हेतु सरकार पर दबाव बनाते हैं।
  • राजनीतिक दल समाज के विभिन्न वर्गों, जैसे - अल्पसंख्यक, दलित, वंचित वर्ग आदि को अपनी समस्याओं एवं मांगों को प्रस्तुत करने का मंच प्रदान करते हैं।

चुनावी कार्य
  • एक सशक्त लोकतंत्र की पहचान है 'स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया'। इस चुनावी प्रक्रिया के सबसे महत्वपूर्ण घटक राजनीतिक दल होते हैं। राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने हेतु चुनावों में प्रतिभाग करते हैं।

शासी कार्य (Governing Function)
  • चुनाव में विजय प्राप्त करने वाला/वाले राजनीतिक दल सरकार का गठन करता है/करते हैं तथा अपनी नीतियों व कार्यक्रमों के आधार पर देश/राज्य में शासन चलाते हैं।
  • चुनाव में परास्त राजनीतिक दल विपक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। विपक्षी दल सरकार के कमजोर पक्षों को उजागर करते हुए उसकी नीतियों व कार्यक्रमों की कमियों को सुधारने के लिए आवाज उठाते हैं।

जनपक्षधरता
  • राजनीतिक दल जनता से जुड़े मुद्दों के पक्ष या विपक्ष में लोक मत का निर्माण कर उसे आवाज प्रदान करते हैं।
  • जनता या राष्ट्र से जुड़े मुद्दों पर आंदोलनों, लेखों, टेलीविजन पर बहस आदि माध्यमों से जनता में जागरुकता फैला कर उनका समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

जनता एवं सरकार के मध्य- 'सेतु'
  • राजनीतिक दल, जनता व सरकार के मध्य एक 'सेतु' (Bridge) का कार्य करते हैं।
  • राजनीतिक दल जमीनी स्तर पर जनता के बीच कार्य करते हैं, जिससे वह जन आकाँक्षाओं व मुद्दों से भली भाँति परिचित होते हैं। जनता के मुद्दों एवं समस्याओं को उठाते हुए उनके समाधान का प्रयास करते हैं।

जनकल्याण
  • प्रत्येक राजनीतिक दल चुनावी घोषणा पत्र के आधार पर चुनावों में उतरता है। चुनावों में राजनीतिक दल जनता से अपनी नीतियों व कार्यक्रमों के आधार पर विभिन्न वायदे कर समर्थन मांगते हैं।
  • चुनाव में विजय के पश्चात राजनीतिक दल अपने वायदों को अपनी नीतियों के माध्यम से पूर्ण करने का कार्य करते हैं। इस तरह वह सरकार के नीति निर्धारण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उत्तर प्रदेश में प्रमुख राजनीतिक दल

भारतीय जनता पार्टी

  • राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के आनुसंगिक संगठन भारतीय जनसंघ के स्वरूप में परिवर्तन कर 6 अप्रैल, 1980 को दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की गयी।
  • भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे।
  • भाजपा आज न सिर्फ भारत, बल्कि विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बन चुका है।
  • भारत में आज केन्द्र के साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत अनेक राज्यों में भाजपा का शासन है।
  • भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रवादी दल है, जो स्व. दीनदयाल उपाध्याय के समग्र मानवतावाद एवं अन्त्योदय की विचारधारा से प्रभावित है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

  • स्वतंत्रता आंदोलन के समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर, 1885 को बम्बई (वर्तमान मुम्बई) में ए.ओ. ह्यूम द्वारा की गयी थी। इसके प्रथम अध्यक्ष थे व्योमेश चन्द्र बनर्जी।
  • स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में उभरी। इसने देश को पं. जवाहर लाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हाराव और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री दिये।
  • स्थापना के बाद से अब तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्वरूप और प्रभाव में आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है। वर्तमान में यह कुछ सीमित राज्यों में शासन करने वाली राजनीतिक पार्टी बनकर रह गयी है, जिसे अपने विस्तार हेतु संघर्ष करना पड़ रहा है।
  • लोकसभा चुनाव 2024 में 99 सीटों पर विजय प्राप्त कर कांग्रेस ने अपनी स्थिति सुधारने का कार्य किया है। इस चुनाव में लोकसभा चुनाव 2019 की तुलना में कांग्रेस को 47 सीटें अधिक प्राप्त हुई है।

बहुजन समाज पार्टी

  • शासन-सत्ता में मुख्य रूप से दलित वर्ग, आदिवासियों (ST) तथा अल्पसंख्यकों को यथोचित प्रतिनिधित्व दिलाने के उद्देश्य से वर्ष 1984 में श्री कांशीराम द्वारा 'बहुजन समाज पार्टी' की स्थापना की गयी। वर्तमान में पार्टी की अध्यक्ष एवं सर्वमान्य नेता सुश्री मायावती हैं।
  • उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में बहुजन समाज पार्टी को 4 बार सरकार बनाने का अवसर प्राप्त हुआ, यद्यपि बीते लंबे समय से पार्टी हर प्रकार के सत्ता से बाहर रह कर पुनर्वापसी के लिए संघर्ष कर रही है।

समाजवादी पार्टी

  • राजनीति में पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं वंचित वर्ग को समुचित स्थान दिलाकर समावेशी सरकार की स्थापना के उद्देश्य से 4 अक्टूबर, 1992 को श्री मुलायम सिंह यादव द्वारा समाजवादी पार्टी की स्थापना की गयी।
  • राममनोहर लोहिया एवं जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से प्रभावित समाजवादी पार्टी का नेतृत्व आज श्री अखिलेश यादव कर रहे हैं।
  • वर्तमान समय में समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है।
  • लोकसभा चुनाव 2024 में 37 सीटें जीतकर समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।

राष्ट्रीय लोकदल

  • पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पुत्र चौधरी अजीत सिंह द्वारा 1996 में राष्ट्रीय लोकदल की स्थापना की गयी।
  • राष्ट्रीय लोकदल का उद्देश्य शासन-सत्ता में किसानों, मजदूरों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं अन्य वंचित वर्ग को सम्मानजनक हिस्सेदारी दिलाना है।
  • चौधरी जयन्त चौधरी राष्ट्रीय लोकदल के वर्तमान अध्यक्ष हैं।

उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय राजनीतिक दल

  • क्षेत्रीय राजनीतिक दल किसी विशेष क्षेत्र अथवा राज्य तक सीमित होते हैं। यह दल सामान्यतः राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की अपेक्षा क्षेत्रीय स्तर पर सत्ता प्राप्त करने पर अधिक केन्द्रित होते है।
  • क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का ध्यान स्थानीय अथवा क्षेत्रीय मुद्दों/समस्याओं पर अधिक होता है, जिनके समाधान हेतु यह निरंतर कार्य करते हैं।
उत्तर प्रदेश में कई क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं, जिनमें प्रमुख नाम इस प्रकार हैं-

समाजवादी पार्टी (सपा)

  • यह उत्तर प्रदेश का सर्वप्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक दल है, जिसकी स्थापना 1992 में हुई। इसके प्रमुख नेता मुलायम सिंह यादव थे। वर्तमान अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं।
  • समाजवादी पार्टी पीडीए (पिछड़ा, दलित एवं अल्पसंख्यक) के हितों की बात कर अपने राजनैतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है।

बहुजन समाजपार्टी (बसपा)

  • इस राजनैतिक दल की स्थापना स्व. श्री कांशीराम द्वारा की गयी। पार्टी का नेतृत्व वर्तमान में सुश्री मायावती के हाथ में है।
  • पार्टी दलितों, अल्पसंख्यकों एवं पिछड़ों के अधिकारों को मुद्दा बना कर राजनैतिक मुकाम हासिल करने का प्रयास कर रही है।

राष्ट्रीय लोकदल (रालोद)

यह जाट समुदाय में लोकप्रिय राजनीतिक दल है, जिसकी स्थापना चौधरी चरण सिंह द्वारा की गयी है। इसके अध्यक्ष जयंत चौधरी हैं। वर्तमान में यह दल केन्द्र के साथ उत्तर प्रदेश में भी सत्ता की भागीदार है।

उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग

  • भारतीय संविधान में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के तहत अनुसूची 40 में वर्णित पंचायतों की स्थापना हेतु संयुक्त प्रांत पंचायती राज अधिनियम 1947 पारित कर 1949 में ग्राम सभा की स्थापना की गई।
  • ग्राम पंचायत एवं नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा (73वें व 74वें संविधान संशोधन, 1993) प्राप्त होने के पश्चात 23 अप्रैल, 1994 को राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना की गई।
  • उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग का मुख्य कार्य पंचायत एवं नगर निकाय चुनाव को सम्पन्न कराना, मतदाता सूची तैयार करना, आदर्श चुनाव आचार संहिता तैयार करना आदि है।
  • वर्तमान में 1983 बैच के सेवानिवृत्त सिविल सेवक राज प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयुक्त हैं। उन्होंने यह पद 7 मार्च, 2024 को संभाला है।
उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयुक्त
क्र.सं. आयुक्त/अध्यक्ष कार्यकाल
1. श्री आर.डी. सानेकर 24 अप्रैल, 1994 से 09 दिसम्बर, 1996 तक
2. डॉ. यशपाल सिंह 10 दिसम्बर, 1996 से 09 दिसम्बर, 2001 तक
3. श्री अपरमिता प्रसाद सिंह 10 दिसम्बर, 2001 से 31 मई, 2007 तक
4. श्री राजेन्द्र भौनवाल 01 जून, 2007 से 04 अप्रैल, 2012 तक
5. श्री सतीश कुमार 11 अप्रैल, 2012 से 19 दिसम्बर, 2017 तक
6. श्री मनोज कुमार 18 जनवरी, 2018 से 17 जनवरी, 2024 तक
7. श्री राज प्रताप सिंह 7 मार्च, 2024 से वर्तमान तक

अपना दल

यह विशेष रूप से कुर्मी समुदाय में लोकप्रिय राजनीतिक दल है। वर्तमान में इसका एक हिस्सा प्रदेश सरकार में शामिल है। इसकी अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल है।

निषाद पार्टी

इस दल का पूरा नाम 'निर्बल भारतीय शोषित हमारा आम दल' है। इसकी स्थापना 2016 में डा. संजय निषाद द्वारा की गयी।

राजनीतिक दलों के समक्ष चुनौतियां

भारत में आजकल राजनीतिक दलों को अनेक चुनौतियों एवं विसंगतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिससे वह देश की राजनीति में अपनी अपेक्षित भूमिका का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं।
वर्तमान परिदृश्य में राजनीतिक दलों के समक्ष विद्यमान कुछ प्रमुख चुनौतियाँ इस प्रकार हैं-
  • आंतरिक लोकतंत्र का अभाव
  • राजनीतिक दलों में पारिवारिक उत्तराधिकार का विवाद
  • राजनीति का अपराधीकरण
  • कदाचार के आरोपियों का राजनीति में प्रवेश
  • जनप्रतिनिधियों द्वारा दल-बदल/खरीद-फरोख्त (Horse trading)
  • चुनावों के दौरान अनुचित वायदे, मुफ्त रेवड़ियां बांटना
  • तुष्टिकरण की राजनीति
  • सामाजिक, सांप्रदायिक एवं संवेदनशील मुद्दों को भड़काना
  • विपक्षी राजनीतिक दलों के विरुद्ध केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग संबंधी आरोप
उपर्युक्त विसंगतियों एवं चुनौतियों के चलते कुछ राजनीतिक दल तात्कालिक रूप से लाभ प्राप्त करने में कई बार सफल होते हैं, किन्तु दीर्घकालिक रूप से इससे समाज एवं राष्ट्र को हानि उठानी पड़ती है। यह चुनाव प्रक्रिया में नागरिकों का विश्वास कमजोर करती हैं।

राजनीतिक दलों की कार्य प्रणाली में सुधार के सुझाव

  • गंभीर अपराधों में शामिल विधायकों/सांसदों के मुकदमों का त्वरित निस्तारण किया जाना चाहिए।
  • अपराधियों को टिकट देने से बचना चाहिए।
  • महिलाओं को चुनाव में भागीदारी का अधिक अवसर दिया जाना चाहिए।
  • चुनावों में छद्म उम्मीदवार उतारने पर रोक लगनी चाहिए। छद्म उम्मीदवारों से चुनावी प्रक्रिया की छवि धूमिल तथा लोकतंत्र कमजोर होता है।
  • राजनीतिक दलों के जाति विभाजक, सांप्रदायिक, धर्म आधारित भाषणों पर रोक लगानी चाहिए।
  • 'दल-बदल कानून' और सांसदों/विधायकों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगायी जानी चाहिए।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।