उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना एवं समस्याएं
उत्तर प्रदेश केवल भारत का सबसे बड़ा सूबा मात्र नहीं है, बल्कि यह विविध संस्कृतियों, परम्पराओं और एक बेहद जटिल सामाजिक ताने-बाने का जीवंत अक्स है। गंगा-जमुनी तहजीब के इस प्रदेश में जहाँ एक ओर संयुक्त परिवार, नातेदारी और ग्रामीण भाईचारे की मिठास बसती है, वहीं दूसरी ओर गरीबी, बेरोजगारी, जातिवाद और दहेज जैसी कुप्रथाओं की गहरी खाइयाँ भी मौजूद हैं। इस विस्तृत लेख में हम यूपी की सामाजिक संरचना की परतों को उधेड़ते हुए उसकी बुनियाद, विशेषताओं और वर्तमान समय में प्रदेश के सामने खड़ी प्रमुख सामाजिक समस्याओं (जैसे साम्प्रदायिकता, अशिक्षा और महिला उत्पीड़न) का गहराई से और प्रामाणिक विश्लेषण करेंगे।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना की प्रकृति को समझने के लिए विभिन्न समुदायों के बीच के आंतरिक संबंधों, जनसंख्यात्मक पहलुओं, समूहों, समुदायों, नातेदारी व्यवस्था, जाति प्रथा इत्यादि को समझना होगा। साथ ही सामाजिक संरचना की स्थायी इकाइयों की विशेषताओं पर भी ध्यान देना होगा।
उत्तर प्रदेश में देश की लगभग 17 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। यहां लगभग 80 प्रतिशत हिन्दू और 19 प्रतिशत मुस्लिम के अतिरिक्त 0.32 प्रतिशत सिख, 0.18 प्रतिशत ईसाई, 0.10 प्रतिशत बौद्ध और 0.11 प्रतिशत जैन समुदाय के लोग एक साथ निवास करते हैं। चूंकि यह एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था वाला प्रदेश है, इसलिए इसके सामाजिक संरचना के निर्माण में भूमि, वनस्पति, पशु इत्यादि का महत्वपूर्ण स्थान है। इस क्षेत्र में एक-दूसरे से आन्तरिक जुड़ाव, एक-दूसरे पर निर्भरता और सुख-दुःख में एक-दूसरे को समय पर सहयोग देना इनकी संरचनात्मक विशेषता रही है।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना में सांस्कृतिक तत्व की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रदेश में परिवार व्यवस्था के मुख्यतः दो स्वरूप देखने को मिलते हैं- संयुक्त परिवार और केन्द्रीय परिवार। संयुक्त परिवार ग्रामीण क्षेत्र की महत्वपूर्ण व्यवस्था है। आज भी प्रदेश के गाँवों में दो से तीन पीढ़ियां एक साथ रहती हैं। उनके बीच अन्तःक्रियात्मक संबंधों को लेकर कोई तनाव नहीं रहता। जहाँ तक केन्द्रीय परिवार की बात है, इनमें प्रायः पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं। इस वर्ग में मुख्यतः नौकरी और व्यावसायिक वर्ग के लोग शामिल होते हैं।
वंश परम्परा और नातेदारी व्यवस्था उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना को विशिष्ट बनाती है। प्रदेश में अधिकांश परिवारों का समूह एक गोत्र अथवा वंश विशेष से जुड़े होते हैं, जो अपना संबंध एक समान पूर्वज से मानते हैं। इस प्रकार वे एक वंश-परम्परा का निर्माण करते हैं। पारिवारिक संबंधों की यह वंश-परम्परा कई पीढ़ियों तक चलती रहती है। यह बहिर्विवाही समूह होते हैं, अर्थात इन समूहों के भीतर वैवाहिक सम्बंध स्थापित नहीं हो सकते।
वंशावली के आधार पर एक-दूसरे से संबंध स्थापित कर जिस व्यवस्था का निर्माण होता है उसे नातेदारी व्यवस्था कहते हैं। नातेदारी का विकास वस्तुतः तीन प्रकार से होता है - विवाह संबंधी नातेदारी, रक्त संबंधी नातेदारी और अन्तिम कल्पनात्मक नातेदारी (जैसे- गोद लिए गए बच्चों के माता-पिता से संबंध)। नातेदारी की जो व्यवस्था पहले एक जाति तक सीमित थी, वह अब प्रदेश में बड़े पैमाने पर अन्तर्जातीय विवाहों को मान्यता मिलने से विभिन्न जातीय समूहों तक विस्तृत हो गई है।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना में जाति एक महत्वपूर्ण सामाजिक तत्व है। जाति व्यवस्था में योग्यता या अनुभव के आधार पर नहीं, अपितु जन्म एवं पदानुक्रम व्यवस्था के अनुसार स्तर निर्धारण किया जाता है।
उत्तर प्रदेश में जाति व्यवस्था का कट्टररूप जातिवाद के रूप में व्यापक रूप से देखा जा सकता है। यद्यपि वर्तमान सामाजिक संरचना में कुछ अन्तर्जातीय विवाहों को मान्यता जरूर मिली है, लेकिन जातिवाद के कठोर रूप के कारण सामान्यतः परम्परागत विवाह पद्धति ही आज भी उत्तर प्रदेश के अधिकांश भागों में स्वीकार्य है। जाति व्यवस्था में सदस्यता का आधार आज भी जन्म या कुल है। अर्जित योग्यता को इस जाति व्यवस्था में अधिक महत्व नहीं दिया जाता है।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना में अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान है। इसका ग्रामीण क्षेत्र जहाँ कृषि प्रधान है वहीं शहरी क्षेत्र में उद्योग, व्यवसाय और नौकरी को अधिक महत्व दिया जाता है। उत्तर प्रदेश में कृषि एक धंधा या जीविकोपार्जन का जरिया मात्र नहीं है अपितु एक जीवन शैली है, जो समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में जोड़े रखती है। शहरी क्षेत्र में यही कार्य व्यावसायिक वर्ग करता है। एक व्यवसाय विशेष से जुड़े सभी लोग अपने आपको एक वर्ग मानते हैं और इसी आधार पर एक-दूसरे का अन्तर्भाव से सहयोग और सहायता करने को तत्पर रहते हैं।
राजनीतिक तत्व उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण भाग है। परम्परागत रूप से यहाँ राजनीतिक संरचना का जो स्वरूप पाया जाता है वह लोकतान्त्रिक पद्धति पर आधारित है। यहाँ ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक कुशल नेतृत्व के चुनाव की स्वतंत्रता होती है। यद्यपि जातिवाद, क्षेत्रवाद और सम्प्रदायवाद यहाँ की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन जो भी नेतृत्व उभरता है वह पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करता है।
परम्परागत रूप से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में शक्ति संरचना के प्रमुख तीन आधार थे- जमींदारी व्यवस्था, ग्राम पंचायत और जाति पंचायत। जहाँ एक तरफ जमींदारी प्रथा लोगों की भौतिक तथा आर्थिक हितों की प्रतिनिधि थी, वहीं दूसरी ओर ग्राम पंचायत और जाति पंचायतें ग्रामीण राजनीति की सामाजिक विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करती थीं।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना में धार्मिक संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यहाँ हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्मों के लोगों के अपने-अपने पूजागृह और पूजा पद्धतियां हैं। प्रदेश में सामाजिक संरचना के ढाँचे की स्थिरता इन धार्मिक सम्प्रदायों के पारस्परिक सम्बन्धों और आपसी सामन्जस्य के कारण मजबूत बनी हुई है।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक समस्याएँ
उत्तर प्रदेश की प्रमुख सामाजिक समस्याओं में गरीबी और बेरोजगारी सबसे ऊपर है। जनसंख्या की दृष्टि से यह देश का सबसे बड़ा प्रान्त है। जनगणना 2011 के अनुसार यहाँ की आबादी लगभग 20 करोड़ है। यही बड़ी जनसंख्या प्रदेश की गरीबी और बेरोजगारी का मूल कारण है। तेंदुलकर कमेटी के फॉर्मूले के आधार पर उत्तर प्रदेश में वर्ष 2014 तक 8.09 करोड़ जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे निवास कर रही थी। यानी प्रदेश की एक बड़ी आबादी जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं- भोजन, आवास, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि से वंचित है। अधिक जनसंख्या के कारण प्रदेश में बेरोजगारी में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। वर्ष 2019 के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी में देशभर में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्र की एक बड़ी आबादी रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है। इससे शहरी क्षेत्र की सीमित मूलभूत सुविधाओं पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है, जो नयी समस्याओं को जन्म दे रहा है।
जनगणना 2011 के अनुसार उत्तर प्रदेश की 77.7 प्रतिशत जनसंख्या गांव में निवास करती है। इनके पास आजीविका का एकमात्र साधन कृषि है, किन्तु इनमें से अधिकांश व्यक्तियों के पास अत्यंत छोटे खेत हैं अथवा अपना खेत है ही नहीं। ऐसे में इन्हें दूसरों के खेत में काम कर अपने परिवार का भरण-पोषण करना होता है। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र की कुछ प्रमुख सामाजिक समस्याएँ इस प्रकार हैं-
- अधिक व्यक्ति खेती पर निर्भर हैं।
- उच्च जातियों में अधिक व्यक्तियों के पास अभी बड़े-बड़े खेत हैं जबकि अन्य गरीब अथवा निम्न जाति के लोगों के पास न्यूनतम भूमि है या वे भूमिहीन श्रमिकों की भाँति कार्य करते हैं।
- शहरी लोगों की तुलना में ग्रामीण लोग बिखरे हुए हैं।
- ग्रामीणों की न केवल जीवन शैली बल्कि मूल्य भी अभी तक परम्परागत हैं।
- किसानों को अपनी पैदावार का मूल्य उनके परिश्रम के अनुपात में कम मिलता है। इन कारणों से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को अपने जीवन-यापन हेतु नए क्षेत्रों एवं स्रोतों की खोज में शहरों की तरफ पलायन कर वहां की गंदी बस्तियों में रहना पड़ता है।
बढ़ती जनसंख्या प्रदेश में कई अन्य तरह की समस्याएं पैदा कर रही है। यहां की जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर 20.23 प्रतिशत है। प्रदेश की एक बड़ी आबादी के अशिक्षित होने के कारण जनसंख्या वृद्धि दर नियंत्रण कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। शासन-प्रशासन के लाख प्रयत्नों और उपायों के बाद भी यहां लोगों के जीवन स्तर में आशातीत सुधार नहीं हो पा रहा है तो इसके पीछे बढ़ती जनसंख्या एक बड़ा कारण है। इस भारी भरकम जनसंख्या के कारण प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, आवासीय व्यवस्था एवं रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं में गुणात्मक सुधार नहीं हो पा रहा है।
निरक्षरता उत्तर प्रदेश की एक अन्य बड़ी सामाजिक समस्या है। जनगणना 2011 के आंकड़े के अनुसार यहाँ की लगभग 33 प्रतिशत आबादी निरक्षर है। इसका बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि इतनी बड़ी आबादी को सरकारी सुविधाओं और उपायों से अवगत करा पाना कठिन हो जाता है, जिसके कारण वह तमाम सरकारी योजनाओं के लाभों से वंचित रह जाती है। यह वर्ग तमाम रूढ़वादी मान्यताओं से घिरा रहता है। यह लोग किसी भी प्रकार के नवाचार अथवा परिवर्तनों के लिए तैयार नहीं होते।
साम्प्रदायिकता उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण एवं गम्भीर सामाजिक समस्या है। कुछ व्यक्तियों एवं समूहों द्वारा अपने हितों के पोषण के लिए साम्प्रदायिक समस्याओं को जन्म दिया जाता है। साम्प्रदायिक भावनाएं भड़का कर प्रदेश की सामाजिक संरचना को अस्थिर करना, धर्म के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकना और जरूरत के हिसाब से विभिन्न सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य पैदा कर दंगे कराना कुछ साम्प्रदायिक नेताओं के लिए व्यक्तिगत लाभ का विषय बन गया है। इस तरह की संकीर्ण मनोवृत्ति के कारण साम्प्रदायिकता ने उत्तर प्रदेश में मॉब लिंचिंग जैसी एक नई सामाजिक समस्या को जन्म दिया है।
प्रदेश के सामाजिक ताना-बाना के विघटन में जातिवाद का प्रमुख स्थान है। इसने समाज को अगणित छोटे व आत्मकेंद्रित गुटों में विभाजित कर दिया है। जातिवाद की उग्र भावना ने प्रदेश में कई बार सामाजिक संघर्षों एवं सामाजिक तनावों को जन्म दिया है।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना को दहेज प्रथा और नारी उत्पीड़न की समस्या ने काफी प्रभावित किया है। दहेज की भारी भरकम मांग के कारण कितनी शादियाँ तय नहीं हो पाती हैं, तो कितनी शादियाँ मण्डप में ही तोड़ दी जाती हैं। ऐसी स्थिति न आये इसके लिए लड़की पक्ष को बैंकों या महाजनों से कर्ज लेकर दहेज देने के लिए बाध्य होना पड़ता है। दहेज के अभाव में आज भी अनेक महिलाओं को तलाक या उत्पीड़न के दौर से गुजरना पड़ता है। 1961 का दहेज निषेध अधिनियम इसकी रोकथाम में असफल रहा है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में बीते वर्ष दहेज हत्या के 8233 मामले सामने आये, जिसमें सबसे अधिक उत्तर प्रदेश से रहे।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना में विचलन उत्पन्न होने के कारण महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा एवं ऑनर किलिंग जैसी सामाजिक समस्याओं ने जन्म लिया है। यह एक ऐसा अपराध है जिसे परिवार के सम्मान के नाम पर छुपाने का प्रयास किया जाता है। घरेलू हिंसा की घटना को रिश्तों के दरकने से जोड़कर देखा जाता है। घरेलू दायरे में किसी महिला का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक, मनोवैज्ञानिक या यौन शोषण किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाना जिसके साथ महिला के पारिवारिक संबंध हैं, घरेलू हिंसा कहलाता है। इस घिनौने कार्य को रोकने के लिए 2005 में घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम बनाया गया जिसे 26 अक्टूबर, 2006 को लागू किया गया। बावजूद इसके, उत्तर प्रदेश में इसका प्रभाव बेहद कम दिखाई दे रहा है।
उत्तर प्रदेश की सामाजिक व्यवस्था में नशाखोरी की समस्या बेहद गम्भीर है। यह एक ऐसी बुराई है जो ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक फैली हुई है। नशे के आगोश में आज का युवा वर्ग दिग्भ्रमित है। नशाखोरी की लत के कारण युवा वर्ग अवसाद और कुण्ठा का शिकार हो रहा है, जिससे वह आपराधिक गतिविधियों की तरफ अग्रसर हो जाता है।
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