उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध संगीत, नृत्य और नाट्य कला

उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध संगीत, नृत्य और नाट्य कला

उत्तर प्रदेश की माटी में सिर्फ इतिहास ही नहीं, बल्कि सुर, ताल और भावों की एक जीवंत आत्मा बसती है। भरत मुनि के 'नाट्यशास्त्र' से लेकर अवध के नवाबों के राजसी दरबारों तक, इस राज्य ने भारतीय कला व संस्कृति को तराशने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। बनारस के घाटों पर गूंजती ठुमरी हो, ब्रज की भावपूर्ण रासलीला, या फिर घुंघरुओं की झंकार से सजा 'कथक' UP की यह सांस्कृतिक विरासत बेमिसाल और वैभवशाली है। इस विस्तृत लेख में हम उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध संगीत घरानों, मनमोहक लोक नृत्यों और सदियों पुरानी नाट्य कला के उस सुरमयी सफरनामे पर चलेंगे, जो आपकी जानकारी बढ़ाने के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण है।
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उत्तर प्रदेश प्राचीन काल से संगीत एवं नृत्य आदि प्रदर्शन कला के क्षेत्र में समृद्ध रहा है। माना जाता है कि भरत मुनि द्वारा 'नाट्यशास्त्र' की रचना उत्तर प्रदेश में की गई थी। यह संगीत और नृत्य के विषय पर रचित प्रथम नियमित और विस्तृत पुस्तक है।

उत्तर प्रदेश में शास्त्रीय संगीत का विकास

नाट्यशास्त्र (भरत मुनि)

भारतीय संगीत का मूल स्रोत

हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति

उत्तर भारत व उ.प्र. में प्रचलित

प्रमुख विधाएँ

ध्रुपद ख्याल तराना ठुमरी

प्रमुख लोक संगीत (Folk Music)

कज़री

  • क्षेत्र: मिर्जापुर (पूर्वांचल)
  • समय: श्रावण मास (मानसून पूर्व)
  • विषय: वर्षा ऋतु, विरह, राधा-कृष्ण प्रेम
  • स्त्रियों द्वारा समूह गायन 'ढुलमुनिया कज़री' कहलाता है।

रसिया & फाग

  • क्षेत्र: ब्रज क्षेत्र (रसिया), पूर्वी उ.प्र. (फाग)
  • अवसर: होली उत्सव
  • विषय: राधा-कृष्ण प्रेम-प्रसंग, प्राकृतिक सौन्दर्य
  • रसिया में 'बंप' (बड़े ढोल) का प्रयोग।

बिरहा

  • क्षेत्र: पूर्वी उत्तर प्रदेश
  • समुदाय: अहीर समुदाय
  • विषय: पति के विरह में पत्नी का भाव
  • प्रथम गायक: बिहारी यादव (गाज़ीपुर)।

आल्हा

  • क्षेत्र: महोबा (बुन्देलखण्ड)
  • विषय: आल्हा और ऊदल की वीरता
  • वीरतापूर्ण कथात्मक गीत।
  • ब्रजभाषा, भोजपुरी व अवधी में गायन।

प्रमुख संगीत घराने और कलाकार

घराना विशेषता / शैली संस्थापक / प्रमुख संरक्षण प्रमुख कलाकार
लखनऊ घराना ख्याल, ठुमरी, कथक (वादन व नृत्य) वाजिद अली शाह, ठाकुर प्रसाद महाराज बेगम अख्तर, बिरजू महाराज, लच्छू महाराज, शम्भू महाराज
बनारस घराना गायन, वादन और नृत्य (मुगल प्रभाव से मुक्त) काशी राजा, पं. जानकी प्रसाद किशन महाराज, बिस्मिल्ला खां, गिरिजा देवी, पं. रविशंकर
आगरा घराना नौहर गायन शैली, 'बंदिश' (रंगीला घराना) हाजी सुजान खाँ फैयाज खान, स्वामी बल्लभदास
किराना घराना ख्याल गायन नायक गोपाल (मुजफ्फरनगर) पं. भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल

कथक नृत्य के प्रमुख घटक (Sequence)

1. नृत्त & ठाट

वंदना और सुंदर मुद्रा में खड़े होना

2. आमद & जुगलबंदी

तालबद्ध बोल व तबलावादक से प्रतिस्पर्द्धा

3. कवित् & तराना

कविता का अर्थ और लयबद्ध प्रस्तुति

4. करमालय & तिहाई

तेज पदचालन व नाटकीय समाप्ति

क्षेत्रीय लोक नृत्य (Regional Folk Dances)

ब्रज क्षेत्र

  • चरकुला/घड़ा: रथ के पहिये पर कई घड़े रखकर नृत्य (होली दूज)।
  • मयूर नृत्य: मयूर पंख पहनकर राधा-कृष्ण प्रेम पर आधारित।
  • रास व झूला: श्रावण माह व रासलीला के दौरान।

बुन्देलखण्ड क्षेत्र

  • दीवारी पाई डंडा: अहीरों द्वारा गुजरात के डांडिया के समान।
  • राई: बेड़िया जनजाति महिलाओं द्वारा (मयूर नृत्य समान)।
  • सौरा/सोहरा: फसल कटाई पर कृषकों द्वारा।

पूर्वांचल

  • धोबिया: धोबी समुदाय (धोबी-गधे का अभिनय)।
  • कठघोड़वा: कृत्रिम लकड़ी के घोड़े पर नृत्य।
  • नटुआ: विवाह में बारात जाने के बाद महिलाओं द्वारा पुरुष वेश में।

अवध एवं अन्य

  • जोगिनी (अवध): रामनवमी पर पुरुष महिलाओं के वेश में।
  • ढेढ़िया (अवध): राम के अयोध्या वापसी पर सिर पर छिद्रदार बर्तन रखकर।
  • करमा (सोनभद्र/मिर्जापुर): जनजातियों द्वारा फुदकते हुए पत्तियों को काटना।

प्रमुख लोक नाट्य (Folk Theatre)

नाट्य विधा मुख्य विशेषताएँ शैलियाँ / प्रकार
रामलीला भगवान राम के जीवन पर आधारित (10-12 दिन)। 2008 में UNESCO अमूर्त विरासत में शामिल। अवधी/क्षेत्रीय भाषा (विदेशों में मुखौटा व छाया रामलीला)
नौटंकी स्वांग की शाखा, ऐतिहासिक/सामाजिक लोक कथाएं। काव्यात्मक संवाद। कानपुरी (अभिनय प्रधान) व हाथरसी (काव्य प्रधान)
स्वांग खुले रंगमंच में 10-12 कलाकारों द्वारा गायन व संवाद (सामाजिक विषय)। रोहतक (हरियाणवी) व हाथरस (ब्रजभाषा)
रासलीला कृष्ण के जीवन (बचपन, किशोरावस्था) के प्रसंगों का जन्माष्टमी पर प्रदर्शन। ब्रजभाषा का प्रयोग

उत्तर प्रदेश में संगीत

उत्तर प्रदेश में संगीत की परम्परा वैदिक काल से विद्यमान है। सामवेद में अवरोही क्रम में खरहरप्रिया राग के सभी सात स्वर दिये गये हैं। सामवेद के उपवेद 'गंधर्ववेद' को 'संगीत का विज्ञान' माना जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण में वीणा के अंगों की चर्चा है। कौषीतकी और जैमनीय ब्राह्मण में संगीत, नृत्य और वाद्य यंत्रों की चर्चा है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व महाजनपद काल में वत्स राज्य का शासक उदयन वीणा वादन में अत्यंत निपुण एवं विख्यात बताया गया है।
गुप्त राजाओं तथा सम्राट हर्ष के समय में संगीत की विधाएँ अपने शीर्ष पर थीं। समुद्रगुप्त को स्वर्ण सिक्कों पर वीणा बजाते हुए दिखाया गया है।
आगे चलकर उत्तर प्रदेश में संगीत का विकास भक्ति आंदोलन व शाही दरबारों के अंतर्गत हुआ। आगरा, फतेहपुर सीकरी, जौनपुर, लखनऊ, अयोध्या, बांदा और दतिया के शाही दरबारों में संगीत को संरक्षण मिला एवं इसका विकास हुआ। भक्ति आंदोलन ने शास्त्रीय संगीत को समृद्ध बनाने तथा लोक संगीत के विकास का काम किया। वल्लभाचार्य ने मंदिरों में भजन गायन की परम्परा शुरू की। इनके पुत्र विट्ठल नाथ ने 'अष्टछाप' नाम से कवियों का समूह बनाया, जो अच्छे संगीतकार भी थे।

उत्तर प्रदेश में शास्त्रीय संगीत

भारतीय शास्त्रीय संगीत का मूल नाट्यशास्त्र में निहित है। समय के साथ भारतीय संगीत दो अलग-अलग धाराओं में विभक्त हो गया-
  1. हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति
  2. कर्नाटक संगीत पद्धति
उत्तर प्रदेश समेत सम्पूर्ण उत्तर भारत में शास्त्रीय संगीत की हिन्दुस्तानी शाखा प्रचलित है। हिन्दुस्तानी शाखा प्राकृतिक स्वर सप्तक सिद्धांत का पालन करती है। बाद में हिंदुस्तानी संगीत पद्धति में दस मुख्य विधाएं विकसित हुई - ध्रुपद, ख्याल, तराना, ठुमरी, धमर, होरी, टप्पा, चतुरंग, रस सागर और सरगम। इनमें से कई विधाओं की उत्पत्ति अथवा विकास उत्तर प्रदेश में हुआ।

ध्रुपद

संगीत के निश्चित नियमों से बंधे होने के कारण इसे 'ध्रुपद' कहा जाता है। परम्परागत रूप से इसे तम्बूरे और पखावज वाद्ययंत्रों के साथ प्रस्तुत किया जाता है। इसकी उत्पत्ति मंदिरों में हुई। यह अलाप से शुरू होता है और फिर लय को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है। इसकी भाषा ब्रज है और संस्कृत अक्षरों का प्रयोग किया जाता है। इस शैली को अकबर के समय मुगल दरबार का संरक्षण प्राप्त हुआ, जिससे यह अपने शिखर पर पहुंच गई। अकबर के दरबार में तीन श्रेष्ठ ध्रुपद गायक थे - तानसेन, बाबा गोपालदास तथा स्वामी हरिदास। बैजू बावरा भी इसी काल में माना जाता है। आगे चलकर ध्रुपद गायन शैली को वाणी के आधार पर चार रूपों में बांटा गया।
ध्रुपद का डागरी घराना उत्तर प्रदेश और बिहार से संबंधित है। मुस्लिम होते हुए भी डागर हिंदू देवी-देवताओं के पाठ करते हैं। गुंडेचा बंधु एवं ऋत्विक सान्याल (वाराणसी) ने इस घराना में अच्छी प्रसिद्धि प्राप्त की है।

ख्याल

हिन्दुस्तानी संगीत की ख्याल शैली की उत्पत्ति का श्रेय अमीर खुसरो को जाता है, हालांकि ख्याल को विशेष महत्व जौनपुर के शर्की सुल्तान 'सुल्तान मोहम्मद शर्की' द्वारा दिया गया। ख्याल में संगीतज्ञ को ध्रुपद की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता रहती है। ख्याल की रचनाएँ 'बंदिश' कहलाती हैं। इसके गायन में अलाप की अपेक्षा तान को अधिक महत्व दिया जाता है।
सामान्यतः ख्याल रचना के दो भाग होते हैं -
  1. बड़ा ख्याल - धीमी गति में गाया जाता है।
  2. छोटा ख्याल - तेज गति से गाया जाता है।
उत्तर प्रदेश में 'किराना' और 'आगरा' घराना ख्याल गायन के लिए प्रसिद्ध हैं।

तराना

तराना शैली का विकास अमीर खुसरो के प्रयासों से हुआ। इसमें लय को प्रमुखता दी जाती है। इसे तेज गति में गाया जाता है। मेवाती घराना के 'पंडित रतन मोहन शर्मा' एक प्रसिद्ध तराना गायक हैं।

ठुमरी

ठुमरी, हिंदुस्तानी संगीत की एक अर्ध-शास्त्रीय शैली (सुगम संगीत) है। इसकी गायकी में नृत्य की गति और भाव का ऐहसास रहता है। इसके ऊपर भक्ति आंदोलन का प्रभाव विद्यमान है। ठुमरी गीतों का विषय 'प्रेम' या 'भक्ति' होता है। रचनाओं की भाषा हिन्दी, ब्रजभाषा और अवधी होती है।
उत्तर प्रदेश में ठुमरी के दो प्रमुख घराने हैं-
  1. बनारस घराना
  2. लखनऊ घराना

अमीर खुसरो : तूती-ए-हिंद

  • दिल्ली सल्तनत शासन में सात सुल्तानों का काल देखने वाले अमीर खुसरो का जन्म उत्तर प्रदेश के कासगंज स्थित पटियाली गांव में 1253 ई. में हुआ। इनका वास्तविक नाम अबुल हसन यामिनुद्दीन खुसरो था। यह महान सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।
  • हिन्दुस्तानी शैली के जनक अमीर खुसरो एक प्रतिष्ठित संगीतज्ञ, रचनाकार, इतिहासविद् और विद्वान थे। उन्होंने ईरानी तम्बूरे और भारतीय वीणा को मिलाकर सितार का आविष्कार किया। इसकेअतिरिक्त पखावज के दो टुकड़े कर तबला बनाया।
  • इन्हें सितार और तबला जैसे वाद्ययंत्रों का आविष्कारक माना जाता है। इन्होंने भारतीय संगीत पर ईरानी (पर्शियन) और तुर्की प्रभाव डाला तथा भारतीय और ईरानी रागों के मिश्रण से कई नई रागों को जन्म दिया, जैसे - साजगरी, इमान, यमन, घोरा और जिल्फ राग।
  • संगीत की ख्याल शैली को विकसित करने का श्रेय अमीर खुसरो को दिया जाता है। विलावल सप्तक पर आधारित ख्याल शैली ने भारतीय संगीत को हिंदुस्तानी संगीत और कर्नाटक संगीत में बांटने का काम किया। उन्होंने 'कव्वाली' में एक नयी शैली को जोड़ा। इन्हें भारत में गज़ल का प्रतिपादक भी माना जाता है। अमीर खुसरो एक प्रतिष्ठित लेखक भी थे। इन्हें उर्दू साहित्य और खड़ी बोली का जनक भी माना जाता है। 'नूह-सिपहर', 'मिफता-उल-फुतूह', 'किरान-उस-सादेन', 'मजनू-लैला', 'आइन-ए-सिकंदरी', 'खज़ायन-उल-फुतूह' और 'तुगलकनामा' आदि उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं। संगीत और साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए अमीर खुसरो को तूती-ए-हिंद कहा जाता है, जिसका भावार्थ है- भारत की आवाज़।

बेगम अख्तर (अख्तरी बाई फैज़ाबादी)
ठुमरी की प्रसिद्ध गायिका हैं। इनका जन्म 7 अक्तूबर, 1914 को फैज़ाबाद के एक कुलीन परिवार में हुआ था।

उत्तर प्रदेश का लोक संगीत

लोक संगीत का आम जनमानस की रोज़मर्रा के जीवन की सहज संवेदना से जुड़ाव होता है। उत्तर प्रदेश का लोक संगीत काफी पुराना और विविधता से पूर्ण है। काफी, पीलू, वृंदावनी और सारंग जैसे रागों का उदय उत्तर प्रदेश के लोक संगीत में हुआ।

प्रदेश के प्रमुख लोक संगीत इस प्रकार हैं -

कज़री

श्रावण मास में गाया जाने वाला पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह प्रमुख लोकगीत है। भोजपुरी के अतिरिक्त इसे मैथिली और मगही में भी गाया जाता है। इसकी उत्पत्ति पूर्वांचल के मिर्जापुर क्षेत्र से मानी जाती है। यहां के लोग आरम्भ में विन्ध्यवासिनी देवी के सम्मान में इसे गाते थे, यद्यपि आगे चलकर कृष्ण और राधा का प्रेम इसकी विषयवस्तु में शामिल हो गया।
कज़री में शृंगार रस की प्रधानता होती है। इसके प्रमुख विषय वर्षा ऋतु, विरह और राधा-कृष्ण के प्रेम-प्रसंग हैं। स्त्रियों द्वारा समूह में गायी जाने वाली कज़री को 'ढुलमुनिया कज़री' कहा जाता है।
कज़री के चार प्रमुख क्षेत्र हैं, जिन्हें 'अखाड़ा' कहा जाता है। प्रमुख अखाड़े हैं- पंडित शिवदास मालवीय अखाड़ा, जहांगीर अखाड़ा, अक्खड़ अखाड़ा और बैरागी अखाड़ा। मालिनी अवस्थी, शारदा सिन्हा, विन्ध्यवासिनी देवी, उर्मिला श्रीवास्तव, ऊषा गुप्ता आदि प्रसिद्ध कज़री गायिका हैं।

रसिया

रसिया ब्रज क्षेत्र का प्रमुख लोक संगीत है। इसका विषय राधाकृष्ण का प्रेम-प्रसंग है। ब्रज क्षेत्र में रसिया गीत त्यौहारों, मुख्यतः होली, के समय गाये जाते हैं। गीतों के साथ बंप नामक एक बड़े ढोल का प्रयोग किया जाता है।

बिरहा

बिरहा पूर्वी उत्तर प्रदेश का लोकगीत है। इसे प्राय: अहिर समुदाय द्वारा गाया व सुना जाता है। इसका पारंपरिक विषय 'पति के विरह में उदास पत्नी का भाव' होता है। समय के साथ बिरहा लोकरंजन के लिए लोकप्रिय हो गया। बिरहा के प्रथम गायक गाज़ीपुर निवासी बिहारी यादव थे। इनके अतिरिक्त पद्मश्री हीरालाल यादव, बालेश्वर यादव, विजय लाल यादव, रामकिशुन यादव आदि प्रमुख बिरहा गायक हैं।

फाग

यह होली उत्सव पर गाया जाने वाला गीत है। प्राकृतिक सौन्दर्य और राधा-कृष्ण के प्रेम-प्रसंग इसके प्रमुख विषय हैं। यह मूलरूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश में गाया जाता है।

बनजारा और न्जाबा

यह लोकगीत रात्रि के समय गाया जाता है। यह तेली समुदाय द्वारा गाया जाने वाला गीत है।

कहारवा

यह कहार जाति द्वारा सामान्यतः विवाह कार्यक्रमों में गाया जाने वाला गीत है।

सोहर

यह अवध क्षेत्र का लोकप्रिय गीत है। इसे बच्चे के जन्म के समय गाया जाता है। गीत के माध्यम से मनुष्य के जीवनचक्र को प्रदर्शित किया जाता है।

नौका झक्कड़

यह नाई समुदाय द्वारा गाया जाने वाला गीत है।

पनवारा और हरदुल पाथ

यह बुंदेलखण्ड क्षेत्र के लोकगीत हैं। पनवारा नृत्य आधारित लोकगीत है।

आल्हा

यह बुंदेलखण्ड क्षेत्र का लोकगीत है, जिसकी शुरुआत महोबा में हुई। यह वीरतापूर्ण कथात्मक गीत है, जिनके द्वारा आल्हा और ऊदल की वीरता के किस्से सुनाये जाते हैं। आल्हा और ऊदल राजा परमार की सेना में दो प्रसिद्ध योद्धा थे। आल्हा गीत ब्रजभाषा, भोजपुरी और अवधी में गाये जाते हैं।

इसुरी फाग

यह गीत बुंदेलखण्ड क्षेत्र में लोकप्रिय है। 'हरताल इसुरी' झांसी के एक लोककवि थे, जिनकी रचनाएं ग्रामीण संस्कृति और बुंदेली लोकजीवन की झलक देती हैं।

नकटा

यह अवध क्षेत्र का गीत है। इसे पूर्वांचल में भी गाया व सुना जाता है।

रागिनी और ढोला

यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध लोकगीत हैं।

भक्ति समुदाय के अंतर्गत संगीत

मध्यकाल में भक्ति आंदोलन से जुड़े संतों ने संगीत के माध्यम से आम जन तक अपना संदेश पहुंचाने का कार्य किया। काशी, मथुरा, वृंदावन और अयोध्या भक्ति आंदोलन के प्रमुख केंद्र थे। संगीतमय भक्ति की लोकप्रियता कृष्ण और राम की आराधना से जुड़ी थी।
रामानंद के प्रसिद्ध बारह शिष्यों में से एक सुरसुरानंद ने ध्रुपद की 500 बंदिशों की रचना की, जो आज रामानन्दी ध्रुपद के रूप में प्रचलित हैं। स्वामी वल्लभाचार्य ने मथुरा वृंदावन में पुष्टि संप्रदाय की स्थापना की। उन्होंने मंदिरों में धार्मिक गीतों का गायन एक पूजा पद्धति के रूप में प्रारम्भ कराया। इन धार्मिक गीतों का विषय कृष्णलीला थी। कृष्ण भक्ति संप्रदाय अष्ट प्रहर संगीतमय उपासना करता है।
संगीतमय भक्ति की प्रथा को आगे बढ़ाने का कार्य स्वामी वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने किया। इन्होंने आठ कवियों के समूह से अष्टछाप की स्थापना की। अष्टछाप से जुड़े कवि कृष्णलीला के पदों की रचना करते और उन्हें गाते थे। सूरदास, कुम्भनदास, कृष्णदास, नन्ददास, छीत स्वामी, गोविंद स्वामी, परमानंद दास और चतुर्भुजदास अष्टछाप के कवि थे। सूरदास ने सूरदासी मल्हार की रचना की। विट्ठल दास की एक शिष्या ताजबेगम ध्रुपद-धमार की प्रसिद्ध गायिका थीं। औरंगजेब की भतीजी ताज बेगम ने कृष्णभक्ति की दीक्षा ली थी।
संगीतमय भक्ति की यह परम्परा आगे आने वाले संतों द्वारा जारी रखी गई। स्वामी हितहरिवंश एक पहुंचे हुए संगीतज्ञ थे। इन्हें 'कृष्ण की वंशी का अवतार' माना जाता था।
अलीगढ़ में पैदा हुए स्वामी हरिदास एक संतकवि होने के साथ-साथ शास्त्रीय संगीतज्ञ भी थे। उन्होंने मंदिरों में धार्मिक गीतों का ध्रुपद शैली में गायन प्रारम्भ कराया। इन्हें ध्रुपद की 'डांगर वानी' को प्रारम्भ करने का गौरव प्राप्त है। तानसेन, बैजू बावरा और गोपाल नायक समेत अनेक प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतज्ञ इनके शिष्य थे। इन्होंने तानसेन को दीपक राग, बैजू बावरा को मेघ राग और गोपाल नायक को मलकोंस राग की शिक्षा दी थी।
  • हरिदासी संप्रदाय, जिसे सखी सम्प्रदाय भी कहते हैं, के ऐसे पांच मुख्य केंद्र थे, जहां संगीतमय भक्ति की जाती थी - बांके बिहारी मंदिर, निधिवन, गोरेलाल मंदिर, श्री रसिक बिहारी और राधा-वल्लभ स्थान।
  • हरिदास जयंती समारोह प्रत्येक वर्ष राधाष्टमी के अवसर पर मथुरा में आयोजित होता है। इसे ध्रुपद मेला भी कहते हैं। इस समारोह में देश-विदेश के श्रेष्ठ संगीतज्ञ शामिल होते हैं।

मरसिया

यह गीत शिया मुस्लिम समुदाय द्वारा गाया जाता है। मरसिया की प्रस्तुति का आशय इमाम हुसैन, जोकि पैगम्बर मोहम्मद के पोते थे, की शहादत से है। ये रचनाएं दुःख व्यक्त करती हैं।

चैती

चैती हिन्दू पंचांग के चैत्र माह में गाया जाने वाला गीत है। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश, मुख्यतः वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर, अयोध्या आदि क्षेत्रों में प्रसिद्ध है। चैती गीतों के सामान्य विषय प्रेम, प्रकृति और होली उत्सव हैं। चैत्र भगवान श्रीराम के जन्म का माह है। अतः चैती गीतों के हर पंक्ति के अंत में सामान्यतः 'राम' शब्द का प्रयोग किया जाता है।

लोक गीतों में प्रयोग होने वाले वाद्ययंत्र

ढोल, नगाड़ा, ढप, झांझ, शंख, झुनझुना, घुंघरू, मृदंग, घंटी, रणसिंघा, सारंगी, थाली, वीणा, तुरही, चिमटा तथा बीन आदि वाद्ययंत्रों का प्रयोग लोक गीतों में किया जाता है।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख लोकगीत गायक/गायिका

मालिनी अवस्थी, संजोली पाण्डेय, पूनम वाजपेयी, उर्मिला श्रीवास्तव, विजया भारती, राकेश श्रीवास्तव, रामकैलाश यादव, लल्लन सिंह 'गहमरी', आर.डी. शर्मा, राकेश उपाध्याय, राजबाला आदि उत्तर प्रदेश के प्रमुख लोकगायक/गायिका हैं।

सुगम संगीत

वह संगीत जो सहजता से गाया और बजाया जा सके, सुगम संगीत है। लय और ताल इसमें विशेष एवं महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। यह शास्त्रीय और लोक संगीत के मेल से बना है। सुगम संगीत के कई प्रकार हैं- लोकगीत, भजन, कव्वाली, गज़ल, फिल्मी संगीत, शब्द, अभंग, भटियाली, तेवरम, कीर्तन आदि। सुगम संगीत के यह प्रकार देश के अलग-अलग भागों में विकसित हुए। इनमें से भजन, कव्वाली, गज़ल, उत्तर प्रदेश से संबंधित हैं-

भजन

भजन की उत्पत्ति भक्ति आंदोलन से हुई। संतों ने भक्ति के संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए पदों एवं श्लोकों का गायन प्रारम्भ किया, जिसे भजन कहा गया। भजन का विषय देवी-देवताओं अथवा सर्वशक्तिमान ईश्वर की प्रशंसा होता है। यह गीत सामान्य धुनों पर आधारित होते हैं। भजन गायन के साथ चिमटा, ढोलक, ढपली और मंजीरा जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है। मीराबाई, तुलसीदास, सूरदास, कबीर और रसखान ने मध्यकाल में भजनों को लोकप्रिय बनाने का काम किया। विनोद अग्रवाल, अनूप जलोटा, अनुराधा पौडवाल और हरिओम शरण, मनोज तिवारी, नन्दू मिश्रा आदि प्रमुख भजन गायक हैं।

कव्वाली

कुछ विद्वान मानते हैं कि कव्वाली की शुरूआत अमीर खुसरो द्वारा की गयी। यह सूफी सम्प्रदाय से जुड़ा धार्मिक संगीत है। सूफी दरगाहों में कव्वालियों का गायन होता है। कव्वाली की रचनाएं अल्लाह, पैगम्बर मोहम्मद और अन्य प्रमुख सूफी संतों की प्रशंसा करती हैं।
कव्वाली गायन अकेले अथवा दो प्रमुख गायक दलों के बीच होता है। प्रत्येक दल में सामान्यतः आठ सदस्य होते हैं। कव्वाली के साथ तबला; ढोलक, हारमोनियम वाद्य यंत्र का उपयोग होता है। सबरी बंधु, तस्लीम आरिफ, उज़ाला परवीन आदि प्रमुख कव्वाली गायक हैं।

गज़ल

अमीर खुसरो को गज़ल के शुरुआती प्रतिपादकों में से एक माना जाता है। गज़ल में तुकबंदी वाले दोहे होते हैं। गज़ल में दोहों की संख्या बारह से कम ही रहती है। प्रेम, बिरह के दर्द, सौन्दर्य आदि गज़ल के मुख्य विषय होते हैं। इसके ऊपर सूफी प्रभाव विद्यमान है। मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़िराक गोरखपुरी, मुहम्मद इक़बाल, वसीम बरेलवी, दुष्यंत कुमार, निदा फ़ाज़ली, नीरज आदि गज़ल से जुड़ी प्रसिद्ध हस्तियां हैं।
गज़ल मूलतः फारसी की काव्य विधा है। फारसी से यह उर्दू और फिर हिंदी में आयी। समय के साथ इसमें प्रेम और बिरह के अतिरिक्त समकालीन विषयों एवं समस्याओं को सम्मिलित कर लिया गया।
  • हिंदी गज़ल को शिखर तक पहुंचाने वालों में दुष्यंत कुमार की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिला अन्तर्गत राजपुर नवादा में हुआ था। इनकी पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई। इन्होंने अपने गज़ल का मुख्य विषय वर्तमान परिवेश, समाज में पनप रही संवेदनहीनता, शासन-प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं आम-आदमी के दुःख-दर्द को बनाया।
दुष्यंत कुमार के अतिरिक्त गोपाल दास 'नीरज', शमशेर बहादुर सिंह, अदम गोंडवी, त्रिलोचन आदि ने हिंदी गज़ल को लोकप्रिय बनाने का कार्य किया। नीरज का जन्म और पालन-पोषण उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद में हुआ।

उत्तर प्रदेश में नृत्य

उत्तर प्रदेश में नृत्य एक समृद्ध परम्परा रही है। यहां शास्त्रीय और लोकनृत्य दोनों का प्रचलन रहा है। कथक उत्तर प्रदेश का एकमात्र शास्त्रीय नृत्य है।

कथक

कथक की शुरुआत ब्रजभूमि की रासलीला से हुई, जहां कथाकार महाकाव्यों और पुराणों के प्रसंगों को गाकर सुनाते और उन पर नृत्य करते थे। भक्ति आंदोलन के राधा-कृष्ण की कथा को प्रस्तुत करने के लिए इसका प्रयोग आरम्भ हुआ। इसमें आध्यात्मिकता के साथ लोकतत्वों का प्रभाव बढ़ने लगा। सल्तनत और मुगलकाल में कथक पर ईरानी प्रभाव पड़ा। फारसी नर्तकियों के सीधे पैर ने कथक को अधिक लोकप्रिय बना दिया। आगे चलकर अवध के नवाब वाज़िद अली शाह के दरबार में इसे संरक्षण प्राप्त हुआ, जिससे 'लखनऊ घराना' अस्तित्व में आया। सामान्य तौर पर कथक के साथ ध्रुपद संगीत का प्रयोग होता है। तराना, ठुमरी और गजल संगीत का प्रयोग भी कथक के साथ किया जाता है। कथक में घुंघरुओं का विशेष स्थान है। शुरू के दिनों में एक पांव में 25 घुंघरू बांधे जाते थे, जो धीरे-धीरे बढ़ते जाते थे। कथक मंच पर नर्तक/नृत्यांगना द्वारा पैरों के प्रयोग के लिए जाना जाता है। नर्तक/नृत्यांगना मंच पर पैरों की चोट से अनेक ध्वनियां निकालने में सक्षम होते हैं।

कथक के प्रमुख घटक
  • नृत्त - वंदना, मंगलाचरण के साथ नृत्य की शुरुआत होती है।
  • ठाट - नर्तक/नृत्यांगना सुंदर मुद्रा लेकर खड़े होते हैं।
  • आमद - तालबद्ध बोल पर नृत्य का पहला परिचय।
  • जुगलबंदी - नर्तक/नृत्यांगना और तबलावादक के बीच प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रस्तुति।
  • कवित् - कविता के अर्थ को नृत्य में प्रदर्शित किया जाता है।
  • तराना - अंत से पहले लयबद्ध प्रस्तुति।
  • करमालय - अंत का अंश, जिसमें नर्तक/नृत्यांगना द्वारा कुशल और तेज पदचालन किया जाता है।
  • गत - बिना किसी गायन के किया जाने वाला नृत्य।
  • तिहाई - एक रचना जहां तल्कार तीन बार दोहराई जाती है और नाटकीय ढंग से समाप्त की जाती है।

घराना व्यवस्था
लखनऊ और बनारस उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध कथक घराने हैं। बिरजू महाराज, लच्छू महाराज, सितारा देवी और रमा देवी कथक के प्रसिद्ध नर्तक/नृत्यांगना हैं।

उत्तर प्रदेश के लोक नृत्य

उत्तर प्रदेश सांस्कृतिक विविधता से परिपूर्ण है। क्षेत्रीय संस्कृति की मौलिकता को प्रदर्शित करने के लिए यहां अनेक लोक नृत्य विधाओं का विकास हुआ। क्षेत्रीय आधार पर लोक नृत्य विधाएं इस प्रकार हैं -

ब्रज क्षेत्र के लोकनृत्य

  • चरकुला/घड़ा नृत्य - राधा के जन्म से सम्बन्धित इस नृत्य की उत्पत्ति ब्रज क्षेत्र से हुई। इसे 'घड़ा नृत्य' भी कहते हैं। बैलगाड़ी अथवा रथ के पहिये पर कई घड़े रखे जाते हैं और फिर उसे सिर पर रखकर नृत्य किया जाता है। यह नृत्य होली की दूज पर किया जाता है। नृत्य के साथ रसिया लोकगीत गाये जाते हैं।
  • मयूर - इस नृत्य के दौरान मयूर पंख से बने एक विशिष्ट परिधान को पहना जाता है। इनके विषय राधा-कृष्ण के प्रेम-प्रसंग पर आधारित होते हैं।
  • रास - इसे रासलीला के दौरान किया जाता है।
  • झूला - यह नृत्य श्रावण माह के दौरान मंदिरों में किया जाता है।

बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लोकनृत्य

  • ख्याल - यह नृत्य पुत्र के जन्म के समय किया जाता है। इस अवसर पर बांस और रंगीन कागजों से बना एक मंदिर अपने सिर पर रखकर नृत्य करने की परंपरा है।
  • लट्ठमार नृत्य - बुन्देलखण्ड क्षेत्र में दीपावली के समय यह नृत्य किया जाता है। हर वर्ग, आयु के लोग हाथ में लट्ठ लेकर एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्द्धा और नृत्य करते हैं।
  • सौरा अथवा सोहरा - यह नृत्य हमीरपुर, झांसी और ललितपुर में प्रसिद्ध है। यह कृषकों द्वारा फसल की कटाई के समय किया जाता है। युवा स्त्री और पुरुष हाथ में एक डंडा लेकर नृत्य करते हैं। यह नृत्य सफलतापूर्वक फसल की कटाई के लिए इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।
  • धूरिया - यह कुम्हार जाति के लोगों द्वारा किया जाता है। पुरुष स्त्रियों के वेश में नृत्य करते हैं।
  • देवी - यह नृत्य विवाह के अवसर पर धोबी समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता है। एक नर्तक देवी का अभिनय करता है और दूसरा उनके सामने अभिनय करता है।
  • दीवारी पाई डंडा - यह एक अति प्राचीन नृत्य है, जिसका संबंध भगवान कृष्ण के जीवन से है। इसमें नर्तक भगवान कृष्ण के रूप में अपने सखाओं के साथ डंडों से छद्म लड़ाई करते हैं। इस नृत्य की गुजरात के डांडिया नृत्य से समानताएं हैं। यह अहीर जाति के लोगों द्वारा किया जाता है। पारम्परिक रूप से नृत्य का प्रदर्शन दीपावली के समय से शुरू होता है और जनवरी में संक्रान्ति तक जारी रहता है।
  • राई - इसे मयूर नृत्य भी कहते हैं। यह ब्रज के मयूर नृत्य से समानताएं रखता है। यह नृत्य बसंत ऋतु तथा जन्माष्टमी की संध्या पर किया जाता है। इसे पारम्परिक रूप से बेड़िया जनजाति की महिलाओं द्वारा किया जाता था।

पूर्वांचल के लोकनृत्य

  • धोबिया - यह नृत्य धोबी समुदाय के पुरुषों द्वारा किया जाता है। नृत्य के दौरान एक नर्तक धोबी का और दूसरा गधे का अभिनय करता है। यह नृत्य शादी, बच्चे के जन्म तथा अन्य मांगलिक अवसरों पर किया जाता है।
  • कठघोड़वा - नर्तक लकड़ी के घोड़े पर बैठकर अन्य नर्तकों के चारों ओर नृत्य करता है। लकड़ी का घोड़ा बांस और रंग-बिरंगे कपड़ों की सहायता से बनता है।
  • धीवर - यह नृत्य कहार जाति के लोगों द्वारा मांगलिक अवसर पर किया जाता है।
  • नटवरी - यह नृत्य भगवान कृष्ण की प्रशंसा में अहीर जाति के लोगों द्वारा जन्माष्टमी और होली के अवसर पर किया जाता है।
  • नटुआ या नकटुरा - यह नृत्य शादी के अवसर पर वर पक्ष की महिलाओं द्वारा किया जाता है। बारात के चले जाने के बाद महिलाएं पुरुषों के वेश में नृत्य करती हैं।
  • चौरसिया - यह जौनपुर का लोकनृत्य है। इसे कहार जाति के लोगों द्वारा किया जाता है।
  • दादरा - यह उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार का लोकप्रिय नृत्य है। नर्तक नृत्य के दौरान होंठ हिलाकर गायन करता है।
  • दीप या दीपावली - नर्तक दीपक से भरी हुई एक थाली अपने सिर पर रखकर नृत्य करते हैं। यह अहीर जाति के लोगों द्वारा किया जाता है।
  • कानरा नृत्य - यह नृत्य विवाह के अवसर पर किया जाता है। इसे धोबी समुदाय के लोग करते हैं।
  • कार्तिक - यह कार्तिक माह में किया जाता है। नर्तक नृत्य के दौरान कृष्ण और गोपी का अभिनय करते हैं।
  • घोड़ा - यह नृत्य मांगलिक अवसरों पर किया जाता है। संगीत की धुन पर नर्तक घोड़ों के साथ नृत्य करते हैं।
  • बरेडी - इसे अहीर समुदाय के लोगों द्वारा रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर किया जाता है।

अवध क्षेत्र के लोकनृत्य

  • जोगिनी - यह पुरुष नर्तकों द्वारा महिलाओं का भेष धारण कर किया जाता है। इसे रामनवमी की संध्या पर करते हैं।
  • कलाबाजी - नर्तक एक नकली घोड़े पर बैठकर, मोरबाजा वाद्ययंत्र बजाते हुए नृत्य करता है। नकली घोड़े को 'कच्ची घोड़ी' कहा जाता है।
  • ढेढ़िया - यह नृत्य भगवान राम के वन से अयोध्या वापस आने के उपलक्ष्य में किया जाता है। नृत्य के दौरान नर्तक अपने सिर पर दीपकों से भरा हुआ एक छिद्रदार मिट्टी का बर्तन रखते हैं। छिद्रदार मिट्टी का बर्तन ढेढ़िया कहलाता है।

मिर्जापुर और सोनभद्र के लोकनृत्य

  • करमा नृत्य - सोनभद्र में गोंड, बैगा, कोरकू और खरवार जनजाति के लोगों द्वारा यह नृत्य किया जाता है। नृत्य के दौरान नर्तक फुदकते हुए पेड़ की पत्तियों व डालियों को काटते व पुजारी के माध्यम से देवता को भेंट देते हैं।
  • ठडिया - यह नृत्य देवी सरस्वती से संतान का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। श्रद्धालु देवी सरस्वती का गुणगान करते हुए उन्हें आमंत्रित करते हैं।
  • चौलर - अच्छी फसल एवं वर्षा की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
  • ढरकहरी - यह नृत्य जानवर के सींगों से बने वाद्ययंत्रों के माध्यम से जनजातियों द्वारा किया जाता है।
  • कज़री - कज़री नृत्य मानसून की शुरुआत से पहले किया जाता है। इस नृत्य का जन्म मिर्जापुर में हुआ।

अन्य लोक नृत्य
  • छपेली नृत्य - यह नृत्य एक हाथ में रुमाल तथा दूसरे में दर्पण लेकर, आध्यात्मिक उन्नति के उद्देश्य से किया जाता है।
  • छोलिया - यह एक योद्धा लोकनृत्य है। इसे राजपूतों द्वारा हाथ में तलवार और ढाल लेकर किया जाता है।

उत्तर प्रदेश में संगीत घराना व्यवस्था

घराना प्रथा हिन्दुस्तानी संगीत की एक विशेषता है। घराना द्वारा एक विशेष संगीत शैली का प्रतिनिधित्व होता है, जिसे गुरू द्वारा अपने शिष्य को प्रदान किया जाता है। घराने के संगीतज्ञ नर्तक/नृत्यांगना आपस में गुरूकुल परंपरा के आधार पर जुड़े होते हैं। घराना संगीतज्ञों और नर्तक/नृत्यांगना की संगीत के संबंध में विचारधारा निर्धारित करता है और उनके द्वारा संगीत व नृत्य की समझ, प्रदर्शन और शिक्षा को प्रभावित करता है।

प्रसिद्ध कलाकार और उनका संगीत घराना

क्र.सं. कलाकार/व्यक्तित्व क्षेत्र
लखनऊ घराना
1. लच्छू महाराज कथक नृत्य
2. बिरजू महाराज कथक नृत्य
3. बेगम अख्तर गज़ल गायिका
4. शम्भू महाराज कथक नृत्य
5. पंडित सखाराम पखावज़ वादक
6. सादिक अली सारंगी वादक
7. पंडित अयोध्या प्रसाद पखावज़ वादक
बनारस घराना
8. किशन महाराज तबला वादक
9. बिस्मिल्ला खां शहनाई वादक
10. राजन-साजन मिश्र ध्रुपद-धमार
11. ज्वाला प्रसाद मिश्र ध्रुपद-धमार
12. छज्जू मिश्र ध्रुपद-धमार
13. पंडित रविशंकर सितार वादक
14. रसूलन बाई ठुमरी-टप्पा गायिका
15. छोटी मैना, बड़ी मैना ठुमरी-टप्पा गायिका
16. गिरिजा देवी ठुमरी गायिका
17. पागल दास पखावज वादक
18. नलिनी-कमलिनी कथक नृत्य
19. मुस्ताक अली खां सितार वादक
किराना घराना
20. भीमसेन जोशी ख्याल गायक
21. गंगूबाई हंगल ख्याल गायिका
प्रयाग
22. हरिप्रसाद चौरसिया बांसुरी वादक
23. जानकी बाई (छप्पन छूरी) गायिका
उत्तर प्रदेश में कई प्रमुख संगीत घराने हैं-

किराना घराना

इस घराने की शुरुआत मुजफ्फरनगर के किराना नामक स्थान से हुई। यह घराना "ख्याल गायन" के लिए प्रसिद्ध है। इसकी शुरुआत नायक गोपाल ने की थी। बाद में बीसवीं सदी के दौरान अब्दुल करीम खाँ और अब्दुल वहीद खाँ ने इसे विकसित और लोकप्रिय बनाने का काम किया। पंडित भीमसेन जोशी और गंगुबाई हंगल के अतिरिक्त मन्ने खां, रोशन आरा बेगम, हीराबाई वरोदेकर और प्रभा आत्रे इस घराने के प्रसिद्ध गायक/गायिका हैं।

आगरा घराना

आगरा घराने के संगीतज्ञ हाजी सुजान खाँ को अपना संस्थापक मानते हैं, जिनके लिये माना जाता है कि उन्हें बादशाह अकबर द्वारा 'दीपक ज्योति' की उपाधि दी गई थी। फैयाज खान द्वारा बीसवीं शताब्दी में सुधारीकरण कर इसे लोकप्रिय बनाया गया, जिसके कारण इसे 'रंगीला घराना' भी कहा जाता है।
आगरा घराना 'बंदिश' पर विशेष ध्यान देता है। इसमें ध्रुपद राग की नौहर गायन शैली का पालन किया जाता है। इसमें ठुमरी गायन भी प्रचलित है। इसे 'कव्वाल बच्चा घराना' भी कहते हैं। दयाल खाँ, मोहसिन खाँ नियाजी, विजय किचलू, स्वामी बल्लभदास, शफी अहमद, सादिक अली खाँ, फजल अली खाँ आदि इस घराने के प्रसिद्ध गायक हैं।

बनारस घराना

इसका विकास काशी राजाओं के संरक्षण में हुआ। इसके संस्थापक 'पंडित जानकी प्रसाद' हैं। यह घराना गायन, वादन और नृत्य तीनों के ख्याति प्राप्त है। यह घराना मुगल प्रभाव से दूर है। इसके संगीतज्ञों को हमेशा हिन्दू राज घराने के साथ काम करने का मौका मिला।
  • प्रसिद्ध ठुमरी गायिका गिरिजा देवी और सिद्धेश्वरी देवी बनारस घराना से संबंध रखती हैं। छोटी मैना, बड़ी मैना और रसूलनबाई इस घराने की प्रसिद्ध ठुमरी टप्पा गायिका हैं।
  • बनारस घराने में पं. रामसहाय, पंडित जानकी मिश्रा, किशन महाराज, दुर्गादास सहाय, अनोखे लाल मिश्रा आदि प्रमुख तबला वादक हैं।
  • मुश्ताक अली खाँ, अलाउद्दीन खाँ, पंडित रविशंकर (अलाउद्दीन खाँ के शिष्य), राजभाव सिंह आदि इस घराने के प्रमुख सितार वादक हैं।
  • शम्भू महाराज, पागलदास, मन्नू मिश्रा प्रमुख पखावज वादक हैं।
  • उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ और मुमताज खाँ इस घराने के प्रमुख शहनाई वादक हैं।
  • बनारस घराना कथक के लिए भी प्रसिद्ध है। सितारा देवी, उदयशंकर और गोपीकृष्ण इस घराने के प्रमुख नृत्यांगना/नर्तक हैं।

लखनऊ घराना

यह घराना वाजिद अली शाह के संरक्षण में विकसित हुआ। इसे गायन, वादन और नृत्य तीनों विधाओं के लिए जाना जाता है।
ठाकुर प्रसाद महाराज को इस घराने का संस्थापक माना जाता है। इस घराने पर स्पष्ट मुगल प्रभाव विद्यमान है।
इस घराने को ख़्याल और ध्रुपद शैलियों के लिए जाना जाता है। वाजिद अली शाह ने 'अख्तर पिया' नाम से ठुमरी बंदिश की रचना की। विंदादीन ने 'सनद पिया' नाम से ठुमरी बंदिश की रचना की।
  • मुर्शीद अली खान को लखनऊ ख्याल गायकी का जनक माना जाता है। सूरज खान, कासिम अली, धन्नो बाई, रहिमन बाई आदि इस घराने के प्रसिद्ध ख्याल गायक थे।
  • 'मल्लिका-ए-गजल' नाम से मशहूर बेगम अख्तर लखनऊ घराने से थीं।
  • पंडित अयोध्या प्रसाद और पंडित सखाराम इस घराने के प्रसिद्ध पखावज वादक हैं। सारिक अली खान प्रसिद्ध सारंगी वादक हैं। मोदू खाँ और बख्शू खाँ ने लखनऊ घराने में कत्थक के लिए तबला वादन की शैली विकसित की।
  • बिंदादीन महाराज, कालकादीन महाराज, लच्छू महाराज (बैजनाथ मिश्र), शम्भू महाराज और बिरजू महाराज लखनऊ घराने के प्रमुख कथक नर्तक हैं।

रामपुर घराना

इस घराना को रामपुर के शाही दरबार का संरक्षण मिला। इसे उस्ताद इनायत खाँ द्वारा स्थापित किया गया। इस घराने के अन्य प्रमुख गायक हैदर खाँ, फिदा हुसैन खाँ, मुश्ताक हुसैन खाँ और उस्ताद निसार हुसैन खाँ हैं।

अतरौली घराना

इस घराने का विकास अलीगढ़ के अतरौली कस्बे में हुआ था। काले खां और चांद खां इसके मुख्य संस्थापक थे। इस घराने की गायन शैली ख्याल और ध्रुपद दोनों का अनुसरण करती है। 'हुसैन खाँ' 'छज्जू खाँ' और खैराती खाँ अतरौली घराने से थे।

फतेहपुर सीकरी घराना

इसे जहाँगीर के शासनकाल में जैनू खाँ और जोरावर खाँ द्वारा स्थापित किया गया। यह ख्याल और ध्रुपद गायन शैलियों के लिए प्रसिद्ध है।

सहारनपुर शाखा

इस घराने के संस्थापक सूफी संत खलीफा मोहम्मद जमां थे। यह घराना 'होरी ध्रुपद' शैली के लिए जाना जाता है। इस घराने का संबंध डागर वानी से भी है। बंदे अली खाँ, नसीर मुईनुद्दीन डागर, नसीर अमीनुद्दीन डागर, नसीर जहीरुद्दीन डागर और नसीर फैयाजुद्दीन डागर इस घराने के प्रमुख गायक हैं।

कानपुर घराना

इसकी शुरुआत नियामत खां ने की थी। इस घराने के प्रमुख गायक हैं-उस्ताद बहादुर खां, उस्ताद अमीर खां, वजीर खां, नजीर खां और इनायत हुसैन खां।

इटावा घराना

यह घराना अपने सितार और सुरबहार वादकों के लिए जाना जाता है। सुरबहार, सितार जैसा एक वाद्ययंत्र है। वहीद खाँ और विलायत खाँ इस घराने के प्रमुख सितार वादक हैं।

शाहजहाँपुर घराना

यह घराना सरोद वादकों के लिए जाना जाता है। उस्ताद कासिम अली, इनायत अली खाँ सरोदिया इस घराने के प्रमुख वादक हैं।

अजराड़ा घराना

इस घराने का विकास मेरठ में हुआ। यह घराना गायन की तान शैली के लिए जाना जाता है। नाथे खान, गुलाम हुसैन खां, गुलाम हैदर खां, अजमत हुसैन खां इस घराने के प्रसिद्ध गायक हैं।

भिंडी बाजार घराना

यह घराना मुरादाबाद के छज्जू खाँ और खारिम खाँ द्वारा शुरू किया गया था। छज्जू खाँ और खारिम खाँ मुंबई के भिंडी बाजार में बस गये और इस घराने की शुरुआत की। लता मंगेशकर ने इस घराने के अली खां से शिक्षा प्राप्त की।

प्रयागराज

यह घराना नहीं है, किंतु अनेक प्रतिष्ठित संगीतज्ञ प्रयागराज से जुड़े रहे हैं। केसरबाई, जानकीबाई (छप्पन छुरी) कृष्णा देवी और मुनीर खातून बेगम प्रयाग की प्रसिद्ध गायिका हैं।
विख्यात बांसुरी वादक पंडित हरी प्रसाद चौरसिया और रघुनाथ सेठ का सम्बन्ध प्रयाग से है। प्रयाग संगीत समिति देश के प्रतिष्ठित संगीत संस्थानों में से एक है।

उत्तर प्रदेश में नाट्य कला

उत्तर प्रदेश में नाट्य कला का शास्त्रीय और लोक नाट्य दोनों रूप विद्यमान है-

शास्त्रीय नाट्य

  • ऐसा माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में शास्त्रीय नाट्य की शुरुआत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा की गयी। उनको हिंदी साहित्य का प्रारम्भकर्त्ता भी माना जाता है। उनका जन्म वाराणसी में हुआ था। उनके मुख्य नाटक हैं- वैदिक हिंसा हिंसा न भवतिः, सत्य हरिश्चन्द्र, नीला देवी, अंधेर नगरी और भारत दुर्दशा।
  • हालांकि भारतेन्दु से पहले भी प्रदेश में नाट्य विधा विद्यमान थी। नवाब वाजिद अली शाह द्वारा 'राधा कन्हैया का किस्सा' और सैय्यद आगा हसन लखनवी द्वारा 'इन्द्रसभा' नामक नाटक 1843 में लिखे गये।
  • भारतेन्दु के पिता बाबू गोपाल चन्द्र ने 'नहुष' नामक नाटक लिखा। यह विशुद्ध नाटक रीति में लिखा गया पहला नाटक माना जाता है।
  • आधुनिक शैली में प्रदर्शित पहला नाटक जानकी मंगल था। इसकी रचना शीतल प्रसाद त्रिपाठी ने 1868 में की थी।
  • मोहन राकेश, सूर्य मोहन, कुलश्रेष्ठ, विनोद रस्तोगी और आलोक रस्तोगी उत्तर प्रदेश के प्रमुख नाटककार हैं।

लोक नाट्य

उत्तर प्रदेश अपने मौलिक लोक नाट्य के लिए प्रसिद्ध है। नौटंकी, रामलीला, रासलीला, गुलाबो-सिताबो, नगर-भाषा, भर्तहरि, स्वांग-सपेरा, रावला, ख्याल, भगत, बिदेसिया आदि उत्तर प्रदेश के प्रमुख नाटक हैं। प्रमुख लोक नाट्य इस प्रकार हैं -

रामलीला
  • रामलीला भगवान राम के जीवन पर आधारित है। प्रतिवर्ष इसका प्रदर्शन दशहरे के अवसर पर दस से बारह दिनों तक किया जाता है। रामलीला की प्रस्तुति अवधी या क्षेत्रीय भाषा में की जाती है।
  • रामलीला को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के तौर पर वर्ष 2008 में जगह मिली।
  • रामलीला का प्रदर्शन इंडोनेशिया, कम्बोडिया, थाईलैंड और म्यांमार आदि देशों में भी होता है।
  • दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में रामलीला के दो रूप देखने को मिलते हैं- मुखौटा रामलीला और छाया रामलीला।

उत्तर प्रदेश में कठपुतली कला
उत्तर प्रदेश में दस्ताना कठपुतली का प्रचलन रहा है। कठपुतलियों को चमकदार कपड़े पहनाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में कठपुतली नाटकों के विषय सामाजिक मुद्दों पर आधारित होते हैं।
  • गुलाबो-सिताबो एक प्रसिद्ध कठपुतली नाटक है। कठपुतली नाटकों में ढोलक और मंजीरे का प्रयोग किया जाता है।
  • यह कला उत्तर प्रदेश में लुप्त होने के कगार पर है। प्रदेश में सन् 2004-05 से ही कठपुतली कला संरक्षण, प्रशिक्षण एवं संवर्द्धन योजना चल रही है।

रासलीला

रासलीला भगवान कृष्ण के जीवन पर आधारित है। कृष्ण के बचपन, किशोरावस्था और युवावस्था से जुड़े प्रसंग रासलीला के विषय-वस्तु होते हैं। इसका प्रदर्शन जन्माष्टमी के अवसर पर किया जाता है। रासलीला के लिए ब्रजभाषा का प्रयोग होता है।

नौटंकी

  • नौटंकी उत्तर प्रदेश का एक लोकप्रिय नाट्य है। नौटंकी, स्वांग की एक शाखा है। इसका वर्णन 'आइन-ए-अकबरी' में भी मिलता है।
  • नौटंकी की विषयवस्तु ऐतिहासिक, सामाजिक और लोक कथाएं हैं। इसका प्रदर्शन नृत्य और संगीत के साथ किया जाता है। संवाद का स्वरूप काव्यात्मक होता है। नौटंकी के साथ नगाड़े (एक प्रकार का ढोल) का प्रयोग किया जाता है।
  • नौटंकी की दो प्रमुख शैलियां हैं- कानपुरी और हाथरसी। हाथरसी शैली पुराने स्वरूप के करीब है और काव्यात्मकता पर जोर देती है जबकि कानपुरी शैली में अभिनय पर बल दिया जाता है।
  • मधु अग्रवाल, विनोद रस्तोगी, उर्मिल कुमार थपलियाल, मुन्नीलाल, चुन्नीलाल आदि उत्तर प्रदेश के प्रमुख नौटंकी कलाकार हैं।

स्वांग

यह उत्तर प्रदेश का एक लोक नृत्य-नाट्य है। इसमें नकल व नाटक के साथ गायन भी समाहित होता है। यह दस से बारह कलाकारों द्वारा खुले रंगमंच में प्रदर्शित किया जाता है। प्रदर्शन में नृत्य और गायन की अपेक्षा संवाद की प्रमुखता होती है। वर्तमान में प्रचलित अनेक विषय, जैसे- स्वास्थ्य और सफाई, को भी स्वांग में सम्मिलित किया जाता है। इसकी दो प्रमुख शैलियां हैं- रोहतक और हाथरस। रोहतक शैली में हरियाणवी और हाथरसी में ब्रजभाषा का प्रयोग होता है।

नकल

यह उत्तर प्रदेश समेत उत्तर भारत की एक लोकगीत-नाट्य कला है। यह नकल पर आधारित प्रदर्शन होता है। प्रदर्शन करने वाले कलाकार को बहरूपिया अथवा नकलची कहते हैं। इसमें एक विदूषक भी होता है जो अपने हास्य और चुटकुलों द्वारा नाट्य की गति निर्धारित करता है।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख सांस्कृतिक संस्थान
  • भारतखण्डे संगीत संस्थान - इसे प्रसिद्ध संगीतविद् और गायक विष्णु नारायण भारतखण्डे द्वारा 1926 में लखनऊ में 'मोरिस कॉलेज आफ म्यूजिक' के रूप में स्थापित किया गया था। 1966 में इसे प्रदेश सरकार ने अपने अधिकार में ले लिया और इसका नाम 'भारतखण्डे संगीत संस्थान' रखा। भारत सरकार ने 24 अक्टूबर, 2002 को एक अधिसूचना द्वारा इसे समविश्वविद्यालय घोषित किया। संगीत शिक्षा के क्षेत्र में यह अपनी तरह का पहला विश्वविद्यालय है।
  • उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी - इसे लखनऊ में 1963 में शुरू किया गया। यह उत्तर प्रदेश में संगीत, नृत्य, नाटक, लोकसंगीत और लोकनाट्य की सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्यरत है।
  • रवीन्द्रालय - यह लखनऊ के चारबाग में एक प्रमुख दर्शनशाला है। इसकी शुरुआत 1964 में हुई।
  • भारतेन्दु नाट्य अकादमी - यह नाट्य कला का प्रशिक्षण देती है। इसकी स्थापना 1975 में हुई। भारतेन्दु नाट्य अकादमी ने 1988 में 'रंग मंडल' की स्थापना की।
  • राष्ट्रीय कथक संस्थान - यह एक स्वायत्त संस्था है। इसकी स्थापना लखनऊ में 1989 में हुई। यह विभिन्न घरानों को राष्ट्रीय मंच पर आगे बढ़ाने का कार्य करती है। संस्थान में 6 से 28 वर्ष तक के छात्र-छात्राओं को परास्नातक स्तर तक की शिक्षा और परीक्षा की व्यवस्था है।

ख्याल

  • यह एक लोकनृत्य और नाट्य कला है। आमतौर पर ख्याल नाट्यों का विषय पौराणिक कथाएं होती हैं। प्रदर्शन की शुरुआत देवताओं की आवाज के साथ होती है। इसके साथ नक्कारा, ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम जैसे वाद्य यंत्र प्रयुक्त होते हैं।
  • नाटक को प्रस्तुत करने वाले सारे कलाकार पुरुष होते हैं। 'उस्ताद' जो कि हमेशा रंगमंच पर रहता है, नाटक का निर्देशन करता है। विदूषक प्रदर्शन का अभिन्न अंग होता है।

राहुला

  • यह बुंदेलखण्ड का एक लोक नाट्य है। इसकी विषय वस्तु शिक्षाप्रद कहानियां होती हैं।
  • आधुनिक काल में उत्तर प्रदेश की लोक नाट्य कलाओं का लगातार और तेजी से क्षरण हो रहा है। मात्र नौटंकी, रामलीला और रासलीला कुछ आकर्षण बनाये रखने में सक्षम हुए हैं।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।