उत्तर प्रदेश में स्थानीय स्वशासन, शहरी एवं पंचायती राज, लोकनीति, अधिकार संबंधी मुद्दे
उत्तर प्रदेश के गांवों की चौपालों से लेकर शहरों के नगर निगमों तक, प्रशासन की असली ताकत आम जनता के हाथों में बसती है। यह लेख सिर्फ अनुच्छेदों और कानूनों का पुलिंदा नहीं, बल्कि उस जमीनी लोकतंत्र का जीवंत सफरनामा है, जिसने पंचायती राज और स्थानीय स्वशासन के जरिए सत्ता को गांवों की पगडंडियों तक पहुंचाया है। इस विस्तृत लेख में हम ग्राम सभा के गठन, 73वें और 74वें संविधान संशोधन, लोकनीति के निर्माण और मानवाधिकारों से जुड़े उन तमाम अहम मुद्दों की परतें खोलेंगे, जो यूपी की प्रशासनिक व्यवस्था की बुनियाद हैं। उत्तर प्रदेश की शासन प्रणाली, नगर निकायों और नागरिक अधिकारों को गहराई से समझने के लिए यह एक प्रामाणिक और बेहद जरूरी दस्तावेज है।
पंचायती राज व्यवस्था का विकास क्रम
बलवन्त राय मेहता समिति
(1957)
त्रिस्तरीय व्यवस्था का सुझाव
त्रिस्तरीय व्यवस्था का सुझाव
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अशोक मेहता समिति
(1978)
द्वि-स्तरीय व्यवस्था की सिफारिश
द्वि-स्तरीय व्यवस्था की सिफारिश
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एल.एम. सिंघवी समिति
(1986)
संवैधानिक दर्जा देने की मांग
संवैधानिक दर्जा देने की मांग
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73वां संविधान संशोधन
(1992)
पंचायतों को संवैधानिक दर्जा (भाग IX)
पंचायतों को संवैधानिक दर्जा (भाग IX)
त्रिस्तरीय पंचायती राज संरचना (उत्तर प्रदेश)
जिला पंचायत (जिला स्तर)
सचिव: मुख्य विकास अधिकारी (CDO)
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क्षेत्र पंचायत (ब्लॉक/माध्यमिक स्तर)
सचिव: खण्ड विकास अधिकारी (BDO)
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ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर)
प्रमुख: ग्राम प्रधान | सचिव: VDO (ग्राम विकास अधिकारी)
ग्राम पंचायत की संरचना (जनसंख्या आधारित)
| ग्रामसभा की जनसंख्या | निर्धारित सदस्यों की संख्या |
|---|---|
| 1,000 तक | 9 सदस्य |
| 1,000 से अधिक - 2,000 से कम | 11 सदस्य |
| 2,000 से अधिक - 3,000 से कम | 13 सदस्य |
| 3,000 से अधिक | 15 सदस्य |
शहरी स्थानीय स्वशासन (74वां संशोधन)
| शहरी निकाय का प्रकार | क्षेत्र की प्रकृति | जनसंख्या मापदंड | सदस्यों की संख्या | प्रमुख पदाधिकारी |
|---|---|---|---|---|
| नगर-निगम | बड़े शहरी क्षेत्र (75% गैर-कृषि) | 3 लाख से अधिक (संशोधित) | न्यूनतम 60 - अधिकतम 110 | महापौर, उप-महापौर, पार्षद |
| नगरपालिका परिषद | छोटे शहर | 2 लाख से 3 लाख के बीच | 25 से 55 के बीच | चेयरमैन/अध्यक्ष, उपाध्यक्ष |
| नगर पंचायत | संक्रमणीय क्षेत्र (ग्रामीण से शहरी) | 10 हजार से 20 हजार | 10 से 24 के बीच | अध्यक्ष, सदस्य |
लोकनीति निर्माण के प्रमुख अंग
🏛️ सरकारी संस्थान
- विधायिका: नीतियां बनाना व बजट स्वीकृति
- कार्यपालिका: नीतियों को लागू करना
- प्रशासनिक तंत्र: जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन
- न्यायपालिका: नीतियों की संवैधानिक समीक्षा
👥 गैर-सरकारी संस्थान
- दबाव समूह: कृषक संघ, श्रमिक संघ, आदि
- राजनीतिक दल: चुनावी घोषणापत्र व मुद्दे
- जनसंचार (Media): जनमत निर्माण व जागरूकता
- सामाजिक आन्दोलन: जनपक्षधरता का प्रभाव
उत्तर प्रदेश में अधिकार संबंधी प्रमुख मुद्दे
⚖️ मानवाधिकार (Human Rights)
जीवन, स्वतंत्रता, समानता व सम्मान का अधिकार।
- संस्था: राज्य मानवाधिकार आयोग (गठन: 2002)
- प्रमुख चुनौतियां: जातिगत भेदभाव, पुलिस अत्याचार, सांप्रदायिक हिंसा।
👩👧 महिला एवं बाल अधिकार
- महिलाएं: निकायों में 1/3 आरक्षण, निःशुल्क कानूनी सहायता, घरेलू हिंसा से सुरक्षा।
- बच्चे: अनुच्छेद 21(A) तहत निःशुल्क शिक्षा (6-14 वर्ष), अनुच्छेद 23/24 तहत बाल श्रम व तस्करी पर रोक।
स्थानीय स्वशासन (Local Governance)
'स्थानीय स्वशासन' का अर्थ लोगों की अपनी स्वयं की शासन व्यवस्था है। दूसरे शब्दों में, स्थानीय लोगों द्वारा निर्वाचित निकायों के माध्यम से स्थानीय मामलों का प्रबंधन स्थानीय स्वशासन है।
कार्य क्षेत्र की दृष्टि से स्थानीय स्वशासन को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है -
- ग्रामीण स्थानीय स्वशासन
- शहरी स्थानीय स्वशासन
पंचायती राज से जुड़े महत्वपूर्ण अनुच्छेद
- अनुच्छेद विषय वस्तु
- 243 - परिभाषाएं
- 243 (A) - ग्राम सभा
- 243 (B) - पंचायतों का संविधान
- 243 (C) - पंचायतों का गठन
- 243 (D) - सीटों का आरक्षण
- 243 (E) - पंचायतों का कार्यकाल
- 243 (F) - सदस्यता से अयोग्यता
- 243 (G) - पंचायतों की शक्तियां, प्राधिकार तथा उत्तरदायित्व
- 243 (H) - पंचायत की करारोपण शक्ति
- 243 (I) - वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए वित्त आयोग का गठन
- 243 (K) - पंचायतों का चुनाव
- 243 (O) - चुनावी मामलों में हस्तक्षेप पर रोक
पंचायती राज व्यवस्था
स्वतंत्रता के बाद भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी ग्रामीण भारत के विकास की। देश की 80 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती थी और ब्रिटिश राज की नीतियों ने ग्रामीण भारत को सर्वाधिक क्षति पहुंचाया था।
इस समस्या से निपटने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम आम आदमी को लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से शासन में प्रभावी भागीदारी प्रदान करना था। इस विचार के साथ ही पंचायती राज व्यवस्था की उत्पत्ति हुई।
वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था स्वतंत्रता के पश्चात समय-समय पर प्रस्तुत विभिन्न समितियों के सुझावों पर आधारित है-
बलवन्त राय मेहता समिति 1957 - इस समिति ने देश में त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था का सुझाव दिया, जिसमें शामिल हैं-
- ग्राम स्तर पर - ग्राम पंचायत
- ब्लाक स्तर पर - पंचायत समिति
- जिला स्तर पर - जिला परिषद
अशोक मेहता समिति 1978 - इस समिति ने द्वि-स्तरीय (Two Tier) पंचायती राज व्यवस्था की सिफारिश की-
- जिला परिषद - जिला स्तर पर
- मंडल पंचायत - कुछ गांवों का समूह
एल.एम. सिंघवी समिति 1986 - इस समिति ने पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा देने की मांग की। साथ ही कुछ गांवों को मिलाकर न्याय पंचायत बनाने का भी सुझाव दिया।
73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 - इस संविधान संशोधन ने पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक संस्था का दर्जा दिया। इसके तहत संविधान में हुए परिवर्तन इस प्रकार हैं-
- भारतीय संविधान में एक नया खण्ड IX जोड़ा गया।
- अनुच्छेद 243-243(O) तक के प्रावधान सम्मिलित हुए।
- एक नयी 11वीं अनुसूची जोड़ी गयी, जिसमें 29 क्रियाशील विषयवस्तु हैं।
इस संविधान संशोधन ने संविधान के अनुच्छेद-40, जो कि राज्य के नीति निदेशक तत्व का हिस्सा था, को प्रभावी बनाया।
उत्तर प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था
- उत्तर प्रदेश में स्थानीय स्वशासन एवं पंचायतों के विकास का प्रथम चरण 1947 से 1952-53 के मध्य रहा। इसी समय संयुक्त प्रांत पंचायती राज अधिनियम 1947, दिनांक 7 दिसम्बर 1947 को तत्कालीन गवर्नर जनरल द्वारा हस्ताक्षरित हुआ, जिसके बाद 15 अगस्त, 1949 को प्रदेश में 35 हजार पंचायतों की स्थापना हुई। इसी समय लगभग 8 हजार पंचायत अदालतों ने भी कार्य करना आरम्भ किया।
- 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के आधार पर ‘उत्तर प्रदेश पंचायत विधि (संशोधन) अधिनियम 1994’ का निर्माण हुआ, जो प्रदेश में 24 अप्रैल, 1994 से प्रभावी किया गया।
- पंचायती राज मंत्रालय द्वारा प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
पंचायत संस्थाएं
ग्राम सभा
ग्राम सभा पंचायती राज व्यवस्था का आधार है। यह ग्राम के समस्त व्यक्तियों (जिनका मतदाता सूची में नाम शामिल है) से मिलकर बनता है। ग्राम सभा का कार्य राज्य विधान मंडल द्वारा तय किया जाता है।
ग्राम सभा की बैठक
ग्राम सभा की बैठकें प्रति वर्ष सामान्यतः दो बार आयोजित की जाती हैं-
- प्रथम बैठक खरीफ की फसल कटने के तुरंत बाद, तथा
- द्वितीय बैठक रबी की फसल कटने के तुरंत बाद आयोजित होती है।
ग्राम पंचायत
यह त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का अंग है। यह गांव स्तर पर कार्य करती है। ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत का प्रमुख होता है, जिसका चुनाव ग्राम सभा करती है।
ग्राम पंचायत की संरचना
प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक प्रधान और जनसंख्या के आधार पर निर्धारित सदस्य होते हैं। ग्राम पंचायत सदस्यों की संख्या ग्रामसभा की जनसंख्या के आधार पर इस प्रकार निर्धारित की जाती है-
- एक हजार जनसंख्या पर 9 सदस्य।
- एक हजार से अधिक, किन्तु दो हजार से कम जनसंख्या पर 11 सदस्य।
- दो हजार से अधिक किन्तु तीन हजार से कम जनसंख्या पर 13 सदस्य।
- तीन हजार से अधिक जनसंख्या पर 15 सदस्य।
- ग्राम पंचायत चुनावों में न्यूनतम आयु सीमा प्रत्याशियों (ग्रामप्रधान/सदस्य आदि) के लिए 21 वर्ष, जबकि मतदाताओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित है।
- प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक ‘ग्राम पंचायत सचिव’ होता है, जो ग्राम प्रधान के सहयोगी के रूप में विकास कार्यों से संबंधित प्रस्तावों, दैनिक गतिविधियों का लेखा-जोखा रखने के साथ ही लिपिकीय कार्यों तथा धन का हिसाब रखने का कार्य करता है।
- पंचायती राज व्यवस्था के अनुसार ग्राम पंचायत सचिव के पद पर ग्राम विकास अधिकारी (VDO) की नियुक्ति होती है। यह एक साथ पांच पंचायतों का कार्यभार संभाल सकता है।
ग्राम पंचायत की बैठक
- ग्राम पंचायत की प्रथम बैठक ग्राम पंचायत गठन के 30 दिनों के भीतर होनी आवश्यक है।
- ग्राम पंचायत की दो बैठकों के मध्य 2 माह से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए।
- ग्राम पंचायत के कार्यों की समीक्षा प्रत्येक माह होनी आवश्यक है।
ग्राम प्रधान को पद से हटाने की प्रक्रिया
- निर्वाचित ग्राम प्रधान को ग्राम सभा की बैठक में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है।
- ग्राम प्रधान को हटाने संबंधी विशेष बैठक को बुलाने की सूचना 15 दिन पूर्व देनी आवश्यक होती है।
- ग्राम प्रधान को हटाने के उद्देश्य से बुलाई गई बैठक हेतु गणपूर्ति आवश्यक होती है, जो संबंधित ग्राम सभा के एक तिहाई सदस्यों से कम नहीं होगी।
- ग्राम प्रधान को हटाने संबंधी बैठक, गणपूर्ति अथवा अपेक्षित बहुमत न होने के कारण प्रस्ताव पारित न हो पाने की स्थिति में, इससे संबंधित दूसरा प्रस्ताव उस बैठक के एक वर्ष के पश्चात ही लाया जा सकता है।
प्रदेश में वर्तमान ग्राम पंचायतें
- उत्तर प्रदेश के पंचायती राज विभाग के अनुसार प्रदेश में ग्राम पंचायतों की वर्तमान संख्या 57,691 है।
- प्रदेश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत गाजियाबाद जनपद की डासना ग्राम पंचायत है।
क्षेत्र पंचायत
क्षेत्र पंचायतों का गठन त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में माध्यमिक स्तर पर किया जाता है। इसके सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा होता है, जबकि क्षेत्र पंचायत प्रमुख का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से क्षेत्र पंचायतों के चुने हुए सदस्यों द्वारा किया जाता है। खण्ड विकास अधिकारी क्षेत्र पंचायत का सचिव होता है।
जिला पंचायत
जिला पंचायत त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का एक प्रमुख भाग है, जिसका गठन जिला स्तर पर होता है। मुख्य विकास अधिकारी जिला पंचायत का सचिव होता है।
पंचायत चुनाव एवं राज्य चुनाव आयोग
- पंचायत चुनावों को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से कराने हेतु 73वें संविधान संशोधन अधिनियम ने एक राज्य चुनाव आयोग की व्यवस्था दी है। इसके अन्तर्गत सभी स्तरों पर (ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत) सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा, जबकि क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से सदस्यों में से ही किया जाता है। निर्वाचन के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष है।
- लोकसभा एवं राज्य विधानसभा के चुनाव हेतु मतदाता सूची भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की जाती है, परंतु पंचायत चुनावों के लिए मतदाता सूची राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा समय-समय पर तैयार की जाती है।
पंचायत का कार्यकाल
अधिनियम के अनुसार पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा, हालांकि इसे 5 वर्ष से पूर्व भी भंग किया जा सकता है। यदि किसी कारणवश पंचायत 5 वर्ष से पूर्व भंग होती है तो छ: माह के भीतर पुन: चुनाव द्वारा शेष समय हेतु पंचायतों का गठन किया जाता है।
आरक्षण
- 73वें संविधान संशोधन द्वारा सभी स्तरों पर एक-तिहाई सीटें (सदस्यों एवं अध्यक्ष) महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगी।
- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान है।
- राज्य विधानसभा यदि जरूरी समझे तो अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए भी आरक्षण का प्रावधान लाया जा सकता है।
पंचायत की शक्तियां एवं कार्य
राज्य विधानमंडल को यह अधिकार है कि वह पंचायतों को उन शक्तियों एवं अधिकारों को हस्तांतरित करे, जो पंचायती राज संस्थानों की शक्ति एवं प्राधिकार में वृद्धि करे, जिससे पंचायतें स्थानीय स्वशासन के रूप में उन सभी 29 विषयों, जिनका वर्णन संविधान की 11वीं अनुसूची में उल्लेखित है, पर प्रभावी कार्य कर सकें।
उत्तर प्रदेश ग्राम पंचायत विकास योजना
- ग्राम पंचायतों के समग्र एवं समेकित विकास हेतु ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) 'हमारी योजना, हमारी विकास' का संचालन राज्य की सभी ग्राम पंचायतों में आरंभ किया गया है।
- योजना का उद्देश्य ग्राम पंचायतों द्वारा तैयार की गई वार्षिक कार्य योजनाओं हेतु संसाधनों का बेहतर प्रबंधन कर उनका अच्छा परिणाम प्राप्त करना है।
- ग्राम पंचायत विकास योजना का लक्ष्य ग्राम पंचायतों को सामाजिक-आर्थिक एवं वैयक्तिक विकास की दिशा में सक्षम बनाना है।
योजना का क्रियान्वयन
- ग्राम सभा की बैठक के माध्यम से जनसमुदाय की आवश्यकताओं की पहचान कर उनकी प्राथमिकताएं निर्धारित की जाती हैं।
- विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध संसाधनों को समेकित कर सहभागी नियोजन द्वारा वार्षिक एवं पंचवार्षिक कार्य योजनाएँ तैयार की जाती हैं।
- वार्षिक कार्ययोजनाओं को पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार के साफ्टवेयर प्लान-प्लस पर अंकित किया जाता है।
- योजना का क्रियान्वयन राज्य के सभी 75 जिलों के 821 ब्लाक पंचायतों एवं 59162 ग्राम पंचायतों में किया जा रहा है।
ग्राम पंचायत विकास योजना के चरण
उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) के निर्माण में निम्नलिखित प्रमुख चरण शामिल हैं -
- ग्राम सभा का गठन: इस प्रक्रिया में गाँव के सभी पात्र मतदाता शामिल होते हैं।
- जन जागरूकता और घोषणाएं: इस चरण में ग्राम सभा की बैठकों के माध्यम से योजना प्रक्रिया के बारे में जागरूकता उत्पन्न कर घोषणाएं की जाती हैं।
- चर्चा एवं समाधान: ग्राम पंचायत स्तर पर स्थानीय सतत विकास लक्ष्यों के प्रमुख स्तंभों और विषयों पर चर्चा कर योजना से संबंधित समस्याओं का समाधान किया जाता है।
- योजना निर्माण: ग्राम सभाएं सामुदायिक भागीदारी से योजनाएं तैयार कर उन्हें आगे की कार्रवाई के लिए ग्राम पंचायतों को सौंपती हैं।
- ग्राम विकास अधिकारी द्वारा सहायता: वीडीओ (ग्राम विकास अधिकारी) तथा अन्य विभागीय अधिकारी ग्राम पंचायतों के स्तर पर योजना के समेकन, तकनीकी सहायता, बजट, कार्यान्वयन और निगरानी में सहयोग करते हैं।
- जन योजना अभियान: यह अभियान विकास नियोजन प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं के बीच 2 अक्टूबर से 31 मार्च तक प्रतिवर्ष संचालित किया जाता है
न्याय पंचायत
- न्याय पंचायत ग्रामीण स्तर पर छोटे विवादों का निपटारा करने की 'स्थानीय न्याय प्रणाली' है।
- न्याय पंचायत वस्तुतः ग्राम पंचायत की न्यायपालिका के रूप में कार्य करती है। यह गांव में होने वाले विवादों का निष्पक्ष निपटारा करती है।
- न्याय पंचायत का मुख्य उद्देश्य एवं कर्तव्य अपने समक्ष आने वाले वाद-विवाद का निपटारा 'प्राकृतिक न्याय' (Natural Justice) के सिद्धांतों के अनुसार करते हुए पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाना है।
- न्याय पंचायत को दीवानी संबंधी मामलों के साथ-साथ फौजदारी के छोटे अपराधों के निपटारे के लिए भी क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
- 27 जून, 2017 को उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने राज्य में न्यायपंचायतों को समाप्त करने का निर्णय लिया, अतः वर्तमान में यह निर्मूल अवस्था में है।
स्थापना
- उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 42 में न्याय पंचायत की स्थापना संबंधी प्रावधान दिया गया है।
- प्रावधान के अनुसार राज्य सरकार या विहित प्राधिकारी जिलों को मंडल में विभाजित करेगा। प्रत्येक मंडल ग्राम पंचायत के क्षेत्राधिकार में उतने ग्राम सम्मिलित होंगे जितने संभव हों।
- राज्य सरकार या विहित प्राधिकारी द्वारा प्रत्येक मंडल में न्याय पंचायत की स्थापना का प्रावधान है।
- प्रत्येक ग्राम पंचायत के क्षेत्र जहां तक संभव हो, आपस में जुड़े होंगे।
संरचना
- उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 42 के अनुसार प्रत्येक न्याय पंचायत में न्यूनतम 10 सदस्य या अधिकतम 25 सदस्य होंगे।
- न्याय पंचायत के समक्ष आने वाले आपराधिक वादों के निपटारे तथा जांच के लिए सरपंच द्वारा न्यायपीठ बनाया जाता है, जिसमें पांच पंच (प्रत्येक में) होने का प्रावधान है।
- कोई पंच, सहायक सरपंच अथवा सरपंच किसी ऐसे वाद निस्तारण में भाग नहीं ले सकता, जिसमें वह स्वयं, उसका निकट भागीदार, सेवायोजक, ऋणी, कर्मचारी आदि पक्षकार हो।
- न्याय पंचायत के लिए यह वैध (विधिसम्मत) होगा कि उनके सदस्यों के कुछ स्थान रिक्त होने के बावजूद न्याय पंचायत अपना काम करती रहेगी, लेकिन न्याय पंचायत सदस्यों की संख्या किसी भी स्थिति में निर्धारित संख्या से दो तिहाई से कम नहीं होनी चाहिए।
- न्याय पंचायत को दीवानी और फौजदारी के छोटे मुकदमे सुनने का अधिकार है।
- न्याय पंचायत में एक सरपंच और उपसरपंच होते हैं।
- न्याय पंचायत में न्यूनतम 10 एवं अधिकतम 25 सदस्य होते हैं।
- न्याय पंचायत में पंचों का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
उत्तर प्रदेश में न्याय पंचायत : वर्तमान स्थिति
- भारत के जिन आठ राज्यों में पंचायती राज अधिनियम के अंतर्गत न्याय पंचायत का प्रावधान है, उत्तर प्रदेश उनमें से एक है।
- उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1947 के अध्याय 6 की धारा 42, 43 तथा 44 में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि ग्राम पंचायतों के गठन के तुरंत बाद वार्ड सदस्यों के बीच से पंच नामित कर न्याय पंचायतों का गठन किया जाएगा।
- बावजूद इसके, उत्तर प्रदेश में न्याय पंचायतों के गठन का विषय सदैव अनिश्चित रहा है।
- उत्तर प्रदेश में न्याय पंचायतों का अंतिम बार गठन 1972 में हुआ।
- उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार ने 27 जून, 2017 को न्याय पंचायतों को समाप्त करने का निर्णय लिया और इस संबंध में प्रदेश कैबिनेट ने प्रस्ताव पास भी कर दिया।
- यद्यपि विधान परिषद द्वारा प्रस्ताव स्वीकृत न किये जाने के कारण न्याय पंचायत के अस्तित्व का विषय समिति के पास है, किन्तु सच्चाई यह है कि राज्य में न्याय पंचायत व्यवस्था निर्मूल हो चुकी है।
राज्य वित्त आयोग
पंचायतों की आर्थिक स्थिति त्वरित गति से सुदृढ़ करने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा राज्य वित्त आयोग की संस्तुतियों के अनुक्रम में प्रदेश के कुल करों की शुद्ध आय का 5.5 प्रतिशत अंश पंचायतों को हस्तांतरित करने का निर्णय लिया गया है।
15वें वित्त आयोग की संस्तुति
श्री एन.के. सिंह की अध्यक्षता वाले 15वें वित्त आयोग ने फरवरी, 2020 में वर्ष 2020-21 के लिए प्रस्तुत अपनी अंतिम रिपोर्ट में स्थानीय निकायों को कुल अनुदान ₹4.36 लाख करोड़ देने की सिफारिश की है। इसमें शामिल है-
- ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए ₹2.4 लाख करोड़।
- शहरी स्थानीय निकायों के लिए ₹1.2 लाख करोड़।
- स्थानीय सरकारों के माध्यम से स्वास्थ्य अनुदान के लिए ₹70,051 करोड़।
- स्थानीय निकायों को अनुदान पंचायत के सभी तीन स्तरों - ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत तथा जिला पंचायतों तक उपलब्ध कराए जाएंगे।
जिला पंचायत अनुश्रवण कोष्ठक
जिला पंचायतों में वित्तीय एवं भौतिक उपलब्धियों की समीक्षा किए जाने, जिला पंचायतों पर प्रभावी नियंत्रण रखने तथा पंचायतों का सुदृढ़ीकरण किए जाने के उद्देश्य से शासन स्तर पर जिला पंचायत अनुश्रवण कोष्ठक का गठन किया गया है।
उत्तर प्रदेश में स्थानीय स्वशासन की चुनौतियां
उत्तर प्रदेश समेत देश के लगभग समस्त राज्यों में स्थानीय स्वशासन के समक्ष कुछ प्रमुख चुनौतियां इस प्रकार हैं-
वित्तीय चुनौतियां
- स्थानीय निकायों को वित्तीय संकट से गुजरना पड़ रहा है। जनसंख्या वृद्धि तथा विकासात्मक कार्यों के विस्तार से स्थानीय निकायों के व्यय में भारी वृद्धि हुई है, जिसके सापेक्ष इन्हें केन्द्र एवं राज्यों से धनराशि कम प्राप्त होती है।
- स्थानीय निकायों के पास संसाधनों का अभाव है। केन्द्रीय वित्त आयोगों की सिफारिशों के बावजूद इन्हें धन का वास्तविक हस्तांतरण कम प्राप्त हो पाता है।
- संघ के करों के विभाज्य पूल का 5 प्रतिशत से अधिक स्थानीय निकायों को नहीं दिया जाता है।
- राज्य वित्त आयोग संवैधानिक आवश्यकताओं के अनुरूप स्थापित नहीं किए गए हैं, जिससे इनका प्रभाव कम होता है।
कार्यात्मक चुनौतियां
स्थानीय निकायों को कार्य सौंपने का अधिकार राज्य सरकार के पास है। राज्य सरकार द्वारा अपने इस अधिकार का प्रयोग प्रायः विलंब से किया जाता है, जिससे स्थानीय निकायों के पास काम कम होते हैं।
राज्य सरकारों द्वारा प्रायः स्थानीय निकायों के कार्य क्षेत्र से जुड़े विषयों पर अलग कार्यनीति तैयार की जाती है, जिससे स्थानीय निकाय कमजोर होते हैं।
कार्य संबंधी चुनौतियां
- स्थानीय निकायों के पास प्रायः कर्मचारियों की संख्या कम होती है, जिसका सीधा प्रभाव उसके कार्यों पर दिखाई देता है।
- स्थानीय निकायों के पास कार्यालय भवनों, प्रशिक्षण केन्द्रों आदि के लिए स्थान कम होते हैं।
- अनेक पंचायतों को प्रायः एक ही सचिव से काम लेना होता है, जिससे कार्य में विलंब तथा अनियमितता की आशंका बनी रहती है।
- स्थानीय सेवाओं के विस्तार हेतु प्रायः केन्द्रीयकृत तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इससे स्थानीय निर्णय लेने में बाधा आती है।
भ्रष्टाचार एवं आपराधिक चुनौतियां
विगत कई वर्षों से स्थानीय निकायों के चुनाव अत्यधिक खर्चीले और प्रभावपूर्ण हो गये हैं। ठेकेदार और आपराधिक प्रवृत्ति के प्रत्याशी समूचे चुनाव को अपने पक्ष में करने कर प्रयास करते हैं। इस प्रतिस्पर्धा में कई बार बड़े अपराधी और भ्रष्ट प्रत्याशियों को सफलता भी प्राप्त होती है। यह प्रवृत्ति स्थानीय स्वशासन की मूल अवधारणा के विपरीत है।
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण)
इस मिशन का संचालन जनपद स्तर पर जिला पंचायत के नियंत्रणाधीन जिला स्वच्छता समूह द्वारा किया जाता है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य प्रदेश में प्रभावी जागरुकता कार्यक्रमों द्वारा सर्वप्रथम व्यक्तिगत शौचालयों की मांग का सृजन किया जाना है, ताकि शौचालयों के निर्माण के उपरांत उनका उपयोग हो तथा व्यक्तियों में स्वच्छ आदतें विकसित हों।
स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) योजना की शुरुआत 2 अक्टूबर, 2014 को की गयी। इसके अंतर्गत व्यक्तिगत शौचालयों की इकाई लागत ₹ 12,000 है।
डॉ. राम मनोहर लोहिया पंचायत सशक्तिकरण योजना
उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2015-16 में पंचायतों के सशक्तिकरण हेतु निम्न उद्देश्यों के साथ यह योजना शुरू की थी-
- पंचायतों में ई-गवर्नेस की स्थापना करना।
- पंचायतों में ई-गवर्नेस की उत्तरोत्तर वृद्धि किया जाना।
- पंचायतों को तकनीकी सहायता प्रदान करना।
- पंचायतों का प्रशिक्षण के माध्यम से क्षमता विकास करना।
मुख्यमंत्री पंचायत प्रोत्साहन पुरस्कार योजना
पंचायतीराज विभाग में उत्कृष्ट कार्य करने वाली पंचायतों को मुख्यमंत्री द्वारा पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है। इसके लिए वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए ₹ 2500.00 लाख का आय-व्ययक प्रावधान किया गया।
नगरपालिका
भारत में प्राचीन काल से ही सुनियोजित शहरों एवं प्रभावी नगर प्रशासन की परंपरा रही है। सिंधु घाटी सभ्यता एक नगरीय सभ्यता थी। ब्रिटिश शासन काल के समय भी नगर प्रशासन को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया गया, जिसमें लॉर्ड रिपन द्वारा प्रस्तुत वर्ष 1882 के प्रस्ताव को भारत में नगर प्रशासन का मैग्नाकार्टा कहा जाता है। लॉर्ड रिपन को भारतीय स्थानीय स्वशासन के पितामह के रूप में जाना जाता है।
आश्चर्यजनक रूप से नगर प्रशासन की यह परंपरा भारतीय संविधान निर्माताओं की परिकल्पना का भाग नहीं बन सकीं। भारतीय संविधान के भाग-IV ( राज्य के नीति-निर्देशक तत्व, अनुच्छेद 40 ) में ही सही, पंचायत संविधान का हिस्सा बनी। मूल संविधान में नगरपालिका का उल्लेख नहीं था।
संविधान लागू होने के पश्चात विभिन्न समितियों ने नगरपालिका को लागू करने से सम्बन्धित विभिन्न सुझाव दिये।
इससे संबंधित महत्वपूर्ण समितियां निम्नलिखित हैं-
| क्र.सं. | वर्ष | समितियों का नाम |
|---|---|---|
| 1. | 1949 | राष्ट्रीय वित्तीय जांच समिति |
| 2. | 1963 | नगर निगम कर्मचारियों की प्रशिक्षण समिति |
| 3. | 1966 | ग्रामीण नगरीय सम्बन्ध समिति |
| 4. | 1974 | नगर प्रशासन में बजटीय सुधार पर समिति |
| 5. | 1985 | नगरीकरण पर राष्ट्रीय आयोग |
नगर प्रशासन से जुड़ी इस विसंगति को वर्ष 1992 में संविधान के 74वें संशोधन द्वारा दूर करने का प्रयास किया गया। इसके अंतर्गत संविधान में एक नए भाग IX-A एवं अनुच्छेद 243-P से लेकर 243-ZG को जोड़ा गया। इसके अतिरिक्त इस संशोधन के माध्यम से संविधान में एक नई अनुसूची 12 भी जोड़ी गयी, जिसमें नगरपालिका से संबंधित 18 क्रियाशील विषयवस्तु हैं।
इस संविधान संशोधन के तहत तीन तरह की नगरपालिकाओं का गठन उनके आकार के आधार पर किये जाने की व्यवस्था दी गई है-
- नगर-निगम - नगर-निगम का गठन उन शहरी क्षेत्रों में किया जाता है जिसकी जनसंख्या तीन लाख से अधिक हो एवं 75 प्रतिशत जनसंख्या गैर-कृषि कार्यों में संलग्न हो। नगर-निगम के पदाधिकारियों में महापौर, उप-महापौर एवं पार्षद होते हैं। नगर-निगम के सदस्यों की स्वीकृत संख्या न्यूनतम 60 एवं अधिकतम 110 होती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने नगर-निगम से संबंधित प्रावधानों में संशोधन करते हुए नगर-निगम के गठन हेतु न्यूनतम 5 लाख जनसंख्या के प्रावधान को घटाकर 3 लाख कर दिया है।
- नगरपालिका परिषद - तुलनात्मक रूप से नगरपालिका परिषद की स्थापना छोटे शहरों, जिनकी जनसंख्या 2 लाख से अधिक एवं 3 लाख से कम है, में की जाती है। नगरपालिका परिषद के पदाधिकारियों में चेयरमैन/अध्यक्ष, उपचेयरमैन/उपाध्यक्ष प्रमुख हैं। नगरपालिका परिषद के सदस्यों की संख्या 25 से कम एवं 55 से अधिक नहीं होनी चाहिए।
- नगर पंचायत - नगर पंचायतों की स्थापना सामान्यतः संक्रमणीय छोटे कस्बों में होती है, जो ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में परिवर्तित हो रहे हैं। इसकी स्थापना उन अर्ध शहरी क्षेत्रों में होती है जिसकी जनसंख्या 10 हजार से अधिक एवं 20 हजार से कम होती है। सदस्यों की संख्या 10 से कम एवं 24 से अधिक नहीं होनी चाहिए।
| उत्तर प्रदेश के नगरीय स्थानीय निकाय | |
|---|---|
| निकाय | संख्या |
| 1. नगर-निगम (2023-24) | 17 |
| 2. नगरपालिका परिषद (2023-24) | 200 |
| 3. नगर पंचायत (2023-24) | 546 |
नगरपालिका की संरचना
74वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार नगरपालिका के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है। सदस्य चुने जाने हेतु न्यूनतम आयु सीमा 21 वर्ष निर्धारित है। इस अधिनियम ने राज्य विधान मंडल को यह अधिकार दिया है कि वह विधान मंडल एवं संसद सदस्यों का, जिस निर्वाचन क्षेत्र में वे मतदाता हैं, उस नगरपालिका में प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
इस अधिनियम ने नगरपालिका में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान किया है। इसके अतिरिक्त नगरपालिका के सदस्यों एवं पदाधिकारियों में से न्यूनतम 33 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे। यदि राज्य सरकार चाहे तो पिछड़ा वर्ग हेतु भी सीटों के आरक्षण का प्रावधान कर सकती है।
नगरपालिका के कार्य
- पानी, सफाई एवं चिकित्सा की व्यवस्था करना।
- नगरपालिका के अंदर भवन निर्माण की अनुमति प्रदान करना।
- सड़कों का निर्माण एवं लाइट की व्यवस्था करना तथा सड़क के किनारे पेड़ लगवाना।
- जन्म एवं मृत्यु का पंजीकरण करना।
- बीमारियों की रोकथाम हेतु टीकाकरण कराना।
- शिक्षा से संबंधित कार्यक्रम आयोजित कराना।
नगरपालिका का निर्वाचन
नगरपालिका चुनाव को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष कराने हेतु एक राज्य चुनाव आयोग की व्यवस्था दी गई है। मतदाता सूची तैयार करना एवं नगरपालिका चुनाव को सम्पन्न कराना राज्य निर्वाचन आयोग का दायित्व है।
नगरपालिका का राजस्व
नगरपालिकाओं को निम्न माध्यमों से राजस्व की प्राप्ति होती है-
- स्थानीय कर (सम्पत्ति कर, विज्ञापन कर, पेशा कर, प्रकाश कर, तीर्थकर, बाजार कर आदि) एवं गैर-कर राजस्व (फीस, जुर्माना)।
- राज्य वित्त आयोग की अनुशंसा के अनुसार राज्य की संचित निधि से शहरी निकायों को निधि का हस्तानांतरण।
- केंद्रीय वित्त आयोग (14वां एवं 15वां वित्त आयोग)
- अमृत मिशन, स्वच्छ भारत मिशन, स्मार्ट सिटी योजना आदि।
- नया सवेरा योजना, आदर्श नगर योजना।
लोकनीति
- लोक कल्याण के उद्देश्य से सरकार द्वारा बनाई गयी नीति 'लोक नीति' कही जाती है।
- भारतीय संविधान के भाग IV में उल्लेखित है कि सरकार लोक कल्याण को ध्यान में रखकर नीतियां बनायेगी।
- सरकार अपनी नीतियों के माध्यम से अपने चुनावी वायदों एवं अन्य मुद्दों को व्यवहार रूप देती है।
- सरकार द्वारा आरंभ की गयी कल्याणकारी नीतियां, जिसे लोक नीति कहा जाता है, शासन व्यवस्था की पहचान होती हैं।
लोकनीति की विशेषताएं
- लोकनीति लोक हित पर आधारित होती है। यह लोकहित को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।
- लोक नीति एक गतिमान प्रक्रिया है। यह आवश्यकतानुसार परिवर्तित होती रहती है।
- लोकनीति का निर्माण भविष्य को ध्यान में रखकर किया जाता है। यह भविष्य से जुड़े उद्देश्यों को पूर्ण करती है।
- लोकनीति दिशा निर्देश देती है, ताकि समस्त प्रशासन इन निर्देशों का पालन कर लोक कल्याण के उद्देश्य को पूरा करे।
- लोकनीति विभिन्न संगठनों, सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग का परिणाम है। लोकनीति निर्माण में मात्र सरकार ही नहीं, बल्कि गैर-सरकारी संगठन भी भागीदार होते हैं। इन सभी के सम्मिलित सहयोग का परिणाम लोकनीति है।
- लोकनीति परिणामोन्मुखी होती है। लोकनीति सदैव इस तरह की बनाई जाती है, जो परिणाम की पूर्ति करे।
लोकनीति निर्माण पर प्रभाव
लोक नीति के निर्माण पर निम्नलिखित घटकों का प्रभाव देखा जा सकता है-
- सवैचारिकता: सरकार में जिस विचारधारा के लोग होते हैं, वैसी ही विचारधारा का प्रभाव लोकनीति पर दिखाई देता है।
- भारत में अनेक विचारधारा से जुड़े राजनीतिक दल हैं, जो अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार कार्य करते हैं। जब राजनीतिक दलों के मध्य गठबंधन होता है तब वह कुछ कॉमन मुद्दों पर मिलकर नीतियां बनाने का प्रयास करते हैं।
- जनपक्षधरता: जनमत का दबाव लोकनीति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। चाहे वह पर्यावरण का मुद्दा हो, या अधिकार का या फिर शोषण का मुद्दा, जनता के मतों का प्रभाव सब पर पड़ता है। लोकनीति निर्माण में जनता की सक्रियता और प्रभाव तभी संभव होता है जब जनता जागरूक हो।
- जनता में छवि: प्रायः सभी सरकारें जनता में अपनी छवि को लेकर सतर्क रहती हैं। कई बार सरकार अपनी लोकनीति इस प्रकार बनाती है कि जनता में उसकी छवि अच्छी बनी रहे।
- बाहरी दबाव: सरकार की नीतियों पर बाहरी देशों या अंतर्राष्ट्रीय दबाव का भी प्रभाव पड़ता है। उदाहरणार्थ- वर्ष 1991 में निजीकरण एवं उदारीकरण आदि को लागू करने में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक का दबाव था।
- मनोवैज्ञानिक कारक: आपदा, मनोवैज्ञानिक एवं व्यक्तिगत कारकों का प्रभाव लोक नीतियों पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
लोकनीति के घटक
लोकनीति निर्माण के निम्नलिखित प्रमुख घटक हैं-
- विषय की पहचान कर उसे परिभाषित करना।
- आवश्यक विकल्पों का निर्माण करना।
- बेहतर विकल्प का चयन करना।
- निर्णयों का उचित क्रियान्वयन करना।
- कार्य आरम्भ होने पर उसकी सतत निगरानी करना। लोकनीति पूर्ण होने तक उसकी देख-रेख करना।
- सफलता और असफलता का विवेचन करना।
लोकनीति निर्माण का संगठन
- लोकनीति का निर्माण शासन-प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि मानी जाती है। यह आम नागरिकों के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करती है।
- लोकनीति निर्माण की संरचना के अन्तर्गत समूची राजनीतिक व्यवस्था शामिल होती है।
लोकनीति निर्माण में दो प्रकार की संस्थाएं प्रमुख रूप से भाग लेती हैं-
सरकारी संस्थान
- कार्यपालिका
- प्रशासनिक तंत्र
- विधायिका
- न्यायपालिका
गैर-सरकारी संस्थान
- दबाव एवं हित समूह
- राजनीतिक दल
- जनसंचार माध्यम
- सामाजिक आन्दोलन
- अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसी
लोक नीति निर्माण के अभिकरण
लोक नीति निर्माण प्रक्रिया में मुख्य भूमिका अदा करने वाले कुछ प्रमुख अभिकरण इस प्रकार हैं-
- संविधान: लोकनीति निर्माण में संविधान के प्रावधानों का विशेष ध्यान रखा जाता है।
- विधायिका: सरकार की प्रमुख नीतियां विधानमंडल द्वारा स्वीकृत होती हैं। विधानमंडल में प्रस्तुत बजट, अनुदान, पूरक मांगों आदि के माध्यम से नीति निर्माण का कार्य पूर्ण किया जाता है।
- दबाव समूह: श्रमिक संघ, व्यावसायिक संघ, कृषक समुदाय, फेडरेशन ऑफ इंडिया, चैम्बर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री आदि अनेक दबाव समूह हैं, जो लोक नीति निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।
- राजनीतिक दल: विभिन्न राजनीतिक दल अपने चुनाव घोषणा पत्रों के माध्यम से अपनी नीतियों को जनता के सामने लाते हैं और उन्हें लागू करने के नाम पर सत्ता प्राप्त करने का भी प्रयास करते हैं।
- मीडिया: मीडिया नीतियों के निर्माण में प्रभावकारी भूमिका निभाती है।
- परामर्शदात्री समितियां: अनेक परामर्शदात्री समितियां लोक नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन समितियों में आर्थिक समन्वय समिति, राजनीतिक मामलों की समिति, आयात-निर्यात मंत्रणा समिति आदि प्रमुख हैं।
लोक नीति के प्रकार
लोक नीतियां मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार की होती हैं-
- समूहगत नीतियां: यह नीतियां किसी वर्ग विशेष से संबंधित न होकर पूरे समाज के विकास से संबंधित होती हैं। शिक्षा एवं स्वास्थ्य का प्रबंधन एवं रोजगार के अनुसार आर्थिक स्थितिकरण, विधि और व्यवस्था बनाये रखना आदि इसके उदाहरण हैं।
- नियंत्रक नीतियां: यह नीतियां व्यापार, व्यवस्था, सुरक्षा उपाय, जनोपयोगी आदि विषयों से संबंधित होती हैं।
- विशिष्ट नीतियां: यह नीतियां सम्पूर्ण समाज के लिए न होकर मात्र विशिष्ट वर्गों के लिए होती हैं। उदाहरण- प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम, खाद्य सहायता, बालवाड़ी, पोषाहार, टीका शिविर आदि।
- पुनः वितरक नीतियां: यह नीतियों की पुन-व्यवस्था से संबंधित होती हैं। यह सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के उद्देश्यों से जुड़ी रहती हैं।
- पूंजीकरण: राज्यों एवं पंचायती संस्थाओं को केन्द्र सरकार द्वारा जिस नीति के माध्यम से आर्थिक सहायता प्राप्त होती है उसे पूंजीकरण नीति कहते हैं। आवश्यकतानुसार यह सहायता अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों को भी प्रदान की जा सकती है।
उत्तर प्रदेश में अधिकार संबंधी मुद्दे
भारत के संविधान ने प्रत्येक वर्ग, समाजिक इकाई एवं व्यक्ति को तमाम आवश्यक अधिकार प्रदान किये हैं, जिससे विकास का अवसर सभी को निर्बाध रूप से प्राप्त हो सके।
उत्तर प्रदेश में विभिन्न वर्गों और समाज को विधि द्वारा प्रदत्त अधिकारों की वर्तमान स्थिति एवं मुद्दे इस प्रकार हैं-
- मानवाधिकार
- महिला एवं बाल अधिकार
- स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी अधिकार
- उपभोक्ता अधिकार
- अनुसूचित जाति/जनजाति के अधिकार
- पिछड़ा वर्ग से जुड़े अधिकार
- अल्पसंख्यकों के अधिकार
- ट्रांसजेंडर के अधिकार
मानवाधिकार
मानवाधिकार वह मानक अधिकार है, जो प्रत्येक मनुष्य की गरिमा की पहचान कर उनकी रक्षा करने का कार्य करता है।
मानवाधिकार में प्रमुख रूप से चार अधिकार समाहित हैं-
- जीवन का अधिकार
- स्वतंत्रता का अधिकार
- समानता का अधिकार
- सम्मान का अधिकार
भारतीय संविधान न सिर्फ मानवाधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है, बल्कि इसकी अवहेलना करने वालों के लिए कड़े दण्ड का प्रावधान भी करता है।
मानवाधिकार की रक्षा करने वाला सबसे महत्वपूर्ण संगठन है- मानवाधिकार आयोग।
मानवाधिकार आयोग
- मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया है।
- 'उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग' की स्थापना यद्यपि 4 अप्रैल 1996 को की गई, किन्तु इसका औपचारिक गठन 7 अक्टूबर 2002 को उस समय हुआ जब जस्टिस ए.पी. मिश्रा को आयोग का अध्यक्ष तथा जस्टिस वी. सरन, एस.आर. आर्य, एस.वी.एम. त्रिपाठी तथा सुखलाल आदर्श को सदस्य नियुक्त किया गया।
- उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग एक स्वायत्त एवं उच्च शक्ति प्राप्त मानवाधिकार संबंधी मामलों की निगरानी करने वाली संस्था है, जो अपनी शक्तियां मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 से प्राप्त करता है।
आयोग के कार्य
(i) आयोग स्वतः संज्ञान लेते हुए या पीड़ित द्वारा अपील किए जाने या पीड़ित पक्ष की तरफ से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपील किए जाने पर निम्नलिखित विषयों पर जाँच आरंभ कर सकता हैं
मानवाधिकारों का उल्लंघन
मानवाधिकारों के उल्लंघन की दशा में लोक सेवक द्वारा की जाने वाली लापरवाही।
(ii) किसी न्यायालय के समक्ष लंबित कार्यवाही, जिसमें मानव अधिकारों के उल्लंघन का आरोप हो, उस न्यायालय के अनुमोदन से हस्तक्षेप करना।
(iii) राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी जेल या किसी अन्य संस्था, जहाँ व्यक्ति उपचार, सुधार या संरक्षण प्रयोजनों के लिए निरुद्ध या दाखिल किए जाते हैं, वहाँ के निवासियों के जीवन की परिस्थितियों का अध्ययन करने, निरीक्षण करने तथा उन पर सरकार को सिफारिश करने का आयोग को अधिकार है।
(iv) संविधान या मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए तत्समय प्रस्तुत किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन उपबंधित रक्षोपाय का पुनर्विलोकन करना और उनके प्रभावपूर्ण कार्यान्वयन हेतु उपायों की सिफारिश करना।
(v) ऐसे मुद्दों की पहचान करना, जो मानवाधिकारों को प्राप्त करने में बाधा बनते हैं।
(vi) मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध करना व उसे प्रोत्साहित करना।
(vii) मानवाधिकारों के विषय में जनता में जागरूकता पैदा करना, उन्हें उपलब्ध मानवाधिकारों से परिचित कराना।
(viii) गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों को बढ़ावा देना तथा मानवाधिकार के क्षेत्र में किये जा रहे कार्यों को प्रोत्साहित कर उन्हे गति देना।
(ix) ऐसे अन्य कार्यों को बढ़ावा देना, जो मानवाधिकार को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक प्रतीत होते हों।
| उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग में वर्ष बार दर्ज शिकायतें | ||
|---|---|---|
| वर्ष | दर्ज शिकायतें | निस्तारित शिकायतें |
| 2019-20 | 22640 | 9930 |
| 2020-21 | 22989 | 13902 |
| 2021-22 | 18622 | 13437 |
| 2022-23 | 36409 | 28266 |
उत्तर प्रदेश में मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार वर्ष 2018 से 2021 के बीच मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े कुल दर्ज मामलो में 40 प्रतिशत अकेले उत्तर प्रदेश से हैं।
मानवाधिकार उल्लंघन के अंतर्गत दर्ज मामलों में प्रमुख हैं -
- जातिगत भेद-भाव
- पुलिस अत्याचार
- महिलाओं पर अत्याचार/हिंसा
- पुलिस द्वारा मुठभेड़
- सांप्रदायिक हिंसा
- विरोध/असहमति की आवाज को दबाना
- सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी तथा कलात्मक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दे
☞ कुछ निजी विद्यालयों द्वारा शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आर्थिक रूप से पिछड़े बच्चों को दाखिला देने में आनाकानी करने संबंधी शिकायतें आ रही हैं।
महिला एवं बाल अधिकार
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 21 तक में ऐसे अनेक अधिकारों का प्रावधान है जो लिंग के आधार पर भेद-भाव किए बिना सभी को समान रूप से उपलब्ध हैं। इस प्रावधान का सर्वाधिक लाभ महिलाओं को प्राप्त होता है।
- संविधान द्वारा महिलाओं को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त हैं। कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम के अन्तर्गत महिलाओं को निःशुल्क कानूनी सहायता का हक प्राप्त है।
- महिलाओं को यौन एवं शारीरिक शोषण, घरेलू हिंसा एवं चरित्र हरण के विरुद्ध सुरक्षा के साथ सेवायोजन और अब लोकसभा एवं विधान सभाओं में भी आरक्षण (1/3) का अधिकार प्राप्त है।
- संविधान का अनुच्छेद 21(A) राज्य के 6 से 14 वर्ष तक की आयु के समस्त बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 23 बच्चों की तस्करी एवं उनसे बलात श्रम पर प्रतिबंध लगाता है।
- अनुच्छेद 24 में बच्चों से कारखाना आदि में काम कराने पर प्रतिबंध लगाया गया है।
स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी अधिकार
- स्वास्थ्य एवं शिक्षा के अधिकार गरिमा पूर्ण जीवन में अंतर्निहित हैं।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है, जिसका सीधा संबध स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी सुविधाओं से है।
- संविधान के 86वें संशोधन द्वारा 6 से 14 वर्ष तक की आयु के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया है।
अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के अधिकार
- संविधान का अनुच्छेद 17 समाज में विद्यमान अस्पृश्यता को समाप्त कर समाज के प्रत्येक वर्ग को गरिमापूर्ण जीवन का हक प्रदान करता है, जिसका सर्वाधिक लाभ अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को प्राप्त होता है।
- अनुच्छेद 15(4), 19(ड.), तथा 46 में अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए अनेक अधिकारों का प्रावधान किया गया है।
दोस्तों, हमें उम्मीद है कि इस लेख में दी गई जानकारी आपके लिए मददगार साबित हुई होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सही और सटीक जानकारी होना बहुत जरूरी है। ऐसे ही महत्वपूर्ण टॉपिक्स को आसान भाषा में पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट WWW.UPGK.IN पर नियमित रूप से विजिट करते रहें। इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!



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