उत्तर प्रदेश के सुविख्यात स्वतंत्रता सेनानी एवं व्यक्तित्व
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उत्तर प्रदेश की माटी का कण-कण शूरवीरों के लहू और उनके अदम्य साहस की गवाही देता है। 1857 की प्रथम क्रांति के शंखनाद से लेकर काकोरी के बलिदानों और भारत छोड़ो आंदोलन की गूंज तक, यूपी हमेशा से आज़ादी की लड़ाई का धड़कता हुआ केंद्र रहा है। इस विस्तृत लेख में हम मंगल पांडे की बगावत, रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य, चन्द्रशेखर आज़ाद की हुंकार, बेगम हजरत महल के संघर्ष और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अनगिनत महान क्रांतिवीरों के जीवन और उनके अमूल्य योगदान की वह गौरवगाथा पढ़ेंगे, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला कर रख दी थी।
भारत के स्वाधीनता संग्राम में उत्तर प्रदेश के लोगों का योगदान अविस्मरणीय है। आरम्भ से ही यह स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र रहा। 1857 के स्वाधीनता संग्राम में सर्वाधिक प्रमुख केन्द्र उत्तर प्रदेश में ही थे। उत्तर प्रदेश ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले स्वाधीनता संग्राम को 'बौद्धिक सहायता' और 'जनभागीदारी' दोनों रूप में सहायता प्रदान की। क्रांतिकारी संघर्ष के संबंध गहराई से उत्तर प्रदेश की भूमि से जुड़े थे।
उत्तर प्रदेश के कुछ प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी इस प्रकार थे-
बख्त खान
इनका जन्म बिजनौर में हुआ। यह एक रोहिल्ला थे। यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में एक सूबेदार थे। जब उन्हें 1857 विद्रोह का पता चला तो वह बड़ी संख्या में रोहिल्ला सैनिकों के साथ दिल्ली की तरफ चल दिये। दिल्ली में उन्होंने मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के अधीन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के सेनापति के रूप में काम किया। दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा होने पर यह दिल्ली से बच निकले और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई को शाहजहांपुर और लखनऊ में जारी रखा।
नाना साहब
नाना साहब मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। जन्म के समय उनका नाम धोंदू पंत था। इन्होंने 1857 के विद्रोह में कानपुर पर अधिकार कर अंग्रेज सेना को आत्मसमर्पण के लिए बाध्य कर दिया। इस सफलता के बाद इन्हें पेशवा घोषित कर दिया गया। इन्होंने खुद को बहादुरशाह जफर के अधीन रखकर स्वाधीनता संघर्ष को आगे बढ़ाने का काम किया। हैवलॉक के नेतृत्व में अंग्रेजों द्वारा कानपुर पर पुनः अधिकार कर लेने पर यह नेपाल चले गये।
तात्या टोपे
मराठा सेनानायक तात्या टोपे का वास्तविक नाम रामचन्द्र पांडुरंग टोपे था। यह नाना साहब के सहयोगी एवं सेनापति थे। इन्होंने कानपुर में अंग्रेज सेनानायक जनरल विण्डहम को पराजित किया। नाना साहब के चले जाने के बाद इन्होंने रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। ग्वालियर के शासक सिंधिया के सामन्त मानसिंह की सूचना पर अंग्रेजों ने इन्हें पकड़ लिया और 1859 में मृत्युदण्ड दे दिया गया।
बेगम हजरत महल
मूल रूप से फैज़ाबाद की निवासी बेगम हज़रत महल अवध के अंतिम नवाब वाज़िद अली शाह की पत्नी थीं। इन्होंने 1857 के विद्रोह का अवध में नेतृत्व किया। इन्हें राजा जयलाल सिंह का सहयोग मिला। इन्होंने अपने पुत्र 'बिरजिस कादिर' को नवाब घोषित किया। यह 'महकपरी' के नाम से लोकप्रिय थीं। अवध पर अंग्रेजों का कब्जा हो जाने के बाद इन्होंने नेपाल में शरण ली, जहां इनकी मृत्यु हो गयी।
रानी लक्ष्मीबाई
यह झांसी की रानी थीं। इनका वास्तविक नाम 'मनु' अथवा 'मणिकर्णिका' था। इनका विवाह झांसी नरेश गंगाधर राव के साथ हुआ था। इन्होंने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के विरूद्ध झांसी और ग्वालियर में
विद्रोहियों का नेतृत्व किया। यह स्वयं एक कुशल योद्धा थीं। इन्होंने झांसी में अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई में अनुकरणीय वीरता दिखाई। इन्होंने अंग्रेजों के समक्ष समर्पण नहीं किया और स्थल बदलकर निरंतर युद्ध करती रहीं। मात्र 31 वर्ष की आयु में ग्वालियर में अंग्रेजों से युद्ध करते हुए रानी लक्ष्मीबाई शहीद हो गईं। ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ ने उनके बारे में कहा है- "विद्रोहियों में वह अकेली मर्द थीं"।
मंगल पाण्डे
मंगल पाण्डे ईस्ट इण्डिया कम्पनी की 34वीं बंगाल नेटिव इंफेन्ट्री में एक सिपाही थे। इनका जन्म नगवां, बलिया में हुआ था। इन्हें 1857 विद्रोह के एक प्रतीक के रूप में जाना जाता है। यह अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़े हुए और अपनी रेजिमेंट के मेजर ह्यूसन और लेफ़्टिनेंट बॉब पर हमला कर दिया। अंग्रेजों ने मंगल पाण्डे का कोर्ट मार्शल कर दिया और 8 अप्रैल, 1857 को उन्हें फांसी दे दी गयी।
खान बहादुर खान
यह रूहेलखण्ड के नवाब हाफिज रहमत खान के पौत्र और ईस्ट इण्डिया कम्पनी शासन में सदर अमीन (जज) के पद से अवकाश प्राप्त पेंशनर थे। 1857 के विद्रोह में इन्होंने बरेली का शासन अपने हाथ में ले लिया। लगभग 30,000 अपने सैनिकों के साथ इन्होंने अंग्रेजी सेना का बहादुरीपूर्वक सामना किया किन्तु पराजित होने के बाद नेपाल भाग कर शरण ली। नेपाल में कुछ स्थानीय नागरिकों की मदद से इस 82 वर्षीय स्वाधीनता संग्राम सेनानी को अंग्रेजों ने पकड़ लिया और बरेली लाकर कोतवाली के सामने फांसी दे दी।
मौलवी लियाकत अली
इनका जन्म प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के ग्राम महगांव में हुआ था। इन्होंने 1857 के विद्रोह में प्रयाग में बागी सैनिकों का नेतृत्व कर किले के बड़े भाग पर अधिकार कर लिया, जिसके बाद इन्हें प्रयाग का सूबेदार घोषित किया गया। खुसरोबाग को मुख्यालय बनाकर इन्होंने शासन करने का काम किया, किन्तु कुछ दिनों बाद कर्नल नील के नेतृत्व में अंग्रेजों ने किले पर पुन: अधिकार कर लिया। अंग्रेजों द्वारा प्रयाग पर पुन: अधिकार कर लेने पर मौलवी लियाकत अली वहां से भाग निकले और चौदह वर्ष बाद इन्हें मुम्बई में पकड़ा जा सका। वर्ष 1873 में इन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, जिसके बाद कालापानी में ही इनकी मृत्यु हो गई।
मौलवी अहमदुल्लाह
मौलवी अहमदुल्लाह ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के विरूद्ध अवध क्षेत्र में विद्रोहियों का नेतृत्व किया। इन्होंने नाना साहब और खान बहादुर खान के साथ मिलकर अंग्रेजों से लोहा लिया। लखनऊ पर अंग्रेजों का कब्जा होने के बाद यह अपने छिपने का स्थान बदलते रहे और शाहजहांपुर में अंग्रेजी सेना का सामना किया।
अजीमुल्लाह खान
अजीमुल्लाह खान का जन्म कानपुर के निकट पटकापुर में हुआ था। इन्होंने तात्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर 1857 क्रांति की रणनीति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। विद्रोह के समय कानपुर के निकट अहिराना नामक स्थान पर अंग्रेजों के साथ युद्ध करते हुए यह शहीद हुए।
राजा देवी सिंह
राजा देवी सिंह का जन्म मथुरा के राया तहसील में हुआ था। इन्होंने 1857 में अपने समर्थकों के साथ ब्रज क्षेत्र में विद्राहियों का नेतृत्व किया था। अंग्रेजों को खदेड़ कर इन्होंने राया क्षेत्र के 80 गांवों में अपना शासन स्थापित कर लिया। इन्हें आधिकारिक रूप से बहादुरशाह जफर द्वारा मथुरा का राजा घोषित किया गया था। बाद में थोर्नबिल के नेतृत्व में एक बड़ी अंग्रेज सेना ने विद्रोहियों को पराजित कर इन्हें 15 जून, 1858 को एक पेड़ से लटका कर फांसी दे दी।
राव उमराव सिंह भाटी
इन्होंने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। यह बुलंदशहर और गौतमबुद्ध नगर में भारतीयों के महत्वपूर्ण नेता थे।
कदम सिंह
इन्होंने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और मेरठ पर नियंत्रण कर लिया। इन्हें परीक्षितगढ़ और मवाना के राजा के तौर पर जाना जाता था।
झलकारी बाई
यह रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में महिला शाखा 'दुर्गादल' की सेनापति थीं। 1857 के विद्रोह में इनका योगदान महत्वपूर्ण है। रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल होने के कारण युद्ध में इन्होंने रानी को अंग्रेजों की पकड़ से बचाने के लिए स्वयं की जान की बाजी लगा दी थी।
लाल प्रताप सिंह
यह उत्तर प्रदेश के कालाकांकर राजघराने के युवराज थे। इन्होंने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ अवध की सेना का नेतृत्व किया। अंग्रेजों से लड़ते हुए चांदा के युद्ध में 19 फरवरी, 1858 को शहीद हो गये।
धन सिंह गुर्जर
इन्हें 10 मई, 1857 को मेरठ से क्रांति आरम्भ करने का श्रेय दिया जाता है। यह मेरठ के कोतवाल थे। अंग्रेजों ने इन्हें गिरफ्तार कर मेरठ के चौराहे पर फांसी पर लटका दिया। इनके नाम पर मेरठ विश्वविद्यालय के एक कैम्पस का नामकरण हुआ है।
बंधु सिंह
बंधु सिंह डुमरी, गोरखपुर के रहने वाले थे। इन्होंने 'गुरिल्ला नीति' अपनाते हुए अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में विद्रोहियों का नेतृत्व किया। इन्हें सार्वजनिक रूप से गोरखपुर के अलीनगर चौराहे पर फांसी दे दी गई।
आचार्य नरेन्द्र देव
सीतापुर के निवासी आचार्य नरेन्द्र देव कांग्रेस के अंतर्गत बनी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक थे। इन्होंने कांग्रेस से जुड़े रह कर स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया।
अशफाकुल्ला खाँ
यह शाहजहांपुर के रहने वाले थे। यह एक क्रांतिकारी और हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सदस्य थे। इन्होंने 9 अगस्त, 1925 को अंग्रेज सरकार का खजाना ले जा रही लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन से चली एक ट्रेन को लूटने का कार्य किया। इस मामले में इन्हें रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह के साथ फांसी दे दी गई।
चन्द्रशेखर आज़ाद
यह भारत के क्रांतिकारियों में सबसे प्रमुख व्यक्तित्व में से एक हैं। जन्म के समय इनका नाम चन्द्रशेखर तिवारी था। इन्होंने 'आज़ाद' की उपाधि स्वयं धारण की। इन्होंने 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन'
(HRA) का नाम परिवर्तित कर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) कर दिया तथा इसे पुन: व्यवस्थित करने का काम किया। इन्होंने 27 फरवरी, 1931 को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क
में अंग्रेजों द्वारा चारों तरफ से घिर जाने पर समर्पण न करते हुए खुद को गोली मारकर अपने प्राण त्याग दिये।
आसफ अली
इनका जन्म वर्तमान बिजनौर जिले के सिहोरा में हुआ था। यह एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और प्रसिद्ध वकील थे। बाद में यह अमेरिका में भारत के प्रथम राजदूत बने। भगत सिंह और उनके साथियों के पक्ष में इन्होंने मुकदमा लड़ा था।
चित्तू पाण्डेय
इनका जन्म बलिया के रत्तू-चक गांव में हुआ था। इन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान बलिया में समानान्तर सरकार स्थापित कर ली थी। इन्हें ‘बलिया का शेर’ कहा जाता है। यह स्वयं को गांधीवादी मानते थे। इनकी मृत्यु 1946 में हुई।
गणेश शंकर विद्यार्थी
प्रयागराज में पैदा हुए गणेश शंकर विद्यार्थी कानपुर में बस गये और एक पत्रकार के रूप में स्वतंत्रता की अलख जगाने का कार्य किया। इन्होंने हिन्दी भाषी अखबार ‘प्रताप’ का प्रकाशन किया, जिसके द्वारा इन्होंने क्रांतिकारियों और शोषितों की आवाज़ उठाई। इन्होंने असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
गोविंद बल्लभ पंत
यह कांग्रेस के सदस्य और प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। पेशे से यह वकील थे। इन्होंने काकोरी काण्ड में क्रांतिकारियों की तरफ से मुकदमा लड़ा। यह 17 जुलाई, 1937 से 2 नवम्बर, 1939 तक संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के मुख्यमंत्री रहे। आज़ादी के बाद यह 1955-1961 तक देश के गृहमंत्री रहे।
हसरत मोहानी
इन्होंने 1921 में ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ का लोकप्रिय नारा दिया। इन्होंने सबसे पहले कांग्रेस के 1921 के अहमदाबाद के अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज्य’ की मांग की। यह एक शायर, पत्रकार एवं इस्लामी विद्वान थे। यह उत्तर प्रदेश के वर्तमान उन्नाव जनपद अन्तर्गत कस्बा मोहान के निवासी थे।
महावीर त्यागी
यह एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और किसान नेता थे। इनका जन्म मुरादाबाद जनपद अन्तर्गत ग्राम ढबारसी में हुआ था। इन्होंने कांग्रेस के अंतर्गत किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। यह स्वतंत्रता के बाद सांसद के साथ केन्द्रीय राजस्व मंत्री एवं ‘मिनिस्टर फॉर डिफेंस आर्गेनाइजेशन’ भी रहे।
मौलाना मुहम्मद अली
रामपुर निवासी मौलाना मुहम्मद अली खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता थे। यह 1923 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने। इन्हें मौलाना मुहम्मद अली जौहर के नाम से भी जाना जाता है। यह मुस्लिम लीग के संस्थापकों में से एक थे।
मौलाना शौकत अली
यह खिलाफत आंदोलन के नेता थे। खिलाफत आंदोलन के असहयोग आंदोलन के साथ जुड़ जाने से स्वाधीनता संग्राम में मुस्लिम जनता का सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ। इनका जन्म रामपुर में हुआ था।
मुख्तार अहमद अंसारी
प्रसिद्ध चिकित्सक एवं राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता मुख्तार अहमद अंसारी का जन्म गाज़ीपुर में हुआ था। यह कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के अध्यक्ष बने। यह जामिया मिलिया, दिल्ली के संस्थापकों में से एक थे। जामिया की स्थापना असहयोग आंदोलन में स्वदेशी की पुकार के अंतर्गत हुई थी। यह 1928-1936 तक जामिया के उप-कुलपति रहे।
मुनीश्वर दत्त उपाध्याय
यह प्रतापगढ़ के निवासी और एक स्वाधीनता सेनानी, राजनेता एवं शिक्षाविद् थे। इन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस पार्टी में ‘लौह पुरुष’ कहा जाता था।
मूलमती
यह रामप्रसाद बिस्मिल की मां थीं। इन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में रामप्रसाद बिस्मिल को तैयार करने में अहम किरदार निभाया। फांसी से ठीक पहले जब यह बिस्मिल से मिलने जेल में गयीं, तो उनसे कहा कि ऐसा पुत्र पाकर वह गौरवान्वित हैं। उन्होंने एक जनसभा में अपने दूसरे पुत्र सुशील चन्द्र को भी स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित करने की बात कही।
रफ़ी अहमद किदवई
यह कांग्रेस के सदस्य थे और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की। यह बाराबंकी के निवासी थे। इनके समाजवाद को इस्लामिक समाजवाद भी कहा जाता है। यह भारत के पहले संचार मंत्री थे।
राजा महेन्द्र प्रताप
यह एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। इन्होंने दिसम्बर, 1915 में काबुल पहुंचकर भारत से बाहर देश की प्रथम निर्वाचित सरकार का गठन किया था। यह देश के बाहर बनी इस सरकार के अध्यक्ष थे। इस सरकार को जर्मनी और रूस से मान्यता मिली। यह एक पत्रकार, लेखक, समाजवादी और समाज सुधारक थे। इन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम
विश्वविद्यालय (AMU) के लिए जमीन दान दी थी। इनका जन्म हाथरस के मुरसान रियासत में हुआ था।
पंडित मदन मोहन मालवीय
उपनिषद वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ को लोकप्रिय बनाने वाले पं. मदन मोहन मालवीय का जन्म प्रयागराज में हुआ था। इनका स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान रहा। यह चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने- लाहौर (1909), दिल्ली (1918), दिल्ली (1932) और कलकत्ता (1933)। इन्होंने 1939 में ‘इण्डिया ब्राह्मण महासभा’ की स्थापना की। वर्ष
1915 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना इनके द्वारा की गयी। इन्हें महामना भी कहते हैं।
पुरुषोत्तम दास टंडन
यह कांग्रेस के सदस्य और स्वतंत्रता सेनानी थे। हिन्दी को आधिकारिक भाषा का स्थान दिलवाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान था। इन्हें राजर्षि की प्रतीकात्मक उपाधि दी गई थी, जिसका मतलब राजकीय महात्मा होता है। इनका जन्म प्रयागराज में हुआ था।
राजेन्द्र लाहिड़ी
यह एक क्रांतिकारी और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सदस्य थे। यह काकोरी षड्यंत्र और दक्षिणेश्वर बमकांड में लिप्त थे। इन्हें गोण्डा कारावास में 17 दिसम्बर, 1927 को फांसी दे दी गयी।
राम मनोहर लोहिया
यह कांग्रेस के समाजवादी धड़े का हिस्सा और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। इन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। भूमिगत रहकर कांग्रेस रेडियो पर गुप्त रूप से प्रसारण किया। इनका जन्म अकबरपुर में हुआ था। इन्होंने अयोध्या में रामायण मेला कीशुरुआत की।
राम प्रसाद बिस्मिल
यह एक क्रांतिकारी और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के संस्थापक सदस्य थे। 1918 के मैनपुरी षड्यंत्र और 1925 के काकोरी काण्ड से जुड़े थे। इन्हें 19 दिसम्बर, 1927 को गोरखपुर जेल की कोठरी में फांसी के फंदे पर लटकाया गया। यह हिन्दी और उर्दू में राम, अज्ञात और बिस्मिल उपनाम से कविताएं लिखा करते थे। इनका जन्म शाहजहांपुर में हुआ था।
स्वामी सहजानन्द सरस्वती
यह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से संबंधित थे। यह एक मार्क्सवादी, सुधारक और क्रांतिकारी थे। यह साधू की तरह जीवन यापन करते थे। आरम्भ में मात्र बिहार इनका कार्यक्षेत्र रहा किंतु 1936 में आल इंडिया किसान सभा की स्थापना के बाद सम्पूर्ण भारत में कार्य किया।
विजय सिंह पथिक
इस क्रांतिकारी का जन्म बुलंदशहर के गुथावली गांव में हुआ था। इनका वास्तविक नाम भूप सिंह था। इन्हें राष्ट्रीय पथिक भी कहते थे।
तेज बहादुर सप्रू
यह अलीगढ़ में पैदा हुए थे। यह एक जाने माने राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे। यह कांग्रेस के सदस्य थे, किंतु इन्होंने बाद में लिबरल पार्टी की सदस्यता ले ली। इन्होंने नेहरू रिपोर्ट के निर्माण में सहायता की तथा गांधी-इरविन समझौते और पूना समझौते में भी अहम भूमिका निभाई। गोलमेज सम्मेलन (1930-1932) में उदारवादियों का नेतृत्व किया।
सुचेता कृपलानी
सुचेता कृपलानी ने स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभायी। यह गांधीवादी थीं और स्वतंत्रता के पश्चात उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
रोशन सिंह
यह शाहजहांपुर के रहने वाले थे। यह हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के सदस्य थे। यह बिस्मिल और अन्य क्रांतिकारियों के साथ काकोरी काण्ड से जुड़े थे। इन्हें अंग्रेजों द्वारा नैनी जेल में फांसी दी गई।
लक्ष्मी रमन आचार्य
यह आगरा षड्यंत्र (1937) के आरोपी थे। बाद में वह उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री बन गये।
दोस्तों, हमें उम्मीद है कि इस लेख में दी गई जानकारी आपके लिए मददगार साबित हुई होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सही और सटीक जानकारी होना बहुत जरूरी है। ऐसे ही महत्वपूर्ण टॉपिक्स को आसान भाषा में पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट WWW.UPGK.IN पर नियमित रूप से विजिट करते रहें। इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!

Comments
Comment करें