उत्तर प्रदेश की वास्तुकला, मूर्तिकला, पुरातत्व, संग्रहालय एवं अभिलेखागार

उत्तर प्रदेश की वास्तुकला, मूर्तिकला, पुरातत्व, संग्रहालय एवं अभिलेखागार

उत्तर प्रदेश की धरती केवल एक भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी कला, संस्कृति और बेजोड़ वास्तुकला का एक जीवंत कैनवास है। विंध्य की गुफाओं में उकेरे गए प्रागैतिहासिक शैलचित्रों से लेकर, मौर्य काल के शानदार स्तूपों और गुप्तकालीन मंदिरों की अद्भुत नक्काशी तक, इस राज्य के कण-कण में एक गौरवशाली इतिहास की गूंज सुनाई देती है। मथुरा शैली की मूर्तिकला हो, मुगलों की बेमिसाल पच्चीकारी (ताजमहल), अवध के नवाबों का रहस्यमयी स्थापत्य या फिर प्रदेश के विभिन्न संग्रहालयों में सहेजी गई अनमोल पुरातात्विक धरोहरें- यह विस्तृत लेख आपको UP की वास्तुकला, मूर्तिकला, पुरातत्व और ऐतिहासिक अभिलेखागारों के एक बेहद रोमांचक सफरनामे पर ले जाएगा।
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उत्तर प्रदेश की कला एवं शिल्प श्रेणियां

स्थापत्य एवं मूर्तिकला
चित्रकला एवं शिल्प
संगीत कला
नृत्य कला
नाट्य कला

वास्तुकला का क्रमिक विकास

प्रागैतिहासिक काल गुफाएं एवं झोपड़ियां
हड़प्पा सभ्यता पकी ईंटों के मकान
मौर्यकाल एकाश्म पाषाण स्तम्भ व स्तूप
मौर्योत्तर काल मथुरा मूर्तिकला शैली
गुप्तकाल शिखरयुक्त ईंटों के मंदिर
मध्यकाल शर्की एवं मुगल वास्तुकला
आधुनिक काल इंडो-यूरोपीय व नवाब शैली

ऐतिहासिक वास्तुकला की विशेषताएं

गुप्तकालीन वास्तुकला

  • दशावतार मंदिर (देवगढ़): 'शिखर' युक्त उत्तर भारत का प्रथम मंदिर। 'पंचायतन शैली' में निर्मित।
  • भितरगांव (कानपुर): ईंटों से निर्मित मंदिर, समतल छत पर 40 फुट ऊंचा शिखर।
  • कहोम मंदिर (देवरिया): स्कन्द गुप्त के काल में निर्मित, 5 जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां।

मुगल स्थापत्य (अकबर)

  • फतेहपुर सीकरी: लाल बलुआ पत्थर से निर्मित शहर। प्रमुख भवन: बुलंद दरवाजा (176 फीट), जोधाबाई महल, पंचमहल।
  • आगरा का लाल किला: यमुना तट पर लाल बलुआ पत्थर से 15 वर्षों में निर्मित।
  • सादगी एवं भव्यता: निर्माण में शहतीर पद्धति और स्थानीय पत्थरों का प्रयोग।

मुगल स्थापत्य (शाहजहां)

  • ताजमहल: उस्ताद अहमद लाहौरी द्वारा डिजाइन। मकराना संगमरमर एवं 'पित्र-दूरा' (Pietra-Dura) जड़ावट।
  • मोती मस्जिद: आगरा किले में स्थित सफेद संगमरमर की सर्वोत्कृष्ट रचना।
  • दीवान-ए-खास: 'तख्त-ए-ताउस' (मयूर सिंहासन) की स्थापना।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजकीय संग्रहालय

राजकीय संग्रहालय, लखनऊ

स्थापना: 1863 (प्रदेश का सबसे पुरातन)
सिन्धु घाटी सभ्यता, कांस्य युगीन पुरावशेष, मुहरें एवं गान्धार कला की मूर्तियों का विशाल संरक्षण।

इलाहाबाद संग्रहालय, प्रयागराज

स्थापना: 1931 (राष्ट्रीय स्तर का संस्थान)
महात्मा गाँधी और नेहरू से जुड़ी सामग्री, हस्तलिपियां एवं 25,000 से अधिक महत्वपूर्ण पुस्तकों का भण्डार।

राजकीय संग्रहालय, मथुरा

स्थापना: 1874 (पूर्व नाम: कर्जन संग्रहालय)
मथुरा कला की विश्व प्रसिद्ध मूर्तियों, कुषाण व गुप्तकालीन कला, एवं कनिष्क की सिरविहीन मूर्ति का संरक्षण।

भारत कला भवन, वाराणसी

स्थापना: 1920 (रायकृष्ण दास द्वारा)
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्थित। 12,000 लघुचित्रों (Miniature paintings) का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात संग्रह।

कला एवं शिल्प की दृष्टि से उत्तर प्रदेश काफी समृद्ध है। अध्ययन में सुगमता के लिए कला को पांच श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-
  1. स्थापत्य एवं मूर्तिकला (Architecture and Sculpture)
  2. चित्रकला एवं शिल्प (Paintings and Crafts)
  3. संगीत कला (Music)
  4. नृत्य कला (Dance)
  5. नाट्य कला (Theater)

स्थापत्य एवं मूर्तिकला

उत्तर प्रदेश में वास्तुकला के विकास को मानव जीवन के विस्तार एवं समृद्धि के रूप में देखा जा सकता है। सुविधा की दृष्टि से इसे निम्नलिखित काल में विभाजित करते हैं-

प्रागैतिहासिक काल

उत्तर प्रदेश में विभिन्न प्रागैतिहासिक युगीन स्थलों के उत्खनन से जो विपुल सामग्री उपलब्ध हुई है, उनके परीक्षण से यह निष्कर्ष निकलता है, कि उत्तर प्रदेश स्थित बेलन घाटी (मिर्जापुर क्षेत्र) में पुरापाषाण युग (5,00,000-10,000 ई.पू.) से लोग अपना आवास बनाकर निवास करते थे।
प्रारम्भ में मनुष्य ने अपने निवास का स्थान गुफाओं, कन्दराओं और झोपड़ियों को बनाया। इनमें गुफाएं एवं कन्दराएं प्रकृति द्वारा निर्मित थीं, जबकि झोपड़ियां मानव निर्मित। इन दोनों रूपों में यहां वास्तुकला का विकास हुआ।
बेलन घाटी में निम्न पुरा-पाषाण कालीन (5,00,000-50,000 ई.पू.) गुफाओं के अस्तित्व मिले हैं। यहां मनुष्य समूह में रहता था। इस काल में मनुष्य 'भोजन-संग्राहक' (Food Gatherer) था, न कि 'भोजन उत्पादक' (Food Producer)। मध्य-पुरापाषाण काल (50,000-40,000 ई.पू.) में मनुष्य ने अपनी गुफाओं व कन्दराओं का विकास किया। अब उसने अग्नि का अपनी सुविधा के अनुसार प्रयोग करना सीख लिया। मृतक संस्कार भी इसी समय प्रचलन में आये।
मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age), जिसका समय 10,000-6,000 ई.पू. के मध्य माना जाता है, में मनुष्य ने अपने स्थायी निवास स्थान का निर्माण आरम्भ कर दिया। वर्तमान प्रतापगढ़ जनपद अन्तर्गत सराय नाहर राय एवं महादाहा में इस काल की अनेक स्थायी झोपड़ियां मिली हैं, जहां मनुष्य निवास करता था। यहां हाथ से बनाए गए मिट्टी के बर्तन एवं चूल्हे भी मिले हैं।

हड़प्पा सभ्यता

उत्तर प्रदेश स्थित हड़प्पा सभ्यता के दो नगरों आलमगीरपुर एवं हुलास में ईंट से बने मकानों के साक्ष्य मिले हैं।
मेरठ जिले में हिंडन नदी के बायें तट पर स्थित आलमगीरपुर में मकान बनाने के लिए दो प्रकार के पके ईंट काम में लाये जाते थे। बड़ी ईंट लगभग 30 सेमी. और छोटी लगभग 15 सेमी. लम्बी होती थी।
सहारनपुर जिला अन्तर्गत हुलास में मकान बनाने के लिए गारे से बनी ठोस ईंटों का प्रयोग किया जाता था।

मौर्यकाल

मौर्यकाल (321-185 ई.पू.) में वास्तुकला का सुनियोजित विकास हुआ। उत्खनन में प्राप्त साक्ष्यों एवं मेगस्थनीज की पुस्तक 'इंडिका' से ज्ञात होता है कि इस युग में भवन निर्माण हेतु ईंट-पत्थर की जगह काष्ठ (Wood) का प्रयोग अधिक होता था।
मौर्यकालीन कला का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भों (Pillars) में देखने को मिलता है। इनका निर्माण चुनार से लाये गये लाल बलुआ पत्थरों से कराया गया है। पत्थर के एक ही टुकड़े पर चट्टान से बने होने के कारण इन्हें एकाश्म पत्थर (Monolith) का अद्भुत नमूना माना जाता है।
  • अपने धर्मलेखों एवं राजघोषणाओं को जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए सम्राट अशोक ने देश के विभिन्न हिस्सों में 7 वृहद्स्तम्भ अभिलेख (Major Pillar Edicts) तथा 5 लघु स्तंभ लेख (Minor Pillar Edicts) लगवाए। यह गोलाकार स्तम्भ लगभग 16 मीटर ऊँचे और वजन में लगभग 80 टन हैं। पत्थर पर इतनी निपुणता से पॉलिश
  • किया गया है कि अनेक दर्शक इन्हें धातु का बना हुआ समझ लेते हैं।
  • अशोक का सारनाथ स्तम्भ मौर्यकालीन शिल्प का बेहतरीन उदाहरण है। आरम्भ में यह 70 फुट से अधिक ऊँचा था।
  • सारनाथ स्तम्भ का सिंहशीर्ष (Lion Capital) बुद्ध के प्रथम उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) का स्मारक है। हमारे राष्ट्रीय प्रतीक का स्वरूप इससे लिया गया है। इसमें पीठ सटाये बैठे हुए चार सिंह निर्मित हैं, जो
  • सम्राट की चारों दिशाओं में धर्म विजय की घोषणा कर रहे हैं। सिंहों के मस्तक पर महाधर्मचक्र (Wheel of Dharma) स्थापित था, जिसमें 32 तीलियां थीं।
  • सिंहशीर्ष के नीचे एक वृत्ताकार चौकी (Platform) बनी है, जिस पर चारों दिशाओं में चार चक्र बने हुए हैं। प्रत्येक चक्र में 24 तीलियां हैं।
  • इन्हीं चक्र के बीच में चलती हुई मुद्रा में चार पशुओं-हाथी, वृषभ, अश्व तथा सिंह को दिखाया गया है। यह चार पशु/जानवर बुद्ध के जीवनचक्र की चार अवस्था क्रमशः गर्भ में आने, जन्म, गृहत्याग तथा संबोधि के प्रतीक हैं।
  • स्तंभ में चौकी के नीचे अवांगमुखी कमल (Lotus bell) बना है, जिसके नीचे स्तंभ का शेष भाग मौजूद है।
मथुरा के निकट परखम एवं बड़ोदा ग्राम से मौर्यकालीन यक्ष की विशाल मूर्तियां प्राप्त हुई हैं, जो अब मथुरा संग्रहालय में मौजूद हैं। यक्ष की पहचान 'मणिभद्र' के रूप में की गई है। इसका निर्माण कुणिक के शिष्य गोमित्र ने कराया था।
मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप भारतीय स्थापत्य कला को नया आयाम प्रदान करते हैं। 'स्तूप' का शाब्दिक अर्थ है 'ढेर' (Mound)। इसका आशय ऐसे उभरे स्थान से है, जिसका निर्माण मृतक की अस्थि या अवशेषों को
नीचे रखकर किया जाता है।
स्तूपों का निर्माण यूं तो महाजनपद काल में बुद्ध के महापरिनिर्वाण के साथ ही शुरू हो गया था किंतु मौर्य सम्राट अशोक ने इस स्थापत्य को व्यापक रूप दिया। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार अशोक ने 84 हजार स्तूपों का निर्माण कराया था।
उत्तर प्रदेश में प्राप्त अशोक के स्तूपों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है सारनाथ का 'धर्मराजिका स्तूप'। इसके नीचे का भाग सुन्दर खुदे पत्थरों से निर्मित है, जबकि ऊपरी भाग ईंट का है। इसका आधार मौर्य अथवा गुप्त काल के अन्य स्तूपों की भांति वर्गाकार नहीं, अपितु गोलाकार है। स्तूप की ऊँचाई लगभग 39 मीटर है। इसकी आकृति आधार के ऊपर ढोल के समान है।
स्तूप की समूची वेदिका (Railing) का निर्माण एक ही पत्थर को तराश कर किया गया था। इसका व्यास आरम्भ में 13.49 मीटर था। वर्ष 1794 ई. में बनारस के राजा चेतसिंह के दीवान जगत सिंह ने एक निर्माण में प्रयोग के लिए धर्मराजिका स्तूप में लगी तमाम ईंटों को निकलवा दिया। अब तक 6 बार इसके मूल स्वरूप में परिवर्तन किया जा चुका है।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख बौद्ध स्तूप
स्थान विवरण
सारनाथ मौर्य सम्राट अशोक के सारनाथ में दो प्रमुख स्तूप हैं- (1) चौखंडी स्तूप (2) धर्मराजिका स्तूप। चौखंडी ऊंचे टीले पर ईंट से निर्मित आठ कोण का स्तूप है। यह जमीन से 84 फीट ऊँचा है। यहां कनिंघम ने खुदाई कराई थी। धर्मराजिका स्तूप का निर्माण अशोक ने बुद्ध के अवशेष पर कराया था।
कुशीनगर यह स्तूप वर्तमान कुशीनगर जनपद में बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल पर निर्मित है। यह 167 फीट ऊँचा है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसे देखा था।
श्रावस्ती लखनऊ के निकटवर्ती श्रावस्ती में राप्ती नदी के तट पर इस स्तूप के भग्नावशेष मौजूद हैं। बुद्ध ने यहां 24 वर्षावास व्यतीत किये थे।
कौशाम्बी प्रयागराज से 38 मील दूर यमुना तट पर कौशाम्बी में इस स्तूप का निर्माण अशोक ने कराया था। आज यहां इसके भग्नावशेष मात्र हैं। इस 200 फीट ऊँचे स्तूप का निर्माण बुद्ध के नख और केश के ऊपर कराया गया था।
कपिलवस्तु सिद्धार्थनगर से 20 किलोमीटर दूर स्थित पिपरहवा नामक स्थान पर इस स्तूप का निर्माण बुद्ध के अस्थि अवशेषों पर हुआ है। कपिलवस्तु बुद्ध के पिता शुद्धोदन के शाक्य गणराज्य की राजधानी थी। अशोक ने कपिलवस्तु की यात्रा की थी।
रामभर यह स्तूप कुशीनगर स्थित महापरिनिर्वाण मंदिर से दक्षिण-पूर्व दिशा में लगभग 1.5 किमी. दूर स्थित है। उत्खनन में यहां से मौर्यकालीन ईंट प्राप्त हुई हैं। बौद्ध मान्यता के अनुसार बुद्ध का अंतिम संस्कार यहीं किया गया था।

मौर्योत्तर काल

मौर्योत्तर काल, विशेषकर कनिष्क के शासनकाल, में भारत में मूर्तिकला की विशिष्ट शैली का विकास हुआ। बुद्ध की मूर्ति सर्वप्रथम इसी काल में निर्मित हुई।
इस अवधि में मूर्तिकला की तीन शैलियों का उद्भव हुआ-
  1. गांधार शैली
  2. मथुरा शैली
  3. अमरावती शैली
इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है मथुरा शैली, जिसका उद्भव व विकास उत्तर प्रदेश में हुआ।

मूर्तिकला की मथुरा शैली

बुद्ध की प्रथम मूर्ति मथुरा शैली में बनी। दिल्ली के निकट मथुरा कनिष्क की द्वितीय राजधानी थी। यहां मूर्तिकला की जो शैली विकसित हुई, उसे मथुरा शैली के नाम से जाना जाता है। यहां बुद्ध के अतिरिक्त जैन तीर्थंकरों, हिन्दू देवी-देवताओं, यक्ष, नाग, शिव, कार्तिकेय आदि की भी मूर्तियां बनायीं गयीं। यह मूर्तियां प्रायः बलुआ अथवा चित्तीदार पत्थरों से निर्मित हैं।

मथुरा शैली में बुद्ध की मूर्तियां भारतीय संत अथवा सन्यासियों की भांति दिखती हैं। इस शैली में बुद्ध को प्रायः भूमिस्पर्श मुद्रा, अभय मुद्रा एवं धर्मचक्रप्रवर्तन मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है। बुद्ध की अधिकांश मूर्तियां खड़ी हैं, जिनके पैरों के नीचे सिंह की आकृति बनी है। सिर के पीछे बड़ा प्रभामण्डल बनाया गया है। यह तथ्य इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मूर्ति की दूसरी समकालीन ‘गांधार शैली’ में बुद्ध को प्रायः राजकुमार की भांति दर्शाया गया है। गांधार शैली पर यूनानी एवं रोमन कला शैली का प्रभाव है। इसका विकास मौर्योत्तर काल में ही उत्तर प्रदेश से दूर गांधार क्षेत्र में हुआ।
मथुरा शैली में निर्मित कनिष्क की एक सिरविहीन खड़ी पाषाण मूर्ति प्राप्त हुई है, जिस पर ‘राजाधिराज देवपुत्रो कनिष्को’ अंकित है। यह 5.7 फुट ऊंची है। मूर्ति की दाहिनी भुजा राजदण्ड पर टिकी है, जबकि बायें हाथ से तलवार पकड़े है। मूर्ति को घुटनों तक चोंगा और पैरों में भारी जूता पहने दिखाया गया है।
मथुरा शैली में मूर्तियों के अतिरिक्त वेदिका स्तंभ विशिष्ट स्थान रखते हैं।

गुप्तकालीन स्थापत्य कला

गुप्तकाल में स्थापत्य कला का अभूतपूर्व विकास हुआ। इस युग की कला में सौन्दर्य और प्रतिबंध का अद्भुत मिश्रण है। कलाकार ने अपना ध्यान लालित्य पर केन्द्रित किया है, किंतु रूढ़िवादिता के बोझ से मुक्त है।
मंदिर निर्माण प्रक्रिया का आरम्भ गुप्त काल में हुआ। शुरू में मंदिर की छतें चपटी बनीं, किंतु आगे चलकर शिखरयुक्त मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ। मंदिर में गर्भगृह, दालान, सभा-भवन, ड्योढ़ी बनी होती हैं। मंदिर ऊंचे चबूतरे पर निर्मित होते हैं, जिन पर चढ़ने के लिए चारों तरफ सीढ़ियां बनी होती हैं। मंदिर में देवमूर्ति की स्थापना के लिए चौकोर या वर्गाकार कक्ष निर्मित होता है, जिसे गर्भगृह कहा जाता है।
मंदिरों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग सर्वप्रथम इसी काल में हुआ। इस समय के मंदिरों का निर्माण मात्र मूर्तियों को प्रतिष्ठित करने के लिए किया जाता था। यहां उपासकों या भक्तों के लिए अलग से सभा भवन या मण्डप नहीं होते थे।

दशावतार मंदिर
गुप्तकालीन स्थापत्य में देवगढ़ (जनपद ललितपुर, झांसी मंडल) के ‘दशावतार मंदिर’ का विशिष्ट स्थान है। उत्तर भारत का यह प्रथम मंदिर है, जिसमें ‘शिखर’ का निर्माण किया गया।
मंदिर 13.5 मीटर वर्गाकार चबूतरे पर बना है। मंदिर का गर्भगृह पांच फीट ऊँचे चबूतरे पर निर्मित है, जिसके चारों तरफ सीढ़ियां बनी हैं। इसका शिखर 12 मीटर ऊँचा था, जो वर्तमान में भग्नावस्था में है।
‘पंचायतन शैली’ के इस मंदिर में विष्णु को शैय्या पर लेटा हुआ दिखाया गया है।

भितरगांव का मंदिर
कानपुर के निकट भितरगांव में ईंटों से बना यह मंदिर है। ऊँचे चबूतरे (36 × 47 फीट) पर बने इस मंदिर में समतल छत पर लगभग 40 फुट ऊँचा शिखर विद्यमान है।

कहोम का मंदिर
देवरिया जनपद में स्थित कहोम (पुराना नाम कुकुभ) के इस मंदिर का निर्माण स्कन्द गुप्त के शासन काल में हुआ। यहां 5 जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की स्थापना का उल्लेख मिलता है।

गुप्तकालीन मूर्तिकला

गुप्तकाल में मथुरा और सारनाथ में बुद्ध और बोधिसत्वों की अनेक सुंदर मूर्तियों का निर्माण हुआ। इन मूर्तियों में परिधान मोटे और सुंदर बनाए गए हैं। सिर पर मुड़े हुए केश और कानों में लम्बे कुण्डल हैं।
सारनाथ में प्राप्त बुद्ध की प्रतिमाओं में 'धर्मचक्र प्रवर्तन' एवं 'भूमि-स्पर्श' मुद्रा का विशिष्ट स्थान है। धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में बुद्ध पद्मासन में बैठे पंचभद्रवर्गीय भिक्षुओं को प्रथम धर्मोपदेश देते दिखाई देते हैं। सिर के पीछे दैदीप्यमान प्रभामण्डल और पलकें झुकी हुई हैं।
भूमि-स्पर्श मुद्रा में बुद्ध आसन पर बैठे हैं। उनका बायां हाथ गोद में है, जबकि दाहिना हाथ भूमि (आसन) को स्पर्श कर रहा है। मूर्ति में आसन के नीचे 'मार पराजय' का दृश्य अंकित है।

मंदिर की पंचायतन शैली
मंदिर के गर्भगृह में मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित होती है। गर्भगृह के आगे मंडप में चारों कोनों पर चार अन्य छोटे देवालय बने होते हैं, जिनमें मुख्य मंदिर में स्थापित देवता से जुड़े अन्य देवताओं की प्रतिमा स्थापित की जाती है। उदाहरणस्वरूप गर्भगृह में यदि शिव की प्रतिमा स्थापित है तो छोटे देवालय में गणेश, नन्दी, भैरो, कार्तिकेय की प्रतिमाएं स्थापित होंगी। मंदिर में कुल पांच देवालय होने के कारण इसे पंचायतन शैली का मंदिर कहा जाता है।

गुप्तकाल के प्रस्तर-स्तम्भ

अशोक की भांति गुप्त सम्राटों ने भी अनेक भव्य और ऊंचे पाषाण स्तम्भ निर्मित कराये। मौर्य और गुप्त शासकों के पाषाण स्तम्भों में कई भेद हैं। मौर्य युग के स्तम्भ जहां गोल, चिकने और पॉलिशयुक्त हैं, वहीं गुप्तकाल के स्तम्भ चतुष्कोण, अष्टकोण और विभिन्न कोणों के होते हैं। गुप्त सम्राटों के स्तम्भ के शीर्ष पर प्रायः विष्णु के वाहन गरुड़ या सिंह की प्रतिमा उत्कीर्ण है।
गुप्तयुगीन पाषाण स्तम्भों में गाजीपुर के निकट सैदपुर तहसील के अंतर्गत स्कन्दगुप्त का 'भीतरी स्तम्भ' प्रमुख है। यह स्तम्भ विष्णु मंदिर के सम्मुख स्थापित किया गया है। इसके स्तम्भ पर स्कन्दगुप्त द्वारा हूणों के प्रथम आक्रमण को विफल कर उन्हें पराजित करने का उल्लेख है।
  • प्रयागराज में अशोक के स्तंभ पर समुद्रगुप्त के दिग्विजय अभियान की प्रशस्ति अंकित है। समुद्रगुप्त के इस प्रशस्ति लेख को उसके अमात्य हरिषेण ने निर्मित कराया था। यह चम्पू शैली (गद्य एवं पद्य दोनों का मिश्रित रूप) में है। आगे चलकर इस पर मुगल बादशाह जहांगीर ने अपना लेख दर्ज कराया।

मध्यकालीन स्थापत्य एवं मूर्तिकला

सल्तनतकाल

मध्यकालीन स्थापत्य कला इस्लाम से प्रभावित है। दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद 13वीं सदी के पूर्वार्द्ध में भारत में जिस स्थापत्य का विकास हुआ उसे 'भारत-इस्लामी कला' के रूप में जाना जाता है।
उत्तर प्रदेश में मध्यकालीन स्थापत्य कला की शुरुआत 1504 ई. में सिंकदर लोदी द्वारा आगरा नगर की स्थापना के साथ हुई। इससे पूर्व आगरा मात्र एक गांव था। सिंकदर लोदी ने इसे व्यवस्थित ढंग से बसाया और अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर यहां स्थानान्तरित कर दिया। उसने यहां कई महल, कुंए, सड़क और एक मस्जिद का निर्माण कराया।

शर्की स्थापत्य शैली

फिरोज तुगलक के पुत्र सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद शाह (1394-1412 ई.) ने एक हिजड़े 'ख्वाजा जहां' को 1394 ई. में अपना वजीर नियुक्त कर उसे 'मलिक-उस-शर्क' (पूरब का स्वामी) की उपाधि प्रदान की। ख्वाजा जहां ने उत्तर प्रदेश के जौनपुर में अपनी स्वतंत्र 'शर्की राजवंश' की स्थापना की। लगभग सौ वर्ष के अपने शासनकाल में इस वंश ने जौनपुर में हिन्दू एवं इस्लामी शैलियों का समन्वय करते हुए अनेक इमारतों, मस्जिदों, मकबरा आदि का निर्माण कराया। स्थापत्य कला में इस कार्यपद्धति को 'शर्की शैली' कहा जाता है।
शर्की शैली की विशेषताओं में वर्गाकार स्तम्भ एवं छोटी गैलरी के अतिरिक्त मीनारों का अभाव शामिल है। इस काल के प्रमुख निर्माण कार्य हैं- इब्राहीमशाह शर्की द्वारा निर्मित अटाला मस्जिद एवं झंझरी मस्जिद, हुसैन शाह द्वारा बनवाई गई 'जामीं मस्जिद' एवं मुहम्मदशाह द्वारा निर्मित 'लाल दरवाज़ा मस्जिद'।
अटाला मस्जिद का निर्माण कन्नौज के राजा विजयचन्द्र द्वारा बनवाये गये 'अटाला देवी मंदिर' को तोड़कर उसके स्थान पर कराया गया। झंझरी मस्जिद, लाल दरवाज़ा मस्जिद और जामीं मस्जिद का निर्माण अटाला मस्जिद की नकल पर कराया गया, जिनमें हिन्दू शैली का प्रभाव दिखता है।

मुगलकाल

उत्तर प्रदेश में स्थापत्य कला का वास्तविक विकास मुगल सम्राट अकबर और शाहजहां के शासनकाल में हुआ। सल्तनत काल की भांति मुगल काल की स्थापत्य कला भी हिन्दू और इस्लामी कला का
समन्वय थी, यद्यपि अब इसमें काफी निखार आ चुका था।

मुगलकाल में वास्तुकला का केन्द्र आगरा बना। आगरा की वास्तुकला अपनी निम्नलिखित विशेषताओं के चलते अधिक लोकप्रिय हुई-
  1. सफेद संगमरमर पर हीरे-जवाहरात से की गयी जड़ावट, जिसे पच्चीकारी अथवा पित्र-दूरा (Pietra-Dura) कहा जाता है। इसमें पुखराज, यशब सुलेमानी, अश्म लेजुलाइट, सूर्यकान्त, चीनी मिट्टी तथा कार्नेलियन जैसे कीमती पत्थरों को तराश कर संगमरमर में फूल-पत्तियों के रूप में जड़ा गया है।
  2. महलों तथा खास भवनों में बहते पानी का उपयोग, जिससे गर्मी में भी अंदर ठण्डी हवा का प्रवेश होता था।
  3. स्मारकों के निर्माण में समरूपता एवं संतुलन का विशेष ध्यान रखा गया है।
  4. स्मारकों में संगमरमर के अतिरिक्त लाल बलुआ पत्थर का शानदार उपयोग किया गया है। उदाहरण: आगरा का लाल किला एवं फतेहपुर सिकरी के निर्माण।
  5. निर्माण में हिन्दुस्तानी, फारसी एवं इस्लामी प्रभावों का अद्भुत मिश्रण देखा जा सकता है।
  6. स्मारकों में गुंबद, मेहराब, तहखानों के साथ ज्यामितीय डिजाइन एवं छिद्रित जालियों का निर्माण किया गया है।
  7. बाबर ने 1528 ई. में आगरा में ज्यामितीय विधि पर आधारित एक उद्यान का निर्माण कराया था, जिसे ‘आरामबाग’ (रामबाग) अथवा ‘बाग-ए-गुल अफसान’ के नाम से जाना जाता है।
बाबर के ही शासनकाल में मियां मीर बाकी ने अयोध्या में ‘बाबरी मस्जिद’ का निर्माण कराया था, जहां अब भव्य राममंदिर का निर्माण किया जा रहा है।

अकबर

अकबर ने मुगल स्थापत्य कला की वास्तविक शुरुआत करते हुए इसे भव्यता प्रदान की। उसने निर्माण कार्यों पर अधिक धन का अपव्यय न करते हुए ऐसे भवनों का निर्माण कराया जो अपनी सादगी में ही अधिक सुंदर दिखते हैं। अकबर के निर्माण कार्यों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं-आगरा का किला एवं फतेहपुर सिकरी।
आगरा का किला-अकबर ने 1566 ई. में अपने वास्तुकार कासिम खां की निगरानी में आगरा के लाल किला का निर्माण आरम्भ कराया। यमुना तट पर लगभग डेढ़ मील क्षेत्र में फैला यह किला 35 लाख रुपये खर्च कर 15 वर्षों में बनकर तैयार हुआ। इसमें दो द्वार हैं- पश्चिम में 'दिल्ली द्वार' और पूरब में 'अमर सिंह द्वार'।
आगरा के किला की बनावट राजा मानसिंह के ग्वालियर के किले से प्रेरित बतायी जाती है।
आगरा के बाद अकबर ने 'इलाहाबाद का किला' का निर्माण कराया।

फतेहपुर सीकरी
अकबर के स्थापत्य कला का सुन्दरतम् प्रयोग आगरा से लगभग 40 किमी. दूर पश्चिम में स्थित फतेहपुर सीकरी में देखने को मिलता है। इस नगर की स्थापना अकबर ने शेख सलीम चिश्ती के सम्मान में 'सीकरी' नाम से की। गुजरात विजय के पश्चात उसने इस नगर का नाम बदलकर 'फतेहपुर सीकरी' करते हुए इसे मुगल साम्राज्य की राजधानी बनाया। वास्तुकार बहाउद्दीन के निर्देशन में इस नगर का निर्माण 1571 ई. में आरम्भ होकर 1585 ई. में पूर्ण हुआ।
फतेहपुर सीकरी की सभी इमारतों में लाल बलुआ पत्थर और परंपरागत शहतीर निर्माण पद्धति का प्रयोग किया गया है। स्तम्भों, ताकों और टाइल्स आदि का निर्माण स्थानीय पत्थरों से किया गया है, जिन्हें बिना गारे (Mortar) के जोड़ा गया है।

फतेहपुर सीकरी के भीतर के प्रमुख निर्माण कार्य-
  • बुलंद दरवाजा- गुजरात विजय के उपलक्ष्य में निर्मित यह इमारत भूमि से 176 फीट ऊँची है। दरवाजा की ऊँचाई 134 फीट है। इसे लाल और पीले बलुआ पत्थर से बनाया गया है। मेहराबों के निर्माण में सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है।
  • सलीम चिश्ती का मकबरा- नगर के उत्तर-पश्चिम कोने में स्थित जामा मस्जिद के बरामदे में शेख सलीम चिश्ती का मकबरा है। लाल और बलुआ पत्थर से निर्मित इस वर्गाकार मकबरे में संगमरमर का काम जहांगीर ने कराया। सीपियों से बने स्तंभ और नक्काशी किए हुए जाली के पर्दे इसकी मुख्य विशेषताएं हैं।
  • दीवान-ए-आम एवं दीवान-ए-खास- अकबर के ये दो प्रशासनिक भवन थे। दीवान-ए-आम एक बड़ा आयताकार कक्ष है, जो चारों तरफ से स्तम्भों से घिरा है। यहां अकबर के लिए एक सिंहासन बना है, जिस पर बैठकर बादशाह अपने मंत्रियों से विचार-विमर्श करता था। दीवान-ए-खास एक आयताकार सभा कक्ष है, जिसमें बाहर की ओर से दो मंजिलें हैं। इसके प्रत्येक कोने में खंभों पर गुंबदनुमा छतरी लगी हुई है। यहां अकबर का चर्चित इबादतखाना है, जहां प्रत्येक गुरुवार को वह विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों से चर्चा किया करता था।
  • जोधाबाई का महल- यह फतेहपुर सीकरी का सबसे विशाल और भव्य भवन है। इसके निर्माण में गुजरात शैली का प्रभाव दिखता है। मुख्य भवन अंदर की ओर है और सभी द्वार एक आंगन में खुलते हैं। भवन के ऊपरी मंजिल में उत्तर में ग्रीष्म विलास और दक्षिण में शरद विलास का निर्माण किया गया है। जोधाबाई के महल के समीप मरियम का महल है, जिसके निर्माण पर फारसी कला का प्रभाव दिखता है।
  • पंचमहल- यह पांच मंजिला अनूठा भवन है। इसमें ऊपर चढ़ने के साथ ही मंजिलों का आकार छोटा होता जाता है। सबसे ऊपर एक गुम्बदनुमा छतरी है। इसमें जितने स्तम्भ बने हैं, सभी एक दूसरे से भिन्न हैं। इनकी सजावट में कलश, घण्टियां और फूल-पत्तियों की आकृतियां बनायी गयी हैं।
  • जामा मस्जिद- इसका निर्माण मक्का की प्रसिद्ध मस्जिद से प्रेरित माना जाता है। इसके मध्य में एक बड़ा बरामदा, तीन तरफ से तोरण पथ (Arcades) तथा ऊपर गुम्बदनुमा छत है। मस्जिद का आम प्रवेश द्वार पूरब की ओर है।
  • अकबर ने 1582 ई. में इसी जामा मस्जिद से ‘दीन-ए-इलाही’ की घोषणा की थी।
  • हिरण मीनार- अकबर ने अपने प्रिय हाथी ‘हिरण’ की स्मृति में फतेहपुर सीकरी में ‘हिरण मीनार’ का निर्माण कराया था।

जहांगीर

जहांगीर के शासनकाल में स्थापत्य कला का विकास धीमा रहा। इस अवधि में वर्तमान उत्तर प्रदेश क्षेत्र में दो प्रमुख इमारतों का निर्माण हुआ-
  1. अकबर का मकबरा
  2. एत्मादुद्दौला का मकबरा

अकबर का मकबरा
आगरा से लगभग 8 किमी. दूर दिल्ली मार्ग पर सिकन्दरा में स्थित है। पिरामिड के आकार वाले इस पांच मंजिला मकबरा की योजना अकबर ने स्वयं तैयार की थी। अकबर ने इसका निर्माण भी आरम्भ करा दिया था, किंतु उसकी मृत्यु के बाद जहांगीर ने थोड़ा परिवर्तन कर इसे 1612 ई. में पूर्ण कराया। मकबरे का भवन चौकोर है, जो चारों ओर से बागान से घिरा हुआ है। नीचे के चार मंजिलों का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से हुआ है, जबकि सबसे ऊपरी मंजिल का निर्माण जहांगीर ने संगमरमर से कराया है। प्रत्येक दिशा की चहारदीवारी के मध्य भाग में प्रवेश द्वार बने हुए हैं, किंतु परिसर में सिर्फ दक्षिण की ओर से प्रवेश किया जा सकता है। अन्य प्रवेश द्वार दिखावटी हैं। मकबरे की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता इसका गुम्बदविहीन होना है। इसके अलंकरण में परम्परागत फूल-पत्ती के बेलबूटों के अतिरिक्त हाथी, हंस, कमल, स्वास्तिक और चक्र का भी प्रयोग हुआ है।

एत्मादुद्दौला का मकबरा
जहांगीर के शासनकाल की दूसरी महत्त्वपूर्ण इमारत आगरा में स्थित एत्मादुद्दौला का मकबरा है। इसका निर्माण नूरजहां ने 1626 ई. में अपने पिता एत्मादुद्दौला (मिर्जा ग्यासबेग) की कब्र पर कराया। यह मुगलकाल की पूर्ण संगमरमर से बनी पहली इमारत है। इसी इमारत में पहली बार पच्चीकारी की 'पित्रदूरा' शैली का प्रयोग किया गया है।

शाहजहां

मुगल स्थापत्य कला की दृष्टि से शाहजहां का शासनकाल 'स्वर्ण काल' माना जाता है। इसके निर्माण कार्यों में संगमरमर का बड़े पैमाने पर कलात्मक उपयोग किया गया। वर्तमान उत्तर प्रदेश क्षेत्र में इसके निर्माण कार्यों को दो भागों में बांटा जा सकता है-
  1. आगरा के किले के भीतर का निर्माण
  2. किले के बाहर का निर्माण (ताजमहल)
आगरा के किले के भीतर शाहजहां ने दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, मोती मस्जिद, मुसम्मन बुर्ज, खासमहल, शीशमहल, नगीना मस्जिद, अंगूरी बाग तथा नहर-ए-बहिश्त आदि का निर्माण कराये हैं।
  • दीवान-ए-आम शाहजहां काल का प्रथम भवन है, जिसमें संगमरमर का प्रयोग किया गया। संगमरमर जोधपुर के 'मकराना' से लाया जाता था। इस भवन में शाहजहां के बैठने के लिए 'तख्त-ए-ताउस' (मयूर सिंहासन) बनाया गया था।
  • सफेद संगमरमर से बने आयताकार भवन दीवान-ए-खास में राजपरिवार के अतिरिक्त सिर्फ अमीरों और उच्चाधिकारियों को प्रवेश की अनुमति थी।
  • उत्कृष्ट सफेद संगमरमर से बनी मोती मस्जिद आगरा के किले की सर्वश्रेष्ठ संरचना है। पर्सी ब्राउन के शब्दों में, 'मोती मस्जिद मुगल वास्तुकला की सर्वोत्तम रचना है।'
  • मुसम्मन बुर्ज एक छः मंजिला भवन था, जहां बैठकर शाही परिवार की स्त्रियां पशुओं का युद्ध देखा करती थीं। औरंगजेब द्वारा कैद किये जाने के बाद शाहजहां यहीं से ताजमहल को निहारा करता था।
  • आगरा के किले में जामा मस्जिद का निर्माण शाहजहां की ज्येष्ठ पुत्री जहांआरा बेगम ने 1648 ई. में कराया।

ताजमहल
शाहजहां की सर्वोत्कृष्ट रचना 'ताजमहल' विश्व की श्रेष्ठतम इमारतों में स्थान रखती है। यमुना तट पर इसका निर्माण शाहजहां ने अपनी प्रिय पत्नी अर्जुमंद बानो बेगम (मुमताज महल) की याद में कराया था। ताजमहल की वास्तुयोजना (Design) उस्ताद अहमद लाहौरी ने तैयार की थी, जिसे शाहजहां ने 'नादिर-उल-अस्र' की उपाधि प्रदान की थी। निर्माण कार्य 1632 ई. में आरम्भ होकर 1643 ई. में पूर्ण हुआ। भूमि से 22 फीट ऊँचे चबूतरे पर निर्मित 108 फीट ऊँची इस इमारत का निर्माण मकराना (जोधपुर) के विशेष खदान से लाये गये संगमरमर से किया गया। चबूतरे के चारों कोनों पर चार वृत्ताकार मीनारें हैं। इमारत के शीर्ष पर खूबसूरत गुम्बद बने हैं, जिनके ऊपर उलटा कमल-कलश स्थित है। मध्य के नीचे भाग में मुमताज महल और शाहजहां की कब्र है, जबकि उसके ठीक ऊपरी भाग में उनकी नकली कब्र बनायी गयी है।
ताजमहल को 1983 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया। इस सूची में शामिल होने वाला यह भारत का प्रथम स्मारक है।

औरंगजेब

शाहजहां के विपरीत उसके पुत्र औरंगजेब की स्थापत्य में कोई रुचि नहीं थी। वर्तमान उत्तर प्रदेश क्षेत्र में उसका कोई निर्माण कार्य प्राप्त नहीं होता।

आधुनिक काल में स्थापत्य

उत्तर प्रदेश की आधुनिक स्थापत्य कला मुख्यतः अवध के नवाबों और अंग्रेजों पर केन्द्रित थी। इस युग के स्थापत्य में मुगलकालीन विचारधारा तथा आधुनिकता की सोच का सम्मिश्रण दिखाई देता है। लाल बलुआ
पत्थर अथवा संगमरमर की जगह 'गारा' (Mortar) का प्रयोग बढ़ गया।
इस काल की प्रमुख इमारतें इस प्रकार हैं-

असफुद्दौला का इमामबाड़ा
अवध के नवाब असफुद्दौला (1775-1797 ई.) द्वारा 1784 ई. में बनवायी गयी यह गुंबदाकार इमारत सत्रहवीं शताब्दी के स्थापत्य का अद्भुत नमूना है। लखनऊ में गोमती नदी के किनारे गारे की मदद और ईंटों के जाल से निर्मित इस इमारत को बड़ा इमामबाड़ा भी कहते हैं। इसके निर्माण में लोहे और सीमेंट का बिल्कुल प्रयोग नहीं हुआ है। विख्यात 'भूल भुलैया' इसका एक भाग है।

छोटा इमामबाड़ा
लखनऊ स्थित छोटा इमामबाड़ा का निर्माण 1837 ई. में नवाब मोहम्मद अली शाह ने करवाया था। इसकी चोटी पर सुनहरा गुम्बद है। यहां मोहम्मद अलीशाह का मकबरा है।

रूमी दरवाजा
अवध वास्तुकला के प्रतीक इस दरवाजे का निर्माण 1783 ई. में नवाब असफुद्दौला ने कराया था। भूमि से 62 फीट ऊँचे इस दरवाजे का निर्माण बड़े इमामबाड़ा की तर्ज पर अकाल के दौरान लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार देने के लिए किया गया था। इसे तुर्किश गेट भी कहते हैं।
महोबा के मकराबाई गाँव का मकरबाई मंदिर एक के स्थान पर तीन गर्भगृह होने के कारण अद्वितीय है। जैन तीर्थंकरों के आंकड़े एक पहाड़ी की चोटी पर एक पैनल में उकेरे गए हैं। पहाड़ियों पर हिंदू देवी-देवताओं की बड़े आकार की आकृतियाँ भी उकेरी गई हैं। महोबा के कुलपहाड़ में 20 फीट x 20 फीट x 20 फीट आकार का 10वीं शताब्दी का यज्ञ मंडप स्थित है। महोबा में कई चंदेल संरचनाओं और कई चंदेल युग के जल निकायों के खंडहर भी मौजूद हैं।

हिन्दू वास्तुकला
आधुनिक काल में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ।
इनमें सर्वप्रमुख नाम है- वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर। यह मंदिर काशी में प्राचीन काल से मौजूद है, लेकिन तुर्क आक्रमण के बाद मुहम्मद गोरी और फिर जौनपुर के शर्की सुल्तान महमूद शाह द्वारा इसे तोड़ दिया गया था। 1585 ई. में राजा टोडरमल द्वारा मंदिर भवन का पुनर्निर्माण कराया गया, किंतु 1669 ई. में औरंगजेब ने इसे पुनः तोड़ दिया। इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने 1777-80 ई. में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। सन् 1839 ई. में लाहौर के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर पर सोने की चादर चढ़वायी।

इण्डो यूरोपियन वास्तुकला
1947 ई. से पूर्व प्रदेश में अंग्रेजों द्वारा अनेक इमारतों का निर्माण कराया गया। इनमें लखनऊ स्थित प्रदेश के विधान भवन (काउंसिल हाऊस) का नाम मुख्य है। इस भवन के मुख्य वास्तुकार- सर स्वीनन जेकब एवं हीरा सिंह थे। सन् 1922 से 1928 ई. के मध्य निर्मित इस दुमंजिला अर्धचन्द्राकार संरचना के सामने का हिस्सा चुनार से लाया गया हल्के भूरे बलुआ पत्थरों से बना है। अर्धचन्द्र के मध्य में एक छतरीनुमा बड़ा गुम्बद है। सामने त्रि-धनुषाकार द्वार पर ऊपर की ओर संगमरमर पर उभरा हुआ राजकीय चिन्ह है। 1937 ई. में मुख्य वास्तुकार ए.एल. मोर्टियर के निर्देशन में विधान भवन का विस्तारीकरण किया गया।

उत्तर प्रदेश में चंदेल स्थापत्य
चंदेल शासकों द्वारा स्थापत्य को काफी संरक्षण प्रदान किया गया। उत्तर प्रदेश में उनकी राजधानी महोबा में किये गये स्थापत्य; उनके निर्माण कार्यों के रूप में अभी तक जीवित हैं।
महोबा की इमारतों का स्थापत्य खजुराहो शैली के अनुरूप है। इनमें स्थानीय रूप से उपलब्ध ग्रेनाइट से निर्माण कार्य हुआ है। चंदेलों ने कई झीलें, मंदिर और गिरि-दुर्गों का निर्माण कराया।
आरम्भिक चंदेल शासक राहिला द्वारा 'राहिला सागर झील' का निर्माण कराया गया। राहिला सागर के किनारे एक 9वीं शताब्दी में निर्मित सूर्य मन्दिर स्थित है, जिसे राहिला मंदिर भी कहते हैं। यह ग्रेनाइट से बना
हुआ है और इसके गर्भ गृह में सूर्य देव की एक सुसज्जित प्रतिमा है। इसके स्थापत्य और 13वीं शताब्दी के कोणार्क सूर्य मंदिर में समानताएं हैं। 11वीं शताब्दी के दौरान विजयपाल और कीर्तिवर्मन द्वारा क्रमशः
विजय सागर झील और कीर्ति सागर झील का निर्माण कराया गया। मदन वर्मन ने 12वीं शताब्दी में मदन सागर नामक विशाल जलाशय बनवाया। इस जलाशय में एक द्वीप पर खखरा मठ नामक एक शिव मंदिर बना हुआ है।

उत्तर प्रदेश में पुरातत्व, संग्रहालय एवं अभिलेखागार

पुरातत्व

पुरातत्व का शाब्दिक अर्थ है- 'पुरातन ज्ञान'। इस शब्द का प्रयोग सामान्यतः दो अर्थों में किया जाता है-
  • मानव के अतीत से संबंधित भौतिक अवशेषों का अध्ययन।
  • मानव के प्रागैतिहासिक काल से संबंधित पुरावशेषों का अध्ययन।
जब हम भौतिक अवशेषों, पुरास्थल के उत्खनन से प्राप्त सामग्री अथवा स्मारक स्थल आदि के माध्यम से प्राचीन तथा तत्कालीन मानव इतिहास का अध्ययन करते हैं, तो इसे पुरातत्व कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रदेश की पुरातात्विक सामग्री, स्मारकों तथा राज्य में पाये जाने वाले प्राचीन पुरास्थलों (बेलन घाटी, मिर्जापुर, सरायनाहरराय, दमदमा, कोलडिहवा, चौपानी माण्डों, लहुरादेव आदि) को संरक्षित करने के उद्देश्य से डा. संपूर्णानन्द की अध्यक्षता में गठित समिति की अनुशंसा पर वर्ष 1951 में राज्य पुरातत्व विभाग की स्थापना लखनऊ में की गयी। इसके प्रमुख क्षेत्रीय कार्यालय झांसी, आगरा, गोरखपुर, वाराणसी तथा प्रयागराज में स्थापित किये गये हैं।
उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा समय-समय पर संचालित सर्वेक्षण अभियानों के माध्यम से प्रदेश के विभिन्न भागों से अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए हैं।
सोनभद्र एवं मिर्जापुर से 100 से अधिक चित्रित शैलाश्रय एवं शैल चित्र प्राप्त हुए हैं, जो प्रदेश की प्राचीन संस्कृतिक एवं इतिहास के अध्ययन को नया आयाम देते हैं।

महत्व
राज्य पुरातत्व विभाग के प्रयास से राज्य में कई अन्य पुरातत्व स्थल, जैसे सोनभद्र में राजानल का टीला, लूसा, लेखहिया, कानपुर देहात में काटर, मूसानगर आदि पुरातात्विक स्थल प्रकाश में आये हैं।
उत्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग ने अपने अभियान में उत्तरी विन्ध्य क्षेत्र से लगभग 150 प्राचीन चित्रित शैलाश्रय तथा बेलनघाटी एवं यमुना घाटी से अति के प्राचीन मानव बस्तियों के अवशेष प्राप्त किए हैं।
मध्य गंगाघाटी के सरयूपार क्षेत्र, वर्तमान संतकबीर नगर में स्थित लहुरादेव से लगभग 9000 ई.पू. के धान की खेती के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
प्रदेश के चंदौली जिले से मलहर उत्खनन तथा राजानल (सोनभद्र) से लोहे के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
उत्तर प्रदेश में ही एटा के निकट अतरंजीखेड़ा से भारत में लोहे के प्रयोग के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। इस स्थल का समय उत्तर वैदिक कालीन (1000-600 ई.पू.) है।
पुरातात्विक सर्वेक्षणों में उत्तर प्रदेश से अनेक आद्य ऐतिहासिक कालीन (प्रोटोहिस्टोरिकल) स्थल, प्राचीन आवासीय स्थल, मूर्तियां तथा पात्र के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा किये गये प्रमुख कार्य

अनुरक्षण कार्य
वार्षिक अनुरक्षण कार्य के अन्तर्गत शुक्ल तालाब कानपुर, गुप्तार घाट मंदिर अयोध्या, गोवर्धन की छतरिया मथुरा, मगहर इत्यादि ऐतिहासिक स्थलों एवं स्मारकों के रसायनिक संरक्षण का उपाय किया गया है।
सई नदी के किनारे स्थित प्रतापगढ़ जिले में मुस्तफाबाद से भगतपुर तक ग्राम स्तरीय सर्वेक्षण कराये गये।
गोण्डा जिले की तरबगंज तहसील के नवाबगंज गांव में ग्राम स्तरीय सर्वेक्षण किये गये, जहाँ से 800 ई. पू., उत्तर मध्यकाल के मृदभाण्ड, स्त्री मृण्मूर्तियां, आदि के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
बांदा के बबेरू तहसील में ग्राम स्तरीय सर्वेक्षण कराया गया, जहाँ 40 से अधिक पुरातात्विक अवशेष स्थल प्रकाश में आये हैं।

अयोध्या का श्री राम मंदिर

मंदिर निर्माण की नागर शैली का अप्रतिम उदाहरण अयोध्या के राम मंदिर में 22 जनवरी, 2024 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी एवं मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में रामलला की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गयी।
राम मंदिर का स्वरुप तीन मंजिला है, जिसमें प्रथम मंजिल का कार्य पूर्ण किया जा चुका है। प्रत्येक मंजिल 20 फुट ऊँची है। परिसर में 392 स्तंभ एवं 44 दरवाजे हैं।
  • मंदिर में राम दरबार प्रथम मंजिल पर है। इसके निकट पांच मंडप (हॉल) निर्मित किए गये हैं- सभा मण्डप, प्रार्थना मण्डप, कीर्तन मण्डप, नृत्य मण्डप तथा रंग मण्डप। रामलला की मूर्ति गर्भगृह में स्थापित की गयी है।
  • 'पंचायतन शैली' के अनुरूप मंदिर के चारों कोनों पर सूर्य, भगवती, शिव एवं गणेश के मंदिर स्थापित किये गये हैं।
  • दीवारों और खंभों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां सुसज्जित की गयी हैं। मंदिर के उत्तरी और दक्षिणी दिशा में क्रमशः अन्नपूर्णा एवं हनुमान मंदिर स्थापित किये गये हैं।
  • मंदिर परिसर में महर्षि वाल्मिकी, वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य, शबरी तथा निषाद राज आदि के मंदिर स्थापित किये जा रहे हैं। परिसर में 'जटायु' की प्रतिमा स्थापित की गयी है।
  • मंदिर निर्माण हेतु राजस्थान के मकराना संगमरमर एवं गुलाबी बलुआ पत्थर, तेलंगाना और तमिलनाडु के ग्रेनाइट पत्थर तथा मध्यप्रदेश स्थित मंडला के रंगीन संगमरमर का उपयोग किया गया है।
  • मंदिर के 44 दरवाजों के निर्माण में महाराष्ट्र स्थित बलारशाह एवं अल्लापल्ली वन क्षेत्रों से लायी गयी सागौन लकड़ी का प्रयोग किया गया है। चौदह दरवाजों पर सोना चढ़ाने का कार्य किया जा रहा है।
  • परिसर को आकाशीय बिजली से बचाने हेतु मंदिर के ऊपर 200 KA लाइट अरेस्टर लगाने का कार्य किया जा रहा है।
  • मंदिर निर्माण में 'रामशिला' ईंटों, नेपाल की गंडकी नदी से लाये गये शालिग्राम शिलाओं, ताम्र एवं स्वर्ण प्लेटों तथा अष्टधातु का प्रयोग किया गया है।
  • संरचना निर्माण में लोहा का प्रयोग लगभग नगण्य रखा गया है।
  • राममंदिर निर्माण के मुख्य वास्तुकार चंद्रकांत भाई सोमपुरा हैं। इस कार्य में उनके दो पुत्रों निखिल सोमपुरा एवं आशीष सोमपुरा का विशेष योगदान रहा।
  • गर्भगृह में स्थापित 51इंच ऊँची 5 वर्षीय बालस्वरूप रामलला की मूर्ति मैसूर (कर्नाटक) की कृष्ण शिला से अरुण योगीराज द्वारा तैयार की गयी है। मूर्ति का वजन लगभग 200 किलो है। मूर्ति के दोनों तरफ विष्णु के दस अवतारों- मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध एवं कल्कि अवतार को उत्कीर्ण किया गया है।
  • मूर्ति का सिर प्रभामण्डल से आच्छादित है, जिसके चारों तरफ ओम, चक्र शंख, गदा एवं स्वास्तिक उत्कीर्ण किया गया है।
  • मूर्ति के सिर के ठीक ऊपर सूर्य देव को अंकित किया गया है, जो श्रीराम के सूर्यवंशीय होने का प्रतीक है।

उत्तर प्रदेश की वास्तुकला: प्रमुख विशेषताएं

उत्तर प्रदेश की वास्तुकला विभिन्न संस्कृतियों और शैलियों के मिश्रण का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिससे क्षेत्रीय प्राचीन संवृद्धि, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का पता चलता है।
यह हिन्दू, बौद्ध, इंडो-इस्लामिक और इंडो-यूरोपीय शैलियों का अद्भुत मिश्रण है। यहां के प्राचीन एवं मध्यकालीन भवनों, स्मारकों, स्तूपों, विहार, किले, महलों, मस्जिदों, मकबरे तथा अन्य सामुदायिक निर्माण में मिश्रित कला शैली की उपस्थिति प्राप्त होती है।

हिन्दू वास्तुकला
उत्तर प्रदेश के हिन्दू मंदिरों में नागर शैली का विशेष प्रभाव है, जिसमें पंचायतन शैली, विस्तृत शिखर और जटिल नक्काशी प्रदर्शित होती है।
राज्य में देश का प्रथम मंदिर (देवगढ़ का दशावतार मंदिर) प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त यहां कई प्राचीन मंदिर और मठ हैं, जो हिन्दू धर्म के महत्व को उजागर करते हैं।
यहां हिन्दू मंदिरों में एक विशेष प्रकार के कलश की डिजाइन प्राप्त होती है, जिससे विशिष्ट धार्मिक महत्व का प्रदर्शन होता है।
मंदिरों एवं अन्य भवनों की दीवारों पर शास्त्रों और उनमें उल्लेखित कथाओं का चित्रण प्राप्त होता है, जो स्थानीय वास्तुकला की अन्य विशिष्टता है।

बौद्ध वास्तुकला
उत्तर प्रदेश में अनेक प्राचीन बौद्ध स्तूप और विहार विद्यमान हैं। कुशीनगर, सारनाथ, कपिलवस्तु समेत अनेक स्थल इसके केन्द्र हैं। इन क्षेत्र के सामुदायिक संरचनाओं में बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट दिखायी देता है।

इंडो-इस्लामिक वास्तुकला
मुगल काल के दौरान उत्तर प्रदेश में इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का विकास हुआ, जिसमें ताजमहल, आगरा का किला और फतेहपुर सीकरी जैसे स्मारकों का निर्माण कराया गया।

इंडो-यूरोपीय वास्तुकला
ब्रिटिश शासन के दौरान उत्तर प्रदेश में इंडो-यूरोपीय वास्तुकला का विकास हुआ। इसका एक अच्छा उदाहरण प्रयागराज में ऑल सेंट्स कैथेड्रल जैसे चर्च के रूप में देखा जा सकता है।

महत्वपूर्ण स्मारक
  • ताजमहल- यह विश्व के सात अजूबों में से एक है। इसे इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
  • आगरा का किला- यह महत्वपूर्ण मुगलकालीन स्मारक है। इसे वास्तुकला और तत्कालीन इतिहास के पन्नों का शानदार मिश्रण माना जाता है।
  • फतेहपुर सीकरी- यह एक प्राचीन शहर है, जिसे मुगल बादशाह अकबर ने सन् 1571 में बसाया था। इसे इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।
  • प्रयागराज का किला- यह एक ऐतिहासिक किला है, जिसका निर्माण मुगल शासक अकबर द्वारा कराया गया था।
  • प्रयागराज का ऑल सेंट्स कैथेड्रल- यह इटालियन वास्तुकला से प्रभावित गॉथिक शैली का चर्च है, जो ब्रिटिश शासन की अवधि में बनाया गया था

उत्तर प्रदेश में राजकीय संग्रहालय

  • संग्रहालय ऐसा संस्थान होता है, जहां कलात्मक, ऐतिहासिक पुरातात्विक एवं साहित्यिक रूप से महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित एवं संरक्षित करने का कार्य किया जाता है।
  • अधिकांश संग्रहालय एक निश्चित समय तक के लिए आम जनता के लिए उपलब्ध होते हैं, किन्तु कुछ संग्रहालय मात्र शोधकर्ताओं एवं विशेषज्ञों के लिए कार्य करते हैं।
  • संग्रहालय के माध्यम से कला, विज्ञान, प्राकृतिक इतिहास, स्थानीय इतिहास आदि को संरक्षण प्रदान किया जाता है।

महत्व
  • राजकीय संग्रहालय राज्य में पर्यटन विकास के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यह देशज एवं विदेशज पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
  • आधुनिक संग्रहालयों में ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों को संरक्षित किया जाता है।
  • यह ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक शोधकर्ताओं को शोध के लिए आवश्यक समाग्री उपलब्ध कराते हैं।

प्रमुख राजकीय संग्रहालय

राजकीय संग्रहालय, लखनऊ

  • यह प्रदेश का सबसे पुरातन संग्रहालय है। इसकी स्थापना 1863 में हुई थी।
  • इस संग्रहालय में अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामाग्री, जैसे- कांस्य युगीन संस्कृति एवं सिन्धु घाटी सभ्यता काल की मुहरें, ईंट, प्राचीन अभिलेख, गान्धार कला की मूर्तियां, प्राचीन मुद्राएं, चित्रकला आदि को संरक्षित किया गया है।

इलाहाबाद संग्रहालय, प्रयागराज

  • यह राष्ट्रीय स्तर का संग्रहालय है, जो अपने समृद्ध संग्रहण तथा विशिष्ट कलाओं के संरक्षण हेतु प्रसिद्ध है।
  • यह संस्कृति मंत्रालय द्वारा वित्त-पोषित है। यह प्रदेश का प्रमुख शोध संस्थान है, जो पुरातत्वविदों, इतिहासकारों तथा शैक्षणिक शोधकर्ताओं को ऐतिहासिक आधार प्रदान करता है।
  • इसमें प्रस्तर निर्मित अनेक मूर्तियां, महात्मा गाँधी के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण तस्वीरें एवं हस्तलिपि, नेहरू से जुड़े विभिन्न संग्रहण प्राप्त होते हैं।
  • प्रयागराज संग्रहालय को वर्ष 1931 में स्थापित किया गया था। इसमें 25,000 से अधिक महत्वपूर्ण पुस्तकें संरक्षित हैं।

कानपुर संग्रहालय

  • कानपुर संग्रहालय की स्थापना 1999 में की गयी। यह फूल बाग कानपुर में स्थित है।
  • जब यूरोपीय कम्पनियाँ कानपुर में व्यवस्थित हो गयीं तब उन्होंने यूरोपीय शैली में इस संग्रहालय की स्थापना की।
  • स्वतंत्रता से पूर्व इस संग्रहालय का प्रयोग ब्रिटिश सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए किया जाता था।

राजकीय संग्रहालय, मथुरा

  • मथुरा संग्रहालय को 1874 में मथुरा के तत्कालीन कलेक्टर द्वारा स्थापित किया गया था। पहले इसे 'कर्जन संग्रहालय' नाम से जाना जाता था।
  • यह संग्रहालय मथुरा कला की विश्व प्रसिद्ध मूर्तियों संरक्षण के हेतु जाना जाता है।
  • इसमें कुषाणयुगीन एवं गुप्तकालीन संस्कृति से जुड़ी विविध कलाएं एवं अवशेष संग्रहित हैं।
  • कनिष्क की खड़ी प्रतिमा, खड़ी अवस्था में बुद्ध की मूर्ति, जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की मूर्ति के अतिरिक्त गुप्त युगीन यक्ष एवं यक्षणियों की मूर्तियां यहां संरक्षित हैं।

सारनाथ संग्रहालय

  • सारनाथ संग्रहालय को वर्ष 1910 में वाराणसी के निकट सारनाथ में स्थापित किया गया।
  • इसमें बुद्ध एवं उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं को प्रदर्शित करती प्रतिमाएं, बौद्ध कला, अशोक द्वारा स्थापित चार मुख वाले शेर की मूर्ति, बुद्ध की खड़ी प्रतिमा, बुद्ध का प्रथम उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) इत्यादि का संग्रहालय किया गया है।

राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर

  • गोरखपुर बौद्ध परिपथ का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बौद्ध धर्म के इतिहास एवं संस्कृति से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्यों एवं उपकरणों को संग्रहित करने के उद्देश्य से वर्ष 1986-87 में राजकीय बौद्ध संग्रहालय की स्थापना की गयी। वर्तमान में यह रामगढ़ताल परियोजना के अंतर्गत स्थित है।
  • संग्रहालय में 4 वीथिकाएं हैं। प्रथम वीथिका राहुल सांस्कृत्यायन के नाम पर है। यहां बौद्ध धर्म से संबंधित कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया है।
  • द्वितीय वीथिका में बुद्ध की विविध मुद्राओं, यथा धर्मचक्र प्रवर्तन, अभय मुद्रा, ध्यान मुद्रा, भू-स्पर्श मुद्रा एवं महापरिनिर्वाण मुद्रा का प्रदर्शन किया गया है।
  • तृतीय वीथिका हिन्दू मूर्तियों से संबंधित है। यहां नृत्यरत्त अष्टभुजी गणेश, त्रिशूलधारी शिव, शेषशायी विष्णु, वाराही, नवग्रह एवं कुषाण कालीन कुबेर की मूर्तियां संग्रहित एवं प्रदर्शित की गयी हैं।
  • चतुर्थ वीथिका मृण्मूर्ति कला से संबंधित है। यहां प्रदर्शित कलाकृतियों में शिशु का आहार करती हुई डाकिन, पशु सिरयुक्त मोढ़े पर बैठी मात्रिका आदि विशिष्ट हैं।
  • संग्रहालय में एक संदर्भ पुस्तकालय भी है, जिसमें भारतीय इतिहास, पुरातत्व, कला एवं बौद्धधर्म से संबंधित लगभग 1,200 पुस्तकें संग्रहित हैं।
  • संग्रहालय में प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के साथ-साथ प्रस्तर, मृण एवं धातु मूर्तियां, सिक्के, लघुचित्र, हाथी दांत एवं हस्तलिखित ग्रन्थ आदि संकलित हैं, जिनकी कुल संख्या वर्तमान में 3,471 है।

भारत कला भवन संग्रहालय, वाराणसी

  • भारत कला भवन की स्थापना सन् 1920 में प्रख्यात कलाविद् एवं पद्मविभूषण रायकृष्ण दास द्वारा की गयी। आरंभ में यह गोदौलिया में स्थित था, जिसे 1929 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा में स्थानांतरित कर दिया गया। वर्तमान में यह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी प्रांगण में स्थित है। यहां लगभग समस्त शैलियों के 12,000 चित्रों का विशाल संग्रह है। भारत भवन में प्रागैतिहासिक हड़प्पाकालीन सामग्री, मूर्तियां, लघुचित्र, सिक्के, टेराकोटा, मुहर, मिट्टी के बर्तन, अभिलेखीय दस्तावेज आदि संग्रहित हैं।
  • यह लघुचित्रों के संग्रह में न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी विख्यात है।

रानी महल संग्रहालय, झांसी

  • झांसी स्थित इस संग्रहालय में देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, 1857 में उपयोग किए गए हथियारों, शस्त्रों और गोला बारूद आदि का प्रदर्शन किया गया है। रानी लक्ष्मीबाई और उनके सहयोगियों द्वारा प्रयुक्त हथियार यहां आने वाले शोधार्थियों एवं पर्यटकों को विशेष आकर्षित करतें है।
  • यहां चांदपुर, दुद्धी, बरूआ सागर तथा देवगढ़ से एकत्र हिन्दू एवं जैन वास्तुकला संग्रहित एवं प्रदर्शित है।
  • संग्रहालय में चंदेलवंश के राजाओं के जीवन शैली से जुड़ी वस्तुओं का भव्य प्रदर्शन किया गया।

प्रदेश के 18 प्राचीन स्थल संरक्षित घोषित
उत्तर प्रदेश के पुरातत्व विभाग एवं पर्यटन-संस्कृति मंत्रालय में प्रदेश के 18 प्राचीन एवं ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को संरक्षित घोषित किया है।
प्रदेश सरकार द्वारा इन सभी स्थलों को एशियंट मान्यूमेंट्स प्रिजर्वेशन एक्ट-1904 की धारा-3 के अधीन संरक्षित घोषित किया गया है। यह स्थल प्रदेश के 6 जिलों में स्थित हैं।

राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित घोषित 18 स्मारक/स्थल इस प्रकार हैं-
  • झांसी जनपद- शिवालय, प्राचीन कोल्हू कुश मढ़िया, चंपतराय का महल, उत्तर मध्यकालीन किला बंजारों का मंदिर, बेर, पिसनारी दायी मड, पठामढ़ी, टहरौली का किला, दिगारा गढ़ी तथा राम जानकी मंदिर।
  • संतकबीर नगर जनपद- कोट टीला
  • प्रयागराज जनपद- रानी का तालाब, इष्टिका निर्मित प्राचीन विष्णु मंदिर, गंगोला शिवाला।
  • महोबा- शिव तांडव, खंकरा मठ।
  • फर्रुखाबाद जनपद- प्राचीन शिव मंदिर।
  • इटावा- शिव मंदिर (टिक्सी टेम्पल)।

राजकीय बौद्ध संग्रहालय, कुशीनगर

  • यह संग्रहालय उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा संरक्षित है।
  • इसमें बौद्ध धर्म से जुड़ी विभिन्न सामग्री के साथ जैन स्थल पावा से प्राप्त अनेक पुरावशेष को भी संरक्षित किया गया है।
  • इस संग्रहालय की स्थापना 1995 में की गयी।

स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय, मेरठ

  • इस संग्रहालय में उत्तर प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित विभिन्न वस्तुओं एवं सेनानियों के महत्वपूर्ण योगदान से जुड़े उपकरणों एवं अन्य साक्ष्यों को संरक्षित किया गया है।
  • राज्य सरकार द्वारा इस संग्रहालय में, विशेषकर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857, से जुड़ी विभिन्न घटनाओं, जैसे मेरठ से शुरू हुए विद्रोह एवं प्रदर्शन, चर्बीयुक्त कारतूस के प्रयोग से भारतीय सैनिकों के इंकार, रानी लक्ष्मी बाई का ब्रिटिश सेना से युद्ध इत्यादि से जुड़ी सामग्री को संग्रहित एवं प्रदर्शित किया गया है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर संग्रहालय, रामपुर

  • इस संग्रहालय को वर्ष 2004 में स्थापित किया गया।
  • इसमें डा. भीमराव अम्बेडकर के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं एवं घटनाओं को प्रदर्शित किया गया है।

राजकीय बौद्ध संग्रहालय, पिपरहवा

  • पिपरहवा की पहचान बुद्ध की जन्म स्थली, तत्कालीन लुम्बिनी, के रूप में की जाती है। यह वर्तमान में सिद्धार्थ नगर जनपद में स्थित है।
  • यहां राजकीय बौद्ध संग्रहालय की स्थापना 1997 में की गयी।
  • इस संग्रहालय में बुद्ध के अस्थि अवशेषों से युक्त कलश रखा है, जिस पर ब्राह्मी एवं खरोष्ठी लिपि में लेख लिपिबद्ध है।

राजकीय पुरातत्व संग्रहालय, कन्नौज

  • इस संग्रहालय की स्थापना 1975 में की गयी, जिसे 1996 में राजकीय पुरातत्व संग्रहालय बना दिया गया।
  • इस संग्रहालय में पुरातात्विक एवं वैदिक कालीन मृदभाण्ड, मुद्राएं, कलाकृतियां, मनके तथा पाषाण मूर्तियां संरक्षित हैं।

राजकीय अभिलेखागार

  • उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार की स्थापना 1949 में सेन्ट्रल रिकार्ड आफिस नाम से प्रयागराज में की गयी। बाद में इस अभिलेखागार को 1973 में प्रयागराज से लखनऊ स्थानान्तरित कर दिया गया।

उद्देश्य
  • उत्तर प्रदेश सरकार के विभिन्न विभागों, मण्डलीय एवं जिला स्तर के कार्यालयों एवं अर्द्धशासकीय स्रोतों से उपलब्ध अभिलेखों का समुचित संरक्षण एवं स्थानान्तरण करना।

स्थानान्तरित अभिलेखों का वैज्ञानिक संरक्षण।
  • शोधरत छात्रों को उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराना।
  • माइक्रोफिल्मिगं द्वारा अभिलेखों को सुरक्षित करने की सुविधा प्रदान करना।
  • यहां अभिलेखों के वैज्ञानिक रखरखाव, संरक्षण एवं माइक्रोफिल्मिगं से संबंधित समस्त आधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं।
  • यहाँ मौखिक इतिहास योजना के अर्न्तगत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों एवं अन्य विशिष्ट व्यक्तियों के संस्मरण को टेप कर संरक्षित किया गया है।
  • राजकीय अभिलेखागार के अर्न्तगत तीन क्षेत्रीय अभिलेखागार स्थापित किये गये हैं, जो आगरा, वाराणसी एवं प्रयागराज में स्थित हैं।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।