उत्तर प्रदेश विधानमंडल | uttar pradesh vidhan mandal

उत्तर प्रदेश विधानमंडल

उत्तर प्रदेश की राजनीति सिर्फ सत्ता का खेल नहीं, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र का वह धड़कता हुआ हृदय है, जिसकी गूंज पूरे देश की दिशा तय करती है। किसी भी राज्य के सुचारू संचालन और लोकहितकारी नीतियों की नींव उसका विधानमंडल ही रखता है। इस विस्तृत लेख में, हम उत्तर प्रदेश विधानमंडल की उस वैभवशाली और जटिल संरचना के सफरनामा पर निकलेंगे- जहाँ हम 'भारत सरकार अधिनियम 1935' से शुरू हुई द्विसदनात्मक व्यवस्था (विधानसभा और विधान परिषद) की बारीकियों को समझेंगे। अध्यक्ष की शक्तियों से लेकर, दोनों सदनों की कार्यप्रणाली, वित्तीय समितियां और द्वितीय सदन की प्रासंगिकता तक, उत्तर प्रदेश शासन व्यवस्था का हर पहलू यहाँ आपको पूरी प्रामाणिकता के साथ पढ़ने को मिलेगा।
uttar-pradesh-vidhan-mandal

उत्तर प्रदेश विधानमंडल की संरचना

राज्य विधानमंडल (अनुच्छेद 168-212)
राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख
विधानसभा निम्न सदन / लोकप्रिय सदन
(कार्यकाल: 5 वर्ष)
विधान परिषद उच्च सदन / स्थायी सदन
(कार्यकाल: 6 वर्ष)

📌 द्विसदनात्मक व्यवस्था वाले 6 राज्य

  • उत्तर प्रदेश
  • बिहार
  • महाराष्ट्र
  • आंध्र प्रदेश
  • तेलंगाना
  • कर्नाटक

✅ विधानसभा सदस्य की योग्यताएं

  • भारत का नागरिक हो।
  • न्यूनतम आयु 25 वर्ष हो।
  • किसी लाभ के पद पर आसीन न हो।
  • दिवालिया या पागल न हो।
  • संसद द्वारा निर्धारित योग्यताएं रखता हो।

विधान परिषद सदस्यों का निर्वाचन प्रणाली

1/3 सदस्य शहरी निकाय एवं जिला परिषद द्वारा
1/3 सदस्य विधानसभा सदस्यों (MLAs) द्वारा
1/12 सदस्य पंजीकृत स्नातकों द्वारा (3 वर्ष पूर्व उत्तीर्ण)
1/12 सदस्य अध्यापकों द्वारा (माध्यमिक या उच्च स्तर)
1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत

विधानसभा बनाम विधान परिषद

आधार (Base) विधानसभा (Legislative Assembly) विधान परिषद (Legislative Council)
धन विधेयक (Money Bill) पूर्ण अधिकार। केवल यहीं प्रस्तुत किया जा सकता है। अधिकार सीमित। केवल 14 दिन तक रोक सकती है।
साधारण विधेयक अंतिम अधिकार विधानसभा के पास होता है। अधिकतम 4 महीने (3 माह + 1 माह) तक विलम्बित कर सकती है।
बजट (Budget) बजट पर चर्चा एवं मतदान दोनों का अधिकार है। चर्चा हो सकती है, किन्तु मतदान का अधिकार नहीं है।
अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद को हटा सकती है। (जवाबदेही) अविश्वास प्रस्ताव द्वारा मंत्रिपरिषद को हटा नहीं सकती।
राष्ट्रपति चुनाव निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं। सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में भाग नहीं ले सकते।

भारतीय संविधान द्वारा भारत के प्रत्येक राज्य में एक विधानमंडल की व्यवस्था की गयी है। अनुच्छेद 168 से 212 (भाग 6) तक में राज्य विधान मंडल की संरचना एवं कार्यों का विवरण है।
उत्तर प्रदेश का विधानमंडल राज्यपाल, विधानसभा एवं विधान परिषद से मिलकर बना है।

द्विसदनात्मक व्यवस्था

उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल द्विसदनात्मक व्यवस्था पर आधारित है, जिसकी शुरुआत 'भारत सरकार अधिनियम 1935' के तहत 1937 में हुई थी। द्विसदनात्मक व्यवस्था में विधानसभा के साथ विधान परिषद होती है।
भारत के मात्र छः राज्यों में द्विसदनात्मक व्यवस्था है। यह राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक। बीते वर्ष जम्मू और कश्मीर विधान परिषद को समाप्त कर दिया गया।
विधानसभा निम्न सदन है, जिसे 'लोकप्रिय सदन' भी कहते हैं। विधान परिषद उच्च सदन है। इसे वरिष्ठजनों का सदन भी कहते हैं।
राज्यों का विधानमंडल एक सदनात्मक हो या द्विसदनात्मक, इस बात के निर्णय का अधिकार राज्य में निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास होता है।
संसद को राज्य में विधान परिषद स्थापित करने एवं समाप्त करने का अधिकार है। इसके लिए आवश्यक है कि संबंधित राज्य की विधानसभा अपने कुल बहुमत, उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव पास करे। (अनुच्छेद 169)

विधानसभा

  • विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, यद्यपि राज्यपाल 5 वर्ष से पूर्व भी विधानसभा को भंग कर सकते हैं।
  • विधानसभा के सदस्यों का निर्वाचन राज्य की जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से वयस्क मताधिकार के आधार पर होता है। प्रदेश को विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
  • विधानसभा को अपने कार्य संचालन तथा प्रक्रिया के लिए नियम बनाने का अधिकार है, जिसका उद्देश्य सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाना है। विधानसभा के समक्ष लाए गए समस्त प्रश्नों का बहुमत के आधार पर निर्णय होता है। सदन की कार्यवाही को संचालित करने के लिए गणपूर्ति (Quorum) का होना आवश्यक है। गणपूर्ति वह न्यूनतम संख्या होती है जिसके अभाव में सदन की कार्यवाही संचालित नहीं हो सकती। इसकी संख्या अध्यक्ष समेत समस्त सदस्यों की 1/10 होती है।
  • विधानसभा का मुख्य कार्य है- कानून बनाना, सरकारी कार्यों के संपादन हेतु वित्त की संस्तुति करना एवं कार्यपालिका के कार्यों को प्रश्नकाल, संकल्पों एवं प्रस्तावों के माध्यम से नियंत्रित करना, जिससे लोकहितकारी कार्यों को बढ़ावा मिल सके।
  • विधानसभा की कार्यवाही हिन्दी भाषा एवं देवनागरी लिपि में संपादित होती है। कोई भी विधेयक (व्यक्तिगत या सरकारी) बिना सदन की अनुमति के प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। विधेयक प्रस्तुत होने पर सदन में उस पर चर्चा होती है एवं वोटिंग (मतदान) द्वारा उसे पास किया जाता है, या किसी चयन समिति/संयुक्त चयन समिति के सम्मुख भेज दिया जाता है।
  • किसी भी विधेयक को विधानमंडल से अनुमोदित तभी माना जाएगा, जब दोनों सदनों ने उसे किसी संशोधन या बिना किसी संशोधन के अपनी स्वीकृति दे दी हो। यह जानना महत्वपूर्ण है कि विधानसभा के पास विधान परिषद से लोकसभा के सापेक्ष अधिक शक्तियां हैं।
  • वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा में सदस्यों की संख्या 404 है, जिनमें 403 सदस्य जनता द्वारा चुने जाते हैं एवं 1 सदस्य आंग्ल-भारतीय समुदाय से राज्यपाल द्वारा उस स्थिति में नामित किया जाता है, जब वह संतुष्ट हो कि विधानसभा में आंग्ल-भारतीय समाज का उचित प्रतिनिधित्व नहीं है। वर्तमान में डेंजिल गोडिन आंग्ल-भारतीय समुदाय से उत्तर प्रदेश विधानसभा में नामित सदस्य हैं।

126वां संविधान संशोधन विधेयक 2019
यह विधेयक संविधान द्वारा प्रदत्त अनुसूचित जाति एवं जनजाति आरक्षण को अगले 10 वर्षों तक जारी रखने का प्रस्ताव करता है। यह विधेयक पारित होने पर आंग्ल भारतीयों को लोकसभा एवं राज्य विधानसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने की स्थिति में राष्ट्रपति एवं राज्यपाल द्वारा नामित करने संबंधी नियम को जारी नहीं रखेगा।
यदि भारत सरकार आंग्ल भारतीयों के प्रतिनिधित्व संबंधी आरक्षण के लिए नहीं लाती है तो उत्तर प्रदेश विधानसभा की संख्या वर्तमान 404 से घटकर 403 रह जायेगी।

विधानसभा सदस्यों के लिए आवश्यक योग्यताएं

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • न्यूनतम 25 वर्ष की आयु का हो।
  • संसद द्वारा निर्धारित की गई योग्यता रखता हो।
  • पागल या दिवालिया न हो।
  • वह सरकार के अधीन लाभ के पद पर न हो।

विधानसभा के पदाधिकारी

प्रत्येक राज्य की विधानसभा के दो प्रमुख पदाधिकारी होते हैं, जो विधानसभा की कार्यवाही को संचालित करते हैं-
  1. अध्यक्ष (Speaker)
  2. उपाध्यक्ष (Deputy Speaker)

विधानसभा अध्यक्ष

विधानसभा अध्यक्ष का पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका दायित्व है सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करना। विधानसभा अध्यक्ष बहुमत के आधार पर विधानसभा के सदस्यों द्वारा, सदस्यों में से किसी एक को चुना जाता है।

कार्यकाल

विधानसभा अध्यक्ष अगली विधान सभा के गठन होने की प्रक्रिया आरम्भ होने तक अपने पद पर बना रहता है। वह त्यागपत्र देकर भी पदमुक्त हो सकता है। इसे विधानसभा द्वारा प्रस्ताव पारित करके भी हटाया जा सकता है, जिसकी सूचना उसे चौदह दिन पूर्व मिल जानी चाहिए। अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को देता है।

कार्य एवं शक्तियां

विधानसभा अध्यक्ष का पद अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि विधानसभा सदस्यों के दल-बदल कानून के अंतर्गत अयोग्यता का निर्धारण विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है। कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं इसका निर्धारण विधानसभा अध्यक्ष करता है। वह सदन के नेता की सिफारिश पर गुप्त बैठक भी बुला सकता है।

विधानसभा अध्यक्ष एवं दसवीं अनुसूची

वर्ष 1985 में भारतीय संविधान में 52वां संविधान संशोधन लाया गया। इस संशोधन में दलबदल कानून के तहत अनुसूची 10 जोड़ी गई एवं सदन के अध्यक्ष को अधिकार दिया गया कि दलबदल की स्थिति में वह विधायिका के सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर सकता है। इस कानून के प्रभाव में आने के बाद विधानसभा अध्यक्ष के निर्णयों को लेकर कई बार विवाद सामने आ चुके हैं। इन सभी विवादों के मूल में है विधानसभा अध्यक्ष पर निष्पक्ष न होने का आरोप।

विधानसभा उपाध्यक्ष

विधानसभा उपाध्यक्ष का चुनाव विधानसभा सदस्यों द्वारा बहुमत के आधार पर सदस्यों में से किसी एक को विधानसभा अध्यक्ष के बाद चुना जाता है। वह विधानसभा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसके स्थान पर कार्य करता है। विधानसभा उपाध्यक्ष का कार्यकाल, पद से हटाने की प्रक्रिया आदि विधानसभा अध्यक्ष के समान होती है।

विधान परिषद

  • विधान परिषद से संबंधित प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 169 एवं 171 में दिये गये हैं। उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) में द्विसदनीय विधानमंडल का गठन गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया अधिनियम, 1935 के अंतर्गत हुआ, जिसमें विधान परिषद को द्वितीय सदन के रूप में स्थापित किया गया।
  • विधान परिषद को 'उच्च सदन' कहा जाता है, यद्यपि व्यवहार में यह विधानसभा की अपेक्षा एक दुर्बल सदन है। यह एक स्थायी सदन है, जो विधानसभा की भांति भंग नहीं होती। इसके सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होता है, तथा कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। प्रत्येक 2 वर्ष पश्चात इसके एक तिहाई सदस्य अवकाश ग्रहण करते हैं।
  • देश में आज मात्र 6 राज्यों में विधानपरिषद अस्तित्व में है। यह राज्य हैं-उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश।
  • संविधान लागू करते समय देश के 8 राज्यों में द्विसदनात्मक व्यवस्था के तहत विधानपरिषद गठन की व्यवस्था दी गयी थी। यह राज्य थे-
  • उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, बंबई (वर्तमान महाराष्ट्र), पंजाब, तमिलनाडु, मैसूर (वर्तमान कर्नाटक), पं. बंगाल। आगे चलकर इनमें से कई राज्यों ने अनुच्छेद 169 में प्रदत्त प्रावधानों के अनुसार विधानपरिषद के उत्सादन का निर्णय लेकर उसे संसद को सौंप दिया, जिसके परिणामस्वरूप संबंधित राज्यों से संवैधानिक प्रक्रिया द्वारा विधान परिषदों को हटा दिया गया। यह राज्य थे-आंध्र प्रदेश, पंजाब, प. बंगाल तथा तमिलनाडु।
  • आंध्र प्रदेश ने पुनः विधान परिषद के गठन का प्रस्ताव पारित कर संसद के पास प्रस्ताव भेजा। संसद द्वारा 2005 में अधिनियम पारित करने के पश्चात 2007 में आंध्र प्रदेश में विधानपरिषद पुनः गठित हो गई।
  • मध्य प्रदेश में विधान परिषद के गठन हेतु संविधान के सातवें संशोधन, 1956 में उपबंध किया गया, किन्तु यहां आज तक विधानपरिषद का गठन नहीं हो सका।

उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष

अध्यक्ष कार्यकाल
1. श्री पुरुषोत्तमदास टण्डन 31 जुलाई, 1937 से 10 अगस्त, 1950
2. श्री नफीसुल हसन 21 दिसंबर, 1950 से 19 मई, 1952
3. श्री आत्माराम जी. खेर 20 मई, 1952 से 10 अप्रैल, 1957
4. श्री आत्माराम जी. खेर 10 अप्रैल, 1957 से 26 मार्च, 1962
5. श्री मदन मोहन वर्मा 26 मार्च 1962 से 16 मार्च, 1967
6. श्री जे. एस. अग्रवाल 17 मार्च, 1967 से 16 मार्च, 1969
7. श्री आत्माराम जी. खेर 17 मार्च, 1969 से 18 मार्च, 1974
8. श्री वासुदेव सिंह 18 मार्च, 1974 से 12 जुलाई, 1977
9. श्री बनारसी दास 12 जुलाई, 1977 से 26 फरवरी, 1979
10. श्री श्रीपति मिश्र 07 जुलाई, 1980 से 18 जुलाई, 1982
11. धरम सिंह 25 अगस्त, 1982 से 15 मार्च, 1985
12. श्री नियाज हसन 15 मार्च, 1985 से 09 जनवरी, 1990
13. श्री एच.के. श्रीवास्तव 09 जनवरी, 1990 से 30 जुलाई, 1991
14. श्री केशरी नाथ त्रिपाठी 30 जुलाई, 1991 से 15 दिसंबर, 1993
15. श्री धनीराम वर्मा 15 दिसंबर, 1993 से 20 जून, 1995
16. श्री बरखू राम वर्मा 18 जुलाई, 1995 से 26 मार्च, 1997
17. श्री केशरी नाथ त्रिपाठी 27 मार्च, 1997 से 14 मई, 2002
18. श्री केशरी नाथ त्रिपाठी 14 मई, 2002 से 19 मई, 2004
19. श्री माता प्रसाद पाण्डेय 26 जुलाई, 2004 से 18 मई, 2007
20. श्री सुखदेव राजभर 18 मई, 2007 से 13 अप्रैल, 2012
21. श्री माता प्रसाद पाण्डेय 13 अप्रैल, 2012 से 30 मार्च, 2017
22. श्री एच.एन. दीक्षित 30 मार्च, 2017 से 29 मार्च, 2022
23. श्री सतीश महाना 29 मार्च, 2022 से अब तक

कार्यकारी अध्यक्ष

अध्यक्ष कार्यकाल
1. श्री जगन्नाथ प्रसाद 27 फरवरी, 1979 से 17 फरवरी, 1980
2. श्री यादवेंद्र सिंह 19 जुलाई, 1982 से 24 अगस्त, 1982
3. श्री बरखू राम वर्मा 20 जून, 1995 से 17 जुलाई, 1995
4. डॉ. वकार अहमद शाह 19 मई, 2004 से 26 जुलाई, 2004

विधान परिषद सदस्यों के चयन की पद्धति

विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या के 5/6 सदस्य निर्वाचित तथा 1/6 राज्यपाल द्वारा मनोनीत होते हैं। निर्वाचन इस प्रकार होता है-
  1. कुल सदस्यों में एक तिहाई सदस्यों का चुनाव शहरी निकाय एवं जिला परिषद सदस्यों द्वारा होता है।
  2. एक तिहाई सदस्य विधानसभा सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।

उत्तर प्रदेश विधान परिषद का स्वरूप

क्र. सं. क्षेत्र सदस्य संख्या
1. विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र 38
2. स्थानीय निकाय निर्वाचन क्षेत्र 36
3. शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र 08
4. स्नातक निर्वाचन क्षेत्र 08
5. मनोनीत 10
कुल सदस्यों की संख्या 100

उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति

नाम कार्यकाल
1. डॉ. सर सीताराम 19 अगस्त, 1925 से 12 मार्च, 1937
12 जुलाई, 1937 से 9 मार्च, 1949
2. श्री चंद्रभाल 10 मार्च, 1949 से 25 जनवरी, 1950 तक
26 जनवरी, 1950 से 5 मई, 1958 तक
3. श्री रघुनाथ विनायक धुलेकर 20 जुलाई, 1958 से 5 मई, 1964 तक
4. श्री दरबारी लाल शर्मा 5 अगस्त, 1964 से 05 मई, 1968 तक
5. श्री वीरेन्द्र स्वरूप 15 मार्च, 1969 से 5 मई, 1974 तक
11 जून, 1974 से 26 फरवरी, 1980
6. श्री वीरेन्द्र बहादुर सिंह चंदेल 6 अक्टूबर, 1980 से 5 मई, 1982
3 मार्च, 1983 से 5 मई, 1988 तक
7. श्री जगदीश चन्द्र दीक्षित 6 अप्रैल, 1989 से 7 मार्च, 1990 तक
8. श्री शिव प्रसाद गुप्ता 5 जुलाई, 1990 से 6 जुलाई, 1992 तक
9. श्री नित्यानंद स्वामी 25 अप्रैल, 1997 से 8 नवंबर, 2000 तक
10. श्री ओमप्रकाश शर्मा 17 नवंबर, 2000 से 5 मई, 2002 तक
11. श्री कुंवर मानवेन्द्र सिंह 6 मई, 2002 से 2 अगस्त, 2004 तक
12. चौधरी सुखराम सिंह यादव 3 अगस्त, 2004 से 15 जनवरी, 2010 तक
13. श्री गणेश शंकर पाण्डेय 21 जनवरी, 2010 से 15 जनवरी, 2016 तक
14. श्री रमेश यादव 11 मार्च, 2016 से 30 जनवरी, 2021 तक
15. श्री कुंवर मानवेन्द्र सिंह 31 जनवरी, 2021 से वर्तमान

स्रोत: विधान परिषद, उत्तर प्रदेश
3. कुल सदस्यों में से 1/12 सदस्य उस राज्य के पंजीकृत स्नातकों द्वारा निर्वाचित होते हैं, जिन्हें स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण किए हुए कम से कम तीन वर्ष हो गये हों।

4. विधान परिषद के कुल सदस्य संख्या के 1/12 सदस्य राज्य की माध्यमिक पाठशाला या उससे उच्च स्तर के विद्यालयों में तीन वर्ष से अधिक समय तक अध्यापन करने वाले अध्यापकों से बने निर्वाचन मंडल द्वारा निर्वाचित होते हैं।

5. शेष 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।

विधान परिषद के सभापति एवं उपसभापति

विधान परिषद के सदस्य अपने सदस्यों में से एक सभापति और एक उपसभापति का चुनाव करते हैं। सभापति एवं उपसभापति सदन के सदस्यों के बने रहने तक अपने पद पर बने रहते हैं। विशेष परिस्थिति में सभापति अपना त्यागपत्र उपसभापति को दे सकता है। इसी प्रकार उपसभापति अपना त्यागपत्र सभापति को देकर पदमुक्त हो सकता है।
सभापति एवं उपसभापति को बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव से हटाया जा सकता है, जिसकी सूचना उन्हें प्रस्ताव प्रस्तुत करने से चौदह दिन पूर्व देनी होती है।

विधान परिषद की बैठक
विधान परिषद की बैठक वर्ष में दो बार अवश्य होनी चाहिए। दो बैठकों के बीच छः माह से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए।

विधान परिषद की शक्तियां

साधारण विधेयक राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन में प्रस्तावित किए जा सकते हैं। विधानसभा से पारित विधेयक को विधान परिषद के पास भेजा जाता है। यदि विधान परिषद 3 माह तक प्रस्ताव को पारित नहीं करती है तो विधानसभा उस विधेयक को पुनः पारित कर विधान परिषद के पास भेजती है। इसके पश्चात विधान परिषद उक्त प्रस्ताव को यदि एक माह तक पारित नहीं करती तो विधेयक को फिर दोनों सदनों से पारित मान लिया जाता है। विधान परिषद साधारण विधेयक को मात्र 4 माह तक रोक कर रख सकती है।
विधान परिषद को 'विलम्बकारी सदन' भी कहा जाता है।
विधान परिषद धन विधेयक को मात्र 14 दिन तक अपने पास रोक सकती है। विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक जब विधान परिषद के पास भेजा जाता है तो उसे 14 दिन में उन विधेयकों को वापस लौटाना होता है, अन्यथा विधेयक स्वतः कानून बन जाता है।
विधान परिषद के सदस्य मंत्रिपरिषद के सदस्य नियुक्त हो सकते हैं।

वेतन एवं भत्ता

विधानमंडल के सदस्यों का वेतन एवं भत्ता समय-समय पर विधानमंडल द्वारा निर्धारित किया जाता है। विधानमंडल के सदस्यों के वेतन एवं भत्ते का भुगतान राज्य की संचित निधि से किया जाता है। विधानमंडल के दोनों सदनों के अपने सचिवालय होते हैं, जो स्वतंत्र रूप से, बिना किसी राज्य सरकार के हस्तक्षेप के, कार्य करते हैं। विधानमंडल के सदस्यों की सुविधा हेतु उत्तर प्रदेश में एक विधानमंडल पुस्तकालय भी है, जो देश के किसी अन्य राज्य के पुस्तकालय से बड़ा है।

समितियां

संविधान के अनुच्छेद 174(2) के अधीन विधानमंडल के प्रति मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व और कार्यपालिका के कृत्यों पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए संविधान के अनुच्छेद 208 के अंतर्गत बनायी गयी उत्तर प्रदेश विधानसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली 1958 के अंतर्गत विभिन्न स्थायी प्रकृति की वित्तीय एवं गैर-वित्तीय समितियों का गठन किया जाता है। सदन की तीन महत्वपूर्ण वित्तीय समितियां हैं-

1. प्राक्कलन समिति - इसका कार्य सदन के समक्ष प्रस्तुत प्राक्कलनों की समीक्षा एवं लोक-व्यय को किफायती बनाने संबंधी सुझाव देना है।

2. लोक लेखा समिति - यह समिति भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा प्रस्तुत राज्य संबंधी प्रतिवेदनों का अध्ययन करती है एवं उस पर अपनी रिपोर्ट विधान मंडल को सौंपती है।
इस समिति का अध्यक्ष पारंपरिक रूप से विपक्ष का सदस्य होता है। मंत्रिपरिषद के सदस्य इस समिति के सदस्य नहीं हो सकते।
उत्तर प्रदेश इस परम्परा को शुरू करने वाला प्रथम राज्य है। इस समिति के सदस्यों का चयन एक वर्ष के लिए होता है।

3. सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम समिति - यह समिति सार्वजनिक उपक्रमों की कार्यप्रणाली की समीक्षा करती है।

विशेष समितियां

अन्य समितियों की तरह विशेष समितियों का उद्देश्य है सदन के कार्य संचालन को प्रभावी बनाना। इन समितियों में प्रमुख हैं-
  • आश्वासन समिति - यह समिति सदन में समय-समय पर दिए गए आश्वासनों की जांच करती है।
  • विशेषाधिकार समिति - यह समिति सदन एवं इसके सदस्यों के विशेषाधिकार हनन संबंधी विषय की समीक्षा करती है और उस पर अपना सुझाव देती है। इस समिति की प्रकृति अर्ध न्यायिक होती है।
  • नेता प्रतिपक्ष - नेता प्रतिपक्ष का पद कैबिनेट मंत्री के समतुल्य है। यद्यपि नेता प्रतिपक्ष कौन होगा इसका स्पष्ट उल्लेख संविधान में नहीं है, लेकिन परंपरागत रूप से सदन में सर्वोच्च संख्याबल वाली विपक्षी पार्टी के नेता को 'नेता प्रतिपक्ष' चुना जाता है, बशर्ते यह संख्या सदन की कुल संख्या के 1/10 से कम न हो।

विधानसभा एवं विधान परिषद : एक तुलनात्मक अध्ययन

  • धन विधेयक - विधान सभा की अपेक्षा विधान परिषद के अधिकार 'धन विधेयक' के संबंध में सीमित हैं। विधान परिषद के पास धन विधेयक में संशोधन या उसे अस्वीकृत करने की शक्ति नहीं होती।
  • साधारण विधेयक - यह विधेयक विधानमंडल के दोनों सदनों में लाया जा सकता है, लेकिन अंतिम अधिकार विधानसभा के पास होता है। विधान परिषद साधारण विधेयक को अधिकतम चार महीने तक विलम्बित कर सकती है। यदि कोई विधेयक विधान परिषद में पारित होकर संस्तुति हेतु विधानसभा में भेजा जाता है और विधानसभा उसे नकार दे तो वह समाप्त हो जाता है।
  • बजट (वार्षिक वित्तीय विवरण) - बजट पर विधान परिषद में चर्चा हो सकती है, किन्तु इस पर मतदान का अधिकार उसे नहीं है।
  • अविश्वास प्रस्ताव - विधान परिषद अविश्वास प्रस्ताव द्वारा मंत्रिपरिषद को हटा नहीं सकता। यह अधिकार मात्र विधानसभा को है। इसीलिए मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति जवाबदेह है।
  • राष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन - राष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सदस्यों के निर्वाचन में विधान परिषद के सदस्य भाग नहीं ले सकते। इसके अतिरिक्त विधान परिषद का अपना अस्तित्व भी विधानसभा पर निर्भर है।

विधान मण्डल में द्वितीय सदन की उपयोगिता

राज्यों में द्विसदनात्मक व्यवस्था (विधान सभा एवं विधान परिषद का अस्तित्व एक साथ होना) की उपयोगिता एवं आवश्यकता को लेकर लंबे समय से चर्चा चली आ रही है। कुछ राज्यों में द्वितीय सदन को अवरोध के रूप में देखा जाता है, जबकि कई अन्य इसकी आवश्यकता महसूस करते हैं।
वर्तमान में भारत के मात्र 6 राज्यों में विधान परिषद हैं। यह राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, बिहार, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक।
हाल के दिनों में आंध्र प्रदेश विधानसभा में सत्ताधारी पार्टी ने राज्य में 3 राजधानियां बनाने के प्रस्ताव को प्रचण्ड बहुमत के चलते विधान सभा से पारित करा लिया, किन्तु उस पर विधान परिषद ने अस्थाई रूप से रोक लगा दी। विधान सभा में सत्ताधारी पार्टी जहां बहुमत में थी, वहीं विधान परिषद में विपक्षी पार्टी के पास अधिक सीटें थीं। इस निर्णय के पश्चात आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा उच्च सदन (विधान परिषद) को समाप्त करने की बात कही गयी। दूसरी तरफ, देश के चार बड़े राज्य मध्य प्रदेश, ओड़ीसा, असम और राजस्थान उच्च सदन स्थापित करने के प्रयास में लगे हैं।

द्वितीय सदन की उपयोगिता

  • लोकतंत्र में राज्य स्तर पर द्विसदनात्मक व्यवस्था अधिक संतुलित और समुचित प्रतिनिधित्व करने वाली प्रणाली मानी जाती है। द्वितीय सदन (विधान परिषद) में समाज के सभी वर्गों- राजनेता, शिक्षक, विद्यार्थी, निकाय प्रतिनिधि, डॉक्टर, इंजीनियर तथा अन्य प्रबुद्ध वर्गों एवं पेशेवर का प्रतिनिधित्व होता है।
  • द्विसदनीय व्यवस्था में विभिन्न मुद्दों पर बेहतर बहस होने की संभावना रहती है। इस तरह बहुमत की सरकारों द्वारा जल्दबाजी में लिए गये निर्णयों को जांचा-परखा जा सकता है। इससे सही और सर्वमान्य निर्णय की संभावना बनी रहती है।
  • द्वितीय सदन को संविधान का प्रहरी कहा जा सकता है। यह वह शक्तिशाली संस्था है, जो विधायी तंत्र में अंकुश और संतुलन बनाये रखने का कार्य करती है।
  • राजनीति अथवा सामाजिक क्षेत्र में ऐसे कई विषय होते हैं जिन पर सदन में गंभीरता पूर्वक स्पष्ट एवं निष्पक्ष भाव से विचार करने की आवश्यकता होती है। विभिन्न राजनीतिक कारणों से विधान सभा के सदस्य कई बार इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर पाते। कभी-कभी दलगत राजनीति भी उनके स्वतंत्र तथा निष्पक्ष विचारों में बाधक बनती है। ऐसी स्थिति में द्वितीय सदन इस कमी को पूरा करता है।
  • विधान सभा द्वारा कई बार शीघ्रता में विधेयक पारित कर दिये जाते हैं, जिससे जनता और सरकार दोनों को समस्या का सामना करना पड़ सकता है। द्वितीय सदन सरकार को विधेयक पर पुनर्विचार करने का अवसर प्रदान करता है। इससे विधेयक में हर प्रकार से सुधार और पुनर्विचार की गुंजाइश रहती है।
  • द्विसदनात्मक व्यवस्था के अंतर्गत विधान परिषद ऐसे व्यक्तियों को एक मंच प्रदान करती है, जो प्रत्यक्ष चुनावी भागीदारी से बचते हैं, जैसे लेखक, चिंतक, सफल पेशेवर, उद्यमी आदि। इन्हें विधान परिषद के माध्यम से विधायी प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर प्राप्त होता है।
  • द्विसदनात्मक व्यवस्था गहन चर्चा और जांच की सुविधा प्रदान कर अधिनियमित कानूनों की गुणवत्ता को बढ़ाकर अच्छी तरह से बहस और व्यापक कानून तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • उच्च सदन, जिसमें स्नातक, शिक्षक और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होते हैं, निचले सदन में संभावित कट्टरवाद के प्रति संतुलन स्थापित करने का कार्य करते हैं। यह स्थिति संयम और सर्वसम्मति से कानून निर्माण को बढ़ावा देती है।
  • द्विसदनात्मक व्यवस्था में विधान परिषद निर्वाचित सदस्यों के निचले सदन (विधान सभा) द्वारा सत्ता के एकाधिकार के विरुद्ध सुरक्षा तंत्र के रूप में कार्य करती है। यह निरंकुश प्रवृत्तियों और मनमाने ढंग से निर्णय लेने पर अंकुश लगाती है।
  • विधान परिषदें, विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञों, समाजसेवकों, शिक्षाविदों और स्नातकों के लिए नामित कोटा आरक्षित कर विविध दृष्टिकोणों के साथ विधायी प्रक्रिया को समृद्ध करते हुए ऐसे अनुभवी व्यक्तियों को समायोजित करती हैं, जिनका चुनावी राजनीति में रुझान नहीं होता।
  • द्विसदनात्मक व्यवस्था विधान सभा के कार्यभार को कम करने में मदद करती है, विशेष रूप से आधुनिक कल्याणकारी राज्यों में जहां विधान सभाओं को कई जिम्मेदारियों का वहन करना पड़ता है। इससे विधान सभा को महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान देने के लिए अधिक समय प्राप्त हो जाता है।

विधानसभा की समितियाँ

क्रम समिति का नाम सभापति
1. प्राक्कलन समिति श्री लोकेंद्र प्रताप सिंह
2. लोक लेखा समिति श्री महबूब अली
3. प्रतिनिहित विधायन समिति श्री अमित अग्रवाल
4. याचिका समिति विधानसभा अध्यक्ष
5. विशेषाधिकार समिति विधानसभा अध्यक्ष
6. सरकारी आश्वासन संबंधी समिति श्री अजय कुमार
7. प्रश्न एवं संदर्भ समिति विधानसभा अध्यक्ष
8. नियम समिति विधानसभा अध्यक्ष
9. कार्य मंत्रणा समिति विधानसभा अध्यक्ष
10. आचार समिति विधानसभा अध्यक्ष
11. स्थानीय निकायों के लेखा परीक्षा प्रतिवेदनों की जाँच संबंधी समिति श्री सुनील कुमार शर्मा
12. विधान पुस्तकालय समिति विधान सभा अध्यक्ष
13. संसदीय शोध संदर्भ एवं अध्ययन समिति विधानसभा अध्यक्ष
14. पंचायती राज समिति श्री विपिन कुमार डेविड
15. संसदीय अनुश्रवण समिति विधानसभा अध्यक्ष
16. अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा विमुक्त जातियों संबंधी संयुक्त समिति श्री श्रीराम चौहान
17. सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम संयुक्त समिति श्री मनीष असीजा
18. आवास संबंधी संयुक्त समिति विधानसभा अध्यक्ष
19. महिला एवं बाल विकास संबंधी संयुक्त समिति श्रीमती नीलिमा कटियार

आलोचना

  • विभिन्न विशेषताओं के बावजूद राज्य विधान परिषदों को आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। कुछ लोगों का तर्क है कि द्विसदनात्मक व्यवस्था कानून निर्माण में निरर्थक और अवरोधक बन सकती है, विशेषकर उस स्थिति में जब निचले सदन में भी उसी पार्टी का प्रभुत्व हो। इससे विधायी प्रक्रिया में विलंब होता है।
  • द्विसदनात्मक व्यवस्था की आलोचना विधान परिषद की सीमित शक्तियों को लेकर भी की जाती है। कहा जाता कि यह निचले सदन के कार्यों की प्रभावी ढंग से जांच नहीं कर सकती, जिससे विधानसभा को परिषद की मंजूरी के बिना अपने एजेंडे के साथ आगे बढ़ने की अनुमति प्राप्त हो जाती है।
  • विधान परिषदों में कई बार ऐसे व्यक्ति सदस्य बनते हैं, जो चुनाव में हार चुके होते हैं, अथवा चुनाव का सामना करना नहीं चाहते। ऐसे सदस्यों को प्रायः मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए विधान परिषद का सदस्य बनाया जाता है। यह प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती जा रही है, जिसे स्वस्थ्य लोकतंत्र के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।
  • विधान परिषदों को बनाए रखने में सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है, जिससे शासन के प्रभावी काम-काज तथा राज्य के विकास में उसके योगदान में रूकावट आती है।
  • विधान परिषदों को निचले सदन (विधान सभा) द्वारा एक साधारण प्रस्ताव के माध्यम से समाप्त किया जा सकता है, जिससे उनका प्रभाव नगण्य हो जाता है।
  • विधान परिषदों द्वारा विधेयकों पर दिये गये सुझाव गैर-बाध्यकारी होते हैं, जिससे उनका प्रभाव कम हो जाता है।
  • वैश्विक रूझानों से पता चलता है कि दुनिया भर में मात्र कुछ राज्यों द्वारा द्विसदनात्मक व्यवस्था अपनायी जा रही है। यह एक सदनीय विधान मंडलों के लिए प्रचलित प्राथमिकता को दर्शाता है। कनाडाई शैक्षणिक संस्था लुई मैसिकोट द्वारा किए गये एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि विश्वभर में 450 से अधिक राज्य विधान सभाओं में से मात्र 73 के पास द्वितीय सदन है। यह आंकड़ा बताता है कि वैश्विक झुकाव एक सदनीय विधान मंडल व्यवस्था की तरफ है।

निष्कर्ष

तमाम आलोचनाओं एवं कमियों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि द्वितीय सदन राज्य की विधायिका का महत्वपूर्ण घटक है। विधान निर्माण की प्रक्रिया में अपना बहुमूल्य सुझाव संशोधनों के माध्यम से प्रस्तुत कर यह विधायी कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति में प्रदेशों में उच्च सदन को आवश्यक ही नहीं अपितु अपरिहार्य भी माना जाने लगा है, अतः इन्हें सुदृढ़ बनाए जाने की आवश्यकता है।

दोस्तों, हमें उम्मीद है कि इस लेख में दी गई जानकारी आपके लिए मददगार साबित हुई होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सही और सटीक जानकारी होना बहुत जरूरी है। ऐसे ही महत्वपूर्ण टॉपिक्स को आसान भाषा में पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट WWW.UPGK.IN पर नियमित रूप से विजिट करते रहें। इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!

Tags:

Comments

Comment करें

Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, भूगोल, कला-संस्कृति और सामान्य ज्ञान के विशेषज्ञ Kartik Budholiya छात्रों को UPPSC, UPSSSC, UP Police, UP Lekhpal, RO/ARO और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए निरंतर शोध-परक कंटेंट साझा करते हैं।