उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था एवं नागरिक अधिकार सुरक्षा
किसी भी राज्य के विकास और वैभवशाली भविष्य की नींव वहां की सुदृढ़ कानून व्यवस्था पर टिकी होती है। 20 करोड़ से अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश का सफरनामा कभी संगठित अपराध और माफियाओं के इर्द-गिर्द घूमता था, लेकिन आज यह 'जीरो टॉलरेंस' और शांति की एक नई कहानी लिख रहा है। इस विस्तृत लेख में हम यूपी की पूरी प्रशासनिक और पुलिस मशीनरी (DGP और मुख्य सचिव से लेकर जिलाधिकारी तक), 7 महानगरों की आधुनिक पुलिस कमिश्नर प्रणाली और आतंक-रोधी 'UPSSF' के गठन का गहराई से विश्लेषण करेंगे। इसके साथ ही महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले 'मिशन शक्ति' और 'सेफ सिटी' प्रोजेक्ट्स की गूंज को भी समझेंगे। प्रतियोगी परीक्षाओं के नजरिए से यह लेख राज्य के प्रशासनिक ढांचे का सबसे प्रामाणिक और सटीक दस्तावेज है।
उत्तर प्रदेश: प्रशासन एवं कानून व्यवस्था
प्रशासनिक संरचना (पदानुक्रम)
सामान्य प्रशासन
मुख्य सचिव (राज्य स्तर)
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मंडलायुक्त / कमिश्नर (मण्डल स्तर)
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जिलाधिकारी / DM (जनपद स्तर)
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उप-जिलाधिकारी / SDM (तहसील स्तर)
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तहसीलदार / नायब तहसीलदार
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राजस्व निरीक्षक / लेखपाल
पुलिस प्रशासन
पुलिस महानिदेशक / DGP (सर्वोच्च)
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अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADG)
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महानिरीक्षक (IG) / उप-महानिरीक्षक (DIG)
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वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) / पुलिस अधीक्षक (SP)
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पुलिस उपाधीक्षक (DySP / CO)
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थाना प्रभारी (SHO/SO) ➔ सिपाही
पुलिस व्यवस्था का भौगोलिक विभाजन
राज्य (8 पुलिस जोन)
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जोन (नेतृत्व: ADG)
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रेंज (नेतृत्व: IG/DIG)
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जिले (नेतृत्व: SSP/SP)
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सर्किल (नेतृत्व: CO/DySP)
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थाना (नेतृत्व: SHO)
महत्वपूर्ण अंतर: कानून vs सार्वजनिक व्यवस्था
| तुलनात्मक बिंदु | कानून व्यवस्था (Law & Order) | सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) |
|---|---|---|
| मुख्य अर्थ | आपराधिक कानून के तहत दृढ़ता, दण्ड व स्थिति का विश्लेषण। | हिंसा रोकना, सामुदायिक तनाव कम करना, शांति भंग होने से बचाना। |
| प्राथमिक उत्तरदायित्व | पुलिस विभाग | जिला मजिस्ट्रेट (DM) |
| प्रभाव क्षेत्र | व्यक्तिगत अपराध (Personal Crimes) | बड़े पैमाने पर समुदाय (Community Level) |
प्रमुख प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका
मुख्य सचिव (Chief Secretary)
- राज्य का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी।
- विभागीय कार्यों और जिलाधिकारियों की मॉनिटरिंग।
- कैबिनेट बैठकों के विषयों का निर्धारण।
- IAS/IPS प्रोन्नति कमेटियों के मुखिया।
मंडलायुक्त (Divisional Commissioner)
- मंडल (संभाग) स्तर का प्रमुख (सचिव रैंक)।
- जन शिकायतों का निस्तारण एवं योजनाओं की समीक्षा।
- राजस्व संग्रह, भू-लेख रखरखाव का पर्यवेक्षण।
- अधीनस्थ कार्यालयों का वार्षिक निरीक्षण।
जिलाधिकारी (District Magistrate)
- जिले का मुखिया, राजस्व एवं कानून व्यवस्था का प्रभारी।
- SDM, तहसीलदार व अन्य पदाधिकारियों के नियंत्रक।
- मजिस्ट्रेट के रूप में न्यायिक व जेल निरीक्षण कार्य।
- शस्त्र लाइसेंस जारी करने का सर्वोच्च अधिकारी।
कानून व्यवस्था में सुधार के प्रमुख कदम
पुलिस कमिश्नर प्रणाली
- 7 शहरों में लागू: लखनऊ, गौतमबुद्ध नगर, वाराणसी, कानपुर, आगरा, प्रयागराज, गाजियाबाद।
- पुलिस आयुक्त (ADG स्तर) एकीकृत कमांड का प्रमुख।
- मजिस्ट्रियल शक्तियां (लाठीचार्ज, धारा 144) पुलिस के पास।
UPSSF व गरुण AI ड्रोन
- UPSSF: CISF की तर्ज पर सुरक्षा बल। (हवाई अड्डे, मेट्रो, धार्मिक स्थल सुरक्षा)।
- बिना वारंट तलाशी व गिरफ्तारी का विशेष अधिकार।
- गरुण AI ड्रोन: भीड़ नियंत्रण, चेहरा पहचान और पब्लिक एड्रेस सिस्टम से लैस।
महिला सुरक्षा एवं सेफ सिटी
- मिशन शक्ति: महिलाओं के विरुद्ध अपराध रोकथाम।
- सेफ सिटी: 17 नगर निगमों में CCTV सर्विलांस सिस्टम।
- पिंक बूथ का निर्माण व महिला बीटों के लिए पिंक स्कूटी।
- एंटी-रोमियो स्क्वाड एवं 1090 महिला हेल्पलाइन।
- पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य का विषय है, जो भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अन्तर्गत आता है। इसमें प्रदेश सरकारों को राज्य में कानून और सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने का दायित्व दिया गया है।
- संविधान के अनुच्छेद 355 के अनुसार बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति की स्थिति में हर राज्य अपनी रक्षा के लिये संघ का सहारा ले सकता है तथा संघ यह सुनिश्चित करता है कि राज्य में सरकार संविधान के प्रावधान के अनुसार चले। केन्द्र सरकार राज्य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण की योजना के अन्तर्गत हथियार, संचार उपकरण, यातायात के साधन, प्रशिक्षण और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिये वित्तीय सहायता प्रदान कर राज्य सरकारों की मदद करती है।
- केन्द्र सरकार विभिन्न एजेंसियों के साथ मिलकर अपराध को रोकने तथा कानून-व्यवस्था की स्थिति को बनाये रखने के लिये राज्यों से अपने खुफिया इनपुट साझा करती है। सार्वजनिक आदेश और कानून-व्यवस्था राज्य सरकार का कार्य है। सार्वजनिक व्यवस्था और कानून व्यवस्था के विफल होने पर नागरिकों में सरकार के प्रति विश्वास कम होता है। किसी राज्य में हिंसा या दंगे उसके सामाजिक ताने-बाने तथा राष्ट्रीय एकता को खतरे में डाल सकते हैं। साथ ही इससे राज्य के आर्थिक विकास को भी हानि होती है।
उत्तर प्रदेश में प्रशासन
प्रशासन एवं कानून व्यवस्था
प्रशासन एवं कानून व्यवस्था के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक संरचना दो भाग में विभाजित की जा सकती है-
- सामान्य प्रशासन विभाग
- पुलिस प्रशासन विभाग
सामान्य प्रशासन विभाग
प्रदेश स्तर पर प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी मुख्य सचिव होता है। मुख्य सचिव के पश्चात मण्डल (संभाग) स्तर पर मण्डलायुक्त एवं जनपद स्तर पर जिलाधिकारी सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होते हैं।
जनपद स्तर पर जिलाधिकारी के अधीन उप-जिलाधिकारी (एसडीएम), तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक एवं लेखपाल कार्य करते हैं।
पुलिस प्रशासन विभाग
- कानून व्यवस्था को प्रभावी बनाने में पुलिस प्रशासन विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
- पुलिस प्रशासन विभाग में राज्य स्तर पर सर्वोच्च अधिकारी पुलिस महानिदेशक (DGP) होते हैं, जिनके सहयोग हेतु अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति की जाती है।
- उत्तर प्रदेश के सात प्रमुख नगरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू की गयी है (देखिए बाक्स में दी गयी सामग्री)। यह व्यवस्था इससे पूर्व मुम्बई, दिल्ली आदि महानगरों में विद्यमान थी। इसमें पुलिस को जिलाधिकारी से आदेश अथवा निर्देश लेने की आवश्यकता नहीं होती।
- मण्डल स्तर पर पुलिस महानिरीक्षक (IG) एवं पुलिस उप-महानिरीक्षक (DIG) की नियुक्ति होती है।
- जनपद स्तर पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), पुलिस अधीक्षक (SP), पुलिस उपाधीक्षक (DySP), थाना प्रभारी तथा सिपाही कार्य करते हैं।
मुख्य सचिव (Chief Secretary)
- मुख्य सचिव राज्य में सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी एवं कार्यपालिका का प्रमुख होता है। राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री के पश्चात मुख्य सचिव का ही स्थान आता है।
- सरकार की समस्त महत्वपूर्ण फाइलें मुख्य सचिव के अनुमोदन के साथ ही आगे बढ़ती हैं।
प्रशासन में मुख्य सचिव की भूमिका
- सरकार द्वारा लागू नीतियों के क्रियान्वयन का दायित्व मुख्य सचिव पर होता है।
- मुख्य सचिव के पास विभिन्न विभागों के सचिवों की टीम होती है, जो विभागीय कार्यों को संभालती है।
- मुख्य सचिव आवश्यकतानुसार विभागों के कामकाज की समीक्षा करते हैं। प्रत्येक जनपद के जिलाधिकारी के कार्यों की मॉनिटरिंग करते हैं, जिससे जिला में योजनाओं का क्रियान्वयन सही ढंग से हो सके।
- सरकार की लगभग सभी बड़ी कमेटियों में मुख्य सचिव सम्मिलित होते हैं। आईएएस, आईपीएस और आईएफएस की प्रोन्नति कमेटी के भी मुखिया मुख्य सचिव होते हैं।
- मुख्यमंत्री के साथ लगभग सभी आधिकारिक बैठकों में मुख्य सचिव उपस्थित रहते हैं।
- भारत सरकार की कैबिनेट की बैठक में राज्य के मुख्य सचिव कैबिनेट सचिव की भूमिका में होते हैं। कैबिनेट में मुख्यमंत्री के बगल में मुख्य सचिव बैठते हैं, उनके बाद विभिन्न मंत्रीगण।
- मंत्रिपरिषद की बैठक में किस विषय को रखा जाना है, इसका निर्णय मुख्य सचिव करते हैं।
- कैबिनेट की बैठक से पूर्व समस्त विभाग अपने विषय मुख्य सचिव के पास भेजते हैं। मुख्य सचिव प्राथमिकता के आधार पर निर्णय लेते हैं कि किसे कैबिनेट की बैठक में रखा जाए।
- राज्य का मुख्य सचिव भारत सरकार के सचिव के बराबर होता है।
- मुख्य सचिव यदि केंद्र में डेपुटेशन पर जाता है तो उसे वहां सचिव का पद प्राप्त होता है।
चयन प्रक्रिया
- सामान्यतः राज्य के वरिष्ठतम् आईएएस अधिकारी को मुख्य सचिव बनाया जाता है, यद्यपि कई बार सरकारें कार्य-प्रदर्शन और पसंद-नापसंद के हिसाब से कम वरिष्ठ अधिकारी को भी मुख्य सचिव नियुक्त कर देती हैं।
- मुख्य सचिव पद पर नियुक्ति के लिए कुछ मानक भारत सरकार द्वारा निर्धारित किए गये हैं। उदाहरण- न्यूनतम 30 वर्ष की सेवा के बाद ही कोई आईएएस अधिकारी मुख्य सचिव पद हेतु पात्र हो सकता है।
मंडलायुक्त (Divisional commissioner)
- राज्य प्रशासन के महत्वपूर्ण इकाई के रूप में मण्डल (संभाग) को रखा जाता है, जिसका प्रशासनिक प्रमुख 'मंडलायुक्त' होता है।
- उत्तर प्रदेश में वर्तमान में कुल 18 मंडल हैं, जिनके नाम हैं- आगरा, अलीगढ़, आजमगढ़, अयोध्या, बरेली, बस्ती, चित्रकूट धाम, देवीपाटन, गोरखपुर, झाँसी, कानपुर, लखनऊ, मुरादाबाद, मेरठ, मिर्जापुर, प्रयागराज, सहारनपुर और वाराणसी।
- कई जिले मिलकर एक मंडल का निर्माण करते हैं। उदाहरण- आगरा, अलीगढ़, गोरखपुर, देवीपाटन, मुरादाबाद, प्रयागराज तथा वाराणसी मंडल में से प्रत्येक में चार जिले शामिल हैं, जबकि अन्य मंडलों में जिलों की संख्या इससे कम अथवा अधिक रखी गई है।
- मंडलायुक्त मंडल प्रशासन का मुखिया होता है। कुछ राज्यों में इसे 'राजस्व संभागी आयुक्त' अथवा 'क्षेत्रीय आयुक्त' के नाम से भी जाना जाता है।
- राज्य सरकार में मंडलायुक्त वस्तुतः सचिव अथवा प्रमुख सचिव रैंक का अधिकारी होता है। इस पद पर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी की नियुक्ति की जाती है। सामान्यतः कई वर्षों तक जिलाधिकारी अथवा समकक्ष पदों पर कार्य करने के पश्चात संबंधित अधिकारी को मंडलायुक्त पद पर नियुक्त किया जाता है।
- मंडलायुक्त अपने संभाग में भूमि राजस्व संग्रह, नहर राजस्व संग्रह तथा कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदार होता है।
प्रशासन में मंडलायुक्त की भूमिका
- मंडलायुक्त मुख्यतः मंडल स्तर पर जन शिकायतों का निस्तारण, समीक्षा तथा मुख्यमंत्री/मुख्य सचिव स्तर से जारी निर्देशों का पालन करते हैं।
- जनता से मुलाकात तथा उनकी समस्याओं का गुणवत्तापरक निस्तारण करते हैं।
- सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के अंतर्गत जनता द्वारा प्रेषित सूचना संबंधी प्रार्थना पत्रों का 30 दिनों के भीतर निस्तारण करते हैं।
- मण्डल की कानून एवं शान्ति व्यवस्था बनाये रखने का दायित्व मण्डलायुक्त पर होती है। यह लोक शिकायत समीक्षा प्रणाली का निवारण करते हैं।
- प्रतिमाह आयोजित मण्डलीय बैठकों में राज्य सरकार द्वारा प्रतिपादित योजनाओं का शत-प्रतिशत अनुपालन एवं निस्तारण कराने की योजना तैयार करते हैं।
- राजकीय देयों/वसूली संबंधी विशेष अभियान तथा लक्ष्य के सापेक्ष वसूली शत प्रतिशत कराना इनके दायित्व में शामिल है।
- भू-लेखों का समयानुसार रखरखाव सुनिश्चित करते हैं।
- भू-राजस्व और राजस्व के निपटान और अधीनस्थ कार्यालयों के समक्ष दायर आपराधिक मामलों का संग्रहण पर्यवेक्षण करते हैं।
- मण्डलायुक्त अधीनस्थ कार्यालयों का वार्षिक निरीक्षण के संचालन और बेहतर कामकाज के लिये संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
- सरकार द्वारा आरंभ की गई विभिन्न नई योजनाओं के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना इनके दायित्व में आता है।
- आपदा प्रबन्धन और राहत गतिविधियों में समन्वय और सम्पर्क स्थापित करते हैं।
- प्रशासन में नये तकनीकी प्रयोगों और अन्य नवाचारों को प्रोत्साहित करना इनके कार्यों में सम्मिलित है।
- विभिन्न सरकारी गतिविधियों में समन्वय और अभिसरण।
- समीक्षा और बेहतर कार्यान्वयन के लिये आवधिक बैठकों और सम्मेलनों का आयोजन करते हैं।
- अपीलीय और संशोधन के अधिकार क्षेत्र से संबंधित अदालत के काम का संपादन करते हैं।
जिलाधिकारी (District Magistrate)
- जिलाधिकारी जिला प्रशासन एवं राजस्व का मुखिया होता है। इसके पास संबंधित जिले की कानून व्यवस्था, चुनाव का संचालन, आपदा प्रबंधन, सार्वजनिक सेवा वितरण, शिकायत निवारण, विकास कार्यों की देखरेख और सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन का दायित्व होता है।
- जिलाधिकारी पद पर सामान्यतः वरिष्ठ आईएएस की नियुक्ति की जाती है। कई बार प्रोन्नति प्राप्त पीसीएस अधिकारी भी जिलाधिकारी बनाए जाते हैं, किन्तु इनकी तैनाती प्रायः छोटे जनपदों में होती है।
- जिलाधिकारी जनपद में कार्य कर रही विभिन्न सरकारी एजेंसियों के मध्य समन्वयक का कार्य भी करता है। भारत में जिलाधिकारी पद का सृजन 1772 में वारेन हेस्टिंग्स द्वारा किया गया था।
- यह राजस्व संगठनों का प्रमुख होता है। भूमि राजस्व वसूलना, सामान्य प्रशासन का निरीक्षण तथा जिले में कानून व्यवस्था बनाए रखना इसकी जिम्मेदारी होती है।
- जिलाधिकारी के दायित्व में भूमि का पंजीकरण, जोतों का विभाजन, विवादों के निपटारे, कृषकों को ऋण तथा अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराना, दिवालियां जागीरों का प्रबंधन तथा सूखा राहत उपलब्ध कराना आदि शामिल है।
- एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, मुख्यविकास अधिकारी (CDO) समेत जिले के अन्य सभी विभागाध्यक्ष एवं पदाधिकारी जिलाधिकारी के अधीनस्थ होते हैं। यह जिले का मुख्य प्रोटोकॉल अधिकारी होता है।
जिला मजिस्ट्रेट
- जिलाधिकारी जनपद स्तर पर कलेक्टर के साथ-साथ जिला मजिस्ट्रेट का भी कार्य करता है। जिला मजिस्ट्रेट होते हुए यह न्यायिक दायित्व निभाता है।
- जिला मजिस्ट्रेट होते हुए यह पुलिस और जनपद के अधीनस्थ न्यायालयों का निरीक्षण भी करता है।
- जिला मजिस्ट्रेट के रूप में यह जनपद के जेलों पर नियंत्रण रखता है।
- यह जनपद स्तर पर अस्त्र-शस्त्र एवं गोला बारूद के लिए लाइसेंस जारी करने का सर्वोच्च अधिकारी होता है।
उपजिलाधिकारी
- प्रशासन एवं राजस्व में तहसील स्तर पर यह जिलाधिकारी के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। वास्तव में यह अपनी तहसील अथवा सब-डिवीजन में लघु जिलाधिकारी के रूप में कार्य करता है।
- यह तहसीलदार और नायब तहसीलदारों के कार्यों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण रखता है।
- तहसील स्तर पर यह भू-राजस्व संबंधी विवादों को निपटाता तथा न्यायिक कार्य करता है।
- अपने अधिकार क्षेत्र में यह राजस्व, मजिस्ट्रेट, कार्यकारी तथा विकास मामलों से संबंधित उप-जिलाधिकारी की शक्तियां रखता है।
- इसके राजस्व कर्तव्यों में भूमि राजस्व के संग्रह के मूल्यांकन से संबंधित मामलों का पर्यवेक्षण और निरीक्षण शामिल है।
तहसीलदार/नायब तहसीलदार
- तहसील स्तर पर यह राजस्व प्रशासन के प्रमुख अधिकारी और सहायक उप-जिलाधिकारी के समान शक्तियां रखते हैं।
- इनका मुख्य कार्य राजस्व संग्रह, भूमि संबंधी विवादों का निपटारा, राजस्व रिकार्ड और फसल आंकड़े आदि रखना है।
- तहसीलदार और नायब तहसीलदार भूमि राजस्व तथा सरकार को देय अन्य बकाया राशि के संग्रह हेतु जिम्मेदार होते हैं।
- एक तहसीलदार के अधीन कई नायब तहसीलदार कार्य करते हैं।
सिटी मजिस्ट्रेट
- यह नगरीय क्षेत्र में जिलाधिकारी के तहत कार्य करने वाले प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होते हैं।
- जिलाधिकारी को यह प्रशासनिक कार्यों में सहायता करते हैं।
- जिलाधिकारी के कार्यालय संबंधी जिम्मेदारियों के तहत यह प्रायः मुख्यालय पर रहते हैं।
- यह जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं।
उत्तर-प्रदेश पुलिस
- लगभग 2,40,928 वर्ग किमी. क्षेत्रफल और 20 करोड़ से अधिक आबादी (2011 की जनगणना) के साथ उत्तर प्रदेश न केवल देश बल्कि दुनिया में सबसे बड़ा एकल पुलिस बल रखने वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश पुलिस राज्य में प्राथमिक कानून प्रवर्तन एजेंसी है, जिसकी स्थापना वर्ष 1863 में पुलिस महानिरीक्षक एकीकृत कार्यालय के रूप में, वर्ष 1861 के पुलिस अधिनियम के तहत हुई थी। वर्ष 1860 में एच.एम. कोर्ट के नेतृत्व में गठित पुलिस आयोग की अनुशंसाओं के परिणामस्वरूप वर्ष 1861 में पुलिस एक्ट अधिनियमित हुआ था।
- उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग का मुख्यालय प्रयागराज में है, जिसे अब प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सिग्नेचर बिल्डिंग में स्थानांतरित किया जा रहा है। इससे पूर्व वर्ष 1937 में मुख्यालय-पुलिस महानिरीक्षक का शिविर कार्यालय लखनऊ स्थानांतरित किया गया था और पुलिस मुख्यालय का काम देखने के लिए एक डीआईजी को वहां नियुक्त किया गया। पहले डीआईजी मुख्यालय थे-आर.एन. नरेश। बाद में डीआईजी का पद बढ़ाकर वर्ष 1983 में आईजी, फिर वर्ष 1992 में एडीजी स्तर का कर दिया गया।
- वर्ष 1861 से आज तक पुलिस अधिनियम में कई संशोधन हो चुके हैं, जिसने राज्य में पुलिस की वर्तमान स्थिति और संरचना को आकार दिया है। उत्तर प्रदेश पुलिस में 1400 से अधिक राजपत्रित अधिकारी और 2.38 लाख से अधिक गैर-राजपत्रित अधिकारी कार्यरत हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस का नेतृत्व पुलिस महानिदेशक (DGP) द्वारा किया जाता है, जो राज्य के सर्वोच्च रैंकिंग (आईपीएस कैडर) का अधिकारी होता है।
- एच.एम. कोर्ट उत्तर-पश्चिम प्रांत और अवध, जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश का क्षेत्र है, के प्रथम पुलिस महानिरीक्षक नियुक्त हुए थे। स्वतंत्रता के बाद बी.एन. लाहिड़ी प्रदेश के पहले भारतीय पुलिस महानिदेशक बने।
सार्वजनिक एवं कानून-व्यवस्था के बीच अन्तर
उच्चतम न्यायालय ने बड़े पैमाने पर एक समुदाय से सम्बन्धित व्यक्तिगत अपराध और सार्वजनिक व्यवस्था से सम्बन्धित कानून व्यवस्था के बीच विशिष्ट अंतर स्पष्ट किया है।
कानून व्यवस्था
इसमें पुलिस द्वारा किया जाने वाला किसी क्षेत्र की स्थिति का विश्लेषण, आपराधिक कानून के तहत दृढ़ता तथा दण्ड के लिये उनकी प्रतिबद्धता शामिल है।
सार्वजनिक व्यवस्था
यह जिला मजिस्ट्रेट का दायित्व है। सम्बन्धित क्षेत्र में हिंसा रोकने, सामुदायिक तनाव को कम करने तथा कानून-व्यवस्था भंग हुई है या नहीं, इसका आंकलन करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट जवाबदेह है।
उत्तर प्रदेश पुलिस : संगठन एवं संरचना
- राज्य में कानून-व्यवस्था को बनाये रखने के लिये राज्य को 8 पुलिस जोन में वर्गीकृत किया गया है। यह जोन हैं- आगरा, प्रयागराज, बरेली, गोरखपुर, कानपुर, लखनऊ, मेरठ तथा वाराणसी। प्रत्येक जोन का नेतृत्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADG) रैंक का अधिकारी करता है। प्रत्येक पुलिस जोन को दो से तीन पुलिस रेंज द्वारा गठित किया जाता है। प्रत्येक रेंज का नेतृत्व पुलिस महानिरीक्षक (IG) या पुलिस उप-महानिरीक्षक रैंक (DIG) के एक अधिकारी द्वारा किया जाता है।
- प्रत्येक रेंज का गठन लगभग दो से चार जिलों में होता है।
- यहाँ राज्य में कुल 75 जिले हैं। प्रत्येक जिले का नेतृत्व (लखनऊ और गौतमबुद्ध नगर को छोड़कर) पुलिस अधीक्षक या उप-पुलिस अधीक्षक द्वारा किया जाता है। उप-पुलिस अधीक्षक को पुलिस अधीक्षक, डिप्टी पुलिस अधीक्षक (DSP) या सह-पुलिस अधीक्षक (ASP) सहायता प्रदान करते हैं। जिले में पुलिस अधीक्षकों व डिप्टी पुलिस अधीक्षकों की संख्या, जिले के आकार, जनसंख्या तथा पुलिस के कार्यक्षेत्र पर निर्भर करती है। लखनऊ, कानपुर नगर, आगरा, गोरखपुर, वाराणसी, मेरठ, प्रयागराज में पुलिस अधीक्षकों एवं उप-पुलिस अधीक्षकों की संख्या अन्य जिलों की तुलना में अधिक हैं।
- पुलिस डिवीजन आगे पुलिस उपखण्डों एवं पुलिस क्षेत्रों (Circles) में विभाजित होता है। पुलिस सर्किल आमतौर पर उप-पुलिस अधीक्षक और सहायक पुलिस अधीक्षक रैंक के अधिकारी के नेतृत्व में होता है। पुलिस सर्किल उपखण्ड को नेतृत्व करने वाले अधिकारी को 'सर्किल ऑफिसर' (CO) के रूप में नामित किया जाता है। आमतौर पर 2 से 4 पुलिस स्टेशनों पर एक पुलिस सर्किल का गठन किया जाता है। पुलिस स्टेशन के प्रमुख पुलिस अधिकारी स्टेशन अधिकारी (SO) या स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) होते हैं। कानून व्यवस्था को बनाये रखने में उन्हें विभिन्न सब-इंस्पेक्टर, हेड कॉन्स्टेबल तथा कॉन्स्टेबलों द्वारा सहायता प्राप्त होती है। पुलिस स्टेशन के क्षेत्र में कई पुलिस चौकियाँ भी होती हैं, जो सब-इंस्पेक्टर के नेतृत्व में कार्य करती हैं।
प्रदेश के 7 शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली
राज्य सरकार ने कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त एवं लोकप्रिय बनाने के लिए प्रदेश के 7 शहरों- लखनऊ, गौतमबुद्ध नगर, वाराणसी, कानपुर, आगरा, प्रयागराज और गाजियाबाद में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू की है।
- पुलिस कमिश्नर प्रणाली वाले जनपदों में अपर पुलिस महानिदेशक स्तर का एक पुलिस आयुक्त तैनात किया जायेगा।
- लखनऊ में लखनऊ नगर और लखनऊ ग्रामीण नामक दो पुलिस जनपदों के गठन का निर्णय लिया गया है।
- उत्तर प्रदेश के सभी नगरों में अब तक दोहरी पुलिस प्रणाली (Duality) की व्यवस्था रही है, जो पुलिस अधिनियम 1861 पर आधारित है। औपनिवेशिक प्रणाली के तहत, एक जिला या समग्र क्षेत्र का प्रभारी जिलाधिकारी होता है एवं पुलिस अधीक्षक द्वारा सम्पूर्ण सूचना जिलाधिकारी को ही सौंपी जाती है। कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्ति, जैसे निवारक गिरफ्तारी के लिये आदेश जारी करना या धारा 144, सीआरपीसी लागू करने का अधिकार जिला मजिस्ट्रेट में निहित रहा है। यह पुलिस प्रशासन की दोहरी प्रणाली है।
क्या है पुलिस कमिश्नर प्रणाली?
- कमिश्नर प्रणाली में पुलिस आयुक्त एकीकृत पुलिस कमान्ड का प्रमुख होता है। इसमें आयुक्त, जिला मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट नहीं करता है।
- कार्यालय के पास विनिमय, नियंत्रण तथा लाइसेंसिंग के साथ मजिस्ट्रियल शक्तियाँ भी होती हैं।
- पुलिस आयुक्त को डीआईजी (डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल) रैंक या उसके ऊपर से लिया जाता है तथा इसे विशेष/संयुक्त/अतिरिक्त/ डिप्टी कमिश्नर द्वारा सहायता प्रदान की जाती है।
उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध एवं आतंकवाद
संगठित अपराध
- सुनियोजित ढंग से संगठित गिरोह बनाकर की जाने वाली आपराधिक क्रियाओं को संगठित अपराध की श्रेणी में रखा जाता है।
- संगठित अपराध में लूटपाट, डकैती, साइबर क्राइम, ड्रग तस्करी, आतंकवाद, भ्रष्टाचार तथा मनी लॉन्ड्रिंग जैसे कार्यों को शामिल किया जाता है।
- इस तरह के अपराध हेतु प्रायः कॉन्ट्रेक्ट कीलिंग, ड्रग तस्करी, वेश्यावृत्ति, जुआ आदि अवैध कार्यों से धन एकत्र किया जाता है।
- उत्तर प्रदेश संगठित अपराध के लिए राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पर हाल के वर्षों तक कुख्यात रहा है, किन्तु बीते आठ वर्षों में राज्य सरकार के 'जीरो टॉलरेंस' नीति के परिणामस्वरूप स्थिति बदल चुकी है। आज उत्तर प्रदेश में संगठित अपराधियों के अंतर्गत शासन सत्ता का भय स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
आतंकवाद
- राजनीतिक, धार्मिक अथवा वैचारिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हिंसा अथवा धमकी का उपयोग कर जनता अथवा सरकार को डराना आतंकवाद कहलाता है।
- उत्तर प्रदेश लंबे समय तक इस तरह के आतंकवाद से प्रभावित रहा है, यद्यपि हाल के वर्षों में इसमें तीव्रता से बदलाव आया है।
संगठित अपराध एवं आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई
- उत्तर प्रदेश सरकार ने संगठित अपराध, माफिया एवं आतंकवाद के विरुद्ध बीते आठ वर्षों में निर्णायक कार्रवाई किया है।
- प्रदेश की पुलिस ने बीते आठ वर्षों में 234 दुर्दांत अपराधियों को मुठभेड़ में मार गिराया, जबकि 79,984 अपराधियों के विरुद्ध गैंगस्टर एक्ट एवं 930 अपराधियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत कार्रवाई की गयी।
- प्रदेश सरकार ने अवैध रूप से अर्जित बेनामी संपत्तियों की पहचान कर उन्हें माफिया से मुक्त कराने का अभियान चलाया, जिसमें ₹ 142.46 अरब से अधिक मूल्य की संपत्तियों को जब्त व ध्वस्त किया गया।
- राज्य पुलिस ने इन आठ वर्षों (जून, 2025 तक) में कुल 14,741 मुठभेड़ की कार्रवाई की, जिसमें 30,293 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। एनकाउंटर की कार्रवाई में 9,202 अपराधी घायल हुए, जबकि 18 पुलिसकर्मी भी शहीद हुए।
- प्रदेश सरकार द्वारा इन आठ वर्षों में चिह्नित 68 माफिया के लंबित मुकदमों में पैरवी कर 73 अभियोगों में 31 माफिया और 74 सह अपराधियों को आजीवन कारावास व अर्थदंड की सजा दिलाई गई। इनमें से दो अपराधियों को फांसी की सजा हुई।
- प्रदेश में 68 चिह्नित माफिया और उनके गैंग के 617 सहयोगियों की गिरफ्तारी की गयी है।
भू-माफिया और आतंकवादियों पर कार्रवाई
- प्रदेश सरकार ने चार स्तरीय एंटी भू-माफिया टास्क फोर्स का गठन कर 66,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त कराया है।
- प्रशासन द्वारा 142 भू-माफिया को चिह्नित कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई।
- एसटीएफ ने वर्ष 2017 से अब तक 130 आतंकवादियों और 171 रोहिंग्या व बांग्लादेशी अपराधियों और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार किया है।
प्रदेश में अपराध कम करने के प्रयास
- उत्तर प्रदेश सरकार आपराधिक मामलों से निपटने के लिए विभिन्न स्तर पर प्रयास कर रही है, जिनके अच्छे परिणाम भी सामने आए हैं।
- जून, 2025 तक आपराधिक मामलों में 85 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गयी है।
पुलिस एनकाउंटर
- उत्तर प्रदेश पुलिस वर्तमान में अपराधियों के एनकाउंटर के लिए जानी जाती है। पुलिस एवं अपराधियों के बीच मुठभेड़ की घटनाएं आए दिन सामने आती हैं। पुलिस प्रशासन ऐसी मुठभेड़ों को जहां कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए आवश्यक मानता है, वहीं मानवाधिकार संगठन गैर न्यायोचित बताकर इनकी आलोचना करते हैं।
- विगत 8 वर्षों में प्रदेश में लगभग 12,964 एनकाउंटर संबंधी घटनाएं सामने आईं, जिनमें विकास दूबे समेत अनेक नामचीन अपराधी मौत के घाट उतार दिए गये। अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, विनोद उपाध्याय एवं मंगेश यादव की मृत्यु भी पुलिस कार्रवाई से जोड़कर देखी जाती है।
गुंडाराज से गुड गवर्नेस की ओर
- प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न माफियाओं के विरुद्ध प्रभावी अभियान चलाया जा रहा है। इन कार्रवाइयों में माफियाओं की परिसंपत्तियों को सीज करना, उनके घरों पर बुलडोजर चलाना एवं अवैध चल-अचल सम्पति को जब्त करना आदि शामिल है। इन कार्रवाई के परिणाम अब सबके सामने हैं। तमाम माफिया समूहों के कारण कुख्यात रहा उत्तर प्रदेश आज पुलिस प्रशासन के लिए उदाहरण माना जाता है।
- ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में जघन्य अपराधों में 85 प्रतिशत तक कमी आयी है।
- सख्त आपराधिक कानून एवं कड़ाई से उनके क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप चोरी, डकैती एवं अपहरण जैसी घटनाओं में कमी आयी है।
- राज्य में आपराधिक मामलों में गिरावट के पीछे सार्वजनिक निगरानी में बढ़ोतरी हेतु सीसीटीवी कैमरे लगाना, सक्षम एवं कुशल पुलिस कर्मियों की नियुक्ति, आधुनिक वाहन तथा पुलिस की बुनियादी व्यवस्था को मजबूत करने का परिणाम माना जा रहा है।
- राज्य में विगत 8 वर्षों में 8000 से अधिक पुलिस मुठभेड़ हुई, जिनमें 234 अपराधियों को मार गिराया गया, जबकि, 8,118 घायल हुए हैं।
माफियां साम्राज्य का अंत
- प्रदेश सरकार द्वारा गैंगस्टर एक्ट का सख्ती से पालन किया जा रहा है। अनेक कुख्यात माफिया या तो पुलिस मुठभेड़ में मार दिये गये अथवा प्रदेश छोड़ कर भाग गये। विधि प्रवर्तन एजेंसियों ने लगभग 68 माफियाओं के विरुद्ध 700 केस दर्ज किए हैं।
- उत्तर प्रदेश पुलिस ने अभियान चलाकर बड़े माफियाओं के दस हजार से अधिक हथियारों को जब्त किया है। इसका सीधा प्रभाव अपराधियों की ताकत में कमी के रूप में दिखाई दे रहा है।
पुलिस बलों की भर्ती
- कानून व्यवस्था को मजबूत बनाये रखने में पुलिस बलों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार समय-समय पर पुलिस भर्ती कर रही है। वर्तमान में, जून, 2025 तक, प्रदेश में 2.5 लाख से अधिक पुलिस बल तैनात किये जा चुके हैं।
उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की चुनौतियां
कानून व्यवस्था नागरिकों को सुरक्षित महसूस कराते हुए उन्हें अपराधों से बचाती है।
उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था से सम्बन्धित कई गंभीर चुनौतियाँ हैं, जिनमें प्रमुख हैं-
- जातीय हिंसा
- साम्प्रदायिक दंगे
- संगठित अपराध
- माओवादी एवं नक्सलवादी उग्रवाद
राजनीतिक दलों से संरक्षित अपराधियों एवं भू-माफियाओं द्वारा अपने हित में कानून व्यवस्था का उपयोग करना, उत्तर प्रदेश में एक गंभीर समस्या है।
उच्च अपराध दर
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) की ताजा रिपोर्ट (2024) में उत्तर प्रदेश को सर्वाधिक अपराध वाला राज्य बताया गया है, जहाँ प्रति व्यक्ति अपराध दर 7.41 है।
साम्प्रदायिक एवं जातीय तनाव
- कुछ राजनीतिक एवं साम्प्रदायिक दलों द्वारा धर्म-जाति के आधार पर समाज को बांटने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है, जिससे पुलिस प्रशासन को राज्य में कानून व्यवस्था बनाये रखने में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उदाहरणः हाल में इटावा में कतिपय गैर ब्राह्मण कथावाचकों के साथ सार्वजनिक रूप से दुर्व्यवहार संबंधी घटना के पश्चात उसके राजनीतिकरण के प्रयास किये गये। इस घटना की प्रतिक्रिया आगे कई क्षेत्रों में देखने को मिली।
- NCRB की रिपोर्ट के अनुसार दलितों के विरुद्ध अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश मध्यप्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है।
लैंगिक आधारित हिंसा
प्रदेश में महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर असुरक्षा, दहेज मृत्यु, बलात्कार के बाद जान से मारने या साक्ष्य मिटाने जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार राज्य की विभिन्न अदालतों में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के लगभग 13.81 लाख मामले विचाराधीन हैं।
न्याय में विलंब
उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ी जनसंख्या वाला राज्य है। यहां एक तरफ जहां अधिक आपराधिक घटनाएं होती हैं, वहीं न्यायालयों में भी उनके केस का निपटारा धीमी गति से किया जा रहा है। इस संबंध में वर्तमान स्थिति लगभग इस प्रकार है-
- कुल विचाराधीन मामले -1,13,72,136
- सिविल मामले -18,32,719
- आपराधिक मामले - 95,39,417
- उच्चन्यायालय में लंबित मामले -7,46,880
- अधीनस्थ अदालतों में लंबित मामले - 81,94,116
पुलिस का राजनीतिकरण
- पुलिस का राजनीतिकरण उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था के समक्ष बड़ी चुनौती है।
- उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को प्रभावित करने में राजनीतिक दलों और उनके प्रतिनिधियों द्वारा किए जाने वाले अनधिकृत हस्तक्षेप की बड़ी भूमिका है। यह कार्य पुलिस जांच प्रक्रिया को प्रभावित कर कई बार वास्तविक अपराधी को बचाते हुए बेकसूर व्यक्ति को सजा दिलाने के लिए किया जाता है।
संगठित अपराध
उत्तर प्रदेश में कई आपराधिक गिरोह सक्रिय हैं, जो जबरन वसूली, अपहरण एवं हत्या जैसी घटनाओं में संलग्न रहते हैं। पुलिस बलों के समक्ष इस तरह की घटनाएं गंभीर चुनौती बन चुकी हैं।
शस्त्र की अधिकता
- एनसीआरबी (NCRB) रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश शस्त्र पंजीकरण के मामले में देश के समस्त राज्यों में शीर्ष पर (15.7 प्रति लाख) है, जो राष्ट्रीय औसत से भी ऊपर है। माना जाता है कि शस्त्र की अधिकता से अपराध में वृद्धि होती है।
साइबर हिंसा
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार उत्तर प्रदेश साइबर अपराध के मामलों में देश के राज्यों में 8वें स्थान पर है। यहां वर्ष 2023 में 6,09,511 साइबर अपराध की शिकायतें दर्ज की गयीं, जिसमें 84.53 प्रतिशत धोखाधड़ी से जुड़ी थीं।
प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली
कानून व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश के 7 जिलों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली की शुरुआत की गयी है। इस सिस्टम में जिलाधिकारी के कई अधिकार पुलिस कमिश्नर को प्राप्त हो जाते हैं, जैसे लाठी चार्ज या फायरिंग आदि।
सतत निगरानी
- एंटी रोमियो स्क्वाड का गठन कर प्रदेश में महिलाओं के साथ होने वाली छेड़खानी या उत्पीड़न में कमी लायी गयी है।
- अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने एवं उनके आपराधिक रिकार्ड को अपडेट करने हेतु प्रदेश में सीसीटीएनएस (क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एण्ड सिस्टम) कार्यक्रम शुरु किया गया है।
- प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ आर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट, उत्तर प्रदेश गिरोह बंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधि० 1986, संशोधन अध्यादेश खण्ड पारित कर कानून व्यवस्था को मजबूत किया है।
हेल्पलाइन नम्बर-112
- एकीकृत स्वास्थ्य आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर-112 उत्तर प्रदेश में नवम्बर, 2019 से शुरू हुई।
- यह पुलिस, चिकित्सा, आग, आपदा, महिलाओं की मदद, रेलवे पुलिस जैसी आपातकालीन सेवायें प्रदान करेगा।
- अब लोगों को कई आपातकालीन नंबर याद रखने की जरूरत नहीं, वे सीधे घटना के सम्बन्ध में डॉयल 112 पर कॉल कर सकते हैं।
- इसे आपातकालीन प्रतिक्रिया समर्थन प्रणाली (ईआरएसएस) के तहत लागू किया गया है।
उत्तर प्रदेश पुलिस के यूनिट विंग
- क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (सीआईडी)
- भ्रष्टाचार विरोधी संगठन (एसीओ)
- मानवाधिकार आयोग (एचआरसी)
- आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस)
- खुफिया विभाग (आईडी)
- विशेष हथियार व रणनीति (एसडब्ल्यूएटी)
- विशेष जाँच दल (एसआईटी)
- उत्तर-प्रदेश होमगार्ड
- राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ)
- उत्तर-प्रदेश अग्निशमन सेवा
- डॉयल 112 सेवायें
- यातायात निदेशालय इत्यादि
केन्द्रीय पुलिस विश्वविद्यालय
- देश का पहला केन्द्रीय पुलिस विश्वविद्यालय ग्रेटर नोएडा में केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा स्थापित किया जा रहा है।
- राज्य सरकार ने इस विश्वविद्यालय के लिये यमुना एक्सप्रेस-वे के पास 100 एकड़ की भूमि आवंटित की है।
- यह विश्वविद्यालय पुलिसिंग, आंतरिक सुरक्षा, साइबर अपराध और फॉरेसिंक विज्ञान पर स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम प्रदान करेगा।
- इस विश्वविद्यालय का मुख्य ध्यान पुलिसिंग के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास पर होगा। यह व्यवहारिक विज्ञान से सम्बंधित कौशल तथा ज्ञान के आधार के विकास पर ध्यान केन्द्रित करने में मदद करेगा।
उत्तर प्रदेश में पुलिस सुधार
उत्तर प्रदेश में पुलिस व्यवस्था एक औपनिवेशिक विरासत है। देश में पहला भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 में, वर्ष 1857 के विद्रोह के तुरन्त बाद बनाया गया था। भारत के लोग अभी भी वर्ष 1861 के इसी अधिनियम द्वारा शासित हैं। वर्ष 1977 में सरकार द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने कहा कि आजादी के बाद देश में कई परिवर्तन हुए हैं, किन्तु देश में राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन होने के बावजूद स्वतंत्र पुलिस व्यवस्था की व्यापक समीक्षा नहीं हुई। एनपीसी की अधिकांश सिफारिशें अभी तक उत्तर प्रदेश में लागू नहीं की गई हैं।
उत्तर प्रदेश पुलिस में समस्याएँ एवं मुद्दे
- पुलिस प्रणाली पर राजनैतिक नियन्त्रण।
- पुलिस बल पर अनेक अतिरिक्त बोझ।
- सुविधाओं में कमी (आदमी एवं सामग्री दोनों के संदर्भ में)।
- राजनीति का अपराधीकरण एवं पुलिस के साथ उसकी सांठगांठ।
- आंतरिक प्रबंधन प्रणाली निष्पक्ष एवं पारदर्शी नहीं है।
- जनता की शिकायतों को ठीक से संयोजित नहीं किया जाता है।
- निचले स्तर के पुलिस वालों के रहने की खराब स्थिति।
- रिक्तियों का पूर्ण रूप से न भरना।
- जनता का कम भरोसा।
- जांच-पड़ताल की कमजोर तथा अप्रचलित तकनीक।
- साइबर क्राइम, कृत्रिम अपराध, उपकरणों के उपयोग जैसी नई सेवाओं के प्रशिक्षण में भारी कमी।
- पुलिस में प्रचलित भ्रष्टाचार।
पुलिस सुधार : उच्चतम न्यायालय के निर्देश
उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में केन्द्र तथा राज्य सरकार को यह निर्देश दिया कि नीचे लिखे सात निर्देशों का पालन करें, जिससे पुलिस सुधारों को शुरू करने के लिये व्यवहारिक तंत्र का विकास हो सके-
- एक राज्य सुरक्षा कमीशन का गठन कर व्यापक नीति, दिशा निर्देशों का पालन करना तथा यह सुनिश्चित करना कि राज्य सरकार पुलिस पर अवांछित प्रभाव या दबाव न डाले।
- डीजीपी (डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस) के लिये दो साल की शर्तें तय करना तथा योग्यता के आधार पर पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्ति।
- पुलिस अधीक्षकों एवं स्टेशन हाउस अधिकारियों (एसएचओ) के लिये न्यूनतम दो वर्षों तक किसी भी एक जिले अथवा पुलिस स्टेशनों पर नियुक्ति तय करना।
- पुलिस अधिकारियों के ट्रांसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन और सेवा सम्बंधी अन्य मामलों तथा डीएसपी पद के नीचे तथा ऊपर के रैंक के अधिकारियों की पोस्टिंग तथा ट्रांसफर पर सिफारिश करने के लिये पुलिस स्थापना बोर्ड का गठन करना।
- पुलिस की अलग जाँच तथा कानून व्यवस्था।
- राज्य व जिलों के लिये पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन।
- केन्द्रीय पुलिस संगठन के प्रमुख के चयन और नियुक्ति के लिये एक पैनल तैयार करने हेतु केन्द्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन।
उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद केन्द्र सरकार 'मॉडल पुलिस बिल 2006' लेकर आयी। इसे पूरे राज्य में प्रसारित किया गया। इसमें यह उम्मीद व्यक्त की गयी थी कि राज्य सरकारें वास्तव में मॉडल पुलिस बिल 2006 और उच्चतम न्यायालय के पुलिस सुधारों के निर्देशों से सर्वोत्तम तत्वों को लेकर अपने स्वयं के पुलिस कानून का पालन करेंगी। हालांकि यह राज्य सरकार की राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण कभी सम्भव नहीं हुआ।
प्रदेश पुलिस व्यवस्था में सुधार के सुझाव
- मॉडल पुलिस बिल 2006 को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अक्षरशः लागू किया जाना चाहिए।
- राजनीति और आपराधिक गठजोड़ को तोड़ा जाना चाहिए तथा सुधारों को राजनीतिक प्रणाली के साथ शुरू किया जाना चाहिए।
- कानून व्यवस्था और जांच को अलग करने की जरूरत है।
- साईबर क्राइम, डॉटा बेस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आदि में प्रशिक्षण की आवश्यकता के अनुसार पुलिस बलों को आधुनिक बनाने की आवश्यकता है।
- बलात्कार, हत्या जैसे मामलों के दौरान जनता के साथ पूछताछ करते समय पुलिस की संवेदनशीलता विशेष रूप से होनी चाहिए।
- राज्य सरकार को बुनियादी ढांचे में सुधार करने और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिये पुलिस के वित्त पोषण में वृद्धि करनी चाहिए।
- राज्य सरकार को पुलिस में व्याप्त कदाचार के मामले को देखने के लिये स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण स्थापित करना चाहिए।
- मेनन कमेटी (2007) और मलीमथ कमेटी (2001-03) की सिफारिश के अनुसार एक लॉ बोर्ड का गठन कर राज्य में आपराधिक न्याय प्रणाली को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
- पुलिस सुधारों पर प्रकाश सिंह मामले से सम्बन्धित वर्ष 2006 में उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों को राज्य सरकार द्वारा लागू किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
राज्य में हाल की उत्तर प्रदेश पुलिस की एनकाउंटर की घटनाओं, विशेषकर विकास दुबे मामले, के पश्चात पुलिस की नैतिकता तथा उसके राजनीतिक नियंत्रण पर गम्भीर सवाल उठे हैं। कानून-व्यवस्था तथा लोकतन्त्र में नागरिकों के विश्वास को बनाये रखने तथा कानून के शासन के लिये पुलिस व्यवस्था में सुधार का यह एक सही समय है।
उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश - 2020
उत्तर प्रदेश सरकार ने 24 नवंबर, 2020 को कैबिनेट की बैठक में 'उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020' को मंजूरी दी। अध्यादेश के महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं-
- शादी करने के लिए बलपूर्वक या दबाव डालकर अथवा धोखा देकर धर्म परिवर्तन कराने पर 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान होगा।
- यह सिद्ध होने पर कि महिला का धर्म परिवर्तन किसी दबाव, धोखे, लालच या मात्र शादी करने के लिए नहीं कराया गया है, तो आरोपी को ₹ 15 हजार के जुर्माने के साथ 1 से 5 साल तक की सजा हो सकती है।
- अगर महिला अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समाज से है, तो ऐसी दशा में न्यूनतम 3 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा और ₹ 25 हजार जुर्माने का प्रावधान है।
- सामूहिक तौर पर धर्म परिवर्तन कराये जाने के मामले में न्यूनतम 3 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा और ₹ 50 हजार जुर्माने का प्रावधान है।
- धर्म परिवर्तन के इच्छुक व्यक्ति को जिला मजिस्ट्रेट को 2 माह पूर्व सूचना देनी होगी। उल्लंघन किए जाने पर न्यूनतम 6 माह और अधिकतम 3 वर्ष की सजा का प्रावधान है।
सीआईएसएफ की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में यूपीएसएसएफ का गठन
- उत्तर प्रदेश में केंद्रीय सुरक्षा बल सीआईएसएफ (CISF) की तर्ज पर 'उत्तर प्रदेश स्पेशल सिक्योरिटी फोर्स' (UPSSF) का गठन जून, 2021 में किया गया। योजना के प्रथम चरण में यूपीएसएसएफ की 5 बटालियन तैयार की गयी है, जिसमें लखनऊ, गोरखपुर, प्रयागराज, मथुरा और सहारनपुर बटालियन शामिल हैं। इन बटालियन में कुल मिलाकर 9,919 जवान शामिल किये गए हैं।
- राज्य सरकार ने 13 सितंबर, 2020 को उत्तर प्रदेश विशेष सुरक्षा बल (Uttar Pradesh Special Security Force-UPSSF) गठित करने का निर्णय लिया था।
- यह उच्च न्यायालय, जिला अदालतों, प्रशासनिक कार्यालयों और भवनों, मेट्रो रेल, हवाई अड्डों, बैंकों, वित्तीय संस्थानों, शैक्षणिक संस्थानों और औद्योगिक इकाइयों को सुरक्षा प्रदान करेगा।
- उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार यूपीएसएसएफ के गठन का उद्देश्य राज्य की संवेदनशील भवनों, धार्मिक स्थलों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करना है।
- ताजा निर्णय के अनुसार अयोध्या स्थित राम मंदिर परिसर समेत अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक/धार्मिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था यूपीएसएसएफ को सौंप दी गयी है।
- राज्य सरकार की सूचना के अनुसार यूपीएसएसएफ के गठन पर वार्षिक लगभग ₹ 1,747 करोड़ व्यय होंगे।
- यूपीएसएसएफ के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस और पीएसी के सर्वश्रेष्ठ जवानों को चुना गया है। इन जवानों को सेन्ट्रल एजेंसीज के स्पेशल कमांडोज जैसी ट्रेनिंग दी गई है। इसमें शामिल जवानों को अत्याधुनिक हथियार चलाने से लेकर क्राइसिस मैनेजमेंट तक का प्रशिक्षण दिया गया है।
- यूपीएसएसएफ के अपने डॉग स्क्वाड और बम निरोधक दस्ते भी हैं। यूपीएसएसएफ की पहली बटालियन लखनऊ मेट्रो की सुरक्षा में तैनात की गयी।
- यूपीएसएसएफ को ऐसे अनेक अधिकार प्रदान किये गये हैं, जो उत्तर प्रदेश पुलिस के पास भी नहीं हैं।
- यूपीएसएसएफ बिना वारंट किसी की गिरफ्तारी और तलाशी ले सकती है। सरकार के अनुसार क्राइसिस मैनेजमेंट और आपात स्थिति के लिए यूपीएसएसएफ के पास यह शक्तियां आवश्यक थीं। इस तरह की शक्तियां मात्र चुनिंदा केंद्रीय एजेंसियों के पास हैं।
यूपीएसएसएफ की आवश्यकता
- उत्तर प्रदेश की तमाम संवेदनशील जगहों, धार्मिक स्थलों से लेकर सरकारी प्रतिष्ठानों, मेट्रो स्टेशन और कोर्ट में अभी सिविल पुलिस के अतिरिक्त सीआरपीएफ और आरएएफ के जवान तैनात किए गए हैं, किन्तु यह केंद्रीय एजेंसियां हैं। ऐसे में कई बार प्रदेश सरकार के साथ इनके तालमेल में दिक्कतें होती रही हैं।
- राज्य सरकार ने अयोध्या में वर्ष 1990 में हुई घटना से भी सबक लिया, जिसके बाद प्रदेश में सीआरपीएफ की तर्ज पर यूपीएसएसएफ के गठन का निर्णय लिया गया।
उत्तर प्रदेश पुलिस: कानून व्यवस्था में सुधार के प्रयास एवं उपलब्धियां
- उत्तर प्रदेश में बीते कुछ वर्षों के अन्दर कानून व्यवस्था में सुधार के जो प्रयास किये गये, उससे सरकार के 'साम्प्रदायिक हिंसा एवं माफिया राज से मुक्त प्रदेश' के दावों को बल मिला है।
- वर्ष 2023-24 में शासन-प्रशासन की सख्ती ने अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, विजय मिश्रा, संजय सिंघला, अनुपम दुबे जैसे अनेक माफियाओं के आतंक से प्रदेश को राहत दिलाने का कार्य किया। इससे पूर्व विकास दुबे तथा कई अन्य अपराधियों के भय को समाप्त करने का कार्य किया गया। इन कार्रवाइयों का परिणाम प्रदेश में आपराधिक घटनाओं में कमी के रूप में देखा जा सकता है।
- सरकारी आंकड़ों के अनुसार गैंगस्टर अधिनियम के अन्तर्गत मार्च, 2017 से दिसम्बर, 2023 तक कुल 22,301 दुर्दांत अपराधियों के विरुद्ध अभियोग पंजीकृत किये गये, जिनमें से 70,879 को गिरफ्तार किया गया। अभियुक्तों से इस दौरान ₹ 120 अरब से अधिक की संपत्ति जब्त की गयी। पुलिस के साथ मुठभेड़ में 192 अपराधी मारे गये, जबकि 5800 घायल हुए।
- महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने हेतु प्रदेश पुलिस द्वारा 1,698 एंटी रोमियो स्क्वाड गठित किए गये हैं, जिन्होंने दिसंबर, 2023 तक प्रदेश भर में 21,422 मुकदमे दर्ज किये।
- प्रदेश के समस्त जनपदों के 1,584 थानों में महिला हेल्प डेस्क तथा 18 जोनल ऑफिसेज में महिला साइबर सेल की स्थापना की गयी है।
- बढ़ते साइबर क्राइम पर नियंत्रण के उद्देश्य से 28 फरवरी, 2024 को उत्तर प्रदेश के 57 जिलों में साइबर थानों का आरम्भ किया गया। डीजीपी कार्यालय में साइबर क्राइम मुख्यालय की स्थापना की गयी है।
- प्रदेश के समस्त 1,523 थानों में साइबर सेल का गठन किया गया है, जिससे अपराधियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई हो सके।
- उत्तर पुलिस की प्रमुख नीति राज्य में कानून व्यवस्था को मजबूत एवं अपराधियों में कानून का भय पैदा करना है। राज्य सरकार ने इसके लिये निम्न कदम उठाये हैं-
सेफ सिटी परियोजना
- प्रदेश सरकार द्वारा नगरों एवं उपनगरों में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से 'सेफ सिटी परियोजना' आरंभ की गयी है।
- परियोजना के प्रथम चरण में 17 नगर निगमों तथा गौतमबुद्ध नगर में इंटीग्रेशन हेतु 21,968 कैमरे लगाए गए हैं, जिनमें 15,732 को कंट्रोलरूम से इन्टीग्रेट किया जा चुका है। सीसीटीवी सर्विलांस से जहां अपराधों में कमी आयी है, वही आपराधिक घटनाओं को पता लगाने में भी तेजी देखी जा रही है।
महत्वपूर्ण स्थलों की सुरक्षा में AI ड्रोन 'गरुण' का प्रयोग
- उत्तर प्रदेश पुलिस अयोध्या तथा अन्य महत्वपूर्ण स्थलों की सुरक्षा हेतु AI तकनीक से लैस 'गरुण' ड्रोन का प्रयोग कर रही है। यह ड्रोन मिलिंद ने डिजाइन किया है।
- 'गरुण' ड्रोन में स्पीकर हैं। इसकी रेंज 8 किमी. है। इसमें हूटर भी है और यह पब्लिक एड्रेस का काम करता है।
- गरुण पुलिस सिस्टम से अटैच रहता है, जिससे सुरक्षा बल को सारी जानकारी मिलती रहती है। अगर कोई एंटी सोशल एलिमेंट 'गरुण' के रेंज में आता है तो उसकी जानकारी सुरक्षाकर्मियों तक तुरंत पहुंच जाती है।
- गरुण ड्रोन के माध्यम से अपराधियों के चेहरे पहचाने जा सकते हैं।
- उत्तर प्रदेश में पहली बार सुरक्षा हेतु पुलिस AI तकनीक युक्त ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है। यह यूपी पुलिस की एयर पुलिसिंग है।
उत्तर-प्रदेश पुलिस ऑनलाइन नागरिक सेवायें
उत्तर प्रदेश पुलिस अपने नागरिकों को निम्नलिखित ऑनलाइन सेवायें प्रदान करती है-
- शिकायत पंजीकरण
- ई-एफआईआर (e-FIR)
- चरित्र सत्यापन
- किरायेदार/पीजी/घरेलू मदद/कर्मचारी सत्यापन
- ईवेन्ट/प्रोग्राम का अनुरोध
- हड़ताल/धरना/प्रसंस्करण निवेदन
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट अनुरोध
- साइबर क्राइम
- आपातकालीन हेल्पलाइन
- लापता व्यक्ति/अज्ञात शव की पहचान इत्यादि।
राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड (NATGRID)
इस परियोजना का उद्देश्य एजेंसियों जैसे-आयकर विभाग, बैंकों, बीमा कम्पनियों, भारतीय रेलवे, क्रेडिट कार्ड लेन-देन और एजेंसियों के साथ संग्रहित डेटा से वास्तविक समय की जानकारी का उपयोग करने के लिये एजेंसियों में जांच तथा कानून की अनुमति देना है।
यह वर्ष 2008 के मुम्बई हमले के बाद अस्तित्व में आया तथा अब इसका इस्तेमाल आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिये भी किया जा रहा है।
अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति
- यूपी पुलिस द्वारा अपराधियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति के तहत प्रभावी एवं त्वरित कार्यवाही की गयी है। परिणामस्वरूप, 18000 से ज्यादा अपराधियों ने मार्च, 2017 से अगस्त, 2019 के बीच न्यायालय में समर्पण किये तथा कोर्ट द्वारा ज़मानत को खारिज कर उन्हें जेल भेज दिया गया है।
- मार्च, 2017 से अगस्त, 2019 के बीच 430 लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत मामले दर्ज किए गए।
- मार्च, 2017 से अगस्त, 2019 के बीच पुलिस एवं अपराधियों के बीच 4600 से ज्यादा मुठभेड़ हुई, जिनमें 10,000 से अधिक अपराधियों की गिरफ्तारी हुई है तथा 94 अपराधी मारे गये हैं।
- राज्य सरकार द्वारा प्रदेश को 100 प्रतिशत अपराध मुक्त बनाने का निर्देश दिया गया है। पहली बार ऐसा हुआ है कि पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में एफआईआर रजिस्टर करने के लिये एक काउंटर की स्थापना की गई है।
- राज्य पुलिस ने अवैध हथियार रखने के खिलाफ कदम उठाये हैं तथा इसके तहत अवैध सम्पत्तियों को जब्त भी किया गया।
- उत्तर प्रदेश पुलिस राज्य में नक्सली दस्तक गतिविधियों को नियंत्रित करने में सफल रही है। इसके लिए पड़ोसी राज्यों के साथ उचित समन्वय स्थापित किया गया है। नेपाल की सीमा पर माओवादी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
एंटी-रोमियों स्क्वाड
- महिलाओं एवं लड़कियों से छेड़-छाड़ की घटनाओं को कम करने के लिये राज्य सरकार ने एंटी रोमियों स्क्वाड की स्थापना की है।
- मार्च, 2017 से सितम्बर, 2019 के बीच इसके तहत 4500 से अधिक मामले रजिस्टर हुए तथा 7400 से अधिक लोगों के ऊपर इसके तहत कार्यवाही की गयी है।
- वर्ष 2019 के जुलाई महीने में महिलाओं एवं लड़कियों में सुरक्षा की जागरुकता के लिये “महिला सम्मान प्रकोष्ठ” को लांच किया गया। इस कार्यक्रम में 30 लाख से ज्यादा लड़कियों ने हिस्सा लिया था।
- तीन महिला बटालियन को लखनऊ, गोरखपुर एवं बदायूँ में स्थापित करने का निर्णय लिया गया है।
- “महिला सम्मान प्रकोष्ठ” द्वारा राज्य स्तर पर महिलाओं के सुरक्षा के लिये तीन ऑपरेशन- ऑपरेशन मुस्कान, ऑपरेशन आत्मरक्षा और ऑपरेशन विध्वंस को स्थापित किया गया है।
- विशेष किशोर पुलिस इकाइयों एवं मानव तस्करी विरोधी इकाइयों के सम्बन्ध में मासिक समीक्षा बैठक की एक प्रणाली विकसित की गई है।
- राज्य में महिला सुरक्षा के लिये ‘महिला शक्ति लाइन 1090’ को एफआईसीसीआई (FICCI) विशेष पुलिसिंग अवार्ड 2019 में, विशेष जूरी अवार्ड से सम्मानित किया गया है।
मिशन शक्ति
उत्तर प्रदेश में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम के लिए विशेष अभियान के रूप में 'मिशन शक्ति' की शुरुआत अक्टूबर, 2020 में की गई। इस अभियान के पहले चरण में इच्छुक स्वयं-सेवी संस्थाओं एवं व्यावसायिक संगठनों आदि का सहयोग लेते हुए महिला सुरक्षा व सशक्तिकरण के संबंध में व्यापक जागरुकता कार्यक्रमों का आयोजन पुलिस द्वारा किया गया। इस मिशन के दूसरे चरण में कड़ी कार्यवाही ‘ऑपरेशन शक्ति’ के अंतर्गत की जाएगी।
एटीएस तथा एसटीएफ का सुदृढ़ीकरण
- आतंकी गतिविधियों एवं अपराधियों के खिलाफ ए.टी.एस. को और अधिक प्रभावी बनाने के लिये विशेष पुलिस ऑपरेशन टीम (एसपीओटी) का गठन किया गया है।
- राज्य में अपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिये केन्द्रित लाइन अपराधिक डेटाबेस पहचान ऐप ‘त्रिनेत्र’ विकसित किया गया है। यह ऐप कृत्रिम इंटेलिजेंस, बड़े डाटा, नेटवर्क-तार एवं चेहरा पहचानने वाले टूल्स से सुसज्जित है। यह राज्य के 5 लाख से अधिक अपराधियों का डाटा संरक्षित करता है। यह ऐप यूपी पुलिस द्वारा विकसित किया गया है। इसे एफआईसीसीआई स्मार्ट पुलिसिंग पुरस्कार 2019 से सम्मानित किया गया है।
- सामान्य नागरिक सुविधाओं की दृष्टि से ‘यूपी कॉप’ मोबाइल ऐप लांच किया गया है।
सोशल मीडिया पर सतर्क नजर
- उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से, फैलाई जा रही अफवाहों को रोकने के उद्देश्य से प्रदेश के सभी पुलिस स्टेशनों में ‘डिजिटल वॉलिंटियर’ नाम से एक व्हाट्सऐप ग्रुप का गठन किया गया है।
- महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध की रोकथाम के लिये साइबर फॉरेंसिक लैब सह-प्रशिक्षण केन्द्र क्षमता के निर्माण के लिये ₹ 470.85 लाख की राशि मंजूर की गयी है।
- मार्च, 2018 से जुलाई, 2019 के मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों से ट्विटर के माध्यम से 6400 से ज्यादा एफआईआर दर्ज किये गये।
- अप्रवासी भारतीयों के लिये एक अलग ट्विटर हैंडल 'यूपी पीओएल एनआरआई' को लांच किया गया है।
उपलब्धियां
- प्रदेश सरकार द्वारा अपराध एवं अपराधियों के विरुद्ध चलाए जा रहे सघन अभियान के सकारात्मक परिणाम सामने आए है। अपराधिक घटनाओं में कमी दर्ज की गयी है।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा दिसम्बर, 2023 में प्रकाशित रिपोर्ट 'क्राइम इन इंडिया 2022' के अनुसार बीते वर्ष के दौरान भारत में कुल 35,61,379 अपराध पंजीकृत हुए, जिनमें से 4,01,787 अपराध उत्तर प्रदेश में घटित हुए।
- राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार वर्ष 2022-23 में पूरे देश का क्राइम रेट जहां 258.1 प्रतिशत रहा, वहीं उत्तर प्रदेश में यह 171.6 प्रतिशत दर्ज किया गया।
- आपराधिक मुकदमों के आधार पर उत्तर प्रदेश देश के अन्य राज्यों की तुलना में 20वें स्थान पर है, जबकि यह देश में सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य है।
- हत्या, हत्या का प्रयास तथा फिरौती हेतु अपहरण जैसे जघन्य अपराधों में उत्तर प्रदेश की रैंकिंग देश के राज्यों में 25वीं है। इसके आधार पर एनसीआरबी का निष्कर्ष है कि अन्य राज्यों की अपेक्षा यूपी में अपराध पर अधिक नियंत्रण हुआ है।
- महिला संबंधी अपराधों में सजा दिलाने के मामले में उत्तर प्रदेश देश के बड़े राज्यों में आगे है।
नागरिक सुरक्षा (Civil Defense)
'नागरिक सुरक्षा' आपातकालीन परिस्थितियों एवं खतरों से नागरिक आबादी की रक्षा करने एवं शत्रुतापूर्ण अथवा प्राकृतिक आपदाओं के तत्काल प्रभाव से उन्हें उबारने का कार्य करता है। इस तरह यह प्राकृतिक (बाढ़, भूकंप, तूफान, रोग संक्रमण, अग्नि कांड आदि) अथवा मनुष्यजन्य (युद्ध, आतंकी हमले आदि) आपदाओं के विरुद्ध मानवीय कार्यों के प्रदर्शन को दर्शाता है।
वैश्विक स्तर पर नागरिक सुरक्षा का प्रथम प्रयोग प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) के दौरान जर्मनी के हमले से प्रभावित यूनाइटेड किंगडम के नागरिकों के बचाव हेतु किया गया था।
भारत में इसकी आवश्यकता सर्वप्रथम 1962 में भारत पर चीन आक्रमण के समय महसूस की गई। बाद में 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय भी हमलों में घायल हुए तमाम लोगों को बचाने के लिए इसे माध्यम बनाने का प्रयास किया गया।
भारत में आज यह नागरिक सुरक्षा अधिनियम (केन्द्रीय अधिनियम-27) 1968 और संबंधित नियमों-विनियमों के तहत कार्य करता है।
उद्देश्य
नागरिक सुरक्षा का मुख्य उद्देश्य है-
- जीवन बचाना
- आपदा में संपत्ति की क्षति को न्यूनतम करना।
- उत्पादन की निरंतरता बनाए रखना।
- शत्रुतापूर्ण हमले के दौरान प्रभावित लोगों के मनोबल को बढ़ाना।
नागरिक सुरक्षा मूलरूप से स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता है, यद्यपि इसे भारतीय रक्षा दल के अभिन्न अंग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
सरकार द्वारा नागरिक सुरक्षा संगठनों के माध्यम से आपदा के समय बचाव हेतु जहां नियोजन, मार्गदर्शन, प्रशिक्षण व अन्य प्रावधान किये जा रहे हैं, वहीं नागरिकों को जनशक्ति, नेतृत्व और उत्साह प्रदान करने के अभियान भी चलाये जाते हैं।
संरचना
- नागरिक सुरक्षा संगठन स्वयंसेवकों की मदद से स्थानीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
- इनके स्वयंसेवक राज्य या केंद्र के नियमित और वेतनभोगी कर्मचारी नहीं होते, न ही उन्हें कोई वेतन आदि मिलता है।
- इनकी सेवाएँ अनुमन्य हैं, अतः इनसे जो भी सेवाएँ ली जाती हैं, वह स्वयंसेवकों के रूप में ली जाती हैं, न कि नियमित वेतनभोगी अधिकारी/कर्मचारी के रूप में।
- वेतनभोगी अधिकारी/कर्मचारी के रूप में विभाग के लिए अनुमोदित कर्मचारियों के कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व इस प्रकार हैं-
निदेशक
- यह नागरिक सुरक्षा विभाग का प्रमुख होता है। इसमें सरकार द्वारा विभाग प्रमुख को प्रदत्त सभी शक्तियाँ निहित होती हैं।
- सरकार की नीतियों के कार्यान्वयन, विभाग के संपूर्ण बजट और गतिविधियों पर नियंत्रण की जिम्मेदारी निदेशक, नागरिक सुरक्षा पर होती है।
संयुक्त निदेशक
- संयुक्त निदेशक को नागरिक सुरक्षा निदेशालय के कार्यालय प्रमुख का अधिकार प्राप्त होता है।
- संयुक्त निदेशक, नागरिक सुरक्षा निदेशालय के पास सभी इकाइयों में सहायक उप नियंत्रक (वरिष्ठ वेतनमान), सहायक उप नियंत्रक (साध रण वेतनमान), भंडार अधीक्षक, प्रथम और भंडार अधीक्षक- द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार है।
- इन्हें अपने सेवा संबंधी सभी मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार है।
- संयुक्त निदेशक, नागरिक सुरक्षा सरकार और विभाग प्रमुख द्वारा निर्धारित नीतियों और निर्देशों के लिए जिम्मेदार है। स्टाफ अधिकारी या निदेशक, नागरिक सुरक्षा उत्तर प्रदेश के सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं, जबकि अन्य उनके द्वारा दिए गए निर्देशों के कार्यान्वयन हेतु जिम्मेदार हैं।
लिपिक
- कार्यालय के संचालन हेतु विभिन्न श्रेणी के लिपिक वर्गीय कर्मचारी एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी स्वीकृत हैं।
केंद्रीय नागरिक सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान
- नागरिक सुरक्षा से जुड़े इस संगठन में निम्नलिखित पदों पर स्वयंसेवक कार्य करते हैं -
सेनानायक
- यह (सेनानायक/कमांडेंट) प्रशिक्षण संस्थान के कार्यालय प्रमुख और नियंत्रण अधिकारी के रूप में कार्य करता है।
- यह केंद्रीय नागरिक सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान में ग्रुप-सी लिपिक और ग्रुप-डी पदों के लिए नियुक्ति प्राधिकारी है।
मुख्य अग्निशमन अधिकारी
- यह उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवा संवर्ग, समूह 'बी' के अधिकारी होते हैं।
- मुख्य अग्निशमन अधिकारी, संस्थान के अग्निशमन संकाय का प्रभारी है। इनकी सहायता के लिए अग्रणी फायरमैन और प्रदर्शनकारी कांस्टेबल तैनात किए जाते हैं।
- मुख्य अग्निशमन अधिकारी, अग्निशमन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए जिम्मेदार होता है। इनका उपयोग विभिन्न प्रशासनिक एवं प्रशिक्षण कार्यों में भी किया जाता है।
वरिष्ठ प्रशिक्षक
- वरिष्ठ प्रशिक्षक, केंद्रीय नागरिक सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान का समूह 'सी' विभागीय राजपत्रित अधिकारी होता है।
- वरिष्ठ प्रशिक्षक 'सामान्य नागरिक सुरक्षा' संकाय का प्रभारी है।
- यह प्रशिक्षण संस्थान में संचालित प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए जिम्मेदार हैं।
नागरिक सुरक्षा (शहर)
नियंत्रक
- नागरिक सुरक्षा (शहर) का सर्वोच्च पदाधिकारी जिला मजिस्ट्रेट होता है। इसे नियंत्रक कहते हैं।
- नियंत्रक अपनी इकाई के कार्यालय का प्रमुख है और नागरिक सुरक्षा अधिनियम, 1968 की धारा-4 के तहत शहर में नागरिक सुरक्षा गतिविधियों के संचालन हेतु सक्षम प्राधिकारी होता है।
लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा हेतु 'सेफ सिटी' परियोजना
- उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु 'सेफ सिटी' (सुरक्षित शहर) परियोजना शुरू की है। परियोजना के तहत राज्य के 17 नगर निगमों के प्रवेश द्वार एवं निकासी मार्गों पर सीसी टीवी के माध्यम से निगरानी की जाएगी।
- संबंधित नगरों में सरकारी और गैर सरकारी विद्यालयों, मदरसों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के बाहर एवं परिसर में भी सीसी टीवी कैमरे लगाये जा रहे हैं, जिससे महिलाओं एवं लड़कियों की सुरक्षा बढ़ायी जा सके।
- संवेदनशील स्थानों को उपद्रवियों के जमावड़े से बचाने और बालिकाओं/महिलाओं को छेड़छाड़ से सुरक्षित रखने हेतु संबंधित शहरों में निजी कोचिंग संस्थानों पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। कोचिंग संस्थानों में शाम की कक्षाओं पर रोक लगा दी गई है।
- सेफ सिटी परियोजना के अंतर्गत शुरुआती चरण में सरकार ने गौतमबुद्ध नगर समेत 17 नगर निगमों और 2500 से अधिक विद्यालयों को सीसी टीवी कैमरे लगाने के लिए चिन्हित किया है। इनमें से 2000 से अधिक विद्यालयों में सीसी टीवी लग चुके हैं, जबकि शेष विद्यालयों में सीसी टीवी लगाने की प्रक्रिया चल रही है। विद्यालयों की कक्षाओं, गलियारों, प्रवेश और निकास द्वार के अतिरिक्त खेल मैदानों में भी सीसी टीवी लगाए गए हैं।
- सेफ सिटी परियोजना के तहत 162 उच्च शिक्षण संस्थानों में 5,505 कैमरे लगाए जा चुके हैं। लखनऊ का क्षेत्रीय कार्यालय एवं महाविद्यालय सेफ सिटी परियोजना के अंतर्गत नहीं आते हैं।
- नगर विकास विभाग सीसीटीवी कैमरों को शहर के कंट्रोल रूम से एकीकृत करेगा।
- प्रदेश में सेफ सिटी परियोजना तीन चरण में पूरी की जानी है। प्रथम चरण में 17 नगर निगमों के साथ गौतम बुद्धनगर शामिल है, जबकि दूसरे चरण में 57 जनपद मुख्यालय की नगर पालिकाओं और तीसरे चरण में 143 नगर पालिकाओं को सेफ सिटी परियोजना से जोड़ा जाएगा।
पिंक बूथ और पिंक स्कूटी से होगी सुरक्षा
- 'सेफ सिटी परियोजना' के तहत महिलाओं एवं लड़कियों की सुरक्षा बढ़ाने हेतु प्रदेश भर में तीन हजार पिंक बूथ और सभी 10,417 महिला बीटों को पिंक स्कूटी देने का निर्णय लिया गया है।
- परियोजना के प्रथम चरण में प्रदेश के नौ शहरों के 20 धार्मिक स्थलों पर पिंक बूथ का निर्माण किये जाने का निर्णय लिया गया है। इन शहरों में वाराणसी, अयोध्या, प्रयागराज, मिर्जापुर, मथुरा, गोरखपुर, आगरा, बलरामपुर और चित्रकूट शामिल हैं। सभी जगह सिंगल स्टोरी के पिंक बूथ बनाए जाएंगे।
- परियोजना के दूसरे चरण में प्रदेश के नगर निगम और गौतमबुद्धनगर में 501 पिंक बूथ बनाए जाएंगे, जबकि तीसरे चरण में प्रदेश के शेष शहरों में 2,480 पिंक बूथ बनाए जाएंगे।
- परियोजना के प्रथम चरण में मंडल मुख्यालय और गौतमबुद्धनगर के 550 थानों को दो-दो जीपीएस लैस पिंक स्कूटी सौंपी जाएगी, जिसे 1,100 महिला बीट आरक्षी इस्तेमाल करेंगी।
उपनियंत्रक
उप नियंत्रक, नागरिक सुरक्षा ग्रुप-बी का विभागीय अधिकारी है और नियंत्रक, नागरिक सुरक्षा के अधीन कार्य करता है।
सहायक उपनियंत्रक
सहायक उपनियंत्रक, समूह 'ग' के विभागीय अधिकारी होते हैं। यह नागरिक सुरक्षा प्रभागों में तैनात होते हैं।
यह ब्लॉक स्तर पर स्वयंसेवकों की भर्ती, प्रशिक्षण, लक्ष्यों को पूरा करने, अभ्यास/प्रदर्शन/बैठकें आयोजित करने, जनता और स्कूलों/कॉलेजों को प्रशिक्षण देने, औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिए नागरिक सुरक्षा योजना तैयार करने आदि का कार्य करते हैं।
उत्तर प्रदेश में नागरिक सुरक्षा
- उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के सभी नगर निकायों में उत्तर प्रदेश नागरिक सुरक्षा की इकाइयां गठित करने का निर्णय लिया है। साथ ही जेलों में क्षमता से अधिक बंदियों की समस्या से लेकर आग लगने की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण पाने तक की समस्याओं के निपटारे हेतु नागरिक सुरक्षा की मदद से ठोस कदम उठाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
- मुख्यमंत्री ने इस संबंध में नागरिक सुरक्षा विभाग के साथ अग्निशमन तथा कारागार विभाग को कड़े निर्देश दिए हैं।
- वर्तमान में उत्तर प्रदेश के 27 जिलों में नागरिक सुरक्षा इकाइयां गठित हैं। इनकी उपयोगिता को देखते हुए नागरिक सुरक्षा इकाइयों का विस्तार सभी जिलों में किया जा रहा है।
- प्रदेश सरकार ने जिलाधिकारियों को निर्देश दिया है कि राज्य के सभी नगर निकायों को आधार मानकर नागरिक सुरक्षा इकाइयों का पुनर्गठन किया जाए। इससे प्रदेश में नागरिक सुरक्षा की साढ़े सात सौ से अधिक इकाइयां क्रियाशील हो सकेंगी।
- मुख्यमंत्री ने नागरिक सुरक्षा इकाइयों की स्थापना हेतु गृह विभाग के साथ समन्वय बनाकर आवश्यक कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया है।
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