उत्तर प्रदेश में सुशासन, भ्रष्टाचार निवारण, लोकायुक्त, सिटीजन चार्टर, ई-गवर्नेस, सूचना का अधिकार, समाधान योजना
सुशासन (Good Governance)
सुशासन का अर्थ ऐसी व्यवस्था से है, जिसमें शासन कम और लोकहित अधिक होता है। प्रथम चरण 'पारदर्शिता' है।
सुशासन के 4 प्रमुख आयाम (विश्व बैंक 1992)
1. सार्वजनिक प्रबंधन
सार्वजनिक क्षेत्रों का उचित प्रबंधन एवं कार्यप्रणाली।
2. जवाबदेही
शासन-प्रशासन की लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जिम्मेदारी।
3. कानूनी ढांचा
विकास के लिए न्यायपूर्ण और समान कानूनी ढांचा।
4. पारदर्शिता
जानकारी की सुलभता एवं शासन में खुलेपन का व्यवहार।
सुशासन के प्रमुख घटक
- पारदर्शिता: कार्य और सूचनाएं मांग पर उपलब्ध।
- उत्तरदायित्व: निर्णयों और कार्यों की जवाबदेही।
- सहभागिता: बिना भेदभाव समान नागरिक सहभागिता।
- विश्वसनीयता: वायदों और नीतियों का प्रतिबद्धता से पालन।
- विधि का शासन: स्वतंत्र न्यायपालिका और कानूनों का शासन।
- संवेदनशीलता: नीतियों में दक्षता और जन-संवेदनशीलता।
भ्रष्टाचार निवारण एवं लोकायुक्त
न्यायालय, लोकसेवा आयोग, राज्य निर्वाचन आयोग, महालेखाकार, उत्तर प्रदेश विधानमंडल, केन्द्र सरकार के प्रभाग, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, ग्रामसभा के प्रधान तथा सचिवालय कर्मी लोकायुक्त की जांच परिधि में नहीं आते हैं।
संथानम समिति
भ्रष्टाचार रोकने हेतु सुझाव। भ्रष्टाचार के 4 मुख्य कारण बताए एवं सेवानिवृत्त लोक सेवकों के निजी रोजगार पर प्रतिबंध की सिफारिश की।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम
रिश्वत लेना/देना अपराध। 2018 संशोधन: लोकसेवकों पर वाद से पूर्व लोकपाल/लोकायुक्त की अनुमति अनिवार्य। सजा: 3 से 7 वर्ष।
उत्तर प्रदेश लोकायुक्त
भ्रष्टाचार/कदाचार की जांच। कार्यकाल: वर्तमान में 5 वर्ष या 70 वर्ष आयु (जो पहले हो)। प्रथम: न्यायमूर्ति विश्वम्भर दयाल।
ई-गवर्नेस (e-Governance) के अनुप्रयोग
सरकारी सूचनाओं एवं सेवाओं को सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) द्वारा त्वरित गति से नागरिकों तक पहुंचाना।
| प्रकार (Type) | पूर्ण रूप | प्रमुख उदाहरण / क्षेत्र |
|---|---|---|
| G2G | सरकार से सरकार | ई-सचिवालय, ई-पुलिस, ई-कोर्ट, राज्य व्यापी नेटवर्क। |
| G2C | सरकार से नागरिक | ई-नागरिक (प्रमाणपत्र), ई-ट्रांसपोर्ट, ई-मेडिसिन, ई-पंजीकरण। |
| G2B | सरकार से व्यापार | ई-टैक्सेशन, लाइसेंस, बिजली कनेक्शन प्राप्त करना। |
| G2N | सरकार से NGO | ई-सोसाइटी, संघों/हित समूहों के साथ तालमेल। |
| C2G | उपभोक्ता से सरकार | ऑनलाइन मतदान, टैक्स भुगतान, जनसांख्यिकी डेटा देना। |
उत्तर प्रदेश की प्रमुख ई-गवर्नेंस परियोजनाएं
लोकवाणी (2004)
सीतापुर से शुरू (PPP मॉडल)। जन शिकायत निगरानी व आय/जाति/निवास प्रमाणपत्र सेवा।
ई-सुविधा & ई-सेवा
बिजली बिल, जलकर, हाउस टैक्स, टिकट बुकिंग, पासपोर्ट और लाइसेंस जैसी सेवाएं।
कोशवानी
वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता एवं विभागों का वित्तीय नियंत्रण।
भू-लेख
खसरा, खतौनी और जमीनी अभिलेखों का ऑनलाइन एकीकरण (bhulekh.up.nic.in)।
सूचना का अधिकार (RTI - 2005)
15 जून 2005 को अधिनियमित, 12 अक्टूबर 2005 से प्रभावी। अनुच्छेद 19 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' में अंतर्निहित मौलिक अधिकार।
RTI अपीलीय व्यवस्था (Flowchart)
(सहायक जन-सूचना अधिकारी आवेदन प्राप्त करने में मदद करते हैं)
(PIO के निर्णय से असंतुष्ट होने पर अपील)
(अंतिम अपीलीय निकाय)
समाधान योजना एवं जनसुनवाई पोर्टल
कानून व्यवस्था सुधारने एवं विभागीय परेशानी दूर करने हेतु 'यूपी जनसुनवाई पोर्टल' (zansunwai.up.nic.in) लॉन्च किया गया।
✔ जनसुनवाई पर मान्य शिकायतें
- सरकारी योजनाओं के संबंध में।
- आम आदमी की समस्याओं से जुड़ी शिकायतें।
- जनता की मांग से जुड़ी शिकायतें।
- भ्रष्टाचार अथवा भू-माफियाओं के विरुद्ध शिकायत।
❌ जनसुनवाई पर अमान्य शिकायतें
- न्यायालय में विचाराधीन मामले।
- सूचना का अधिकार (RTI) से संबंधित प्रकरण।
- आर्थिक सहायता या नौकरी की मांग।
- सरकारी सेवकों के स्थानांतरण/सेवा संबंधी प्रकरण।
- सामान्य सुझाव।
सुशासन
शासन में पारदर्शिता
- लोकतांत्रिक व्यवस्था में 'पारदर्शिता' लोकतंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता है। इससे प्रशासन में व्याप्त कदाचार एवं भ्रष्टाचार पर जहाँ रोक लगती है, वहीं शासन के प्रति जनता का विश्वास बढ़ता है।
- उत्तर प्रदेश में विगत कई वर्षों से शासन में पारदर्शिता को बेहद महत्वपूर्ण मानते हुए सरकारी निर्णयों और विकास कार्यक्रमों के लिए आवंटित एवं व्यय की गयी धनराशि को सार्वजनिक करने का अभियान चलाया जा रहा है।
- शासन में पारदर्शिता से 'सुशासन' का आगाज होता है। इसके विपरीत पारदर्शिता की कमी भ्रष्टाचार का कारण बनती है, जिससे अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता, उत्पादन लागत में वृद्धि, शासन-प्रशासन में कम दक्षता एवं सामाजिक-आर्थिक विकास में असमानता को बढ़ावा मिलता है।
- सुशासन और पारदर्शिता में कमी से सर्वाधिक प्रभावित गरीब वर्ग होता है। गरीब सरकारी योजनाओं एवं सार्वजनिक सेवाओं की पहुँच से दूर होते जाते हैं।
- सुशासन एवं शासन में पारदर्शिता से उत्पादन एवं विकास कार्यक्रमों की लागत में कमी आती है। इसका बेहतर परिणाम आज उत्तर प्रदेश में देखा जा सकता है।
- सुशासन का ही परिणाम माना जा रहा है कि हाल में लखनऊ में आयोजित तीन दिवसीय 'यूपी ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट-2023' में राज्य को ₹ 33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए।
- समिट में 19058 एमओयू पर हस्ताक्षर भी किए गये, जिससे लगभग 94 लाख रोजगार के अवसर सृजित होने की संभावना है।
- किसी राज्य में निवेशकों का आकर्षण उसके सुशासन का परिणाम माना जाता है।
सुशासन के आयाम
- सार्वजनिक क्षेत्रों का प्रबंधन
- जवाबदेही
- विकास के लिए कानूनी ढांचा
- पारदर्शिता एवं जानकारी
सुशासन के घटक
- पारदर्शिता: सुशासन के लिए पारदर्शिता प्रथम शर्त मानी जाती है। शासन व्यवस्था में गोपनीयता का व्यवहार स्वीकार्य नहीं हो सकता। कार्य और उनके परिणामों से जुड़ी सूचनाएं मांग पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए। 'सूचना का अधिकार' अधिनियम इसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है।
- उत्तरदायित्व: शासन-प्रशासन को अपने निर्णयों एवं कार्यों के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उत्तरदायी होना होता है। उत्तरदायित्व के बगैर 'सुशासन' संभव नहीं हो सकता।
- सहभागिता: शासन-प्रशासन के निर्णयों एवं कार्यों में नागरिकों की समान सहभागिता बढ़ाने पर बल दिया जाना चाहिए। सुविधा देने में लिंग, वर्ग, जाति आदि के आधार पर भेदभाव सुशासन में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
- विश्वसनीयता: सरकारें अपने वायदों और नीतियों को पूरी तरह लागू कर 'सुशासन' का प्रयास करती हैं। शासन द्वारा जो नीतियां बनायी जाती हैं, उन्हें सही होना चाहिए और जब वह नीतियाँ प्रयोग में लाई जाएं तो पूरी तरह प्रतिबद्ध होकर लागू की जानी चाहिए। इस तरह लोगों में शासन के प्रति विश्वसनीयता उत्पन्न होती है।
- विधि का शासन: सुशासन के लिए विधि का शासन और स्वतंत्र न्यायपालिका का होना आवश्यक है। इससे शासन के प्रति लोगों का विश्वास बना रहता है।
- संवेदनशीलता और दक्षता: अपनी नीतियों, निर्णयों एवं कार्यों को लेकर शासन को संवेदनशील और दक्ष होना चाहिए। कठोर और अक्षम व्यवस्था सुशासन के मार्ग में बाधक मानी जाती है।
उत्तर प्रदेश में 'सुशासन' की वर्तमान स्थिति
- उत्तर प्रदेश की सरकार वर्तमान में अपने सख्त निर्णयों एवं अपराधियों/माफियाओं के विरुद्ध की गयी कार्रवाइयों के लिए चर्चा में है। सरकार का दावा है कि कानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार से एक तरफ जहां अपराध कम हुए, वहीं आम आदमी के साथ-साथ निवेशकों का भी विश्वास उत्तर प्रदेश में तीव्र गति से बढ़ा है।
- उत्तर प्रदेश की यह बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है कि कुछ वर्ष पूर्व तक माफियाओं का प्रदेश माने जाने वाले इस राज्य में 'विधि का शासन' स्थापित करने में काफी हद तक सफलता प्राप्त हुई है।
- आपराधिक क्रियाओं द्वारा एकत्र की गयी माफियाओं की संपत्ति जब्त कर सरकार द्वारा उन्हें गरीबों में वितरित किया जा रहा है।
- प्रदेश सरकार की सूचना के अनुसार प्रयागराज के लूकरगंज में 1731 वर्गमीटर नजूल की भूमि माफिया के कब्जे में थी। भूमि की कीमत लगभग ₹10 करोड़ बतायी जाती है। इस भूमि को 13 सितंबर, 2020 को प्रदेश सरकार द्वारा मुक्त कराया गया। वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री ने यहां गरीबों के लिए आवासीय फ्लैट्स की आधारशिला रखी और मात्र 18 माह में यह योजना पूरी कर ली गई। वर्ष 2023-24 में आवासीय योजना 1,731 वर्गमीटर में विकसित की गई, जिसमें दो ब्लॉक बने हैं। गरीबों में यह फ्लैट वितरित किए जा रहे हैं।
- उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत वर्ष 2017 से अब तक 54 लाख से अधिक गरीबों को आवास वितरित किए जा चुके हैं।
- बीते लगभग 5 वर्ष के भीतर प्रदेश में माफियाओं से ₹ 3,516 करोड़ से अधिक मूल्य की संपत्ति जब्त, ध्वस्त व कब्जा मुक्त कराई जा चुकी है। यह अभियान अनवरत जारी है।
- विगत कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में ऐसे अनेक कार्य हुए हैं, जिनसे जनता की सुविधाएं बढ़ी हैं। उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक एक्सप्रेसवे वाला राज्य बन चुका है। यहां 6 क्रियाशील और 7 निर्माणाधीन एक्सप्रेसवे हैं।
- राज्य में एयरपोर्ट्स की संख्या बढ़कर 19 हो चुकी है, जिनमें 5 अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट्स हैं।
- शासन में पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आम आदमी को अपनी शिकायत ऑनलाइन दर्ज कराने की सुविधा प्रदान की गयी है। इस तरह के शिकायतकर्ता का नाम और पता गुप्त रखने की व्यवस्था की गयी है।
- कोई भी व्यक्ति https://zansunwai.up.nic.in लिंक पर क्लिक कर भ्रष्टाचार अथवा भू-माफियाओं के विरुद्ध अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है, जिस पर त्वरित जांच और कार्यवाही के लिए शासन द्वारा प्रबंध किये गये हैं।
- प्रदेश सरकार द्वारा प्रत्येक ग्राम पंचायत में दो जनसेवा केन्द्र स्थापित किये जा रहे हैं, जिससे ग्रामीणों को आय, जाति, निवास प्रमाणपत्र आदि के लिए दूर भटकना नहीं होगा।
- उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 19 फरवरी, 2024 को ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी (GBC 4.0) के माध्यम से लखनऊ में ₹10 लाख करोड़ की निवेश परियोजनाओं का शिलान्यास किया गया। इससे प्रदेश के हजारों युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।
- स्वास्थ्य क्षेत्र के सबसे बड़े कार्यक्रम 'आयुष्मान भारत' में 5 करोड़ कार्ड जारी करने वाला उत्तर प्रदेश भारत का शीर्ष राज्य बन गया है। इस योजना के तहत आर्थिक रूप से वंचित कोई भी व्यक्ति निजी अस्पतालों में निःशुल्क इलाज करा सकता है।
- उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ई-गवर्नेंस के माध्यम से प्रभावी शासन स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। राज्य सरकार ने हाल में उत्तर प्रदेश भूलेख, ई-साथी, जनसुनवाई, ई-पेंशन, MyGov UP, सेवायोजन आदि अनेक पोर्टल एवं ऐप जारी किये हैं, जिससे 'शासन-प्रशासन तक आम आदमी की त्वरित पहुँच' जैसी परिकल्पनाएं पूर्ण हो रही हैं।
उत्तर प्रदेश में सुशासन की चुनौतियां
- निर्धनता एवं बेरोजगारी
- समावेशी विकास का अभाव
- विस्तृत ग्रामीण क्षेत्र
- देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य
- राजनीति का अपराधीकरण
- नौकरशाही, जवाबदेही की कमी
- सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार
- युवाओं में बढ़ती हिंसा की प्रवृत्ति
- लैंगिक असमानता
भ्रष्टाचार निवारण
भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार निवारण के प्रयास
- प्रशासनिक कामकाज में विलंब।
- लोकतांत्रिक ढंग से नियामक तंत्र के गठन की बजाय सरकार का अपने तरीके से समस्याओं के हल पर भरोसा करना।
- सरकारी अधिकारियों में अन्तर्निहित शक्तियों के प्रयोग में व्यक्तिगत विवेक की गुंजाइश का होना।
- नागरिकों को दीर्घकालिक प्रभावित करने वाले मुद्दों पर सरकार द्वारा कम ध्यान देना।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 को भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रथम महत्वपूर्ण कानून माना जाता है।
- अधिनियम के अनुसार रिश्वत लेना और रिश्वत देना, दोनों ही अपराध हैं। यदि तीसरे पक्ष के माध्यम से भी रिश्वतखोरी की जाएगी तो वह भी अपराध की श्रेणी में आएगा।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 को वर्ष 2018 में संशोधित किया गया, जिसे 'भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018' नाम से जाना जाता है।
भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम 2018
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 2018 के अनुसार लोकसेवकों पर भ्रष्टाचार का वाद शुरू करने से पूर्व केन्द्र के मामले में लोकपाल तथा राज्यों के मामले में लोकायुक्तों से अनुमति लेना आवश्यक है।
- रिश्वत देने वाले व्यक्ति को अपना पक्ष रखने के लिये 7 दिन का समय मिलेगा, जिसे 15 दिन तक बढ़ाया जा सकता है।
- जांच में यह जानने का प्रयास किया जाता है कि रिश्वत किन परिस्थितियों में दी गई है।
- रिश्वत लेने वाले लोकसेवक के विरुद्ध भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 7 के तहत मामला दर्ज किया जाता है।
- अधिनियम की धारा 7 के अनुसार भ्रष्टाचार में लिप्त लोक सेवक को 3 वर्ष से लेकर 7 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है।
- लोक सेवक द्वारा उसे सौंपी गई संपत्ति का दुरुपयोग करना।
- योजनाबद्ध ढंग से स्वयं को अवैध रूप से समृद्ध करना।
भ्रष्टाचार निवारण के उपाय
- लोकपाल
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC)
- केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI)
उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार निवारण अभियान
- उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में भ्रष्टाचार निवारण संगठन (ACO) की मंडल स्तर पर स्थापित इकाइयों को थाने के रूप में अधिसूचित किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। वर्ष 2024 में इस प्रस्ताव के पास होने के पश्चात एसीओ के अधिकारी भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध अपने थाने में रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई सुनिश्चित करा सकेंगे।
- उत्तर प्रदेश में इससे पूर्व तक भ्रष्टाचार निवारण संगठन की इकाइयां और संगठन की टास्क फोर्स सिर्फ राजधानी लखनऊ के अतिरिक्त अयोध्या, गोरखपुर, वाराणसी, बरेली, मुरादाबाद, आगरा, कानपुर, झांसी और मेरठ मंडल तक सीमित थीं। अब प्रदेश के सभी 18 मंडलों में स्थापित इकाइयों में एसीओ का थाना स्थापित होगा।
- प्रदेश सरकार की घोषणा के अनुसार अलीगढ़, देवीपाटन (गोंडा), बस्ती, प्रयागराज, चित्रकूट धाम (बांदा), सहारनपुर, आजमगढ़ और मिर्जापुर में 'भ्रष्टाचार निवारण संगठन' की नई इकाइयां स्थापित की जा रही हैं।
- प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई हेतु पुलिस दल के विशेष दस्ते तैनात कर रही है।
- प्रदेश कैबिनेट ने रामपुर में स्पाट कमांडो हब की स्थापना के लिए निःशुल्क भूमि आवंटित किए जाने की स्वीकृति प्रदान कर दी है।
- प्रदेश सरकार ने सहारनपुर में स्पाट कमांडो ट्रेनिंग सेंटर के लिए निःशुल्क भूमि आवंटित किए जाने को मंजूरी प्रदान कर दी है। इसके लिए सहारनपुर में राजस्व ग्राम सुल्तानपुर तथा दतौली रांघड़ की कुल 28.095 एकड़ सिंचाई विभाग की भूमि गृह विभाग को आवंटित की जाएगी, जहां स्पाट कमांडो ट्रेनिंग सेंटर स्थापित होगा।
- उत्तर प्रदेश में 'एंटी करप्शन पोर्टल' शुरू किया गया है, जहां कोई भी व्यक्ति भ्रष्ट नौकरशाहों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। शिकायत दर्ज कराने वाले की पहचान गुप्त रखने का प्रावधान है।
लोकायुक्त
लोकायुक्त के कार्य
- उत्तर प्रदेश लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त अधिनियम 1975 के अनुसार कोई भी व्यक्ति अथवा नागरिक भ्रष्टाचार/कदाचार से जुड़े मंत्री, विधायक, जिला परिषद अध्यक्ष नगरपालिका प्रमुख अथवा राज्य के कर्मचारियों एवं अधिकारियों के विरुद्ध लोकायुक्त के समक्ष शिकायत/परिवाद प्रस्तुत कर सकता है, जिसकी जांच लोकायुक्त द्वारा की जाएगी।
- प्रावधान के अनुसार भ्रष्टाचार से संबंधित दो प्रकार के परिवाद 'शिकायत' तथा 'अभिकथन' के रूप में प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
- शिकायत के अंतर्गत लोकसेवकों के सेवानिवृत्त होने के उपरांत उनके देयकों के भुगतान न होने के प्रकरण आते हैं, जबकि राज्य सरकार के विभाग से जुड़े लोकसेवकों द्वारा पद का दुरूपयोग या भ्रष्टाचार से संबंधित परिवाद को अभिकथन कहते हैं।
- न्यायालय, लोकसेवा आयोग, राज्य निर्वाचन आयोग, महालेखाकार, उत्तर प्रदेश विधानमंडल, केन्द्र सरकार के प्रभाग, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, ग्रामसभा के प्रधान तथा सचिवालय कर्मियों को लोकायुक्त की कार्य परिधि से मुक्त रखा गया है।
- भारत में सर्वप्रथम लोकायुक्त का गठन 1971 में महाराष्ट्र में हुआ था, जबकि ओडिशा में यह अधिनियम 1970 में पारित हुआ, यद्यपि लागू 1983 में किया गया।
| उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त | |
|---|---|
| नाम | कार्यकाल |
| 1. न्यायमूर्ति श्री विश्वम्भर दयाल | 14 सितम्बर, 1977 से 13 सितम्बर, 1982 तक |
| ● पद रिक्त | 14 सितम्बर, 1982 से 09 जनवरी, 1983 तक |
| 2. न्यायमूर्ति श्री मिर्जा मु. मुर्तजा हुसैन | 10 जनवरी, 1983 से 10 जनवरी, 1989 तक |
| ● पद रिक्त | 11 जनवरी, 1989 से 27 जनवरी, 1989 तक |
| 3. न्यायमूर्ति श्री कैलाश नाथ गोयल | 28 जनवरी, 1989 से 28 जनवरी, 1995 तक |
| ● पद रिक्त | 29 जनवरी, 1995 से 8 फरवरी, 1995 तक |
| 4. न्यायमूर्ति श्री राजेश्वर सिंह | 09 फरवरी, 1995 से 13 जनवरी, 2000 तक |
| ● पद रिक्त | 14 जनवरी, 2000 से 15 मार्च, 2000 तक |
| 5. न्यायमूर्ति श्री सुधीर चन्द्र वर्मा | 16 मार्च, 2000 से 15 मार्च, 2006 तक |
| 6. न्यायमूर्ति श्री एन. के. मेहरोत्रा | 16 मार्च, 2006 से 31 जनवरी, 2016 |
| 7. न्यायमूर्ति श्री संजय मिश्रा | 31 जनवरी, 2016 से वर्तमान तक |
नियुक्ति
- लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त की नियुक्ति संबंधित प्रदेश के राज्यपाल द्वारा की जाती है।
- लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त की नियुक्ति हेतु राज्यपाल संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं राज्य विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष से परामर्श करते हैं।
- उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त के लिये न्यायिक योग्यता निर्धारित की गयी है।
- उत्तर प्रदेश में लोकायुक्त का कार्यकाल पहले 6 वर्ष और फिर 8 वर्ष किया गया था, जिसे फरवरी, 2024 में संशोधित कर 5 वर्ष कर दिया गया है।
- उत्तर प्रदेश सरकार ने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य तथा कार्यहित को देखते हुए लोकायुक्त एवं उप-लोकायुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु, जो पहले हो, का प्रावधान करने का निर्णय लिया है।
- न्यायमूर्ति विश्वम्भर दयाल उत्तर प्रदेश के प्रथम लोकायुक्त थे। (14 सितम्बर, 1977-13 सितम्बर, 1982)। उत्तर प्रदेश के वर्तमान लोकायुक्त न्यायमूर्ति संजय मिश्रा हैं।
लोकायुक्त से संबंधित मुद्दे
- लोकायुक्त अधिनियम के अंतर्गत लोकायुक्त की नियुक्ति, कार्यकाल, उसकी शक्तियों, संरचना तथा अन्य कई विवरणों के संबंध में जानकारी अस्पष्ट एवं अपूर्ण है।
- लोकायुक्त अपनी बुनियादी आवश्यकताओं एवं वित्त पोषण के लिए राज्य सरकार पर निर्भर रहता है। संस्था की स्वतंत्रता एवं स्वायत्तता पर इसे बड़ा अवरोध माना जाता है।
- लोकायुक्त की नियुक्ति के संबंध में राज्यों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है, जिसका कई बार दुरूपयोग होता है।
- शासन-प्रशासन से सहयोग न प्राप्त होने पर लोकायुक्त की जांच में विलम्ब होता है।
सिटीजन चार्टर
- सिटीजन चार्टर एक ऐसा लिखित दस्तावेज है, जिसमें संगठन की सेवाओं के मानक, संगठन संबंधी सूचनाओं, परामर्श और पसंद, सेवाओं तक भेदभाव रहित पहुंच, शिकायत निवारण तथा शिष्टाचार आदि के संबंध में अपने नागरिकों के प्रति प्रतिबद्धताओं का व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत किया गया होता है।
- इस दस्तावेज में शिकायत निवारण तंत्र सहित गुणवत्तापूर्ण, उच्च मानक सेवाएं प्रदान करने के लिए संगठनों या सेवा प्रदाताओं को रेखांकित किया जाता है।
- सिटीजन चार्टर जारी करने का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक सेवाओं को दक्ष एवं त्वरित बनाते हुए उनकी गुणवत्ता में सुधार करना होता है।
- माना जाता है कि सिटीजन चार्टर नागरिक सेवा प्रदाता और नागरिकों/उपभोक्ताओं के मध्य रिश्तों को मजबूत बनाता है।
सिटीजन चार्टर के उद्देश्य
- सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाना।
- पारदर्शिता और सूचना का अधिकार सुनिश्चित करना।
- ग्राहक और सेवा प्रदाता, दोनों के समय में बचत होना चाहिए।
- सभी स्तर पर सेवाओं के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जाएं।
सिटीजन चार्टर का महत्व
- यह सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता एवं वितरण में जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
- सुशासन को प्रोत्साहित कर लोकप्रिय बनाता है।
- यह मापने योग्य मानकों द्वारा संगठनों की प्रभावशीलता में सुधार लाता है।
- आंतरिक और बाह्य निगरानी इकाई को मजबूत कर यह सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाता है।
- कुशल कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने में सहायता करता है।
- सिविल सेवाओं के वितरण में पारदर्शिता और खुलेपन को प्रोत्साहन मिलता है।
भारत में सिटीजन चार्टर
- भारत में सिटीजन चार्टर की शुरुआत का प्रयास मई, 1997 में दिल्ली में आयोजित विभिन्न राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में किया गया।
- सिटीजन चार्टर को देश में प्रभावी रूप से लागू करने का दायित्व कार्मिक शिकायत और पेंशन मंत्रालय को दिया गया है।
- भारत में सिटीजन चार्टर को वैधानिक रूप में लागू नहीं कराया जा सकता। इसे वैधानिक स्वरूप देने के लिए दिसंबर, 2011 में लोकसभा में 'सिटीजन चार्टर और शिकायत निवारण विधेयक 2011' प्रस्तुत किया गया, परंतु यह पारित नहीं हो सका। बाद में इसे एक स्थायी समिति को भेज दिया गया, जिसने 2012 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। दूसरी तरफ वर्ष 2014 में लोकसभा भंग होने के कारण विधेयक रद्द हो गया।
- सिटीजन चार्टर विधेयक में यह व्यवस्था दी गयी थी कि प्रत्येक सार्वजनिक अधिकारी को विधेयक लागू होने के 6 महीने की अवधि में सिटीजन चार्टर का निर्माण करना होगा और जिन अधिकारियों द्वारा इसका निर्माण नहीं होगा, उन्हें दंडित किया जाएगा।
- पारदर्शिता- नियमों, योजनाओं, प्रक्रियाओं एवं शिकायतों आदि में पारदर्शिता अपनाना।
- गुणवत्ता- उपलब्ध करायी जा रही सेवाओं की गुणवत्ता में निरंतर सुधार करना।
- विकल्प- आवश्यकता और मांग के अनुसार विकल्प की उपलब्धता।
- मानक- सेवाओं की आपूर्ति में मानक पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- मूल्य- करदाताओं को उनके भुगतान के लिए अदायगी।
- जवाबदेही- व्यक्ति और संगठन स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करना।
भारत में सिटीजन चार्टर की समस्याएं
- भारतीय सिटीजन चार्टर में सेवाओं की गुणवत्ता का उल्लेख नहीं किया जाता।
- अधिकांश चार्टर आवश्यकता से अधिक लंबे हैं।
- चार्टर में उल्लेखित वायदे अस्पष्ट और अनुपयोगी होते हैं।
- चार्टर के अनुसार क्षतिपूर्ति प्राप्त करना अत्यधिक कठिन होता है।
- चार्टर का सुधार और पुनरावलोकन करना समस्या है।
- चार्टर के निर्माण में वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों के हितों को ध्यान में नहीं रखा जाता।
- चार्टर में परिवर्तन के अनुसार सेवा प्रदाता स्वयं को परिवर्तित नहीं करते।
- चार्टर निर्माण में उपभोक्ताओं और एनजीओ की सलाह को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
सुधार के उपाय
- सेवाओं की गुणवत्ता में कमी पाये जाने पर दंड और मुआवजे की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- चार्टर में मात्र उन वायदों को प्रस्तुत किया जाए जिसे पूर्ण करना संभव हो।
- चार्टर निर्माण से पूर्व, संबंधित विभाग को अपनी व्यवस्था और प्रक्रिया की समीक्षा करनी चाहिए।
- सिटीजन चार्टर का निर्माण स्थानीय आवश्यकताओं और जमीनी हकीकत के अनुसार किया जाना चाहिए।
- चार्टर के निर्माण में संबंधित सभी लोगों की सलाह लेनी चाहिए।
- शिकायत निवारण तंत्र नागरिक केंद्रित होना चाहिए।
- चार्टर का मूल्यांकन नियमित रूप से होना चाहिए।
- परिणाम के लिए अधिकारियों का उत्तरदायित्व निर्धारित होना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में सिटीजन चार्टर व्यवस्था
- उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में पारदर्शिता और जीरो टॉलरेंस नीति को बनाए रखने के उद्देश्य से सिटीजन चार्टर लागू करने की घोषणा की है, जिसके बाद शासन स्तर पर इस संबंध में कवायद तेज हो चुकी है।
- उत्तर प्रदेश सरकार की नयी घोषणा के अनुसार राज्य में सिटीजन चार्टर के अंतर्गत जनहित से जुड़े मुद्दों और समस्याओं की निर्धारित समय पर सुनवाई होगी और उनका निस्तारण किया जाएगा।
- प्रदेश स्थित सरकारी कार्यालयों में ई-ऑफिस व्यवस्था पूरी तरह लागू करने एवं सभी विभागों में सिटीजन चार्टर लागू करने संबंधी काम शुरू किया जा चुका है।
- मुख्यमंत्री स्तर पर लिए गए निर्णय के अनुसार, विभागों के सभी कामकाजों का निष्पादन डिजिटलाइजेशन के माध्यम से किया जाएगा।
- सभी अधिकारी व कर्मचारी समय से कार्यालय में उपस्थित होकर अपने कार्यों एवं दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करेंगे।
- उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा की गयी घोषणा के अनुसार सिटीजन चार्टर लागू होने के पश्चात शासन से जुड़े कार्यालयों में ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित होगी, जिससे आम जनता को किसी प्रकार की असुविधा न होने पाए। थाना, ब्लॉक एवं तहसील स्तर पर जन समस्याओं के निस्तारण का काम संवेदनशीलता के साथ संपादित किया जाएगा।
- सिटीजन चार्टर में संवेदनशीलता के साथ-साथ जन समस्याओं का निस्तारण समयबद्ध एवं प्रभावी रूप से किए जाने का प्रावधान किया जा रहा है।
- उत्तर प्रदेश के सिटीजन चार्टर में न्यायालयों में लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण कराने का विषय उच्च प्राथमिकता के साथ शामिल किया गया है।
- आईजीआरएस एवं मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के कार्यों की नियमित समीक्षा तथा समस्याओं का निस्तारण मेरिट के आधार पर करने और जनता की समस्याओं को तत्काल प्रभाव से निस्तारित करने संबंधी मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया है।
- समस्याओं के निस्तारण के पश्चात परिणाम से जनता को अवगत कराने की भी जिम्मेदारी अधिकारियों को दी गई है।
ई-गवर्नेंस (e-Governance)
- शासन प्रक्रिया का जटिल होना।
- सरकार से नागरिकों की अपेक्षाओं में वृद्धि।
ई-गवर्नेंस के अनुप्रयोग
- इसमें राज्य को नागरिकों के करीब लाने पर जोर दिया जाता है। उदाहरण के लिये-ऑनलाइन सेवाओं का प्रावधान।
- ई-प्रशासन एवं ई-सेवायें मिलकर ई-सरकार का निर्माण करती हैं।
- इसमें आईटी का उपयोग राज्य के शासन में भाग लेने वाले समाज के सभी वर्गों की क्षमता को सुविधाजनक बनाने के लिये किया जाता है।
- इसमें शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही एवं लोगों की भागीदारी पर जोर दिया जाता है।
- इसमें नीतियों की ऑनलाइन प्राप्ति, ऑनलाइन शिकायत निवारण एवं ई-जनमत संग्रह आदि शामिल हैं।
ई-शासन की ओर उठाये गये प्रारम्भिक कदम
- 1971 में इलेक्ट्रॉनिक विभाग की स्थापना को सुशासन की तरफ उठाया गया पहला मुख्य कदम माना जाता है।
- 1977 में स्थापित राष्ट्रीय सूचना केन्द्र (NIC) के माध्यम से प्रदेश के सभी जिला कार्यालयों को डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम प्रोग्राम के तहत कम्प्यूटरीकृत करने का कार्यक्रम शुरू किया गया।
- ई-गवर्नेंस के लिये 1987 में 'नेशनल सैटेलाइट बेस्ड कम्प्यूटर नेटवर्क' (NICNET) स्थापित किया गया।
ई-गवर्नेंस के अन्य अनुप्रयोग/प्रकार
- G2G (सरकार से सरकार)
- G2C (सरकार से नागरिक)
- G2B (सरकार से व्यापार)
- G2N (सरकार से गैर-सरकारी संगठन)
- C2G (उपभोक्ता से सरकार)
- ई-सचिवालय
- ई-पुलिस
- ई-कोर्ट
- राज्य व्यापी नेटवर्क
- ई-नागरिक
- ई-ट्रांसपोर्ट
- ई-मेडिसिन
- ई-शिक्षा
- ई-पंजीकरण
- ई-नागरिक - इसमें विभिन्न सेवायें जैसे-प्रमाणपत्रों को जारी करना, राशन कार्ड, पासपोर्ट, बिलों का भुगतान एवं टैक्स का भुगतान आदि शामिल हैं। ये एकीकृत सेवा केन्द्र सभी सेवाओं के लिए 'वन-स्टाप गवर्नमेंट शाप' की तरह कार्य करेंगे।
- ई-ट्रांसपोर्ट - यह विभिन्न सेवाएं जैसे- मोटरगाड़ियों का पंजीकरण, लाइसेंस, परमिट, टैक्स भुगतान, कैश द्वारा फीस का कलेक्शन, बैंक चालान तथा प्रदूषण नियंत्रण आदि प्रदान करता है।
- ई-मेडिसिन - यह बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए देश के अलग-अलग भागों में विभिन्न अस्पतालों को जोड़ने का कार्य करता है।
- ई-शिक्षा - इसके अन्तर्गत सूचना एवं प्रौद्योगिकी का उपयोग करके नागरिकों तथा सरकारों को शिक्षित करने हेतु विभिन्न योजनाओं का संचालन किया जाता है।
- ई-पंजीकरण - ई-पंजीकरण द्वारा ऑनलाइन पंजीकरण, सम्पत्ति के स्थानांतरण एवं स्टैम्प के ऑनलाइन बिक्री होने से जालसाजी एवं पेपर कार्यों में काफी कमी आई है तथा यह पहले से सुगम हो गया है।
उत्तर प्रदेश में ई-गवर्नेंस सम्बन्धी परियोजनाएं
- लोकवाणी
- ई-सुविधा
- ई-सेवा
- कोशवानी
- जन-सुविधा केन्द्र
- सृष्टि
- भू-लेख
- आय प्रमाण-पत्र
- जाति प्रमाण-पत्र
- निवास प्रमाण-पत्र
- जन्म प्रमाण-पत्र
- मृत्यु प्रमाण-पत्र
- निविदा प्रमाण-पत्र
- बिजली बिल
- हवाई जहाज का टिकट
- सभी पोस्टपेड बिल का भुगतान
- मूवी टिकट
- इंश्योरेंस प्रीमियम
- डी.टी.एच. सेवायें
- परमिट एवं लाइसेंस
- यह पारदर्शिता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
- शासन के कार्यक्रमों को व्यापक विस्तार प्रदान करता है।
- सार्वजनिक प्रशासन का विकास करता है।
- आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए सुगम परिवेश का निर्माण करता है।
- नागरिकों तक सूचना तथा गुणवत्तापूर्ण सेवाओं के बेहतर पहुँच के लिये उन्नत सेवा के वितरण प्रणाली का निर्माण करता है।
'डिजिटल इण्डिया' के अन्तर्गत विभिन्न पहल
ई- डिस्ट्रिक्ट
मुख्य घटक
- ई-डिस्ट्रिक के तहत 32 सेवाएं उपलब्ध करायी जा रही हैं। इनमें राजस्व विभाग (आय, जाति, निवास प्रमाण पत्र इत्यादि), पंचायती राज विभाग, चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, गृह विभाग, समाज कल्याण, कृषि, दिव्यांगजन सशक्तिकरण, महिला कल्याण आदि से संबंधित सेवाएं शामिल हैं।
- नागरिक उपरोक्त प्रमाणपत्रों एवं सेवाओं के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं और उनकी स्थिति को ट्रैक कर वास्तविक वस्तुस्थिति की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
ई-गवर्नेस के लिये चुनौतियाँ
- लागत
- रख-रखाव
- पुनर्प्रयोग
- पोर्टेबिलिटी
- पहुँच
- प्रयोजन
- क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग
- ई-शासन के प्रति जागरूकता
- सुरक्षा
- गोपनीयता
- प्रमाणीकरण
- ई-शिक्षा
- ई-स्वास्थ्य
- किसान
- सुरक्षा
- वित्तीय समावेशन
- न्याय
- योजना
- साइबर सुरक्षा
सूचना का अधिकार (Right to Information)
- सरकार के कामकाज में पारदर्शिता लाकर जवाबदेही तय करने तथा नागरिकों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से 'सूचना का अधिकार अधिनियम' 15 जून, 2005 को अधिनियमित किया गया, जिसे उसी दिन राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति भी प्रदान कर दी गयी।
- सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम 12 अक्टूबर, 2005 को प्रभावी हुआ।
- 'सूचना का अधिकार' अधिनियम भारतीय संविधान के मौलिक अधिकार से संबंधित 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' को सुदृढ़ करता है।
- यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है, अतः इसे एक 'अंतर्निहित मौलिक अधिकार' भी माना जाता है।
'सूचना' का अर्थ
- अधिनियम के अनुसार सूचना का अर्थ किसी इलेक्ट्रॉनिक रूप में धारित अभिलेख, दस्तावेज, ज्ञापन, ई-मेल, मत, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लॉगबुक, संविदा, रिपोर्ट, नमूने तथा आंकड़ों संबंधी जैसी जानकारी से है।
- इसके अन्तर्गत किसी निजी निकाय से संबंधित ऐसी सूचना भी मांगी जा सकती है, जो विधि के तहत किसी लोक प्राधिकारी की पहुंच में हो।
सूचना के अधिकार का अर्थ
- किसी भी विभाग के कार्यों, दस्तावेज और रिकॉर्ड की जानकारी मांग कर उसकी जाँच कर सकता है।
- किसी भी रिकॉर्ड के किसी भी भाग को नोट कर सकता है तथा किसी भी दस्तावेज की सत्यापित प्रतिलिपि प्राप्त कर सकता है।
- किसी भी कार्य में प्रयुक्त होने वाली किसी भी सामग्री की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर सकता है।
- फ्लापी, टेप, वीडियो, सी.डी., पेन ड्राइव अथवा अन्य इलेक्ट्रॉनिक विधि या प्रिंटआउट के माध्यम से सूचना प्राप्त कर सकता है।
सूचना के अधिकार की आवश्यकता
- यह मान्य धारणा है कि सूचना प्राप्त नागरिक शासन के साधनों पर आवश्यक निगरानी रखने हेतु अधिक सक्षम बनता है। इस तरह वह सरकार को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह बनाता है।
- यह अधिनियम नागरिकों को सरकार की गतिविधियों के संबंध में जागरूक करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपकरण है।
- सूचना का अधिकार नागरिकों को सशक्त बनाते हुए सरकार की कार्यशैली में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाता है। इससे भ्रष्टाचार को रोकने में मदद मिलती है, जो लोकतंत्र के लिए लाभप्रद है।
आरटीआई अधिनियम के तहत लोक प्राधिकरण का अर्थ
- आरटीआई अधिनियम के तहत लोक प्राधिकरण का अर्थ अत्यंत व्यापक है।
- लोक प्राधिकरण का अर्थ संविधान अथवा संविधान के अधीन या संसद अथवा राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित कानून के तहत स्थापित संस्था है।
- ऐसे समस्त निकाय जो समुचित सरकार के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा वित्तपोषित हैं, आरटीआई अधिनियम के तहत लोक प्राधिकरण में सम्मिलित माने जाते हैं।
- सूचना के अधिकार के अंतर्गत सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वित्त पोषित गैर-सरकारी संगठन (NGO) भी प्राधिकरण के रूप में शामिल हैं।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को संशोधित करने के प्रस्ताव के साथ हाल ही में संसद ने 'सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019' पारित किया।
- नये संशोधन विधेयक में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों में संशोधन कर दिया गया है।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्षों के लिए निर्धारित किया गया था, परंतु इस संशोधन के तहत अब इसे परिवर्तित करने का प्रावधान किया गया है।
- नये संशोधन के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल अब केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जाएगा।
- नए संशोधन विधेयक के तहत केंद्र और राज्य स्तर पर मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते तथा अन्य रोजगार की शर्तें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाएंगी।
- सूचना का अधिकार, 2005 में यह समस्त कार्य केंद्र सरकार के कार्यक्षेत्र से बाहर रखे गये थे।
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत प्रावधान किया गया था कि यदि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त पद पर नियुक्त होते समय उम्मीदवार किसी अन्य सरकारी नौकरी की पेंशन या अन्य सेवानिवृत्ति संबंधी लाभ प्राप्त कर रहा होता है तो उस लाभ के बराबर राशि को उसके वेतन से घटा दिया जाएगा, लेकिन अब नए संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है।
- सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक 2019 का अनेक स्तर पर विरोध हो रहा है। यह तर्क दिया जा रहा है कि नये संशोधन से सूचना के अधिकार की वास्तविक शक्ति समाप्त अथवा कमजोर हो जाएगी।
- आशंका व्यक्त की जा रही है कि इस संशोधन से सूचना आयोग और सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता और स्वतंत्रता प्रभावित होगी।
- सूचना के अधिकार से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ विशेषज्ञों का भी मानना है कि नया संशोधन विधेयक सूचना आयोग को केन्द्र सरकार के अधीन कर देगा।
- सूचना के अधिकार का पूरा क्रियान्वयन इस बात पर टिका है कि सूचना आयोग इसे कैसे लागू कराता है। आरटीआई एक्ट की स्वतंत्र कार्यविधि तभी तक संभव है जब इसे सरकार के नियंत्रण से बाहर रखा जाए।
- मौजूदा समय में केंद्रीय सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त और राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त आदि की स्थिति फिलहाल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर है। इस संशोधन के परिणामस्वरूप इसे घटा देने पर सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोगों को निर्देश जारी करने का उनका अधिकार भी कम हो जाएगा। यह संघीय तंत्र की अवज्ञा होगी। इससे गुड गवर्नेस और लोकतंत्र कमजोर होगा, ऐसा माना जा रहा है।
लोक सूचना अधिकारी
सहायक जन-सूचना अधिकारी
- सहायक जन-सूचना अधिकारी का दायित्व लोक सूचना अधिकारी को उनके कर्तव्यों के पालन में सहायता प्रदान करना है।
- यह अधिकारी नागरिकों से आरटीआई आवेदन प्राप्त करते हैं तथा उन्हें लोक सूचना अधिकारी अथवा संबंधित अपीलीय प्राधिकरण तक पहुंचाने का कार्य करते हैं।
- सहायक जन सूचना अधिकारी, सूचना उपलब्ध कराने हेतु बाध्य नहीं है।
- आरटीआई अधिनियम की धारा 4 के अनुसार प्रत्येक लोक प्राधिकरण के लिए मांग पर सूचना का विवरण स्वतः प्रस्तुत करना आवश्यक है।
- धारा 8(1) में आरटीआई अधिनियम के अंतर्गत सूचना प्रस्तुत करने से छूट का उल्लेख है।
- धारा 8(2) में सार्वजनिक हित की पूर्ति हेतु आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 के अंतर्गत छूट प्राप्त जानकारी के प्रकटीकरण का प्रावधान किया गया है।
आरटीआई अधिनियम के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
- लोक प्राधिकरणों द्वारा 'अपूर्ण आवेदन पत्र', 'राष्ट्रीय सुरक्षा' आदि जैसे आधारों पर आरटीआई आवेदनों को अस्वीकृत करने संबंधी प्रवृत्ति में बढ़ोत्तरी दिखायी दे रही है।
- लोक प्राधिकारी द्वारा आवेदकों को अपूर्ण, गलत अथवा अस्पष्ट सूचना प्रदान करने संबंधी शिकायतों में बढ़ोत्तरी हुई है।
- वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश में एक एसडीएम (SDM) तथा दो राजस्व अधिकारियों के विरुद्ध गलत जानकारी प्रदान करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया।
अपीलीय व्यवस्था
- प्रथम अपीलीय प्राधिकारी - यदि कोई व्यक्ति लोक सूचना अधिकारी के निर्णय अथवा उसकी कार्रवाई से असंतुष्ट है तो वह प्रथम अपीलीय प्राधिकारी के पास अपील कर सकता है। प्रथम अपीलीय प्राधिकारी, लोक सूचना अधिकारी का उच्चाधिकारी होता है।
केन्द्रीय सूचना आयोग
राज्य सूचना आयोग
उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग
- उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग का गठन सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15 के तहत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 14 सितम्बर, 2005 को किया गया।
- न्यायमूर्ति एम.ए. खान राज्य के प्रथम सूचना आयुक्त थे।
- सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 16 (1) के अनुसार राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त तथा राज्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष (जो भी पहले हो) तक होगा।
- राज्य सूचना आयुक्त की पुनः नियुक्ति नहीं की जा सकेगी।
- राज्य के तीसरे मुख्य सूचना आयुक्त श्री जावेद उस्मानी थे, जो 16 फरवरी, 2020 तक इस पद पर बने रहे।
- प्रदेश सरकार ने 7 मार्च, 2024 को पूर्व डीजीपी आर.के. विश्वकर्मा को राज्य का नया मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया है। इसके साथ ही राज्य में 10 नये सूचना आयुक्तों की नियुक्ति भी की गयी है।
समाधान योजना
उत्तर प्रदेश में समाधान योजना
- नागरिकों की समस्याओं एवं शिकायतों के समाधान हेतु उत्तर प्रदेश सरकार ने अनेक प्रभावी कदम उठाये हैं।
- आयुक्त, जिलाधिकारी, उप-जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक एवं तहसीलदार समेत प्रत्येक जिम्मेदार अधिकारी को शासन द्वारा निर्देशित किया गया है कि वे निर्धारित समय तक (सामान्यतः पूर्वान्ह 10 से अपरान्ह 2 बजे तक) अपने कार्यालय में बैठ कर जनता की समस्याओं को सुनें और उनके समाधान का प्रयास करें।
- प्रत्येक माह साप्ताहिक कार्यक्रम के अनुसार तहसील दिवस एवं थाना दिवस का आयोजन किया जाता है, जिसमें जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से लेकर लेखपाल एवं थाना अध्यक्ष स्तर तक के अधिकारी एवं कर्मचारी जनता की शिकायतों को सुनते तथा उनके समाधान का प्रयास करते हैं।
- मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा समय-समय पर जनता दरबार का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री स्वयं फरियादियों की शिकायतें सुनते एवं उनके समाधान का उपक्रम करते हैं।
उत्तर प्रदेश जनसुनवाई पोर्टल
- उत्तर प्रदेश सरकार ने कानून व्यवस्था की स्थिति सुधारने और लोगों के कामकाज से संबंधित विभागीय परेशानी को दूर करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश जनसुनवाई पोर्टल लॉन्च किया है।
- इस पोर्टल की सहायता से राज्य के लोगों की शिकायत का निवारण त्वरित गति से किया जा सकता है।
- पोर्टल के माध्यम से राज्य के सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार रोकने में सहायता प्राप्त होगी, ऐसा विश्वास किया जाता है। सरकार का उद्देश्य इस सुविधा का लाभ प्रदेश के सभी लोगों तक पहुंचाना है।
- उत्तर प्रदेश सरकार का प्रयास है कि राज्य में भ्रष्टाचार और आपराधिक घटनाओं पर रोक लगे तथा सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आए। इसी उद्देश्य को पूरा करने हेतु उत्तर प्रदेश सरकार ने जनसुनवाई पोर्टल आरंभ किया है।
- जनसुनवाई पोर्टल के माध्यम से कोई भी व्यक्ति घर बैठे इंटरनेट के माध्यम से अपनी शिकायत ऑनलाइन दर्ज करा सकता है, जिसका समाधान निर्धारित समय में प्राप्त होगा। अपनी शिकायत और उसके समाधान की स्थिति (Status) संबंधित व्यक्ति कभी भी जान सकता है।
- न्यायालय में विचाराधीन मामले
- सूचना का अधिकार से संबंधित प्रकरण
- आर्थिक सहायता या नौकरी की मांग
- सुझाव
- सरकारी सेवकों के स्थानांतरण एवं अन्य सेवा संबंधी प्रकरण।
- सरकारी योजनाओं के संबंध में।
- आम आदमी की समस्याओं से जुड़ी शिकायतें।
- जनता की मांग से जुड़ी शिकायतें।
दोस्तों, हमें उम्मीद है कि इस लेख में दी गई जानकारी आपके लिए मददगार साबित हुई होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए सही और सटीक जानकारी होना बहुत जरूरी है। ऐसे ही महत्वपूर्ण टॉपिक्स को आसान भाषा में पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट WWW.UPGK.IN पर नियमित रूप से विजिट करते रहें। इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!

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